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वैज्ञानिकों ने डायलिसिस के बेहतर परिणाम हासिल करने के लिए रैडियल आर्टेरी डिविएशन एंड रीइंप्लांटेशन या 'रडार' नाम की एक नई तकनीक विकसित की है। अमेरिका की याले यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित की गई यह तकनीक सर्जिकली तैयार की गई रक्त वाहिकाओं में रक्त संचार को बेहतर करने का काम करती है। ये रक्त वाहिकाएं डायलिसिस की प्रक्रिया में इस्तेमाल की जाती हैं। खबर के मुताबिक, रडार तकनीक इन रक्त वाहिकाओं को ज्यादा समय तक बने रहने योग्य बनाती है और इनसे जुड़े जोखिमों को भी मौजूदा तकनीक की अपेक्षा कम करती है। इस तकनीक के विकास से जुड़ा अध्ययन साइंस ट्रांसलेशनल मेडिसिन पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है। इसमें बताया गया है कि नई तकनीक से जुड़े दावे इसे सैकड़ों मरीजों पर आजमाने और जानवरों पर आधारित अध्ययनों के आधार पर किए गए हैं।

डायलिसिस की मौजूदा तकनीक में मरीज के शरीर की एक छोटी नस को एक बड़ी नाड़ी (आर्टरियोवीनस फिस्टुला) से जोड़ देते हैं। इसके लिए वे मरीज की कलाई की नस का इस्तेमाल करते हैं। इससे उन दो नीडल्स में ब्लड फ्लो ज्यादा हो जाता है, जो रक्त को शरीर से खींच कर डायलिसिस मशीन में पहुंचाने और उससे वापस शरीर में लाने के काम आती हैं। पिछले 50 सालों से डायलिसिस के लिए यही तकनीक इस्तेमाल की जा रही है। याले स्कूल ऑफ मेडिसिन के डॉक्टर और इस अध्ययन के लेखक ऐलन डार्डिक का कहना है कि इस तकनीक के परिणाम सबसे ज्यादा खराब होते हैं।

ऐलन के मुताबिक, डायलिसिस की इस पारंपरिक तकनीक की वजह से 50 प्रतिशत मरीजों के फिस्टुला (शरीर के दो अंगों के बीच का जोड़ या कनेक्शन) एक साल के बाद इस्तेमाल करने योग्य नहीं रह जाते। महिलाओं के मामले में यह दर और कम हो जाती है। जिन मामलों में फिस्टुला को मेंटेन नहीं रखा जा पाता, उनमें मरीजों को आर्फिफिशियल ग्राफ्ट की जरूरत पड़ती। दुर्भाग्य से इसका सक्सेस रेट भी कम है। डॉ. ऐलन कहते हैं, 'आखिर में इन मरीजों को केवल कैथटर (नली के जरिये) के जरिये डायलिसिस दिए जाने का विकल्प बचता है।' इस प्रक्रिया में संक्रमण से लेकर मौत होने तक का खतरा रहता है। बताया जाता है कि फिस्टुला की अपेक्षा कैथटर से डायलिसिस देने से मृत्यु होने की दर 1.6 से 2.5 गुना ज्यादा होती है।

लेकिन रडार तकनीक में डायलिसिस की प्रक्रिया को रिवर्स यानी उल्टा चलाया जाता है। इसमें नस को नाड़ी से नहीं, बल्कि नाड़ी को नस से जोड़ा जाता है। वहीं, डायलिसिस के दौरान ब्लड को अस्थायी रूप से रोकने के लिए क्लैम्प्स की जगह टूर्निकेट का इस्तेमाल किया जाता है। इससे धमनी और नस को ज्यादा संभालने की जरूरत नहीं पड़ती, जैसा कि पारंपरिक तकनीक में करना पड़ता है। परिणामस्वरूप, मरीज के शरीर और डायलिसिस मशीन के बीच ब्लड फ्लो बेहतर हो जाता है और फिस्टुला मजबूत और टिकाऊ बनता है।

डॉ. ऐलन और उनकी सहयोगियों ने साल 2016 में शुरुआती अध्ययन के तहत रडार को 53 डायलिसिस मरीजों पर आजमाया था। दूसरे प्रयास में उन्होंने 201 मरीजों पर इस तकनीक का इस्तेमाल किया था, जिनकी धमनी को नस से जोड़ने वाली सर्जरी की गई थी। इस अध्ययन के परिणामों की तुलना ऐसे 73 अन्य मरीजों से की गई, जिनकी पारंपरिक तरीके से नस को धमनी से जोड़ने वाली सर्जरी की गई थी। एक साल बाद देखा गया कि रडार वाले 72.2 प्रतिशत मरीजों का फिस्टुला बरकरार था, जबकि पारंपरिक सर्जरी वाले केवल 48 प्रतिशत मरीजों में फिस्टुला सक्षम बना हुआ था। वहीं, तीन साल बाद रडार तकनीक से सर्जरी कराने वाले 62.1 प्रतिशत मरीजों का फिस्टुला बचा हुआ था। वहीं, पारंपरिक सर्जरी वाले केवल 37.6 प्रतिशत मरीजों में फिस्टुला बचा हुआ था। अच्छी बात यह रही कि रडार के परिणाम पुरुषों और महिलाओं दोनों में एक समान रहे।

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