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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कोविड-19 बीमारी के इलाज और रोकथाम के संबंध में हाल में कुछ अहम बयान दिए हैं। इनमें उसने कहा है कि यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता वैज्ञानिक कोविड-19 की वैक्सीन बना ही लेंगे। हालांकि, उसने यह भी कहा है कि कोविड-19 की वैक्सीन बनाने का काम तेजी से हुआ है और अगर कोई प्रभावी वैक्सीन वजूद में आती है तो उसे पूरी तरह तैयार करने का काम अगले कुछ महीनों में पूरा हो सकता है। इसके अलावा, कोरोना वायरस सार्स-सीओवी-2 की वजह से होने वाली इस बीमारी की रोकथाम के लिए डब्ल्यूएचओ और उसके सहयोगियों ने दुनियाभर की सरकारों से 31 अरब डॉलर यानी करीब दो लाख 34 हजार 446 करोड़ रुपये की मांग की है।

अब तक किसी कोरोना वायरस की वैक्सीन 'नहीं'
कोविड-19 के इलाज और रोकथाम को लेकर डब्ल्यूएचओ के तमाम बयानों का महत्व तभी है जब इस बीमारी की कारगर वैक्सीन तैयार कर ली जाए। यह बात इस मायने में महत्वपूर्ण है कि डब्ल्यूएचओ खुद पूरी तरह आश्वस्त नहीं है कि कोविड-19 की वैक्सीन बनाने में वैज्ञानिक सफल हो ही जाएंगे। खबर है कि यूरोपीय संसद के स्वास्थ्य समिति के साथ हुई एक वीडियो कॉन्फ्रेंस में डब्ल्यूएचओ के प्रमुख टेड्रोस गेब्रेयसस ने कहा है कि यह यकीन से नहीं कहा जा सकता कि कोविड-19 की वैक्सीन बना ली जाएगी। कॉन्फ्रेंस में डब्ल्यूएचओ प्रमुख ने कहा, 'यह कहना बहुत मुश्किल है कि हम निश्चित रूप से वैक्सीन बना लेंगे। कोरोना वायरस की कोई वैक्सीन आज तक नहीं बनी है। हम उम्मीद करते हैं कि इस बार वैक्सीन बना ली जाएगी। ऐसा हुआ तो (यह किसी कोरोना वायरस की) पहली वैक्सीन होगी।'

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इसके अलावा टेड्रोस ने कहा कि वैक्सीन का बनना मुश्किल है, लेकिन अगर ऐसा होता है तो यह काम एक साल या उससे भी कम समय में हो सकता है। ट्रेडोस के मुताबिक, 'वैक्सीन बनने की उम्मीद लगाई जा रही है। ऐसा अनुमान है कि एक साल के अंदर हमारे पास वैक्सीन होगी। अगर काम और तेजी से हो तो और कम समय में वैक्सीन उपलब्ध हो सकती है। फिर भी कुछ महीने तो लगेंगे। ऐसा वैज्ञानिकों का कहना है।'

कुछ वैक्सीन एडवांस स्टेज में
कोविड-19 के इलाज के संबंध में डब्ल्यूएचओ का बयान इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इस बीमारी की काट निकालने के लिए बनाई जा रही कुछ वैक्सीन अपने अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। इनमें ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और दवा कंपनी एस्ट्राजेनेका के संयुक्त प्रयास से तैयार की जा रही चीएचएडीओएक्स1 वैक्सीन और अमेरिकी दवा कंपनी मॉडेर्ना द्वारा निर्मित वैक्सीन सबसे आगे हैं। शुक्रवार को डब्ल्यूएचओ की प्रमुख वैज्ञानिक सौम्या स्वामीनाथन ने खुद कहा कि ये दोनों कंपनियां दवा बनाने की एडवांस स्टेज पर पहुंच गई हैं। स्वामीनाथन ने यह भी बताया कि डब्ल्यूएचओ चीन में कोविड-19 की वैक्सीन बनाने में लगी कंपनियों के संपर्क में हैं। इनमें 'साइनोवैक' भी शामिल है।

डॉ. सौम्या स्वामीनाथन के मुताबिक, वैक्सीन बनाने के अलावा बड़े पैमाने पर इसके डोज तैयार करना भी एक बड़ी चुनौती है, जिसके लिए 18 अरब डॉलर या एक लाख 36 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की फंडिंग की जरूरत होगी। उन्होंने कहा कि इस समय दुनियाभर में 200 से ज्यादा वैक्सीन पर काम चल रहा है, जिनमें से 15 का अलग-अलग स्तर पर ह्यूमन क्लिनिकल ट्रायल किया जा रहा है। टेड्रोस गेब्रेयसस की तरह स्वामीनाथन ने भी उम्मीद जताई है कि आने वाले महीनों (12 से 18) के दौरान वैक्सीन तैयार हो सकती है।

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31 अरब डॉलर की जरूरत
कोविड-19 की वैक्सीन बनाने के अलावा इसकी टेस्टिंग और ट्रीटेमेंट की तैयारी के लिए भी काफी पैसा खर्च होगा, जिसके लिए डब्ल्यूएचओ और उसकी सहयोगी संस्थानों ने दुनियाभर की सरकारों से अगले 12 महीनों में 31 अरब डॉलर यानी दो लाख 34 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा का फंड इकट्ठा करने को कहा है। संयुक्त राष्ट्र की स्वास्थ्य एजेंसी ने बताया कि अभी तक 3.4 अरब डॉलर (25,713 करोड़ रुपये से ज्यादा) का योगदान किया गया है, जबकि 27.9 अरब डॉलर (दो लाख 11 हजार करोड़ रुपये से अधिक) मिलना अभी बाकी हैं। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, इस रकम में से 13.7 अरब डॉलर यानी एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की फंडिंग तुरंत किए जाने की जरूरत है।

इस मांग को लेकर डब्ल्यूएचओ प्रमुख डॉ. टेड्रोस एडनॉम गेब्रेयसस ने कहा है, 'यह अब साफ है कि कोविड-19 को नियंत्रित करने और लोगों की जिंदगी बचाने के लिए हमें असरदार वैक्सीन, डायग्नॉस्टिक और चिकित्सा उपकरणों को अभूतपूर्व गति के साथ अभूतपूर्व मात्रा में उपलब्ध कराने की जरूरत है। यह भी साफ है कि कोविड-19 का खतरा सब लोगों पर है, इसलिए इसकी रोकथाम, पहचान और इलाज के लिए जरूरी उपकरणों की पहुंच भी सब लोगों तक होनी चाहिए, न कि केवल उन लोगों तक जो इनकी कीमत चुका सकते हैं।'

खबरों के मुताबिक, कोविड-19 को लेकर डब्ल्यूएचओ ने जितनी रकम की मांग की है, उसकी उपलब्धता होने पर उन देशों में कोरोना वायरस के संक्रमण की पहचान के लिए 50 करोड़ टेस्ट और 24.5 करोड़ ट्रीटमेंट कोर्सेज की मांग पूरी हो पाएगी, जो आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं। इसके अलावा, कोविड-19 की दो अरब वैक्सीन बनाने का काम भी संभव हो पाएगा, जिनमें से आधी वैक्सीन मध्य और निम्न आय वाले देशों को उपलब्ध कराई जाएंगी।

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