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वर्ल्ड हार्ट डे या विश्व हृदय दिवस पर डॉ. विल्लेम एंथोवेन की पुण्य तिथि भी होती है। डॉ.एंथोवेन एक डच चिकित्सक थे जिन्होंने सन् 1903 में पहली व्यावहारिक इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम या ईसीजी की खोज की। इस आविष्‍कार के लिए उन्हें सन् 1924 में चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

डॉ. एंथोवेन ने इतालवी वैज्ञानिक और चिकित्सक डॉ. ल्युगी गैलवानी (जिनके नाम पर गैल्वेनोमीटर का नाम रखा गया था) के काम को आगे बढ़ाया था। डॉ. गैलवानी ने धातु के टुकड़ों को मरे हुए मेंढक के पैर लगाने पर उसमें सनसनाहट देखी थी। उन्होंने इस घटना को 'एनिमल इलेक्ट्रिसिटी' नाम दिया। इसके बाद अन्य वैज्ञानिक एलेसैंडर वोल्टा ने बताया कि किसी कीड़े से लेकर मनुष्यों तक सभी जीवित जीवों में विद्युत धाराएं (इलेक्ट्रिक करंट) मौजूद होती हैं। 

डॉ. गैलवानी के मूल गैल्वेनोमीटर (जिसका 1820 में आविष्कार किया गया था) में सुधार या बदलाव लाने की कोशिश जारी थी। इसी क्रम में सन् 1838 में इटली के शहर पीसा में भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर कार्लो मैटेउसी ने एक मेंढक के हृदय को उसके पैर की मांसपेशियों से जोड़ा और देखा कि उसका पैर प्रत्येक धड़कन के साथ संकुचित हो रहा था। इससे उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि उस मेंढक का हृदय किसी तरह का इलेक्ट्रिकल सिग्नल दे रहा था।

सन् 1887 में एक ब्रिटिश फिजियोलॉजिस्ट ऑगस्टस वालर ने पता लगाया कि हमारी त्वचा की सतह से भी हृदय की गतिविधि को रिकॉर्ड किया जा सकता है। उन्होंने फोटोग्राफिक प्लेटों पर हृदय के संकेतों का पता लगाने के लिए कैपिलरी इलेक्ट्रोमीटर नामक एक उपकरण का उपयोग किया। 

ऑगस्टस वालर के एक्‍सपेरिमेंट से डॉ एंथोवेन प्रेरित हुए। डॉ. एंथोवेन ने सन् 1902 में हृदय की गतिविधि के संकेतों को रिकॉर्ड करने के लिए एक उपकरण बनाया। ह्रदय की तरंगों के वर्णन के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला 'इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम' शब्द पहली बार 1893 में एंथोवेन द्वारा ही उपयोग में लाया गया था। डॉ. एंथोवन ने हार्ट इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी में पांच ऊपर और नीचे 'तरंगों' की पहचान की, जिन्हें उन्होंने P, Q, R, S और T (जो आज भी इस्तेमाल किए जाते हैं) नाम दिया। ये अक्षर ग्राफ के आरंभ या नीचे बाएं कोने में लिखे O के बाद होते हैं। पुरानी मशीन के मैग्नेट को ठंडा करने के लिए पानी की आवश्यकता होती थी, जिसका वजन लगभग 300 किलोग्राम होता था और जिसका आकार एक पूरे कमरे जितना था। 

निरंतर प्रयासों के बाद सन् 1928 में पहली पोर्टेबल ईसीजी मशीन का निर्माण हुआ जिसे वाहनों की बैटरी द्वारा संचालित किया गया था और जिसका वजन लगभग 20 किलो था। छोटे ट्रांजिस्टर इलेक्ट्रॉनिक्स का आविष्कार होने तक वाहनों की बैटरी का ही इस्‍तेमाल किया जाता था। माइक्रोचिप्स के विकास के बाद 12 चैनल ईसीजी जैसी मशीनों के विकास में मदद मिली, जिनका वर्तमान समय में इस्‍तेमाल किया जाता है।

हाल ही में अमेरिका की प्रसिद्ध कंपनी एप्पल ने एक ऐसी वॉच लांच की है जिसमें इलेक्‍ट्रोकार्डियोग्राफी ऐप है। एप्‍पल के एप्‍पल वॉच सीरीज 4 से 30 सेकंड के अंदर ईसीजी किया जा सकता है। इसके लिए यूज़र को स्मार्ट वॉच के डिजिटल क्राउन पर अपनी उंगली रखनी होती है, जिसके बाद ईसीजी होना शुरु हो जाता है। इस क्राउन पर इलेक्ट्रोड लगे हुए होते हैं। 

अमेरिका की एफडीए द्वारा ऐसे उपकरणों को क्लास II डिवाइस के रूप में वर्गीकृत किया गया है। हालांकि, अब यह देखना है कि इस तरह के डिजिटल डिवाइस को चिकित्‍सा के क्षेत्र में जांच के तौर पर कब स्वीकृति मिल पाती है। हालांकि, इस बात में कोई संदेह नहीं है कि विज्ञान और खोज करने की मनुष्‍य की इच्छा ने हमें हृदय रोग की जांच करने में बहुत सक्षम बना दिया है। जहां पहले ईसीजी के लिए एक कमरे जितनी बड़ी मशीन का इस्‍तेमाल किया जाता था, वहीं अब वो काम कुछ ईंच की घड़ी करने लगी है।

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