उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने यहां नियुक्त किए गए 700 डॉक्टरों को उनके पदों से बर्खास्त करने का फैसला किया है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सरकार का कहना है कि इन डॉक्टरों की चयन के बाद नियुक्ति की जा चुकी है, लेकिन उन्होंने अभी तक ड्यूटी जॉइन करने की रिपोर्ट नहीं दी है। इसी के चलते राज्य सरकार को यह फैसला लेना पड़ा है।

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश सरकार का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब कोरोना वायरस को रोकने के लिए प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था को दुरुस्त रखना बेहद जरूरी है। हालांकि सरकार ने दावा किया है कि उसके इस फैसले से लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है। सूबे के स्वास्थ्य मंत्री जय प्रताप सिंह ने मीडिया से बातचीत में कहा, 'इन डॉक्टरों की बर्खास्तगी की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है। सभी को एक से डेढ़ महीने के अंदर सेवा से मुक्त कर दिया जाएगा। घबराने की कोई बात नहीं है। अच्छी तरह से देखभाल करने पर (कोरोना) वायरस को रोका जा सकता है। भारत इससे लड़ने के लिए तैयार है।' गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में अब तक कोरोना वायरस से जुड़े 13 संक्रमित मामलों की पुष्टि हो चुकी है।

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यूपी में क्या है डॉक्टरों की संख्या?
साल 2018 में नेशनल इस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया यानी नीति आयोग की ओर से जारी गई एक रिपोर्ट में बताया गया कि यूपी में डॉक्टरों की भारी कमी है। हालात ऐसे हैं कि उत्तर प्रदेश में करीब 20,000 मरीजों पर मात्र एक ही डॉक्टर उपलब्ध हो पाता है। इस मामले में देश में उत्तर प्रदेश का नंबर 21वें स्थान पर आता हैं, जो बड़े राज्यों की तुलना में सबसे खराब स्थिति है।

कुछ समय पहले आई एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश की खराब स्वास्थ्य सेवा के पीछे ग्रामीण इलाकों की बदहाली काफी हद तक जिम्मेदार है। बताया गया कि इन इलाकों के अस्पतालों का बुनियादी ढांचा काफी कमजोर है। साथ ही प्रदेश के स्वास्थ्य क्षेत्र में मेडिकल स्टाफ या कर्मचारियों (डॉक्टरों) की भारी कमी है। इसका असर शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों पर पड़ता है।

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साल 2018 में प्रकाशित एक अन्य सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के 3,621 ग्रामीण अस्पतालों के लिए सिर्फ 2,209 सरकारी डॉक्टर हैं। यानी प्रति ग्रामीण अस्पताल में डॉक्टरों की संख्या एक से भी कम है। वहीं, उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में 19,962 मरीजों पर केवल एक डॉक्टर उपलब्ध है। रिपोर्ट में बताया गया कि बिहार के बाद यूपी देश का ऐसा दूसरा राज्य है जहां डॉक्टर और मरीजों की संख्या के बीच इतना बड़ा अंतर है। बता दें कि बिहार में 28,391 मरीजों पर केवल एक डॉक्टर उपलब्ध है। वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो औसतन 11,082 रोगियों पर एक ही डॉक्टर नियुक्त हो पाता है।

अंतर पूरा करना मुश्किल
आंकड़े यह भी बताते हैं कि उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी इस स्थिति में सुधार करना काफी मुश्किल है। प्रदेश में स्वीकृत डॉक्टरों की संख्या केवल 18,732 है। साल 2017 में उत्तर प्रदेश में करीब 7,000 डॉक्टरों की कमी थी। हालांकि उसके बाद 2,532 नए डॉक्टरों की भर्ती जरूरी हुई थी। लेकिन यह संख्या हालात बदलने के लिए काफी नहीं लगते।

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