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  1. डायलिसिस क्या होता है? - Dialysis kya hai in hindi?
  2. डायलिसिस क्यों की जाती है? - Dialysis kab kiya jata hai?
  3. डायलिसिस होने से पहले की तैयारी - Dialysis ki taiyari
  4. डायलिसिस कैसे किया जाता है? - Dialysis kaise hota hai?
  5. डायलिसिस के बाद देखभाल - Dialysis hone ke baad dekhbhal
  6. डायलिसिस की जटिलताएं - Dialysis me jatiltaye

जब गुर्दे उचित तरीके से कार्य करने में सक्षम नहीं रहते, तो ऐसी प्रक्रिया जिसमें मानव शरीर से जहरीले अपशिष्ट (Waste; वेस्ट) और अत्यधिक द्रव को निकाला जाता है, उसे डायलिसिस (Dialysis) कहा जाता है।

गुर्दे रीढ़ की हड्डी के दोनों ओर स्थित होते हैं। सामान्य परिस्थितियों में, गुर्दे शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को निकालने का कार्य करते हैं और इन अपशिष्ट पदार्थों को मूत्र के माध्यम से शरीर से बाहर निकाला जाता है।

डायलिसिस गुर्दे का सबसे महत्वपूर्ण कार्य करता है, जो कि शरीर का सारा कचरा बाहर करना है। इसलिए इस प्रक्रिया को गुर्दे की प्रतिस्थापन चिकित्सा (Renal Replacement Therapy) के रूप में भी जाना जाता है।

जब किसी व्यक्ति के गुर्दे ठीक से काम करना बंद कर देते हैं और शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को फ़िल्टर करने में सक्षम नहीं रहते, तो अपशिष्ट शरीर में जमा होने लगता है। यह गंभीर जटिलताएं पैदा कर सकता है। जब गुर्दे गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो जाते हैं और गुर्दे का फेलियर हो जाता है, तो डायलिसिस एक मुख्य विकल्प होता है। गुर्दे के फेलियर के कारण, रक्त ठीक से फ़िल्टर नहीं होता जिससे गंभीर दुष्प्रभाव होते हैं। जब गुर्दे की बीमारियां अनुपचारित रहती हैं, तो वे गंभीर जटिलताओं को जन्म देती हैं और अंततः गुर्दे के फेलियर का कारण बनती हैं। डायलिसिस की प्रक्रिया अवांछित पदार्थों और तरल पदार्थ को हटाने में मदद करती है इससे पहले कि गुर्दे की गंभीर बीमारी वाले किसी मरीज़ के गुर्दे फेल हों।

ज्यादातर स्थितियों में, गुर्दे का फेलियर स्थायी होता है, लेकिन ऐसा हमेशा हो ये ज़रूरी नहीं। अधिकांश मरीज़ों में गुर्दे के एक्यूट फेलियर (Acute Kidney Failure) का इलाज किया जा सकता है और मरीज़ को कुछ समय के लिए डायलिसिस की आवश्यकता होती है। गुर्दे के ठीक हो जाने पर, ज्यादातर रोगियों को डायलिसिस की आवश्यकता नहीं होती। गुर्दे के क्रोनिक फेलियर (Chronic Kidney Failure) और या अंत-स्तरीय गुर्दे के फेलियर (End-Stage Kidney Failure) में गुर्दे के ठीक होने की कोई सम्भावना नहीं होती और और डायलिसिस ही एक मात्र उपचार होता है। अत्यधिक गंभीर स्थितियों में डोनर के गुर्दे के साथ रोगी के गुर्दे के प्रत्यारोपण की ज़रुरत हो सकती है।

सर्जरी की तैयारी के लिए आपको निम्न कुछ बातों का ध्यान रखना होगा और जैसा आपका डॉक्टर कहे उन सभी सलाहों का पालन करना होगा: 

  1. सर्जरी से पहले किये जाने वाले टेस्ट्स/ जांच (Tests Before Surgery)
  2. सर्जरी से पहले एनेस्थीसिया की जांच (Anesthesia Testing Before Surgery)
  3. सर्जरी की योजना (Surgery Planning)
  4. सर्जरी से पहले निर्धारित की गयी दवाइयाँ (Medication Before Surgery)
  5. सर्जरी से पहले फास्टिंग खाली पेट रहना (Fasting Before Surgery)
  6. सर्जरी का दिन (Day Of Surgery)
  7. सामान्य सलाह (General Advice Before Surgery)
  8. ध्यान देने योग्य अन्य बातें (Other Things To Be Kept In Mind Before Surgery)
    जैसा कि उपर्लिखित है कि आपसे जुड़ी हर मेडिकल समस्या और दवाओं का ज्ञान आपके डॉक्टर को होना चाहिए। अगर आपकी इससे पहले कोई भी सर्जरी हुई है तो उसके बारे में अपने डॉक्टर को ज़रूर बताएं। अगर आपके शरीर में पेसमेकर डला हुआ है, तो यह भी आपके डॉक्टर को पता होना चाहिए। यह सारी जानकारी अत्यंत महत्वपूर्ण है। डायलिसिस उपचार के दौरान गर्भधारण करना जोखिम भरा हो सकता है। डायलिसिस के दौरान सफल गर्भावस्था मुम्किन है, लेकिन इसके लिए मरीज़ की स्थिति पर निरंतर जांच और निगरानी रखी जाने की आवश्यकता है। डायलिसिस उपचार के दौरान अगर आप गर्भावस्था की योजना बना रहीं हैं, तो अपने डॉक्टर के साथ ज़रूर बात करें। इससे जटिलताओं से बचने में मदद होगी। 

इन सभी के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए इस लिंक पर जाएँ - सर्जरी से पहले की तैयारी

डायलिसिस के दो मुख्य प्रकार हैं। 

  1. हेमोडायलिसिस (Hemodialysis): इसमें रक्त को एक बाहरी साधन की ओर मोड़ देता है जिससे फिल्टर्ड रक्त शरीर में वापस डाला जाता है। 
  2. पेरिटोनियल डायलिसिस (Peritoneal Dialysis): इस पद्धति में डायलिसिस द्रव को उदर गुहा में पंप किया जाता है जिससे रक्त वाहिकाओं में से अपिष्ट को बाहर निकला जा सके।

हेमोडायलिसिस (Hemodialysis)

अधिकांश रोगियों में, एक सप्ताह में हेमोडायलिसिस के तीन सत्र किए जाते हैं। प्रत्येक सत्र लगभग चार घंटे का हो सकता है। इस प्रक्रिया को अस्पताल या घर में (जब मरीजों को अपने आप डायलिसिस करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है) किया जाता है।

एवी नालव्रण (AV Fistula) में दो पतली सुइयों को डाला जाता है और टेप किया जाता है। एक सुई की सहायता से धीरे-धीरे रक्त निकाला जाता है और डायलाइज़र (Dialyzer) नामक डायलिसिस मशीन में स्थानांतरित किया जाता है।

इस डायलिसिस मशीन में एक विशेष प्रकार का द्रव होता है जिसे डायलिसेट (Dialysate) कहते हैं और झिल्ली (Membrane) की एक श्रृंखला होती है जो एक फिल्टर के रूप में काम करती है। ये झिल्ली रोगियों के खून से अपशिष्ट पदार्थों को फ़िल्टर करने में मदद करते हैं। बाद में, ये पदार्थ डायलिसेट द्रव में जाते हैं।

यह उपयोग किया हुआ डायलिसेट द्रव डायलिसिस मशीन से बाहर निकाला जाता है और फ़िल्टर्ड रक्त अन्य सुई की मदद से शरीर में वापस आ जाता है। हेमोडायलिसिस की प्रक्रिया सामान्य रूप से दर्दनाक नहीं होती। कुछ रोगियों को चक्कर आना और बीमारी का अनुभव हो सकता है और हेमोडायलिसिस के दौरान मांसपेशिओं में ऐंठन महसूस कर सकते हैं। हेमोडायलिसिस उपचार के दौरान रक्त में द्रव के स्तर में तेजी से बदलाव के कारण मांसपेशिओं में ऐंठन हो सकती है। डायलिसिस उपचार पूरा होने पर, सुइयों को हटाया जाता है और रक्तस्राव को रोकने के लिए, सुई लगाने की जगह पर प्लास्टर चढ़ाया जाता है। डायलिसिस के पूरा होने के बाद रोगी घर जा सकते हैं। मरीज़ की स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर अस्पताल में भर्ती होने के लिए कहा जाता है।

पेरिटोनियल डायलिसिस (Peritoneal Dialysis)

पेरिटोनियल डायलिसिस के दो मुख्य प्रकार हैं:

  1. कंटीन्यूअस एम्बुलेटरी पेरिटोनियल डायलिसिस (Continuous Ambulatory Peritoneal Dialysis, CAPD): इस प्रकार के डायलिसिस में, रोगियों का खून एक दिन में कई बार फ़िल्टर होता है।
  2. स्वचालित पेरिटोनियल डायलिसिस (Automated Peritoneal Dialysis, APD): इस प्रकार के डायलिसिस में, खून को रात को फ़िल्टर किया जाता है, जब रोगी सो रहा होता है।

पेरिटोनियल डायलिसिस के दोनों प्रकार घर पर किये जा सकते हैं जब रोगियों को खुद डायलिसिस करने के लिए प्रशिक्षित कर दिया जाता है।

कंटीन्यूअस एम्बुलेटरी पेरिटोनियल डायलिसिस (Continuous Ambulatory Peritoneal Dialysis, CAPD)

CAPD में, डायलिसिस के लिए एक विशेष उपकरण का उपयोग किया जाता है। इस उपकरण में डायलिसेट द्रव का एक बैग, अपशिष्ट उत्पादों को इकट्ठा करने के लिए एक खाली बैग और दोनों बैग सुरक्षित रखने के लिए टयूबिंग और क्लिप की एक श्रृंखला होती है। ऐसा इन बैगों को कैथेटर से जोड़कर किया जा सकता है।

CAPD प्रक्रिया के दौरान, रोगियों के पेट में कैथेटर के साथ डायलिसेट द्रव का एक बैग जुड़ा होता है। यह पेरिटोनियल गुहा में द्रव प्राप्त करने और कुछ घंटों तक वहां रहने में मदद करता है। अपशिष्ट पदार्थों और शरीर के अतिरिक्त द्रवों को पेरिटोनियल गुहा लाइनिंग के माध्यम से खून से निकाल दिया जाता है जबकि डायलिसेट द्रव पेरिटोनियल गुहा में छोड़ दिया जाता है।

कुछ घंटों के बाद, पुराना द्रव अपशिष्ट इकट्ठा करने के लिए रखे बैग में चला जाता है। नया द्रव रोगी की पेरीटोनियल गुहा में पुराने द्रव की जगह ले लेता है और अगले उपचार सत्र तक वहां रहता है। द्रव एक्सचेंज की प्रक्रिया कम दर्दनाक होती है और इसे पूरा होने में लगभग 30-40 मिनट लगते हैं। हालांकि इसमें कम दर्द होता है, लेकिन शुरुआत में मरीजों द्वारा असुविधा अनुभव की जा सकती है। डायलिसिस के सत्र के दौरान, बैग को हटाया जाता है। कैथेटर के एंड्स को सही से सील किया जाना आवश्यक है।

स्वचालित पेरिटोनियल डायलिसिस (Automated Peritoneal Dialysis, APD)

जब रोगी सोने जा रहा होता है, तब स्वचालित पेरिटोनियल डायलिसिस मशीन (APD) के साथ जुड़े हुए बैग को डायलिसेट द्रव से भरा जाता है। जब रोगी नींद में होता है, तो APD मशीन द्वारा स्वचालित रूप से विभिन्न द्रव एक्सचेंज किये जाते हैं। इस प्रक्रिया को आम तौर पर 8-10 घंटे लगते हैं। उपचार के पूरा होने के बाद, कुछ मात्रा में डायलिसेट द्रव रोगी के पेट में रहता है। उपचार के अगले सत्र में यह द्रव निकल जाता है। यदि रात को रोगी शौचालय जाना चाहता है, तो द्रव एक्सचेंज की प्रक्रिया में रुकावट हो सकती है। कुछ स्थितियों में, APD के दौरान बिजली कटौती से जुड़े जोखिमों की वजह परेशानी रहती है। अगर एक रात द्रव एक्सचेंज न किया जाए तो भी कोई परेशानी की बात नहीं है क्योंकि उपचार 24 घंटों में ही शुरू होता है। तकनीकी आपातकालीन परेशानियों के लिए मरीज़ अपनी मेडिकल टीम से संपर्क कर सकते हैं। असामन्य परेशानियों को रिपोर्ट कर देना चाहिए जिससे आगे होने वाली किसी भी प्रकार की जटिलता से बचा जा सके।

आहार (Diet; डाइट)

डायलिसिस उपचार का प्रयोग कर रहे रोगियों को, आहार (डाइट) और तरल पदार्थ प्रतिबंधों का पालन करना चाहिए। आपके द्वारा सेवन किये जा रहे तरल पदार्थों की मात्रा पर प्रतिबन्ध होता है क्योंकि डायलिसिस मशीन दो से तीन दिनों के अतिरिक्त द्रव की मात्रा को निकालने में सक्षम नहीं है। रक्त, फेफड़े और अन्य ऊतकों में अतिरिक्त द्रव का निर्माण गंभीर जटिलताओं को जन्म दे सकता है। रोगियों के आकार और वजन के आधार पर, डॉक्टरों द्वारा द्रव का सेवन तय किया जाता है। अधिकांश रोगियों को प्रति दिन 1000-1500ml द्रव की अनुमति दी जाती है। रोगियों के आहार की भी सावधानीपूर्वक योजना बनाने की आवश्यकता है क्योंकि खनिजों की खपत से शरीर में खनिज संचय (Mineral Accumulation) के जोखिम को बढ़ा सकता है। डायलिसिस प्रक्रिया से गुजरते समय बेहतर आहार योजना के लिए मरीजों को डायटीशियन से संपर्क करने के लिए कहा जाता है। डाइट रोगियों के आधार पर भिन्न होती है। इन रोगियों को पोटेशियम और फॉस्पोरस युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन न करने के लिए कहा जाता है। जटिलताओं से बचने के लिए नमक सेवन को भी कम करने की सलाह दी जाती है। डायलिसिस सामान्य रूप से सप्ताह में तीन बार किया जाना चाहिए।

प्रक्रिया के कारण होने वाली तकलीफ (Discomfort Due To The Process)

डायलिसिस की प्रक्रिया के कारण कुछ रोगियों को तकलीफ का अनुभव होता है। डायलिसिस की प्रक्रिया दर्द रहित है, फिर भी कुछ मामलों में सुई की वजह से तकलीफ हो सकती है। कुछ रोगियों को रक्तचाप कम होना, पेट खराब होना, सिरदर्द, ऐंठन और उल्टी का अनुभव हो सकता है। उपचार के लगातार सत्र के बाद, ये लक्षण गायब हो जाते हैं और रिकवरी भी जल्दी होने लगती है।

सफलता दर (Success Rate)

डायलिसिस का सफलता दर रोगियों के गुर्दे की क्षति और स्वास्थ्य स्थिति पर आधारित है। जब तक कि मरीजों को गुर्दा प्रत्यारोपण सर्जरी करवाने की सलाह नहीं दी जाती, तब तक उन्हें गुर्दे के फेलियर के उपचार के लिए डायलिसिस प्रक्रिया की ज़रुरत होती है। रोगियों द्वारा प्राप्त चिकित्सा और उपचार के अनुसार जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) का निर्धारण किया जाता है। डायलिसिस के बाद औसत रोगी 5 से 10 वर्षों तक जीवित रह सकते हैं। ऐसे रोगियों के कई उदाहरण हैं जो 20 से अधिक वर्षों तक जीवित रहे हों। डायलिसिस के दौरान मरीजों को स्वस्थ जीवन शैली का पालन करना चाहिए। यह उन्हें जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने में मदद करता है।

गर्भवस्था की योजना (Planning Pregnancy While On Dialysis)

डायलिसिस के दौरान पुरुष रोगी अपने साथी के साथ गर्भवस्था की योजना बना सकते हैं। लेकिन महिला रोगियों में, गर्भावस्था के कारण कई परेशानियां हो सकती हैं। एक साथ गुर्दे का फेलियर और गर्भावस्था महिला और बच्चे दोनों के लिए स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानी का कारण बन सकते हैं। इसके अलावा इससे गुर्दे की बीमारी और बढ़ सकती है। गर्भावस्था की योजना बनाने से पूर्व एक बार अपने चिकित्सक से सलाह ज़रूर करें। इससे गर्भस्थ में होने वाली जटिलताओं से बचा जा सकता है।

हेमोडायलिसिस और पेरिटोनियल डायलिसिस के जोखिम और दुष्प्रभाव भी हैं। डायलिसिस प्रक्रिया के दुष्प्रभाव नीचे दिए गए हैं।

दीर्घकालिक डायलिसिस की वजह से मरीज़ को पूरा दिन थकान महसूस हो सकती है। कई बार, थकान गुर्दे की कार्यवाही की परेशानी, डायलिसिस के दौरान आहार प्रतिबंध और पूरी प्रक्रिया के दौरान होने वाले तनाव के कारण हो सकती है। रोगी को अपने ऊर्जा स्तर के बारे में सर्जन को सूचित करना होगा। सर्जन ऊर्जा प्रदान करने वाले आहार और व्यायाम बताएँगे। (और पढ़ें – थकान कम करने के घरेलू उपाय)

डायलिसिस के बाद मरीज के स्वास्थ्य के आधार पर कम-से-मध्यम ऊर्जा वाले व्यायाम किये जा सकते हैं।

हेमोडायलिसिस के दुष्प्रभाव

रक्तविषंणता (Sepsis)
इस प्रक्रिया के मरीजों में सेप्सिस (रक्त के विषाक्तता) विकसित करने की अधिक संभावना रहती है। बैक्टीरिया इस चरण में इन रोगियों के शरीर में प्रवेश करते हैं और पूरे शरीर में फैल जाते हैं। इससे मल्टिपल ऑर्गन फेलियर हो सकता है। चक्कर आना और उच्च तापमान सेप्सिस के संकेत हैं। अन्य असामान्य लक्षणों के साथ इन लक्षणों के पाए जाने पर, रोगियों को डायलिसिस सर्जन को सूचित चाहिए। समय पर उपचार करने से जटिलताओं की गंभीरता को कम किया जा सकता है। सेप्सिस विकसित होने पर, एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती हैं।

निम्न रक्त चाप (Hypotension Or Low Blood Pressure)
हाइपोटेन्शन या निम्न रक्तचाप हेमोडायलिसिस प्रक्रिया का सामान्य दुष्प्रभाव है। यह डायलिसिस प्रक्रिया के दौरान तरल पदार्थ के स्तर में कमी का एक परिणाम है। निम्न रक्तचाप के परिणामस्वरूप, मरीज मतली और चक्कर आना अनुभव कर सकते हैं। यदि लक्षण स्थायी हैं तो रोगियों को सर्जन से परामर्श करना चाहिए। यह जल्दी रिकवरी पाने में मदद कर सकता है।

मांसपेशियों में ऐंठन (Muscle Cramps)
डायलिसिस प्रक्रिया के दौरान, रोगी मांसपेशियों की ऐंठन का अनुभव कर सकते हैं; विशेष रूप से पैर के निचले हिस्से में। यह डायलिसिस प्रक्रिया में हुए तरल पदार्थ के नुकसान के लिए मांसपेशियों की प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप होती है। बेहद दर्दनाक मांसपेशियों की ऐंठन होने पर सर्जन को तुरंत सूचित करें।

त्वचा पर खुजली (Itching Of The Skin)
रोगी त्वचा पर खुजली का अनुभव कर सकते हैं। यह सत्रों के दौरान शरीर में खनिज के बनने की वजह से है। खुजली से निजात पाने हेतु डॉक्टर मॉइस्चराइजिंग या स्मूथनिंग क्रीम्स निर्धारित कर सकते हैं। (और पढ़ें - खुजली दूर करने के घरेलू उपाय)

द्रव अधिभार (Fluid Overload)
गुर्दा डायलिसिस के परिणामस्वरूप, रोगियों में द्रव की अधिक मात्रा हो सकती है। इससे बचने के लिए, रोगियों को एक निश्चित मात्रा में द्रव का उपभोग करने की आवश्यकता होती है। 

अन्य दुष्प्रभाव (Other Side Effects)
हेमोडायलिसिस प्रक्रिया के कुछ अन्य दुष्प्रभाव हैं, जैसे:

  1. मुंह का सूखना (Dryness Of Mouth)
  2. घबराहट (Anxiety)
  3. अनिद्रा (Insomnia; नींद आने में कठिनाइयों) (और पढ़ें - अनिद्रा के आयुर्वेदिक उपचार)
  4. यौन इच्छा में कमी (Loss Of Sex Drive)
  5. स्तंभन दोष (Erectile Dysfunction) (और पढ़ें – इरेक्टाइल डिसफंक्शन के लिए दवा)

पेरिटोनियल डायलिसिस के दुष्प्रभाव

हर्निया (Hernia)
पेरिटोनियल डायलिसिस के माध्यम से उपचार पाने वाले मरीजों में हर्निया से प्रभावित होने की अधिक संभावना रहती है। यह पेरिटोनियल गुहा में लंबे समय तक तरल पदार्थ रखने के कारण होता है। इसके परिणामस्वरूप, पेट की मांसपेशियों पर तनाव बढ़ जाता है। गांठ (Lump) का प्रकटन शरीर में हर्निया के विकास का एक प्रमुख लक्षण है। यह गांठ दर्द रहित हो सकती है और विस्तृत जांच-पड़ताल के बाद ही इसका पता लगाया जा सकता है। हर्निया की इस स्थिति को सर्जरी द्वारा ठीक किया जाता है। उदर भित्ति (Abdominal Wall) को मज़बूत करने के लिए एक कृत्रिम जाल (Synthetic Mesh) लगाया जा सकता है। (और पढ़ें - हर्निया के कारण)

वज़न बढ़ना (Weight Gain)
पेरिटोनियल डायलिसिस करते समय प्रयुक्त तरल पदार्थ में शुगर मोलेक्युल होते हैं। इनमें से कुछ डायलिसिस की प्रक्रिया के दौरान शरीर में अवशोषित हो जाते हैं। इससे रोगियों के शरीर में कैलरी की मात्रा में वृद्धि होती है। कैलोरी की दैनिक खपत का ध्यान न रखने के कारण वजन बढ़ने लगता है। जिन मरीज़ों में वज़न बढ़ने का खतरा ज़्यादा होता है, उनके लिए डॉक्टर डाइट और व्यायाम की योजना बना सकते हैं।  
रोगी फैड डाइट (Fad Diet), जो वजन कम करने का दावा करते हैं, न लें। अत्यधिक परहेज़ से शरीर में समस्याएं हो सकती हैं जिनसे विभिन्न विकार हो सकते हैं। 

पेरिटोनिटिस (Peritonitis)
पेरिटोनिटिस पेरिटोनियम (Perotoneum) का एक बैक्टीरियल संक्रमण है। यह पेरिटोनियल डायलिसिस प्रक्रिया का  दुष्प्रभाव है। ऐसा तब हो सकता है जब डायलिसिस के लिए इस्तेमाल किए गए उपकरण स्वच्छ स्थिति में नहीं होते। डायलिसिस उपकरण पर मौजूद बैक्ट्रिया रोगियों के पेरिटोनियम में फैलता है और यह संक्रमित हो जाता है। संक्रमण से बचने के लिए डायलिसिस उपकरण को स्वच्छ रखने के लिए कहा जाता है। पेरिटोनिटिस के लिए एंटीबायोटिक उपचार की आवश्यकता होती है। जिन मरीज़ों में संक्रमण की पुनरावृत्ति हो रही हो, उन्हें इस डायलिसिस प्रक्रिया के बजाय हेमोडायलिसिस प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए।

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