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आपने यह बात जरूर नोटिस की होगी कि जब भी आपको चोट लगती है, प्रभावित हिस्से पर एक उभार बन जाता है, थोड़ी सूजन हो जाती है और लालिमा भी आ जाती है और कई बार प्रभावित हिस्सा छूने पर गर्म भी महसूस होता है। यह शरीर में प्रत्यक्ष रूप से होने और दिखने वाला इन्फ्लेमेशन है। इन्फ्लेमेशन एक मौलिक हथियार है जिसका इस्तेमाल हमारे शरीर का इम्यून सिस्टम (प्रतिरक्षा तंत्र) करता है ताकि किसी भी तरह की चोट लगने पर, घाव होने पर या इंफेक्शन होने पर शरीर को फिर से स्वस्थ किया जा सके। आमतौर पर प्रोटीन का एक कठिन तंत्र इस इन्फ्लेमेशन को चालू करने और बंद करने का काम करता है।

कुछ मामलों में हालांकि इम्यून सिस्टम बढ़ जाता है जिसे वैज्ञानिक समृद्ध प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया के तौर पर जानते हैं। इसका मतलब है कि अचानक और स्थानीय प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया शुरुआत में तो बेहद जरूरी होती है, लेकिन कुछ मौकों पर वह बहुत ज्यादा या नियंत्रण से बाहर हो जाती है। जब साइटोकीन्स (एक तरह का प्रोटीन जिसका इस्तेमाल इम्यून सेल्स एक दूसरे से बात करने के लिए करते हैं) के अत्यधिक उत्पादन के कारण ऐसा होता है तो इसे ही साइटोकीन स्टॉर्म या साइटोकीन स्टॉर्म सिंड्रोम (सीएसएस) कहते हैं। साइटोकीन स्टॉर्म खतरनाक होता है क्योंकि यह ऑर्गन्स को नुकसान पहुंचा सकता है, उन्हें खराब कर सकता है जिससे आखिरकार मौत भी हो सकती है।

हालांकि साइटोकीन स्टॉर्म यह शब्द वायरल इंफेक्शन के संदर्भ में हाल ही में प्रचलन में आया है, लेकिन चिकित्सक, कई तरह के सिस्टेमिक इम्यून सिस्टम अनियंत्रण के बारे में हजारों सालों से जानते हैं- कम से कम तब से जब से पहली बार सेप्सिस को डायग्नोज किया गया था। (साइटोकीन स्टॉर्म की वजह से अक्सर सेप्सिस की समस्या होती है लेकिन ये दोनों एक ही चीज नहीं है)

हम आपको बता दें कि साइटोकीन स्टॉर्म इस शब्द को 1993 में गढ़ा गया था जिसका संबंध अंग प्रत्यारोपण के दौरान होने वाली जटिलता ग्राफ्ट वर्सेस होस्ट डिजीज से है। साल 2003 में साइटोकीन स्टॉर्म को वायरल इंफेक्शन से लिंक पाया गया। कई ऐसे वायरल इंफेक्शन जिनकी वजह से मरीजों में साइटोकीन स्टॉर्म की समस्या देखने को मिलती है, वे हैं:

कुछ गैर-संक्रामक बीमारियां भी हैं जिनकी वजह से साइटोकीन स्टॉर्म की समस्या हो सकती है जैसे- अग्नाशयशोथ या पैनक्रियाटाइटिस (अग्नाशय में इनफ्लेमेशन होना, अग्नाशय एक ऐसा अंग है जो पाचन एन्जाइम्स और इंसुलिन जैसे हार्मोन के उत्पादन के लिए जिम्मेदार होता है) और मल्टीपल स्क्लेरोसिस (एक ऑटोइम्यून बीमारी है जिसमें इम्यून सिस्टम नसों के आसपास मौजूद शरीर के सुरक्षात्मक आवरण या लेयर पर ही हमला करने लगता है)। पिछले 15 सालों में अत्यधिक साइटोकीन के उत्पादन (साइटोकीन रिलीज सिंड्रोम) पर भी गहन रूप से कई अध्ययन किए गए हैं जिसमें कैंसर के संदर्भ में की जाने वाली इम्यूनोथेरेपी जैसे- सीएआर-टी के संभावित दुष्प्रभाव शामिल हैं।

जैसा कि यह शब्द स्टॉर्म मतलब आंधी यह संकेत देता है कि जैसे-जैसे समय गुजरता है यह और ज्यादा गंभीर होता जाता है। साइटोकीन स्टॉर्म को शुरुआती स्टेज में ही बेहतर तरीके से कंट्रोल किया जा सकता है क्योंकि आखिरी स्टेज में आते-आते यह शरीर के महत्वपूर्ण अंगों जैसे- फेफड़े, हृदय और किडनी को क्षतिग्रस्त करने लगता है। 

हालांकि यह कहना आसान है लेकिन करना मुश्किल। प्रतिरक्षा कोशिकाएं (इम्यून सेल्स) एक दूसरे से बात करने के लिए साइटोकीन्स के एक बेहद मुश्किल और परस्पर व्याप्त तंत्र का इस्तेमाल करती हैं और इस प्रक्रिया को सेल सिग्नलिंग के नाम से जाना जाता है। साइटोकीन्स कई अलग-अलग तरह के होते हैं- कुछ प्रोइन्फ्लेमेट्री होते हैं (इनसे इन्फ्लेमेशन होता है), बाकी कुछ ऐसे भी होते हैं जो एंटी-इन्फ्लेमेट्री होते हैं। इसके अलावा कुछ जैसे- इंटरल्युकिन-6 या आईएल-6 प्लीयोट्रोपिक या बहुपोषित होते हैं जो प्रो और एंटी दोनों हो सकते हैं।

ऐसे में साइटोकीन्स क्या हैं, साइटोकीन स्टॉर्म क्या है, साइटोकीन कितने तरह का होता है, कोविड-19 जैसे श्वास संबंधी इंफेक्शन में साइटोकीन का रोल क्या है, मरीजों में साइटोकीन स्टॉर्म के क्या संकेत या लक्षण नजर आते हैं, इन सभी बातों के बारे में हम आपको इस आर्टिकल में बता रहे हैं।

  1. कोविड-19 में साइटोकीन स्टॉर्म
  2. साइटोकीन के प्रकार - Cytokine storm ke type in Hindi
  3. साइटोकिन स्टॉर्म के लक्षण - Cytokine storm ke symptoms in Hindi
  4. साइटोकिन स्टॉर्म का कारण - Cytokine storm kyu hota hai
  5. साइटोकीन स्टॉर्म को डायग्नोज कैसे करते हैं? - Cytokine storm ka diagnosis in Hindi
  6. साइटोकिन स्टॉर्म से जुड़ी जटिलताएं - Cytokine storm se jude complications in Hindi
  7. साइटोकीन स्टॉर्म का इलाज - Cytokine storm ka treatment in Hindi
साइटोकीन स्टॉर्म के डॉक्टर

मार्च 2020 से वैज्ञानिकों को यह मालूम है कि गंभीर कोविड-19 के मामले में 2 तरह की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया (इम्यून रिऐक्शन) देखने को मिलता है। एक है इम्यूनोडेफिशिएंट जिसमें इम्यून सिस्टम वायरस से लड़ने में अक्षम होता है और दूसरा है जिसे वैज्ञानिक इम्यूनोपैथोलॉजिकल कहते हैं जिसमें इम्यून रेस्पॉन्स की वजह से बीमारी होती है। साइटोकीन स्टॉर्म दूसरी वाली प्रतिक्रिया का नतीजा है। अनुसंधानकर्ताओं की मानें तो कोविड-19 में होने वाले साइटोकीन स्टॉर्म में शुरुआत में 2 चीजें होती हैं:

  • हेल्पर टी-सेल्स से होने वाली टीएच1 प्रतिक्रिया परिवर्तित हो जाती हैं और पर्याप्त एंटीवायरल एक्टिविटी के लिए इम्यून सिस्टम पर्याप्त मात्रा में सी8+ कोशिकाओं को रिलीज नहीं करती है।
  • इसकी जगह और ज्यादा इंटरल्युकिन्स जिसमें टीएनएफ-ए, आईएल-6 और आईएल-10 शामिल है का शरीर में उत्पादन होने लगता है।

फेफड़ों में मौजूद एयर सैक्स में मौजूद कोशिका पर सार्स-सीओवी-2 जैसा कोई सांस संबंधी वायरस जब आक्रमण करता है तो ये चीजें होती हैं:

  • वायरस कोशिका में गुप्त तरीके से प्रवेश करता है। लेकिन एक बार जब वह अपनी कॉपी बनाना शुरू करता है तब कोशिका को पता चलता है कि उस पर बाहरी आक्रमण हुआ है।
  • एयर सैक के अंदर मौजूद मैक्रोफेजेस (सफेद रक्त कोशिकाएं जो रोगाणु को खाकर उन्हें मारती हैं) वायरस को क्षतिग्रस्त करना शुरू करते हैं। साथ ही साथ वे साइटोकीन्स को भी भेजते हैं ताकि वे दूसरे इम्यून सेल्स को मदद के लिए बुला सकें।
  • न्यूट्रोफिल्स, दूसरे तरह की सफेद रक्त कोशिका जो आमतौर पर खून में सर्कुलेट होती है, वे कोशिका में प्रवेश कर प्रतिक्रिया देना शुरू करती हैं और प्रो-इन्फ्लेमेट्री तत्व रिलीज करने लगती हैं जैसे- ल्युकोट्राइन्स, पीएएफ, ऑक्सिडेंट्स और प्रोटीयाज आदि।
  • ल्युकोट्राइन्स की वजह से इन्फ्लेमेशन होता है और वायुमार्ग संकुचित होने लगते हैं। इससे और ज्यादा म्यूकस और तरल पदार्थों का उत्पादन होने लगता है। इस वजह से सांस लेने में मुश्किल होने लगती है।
  • एयर सैक के अंदर मौजूद फाइब्रोब्लास्ट एक और तरह की सफेद रक्त कोशिका भी और ज्यादा साइटोकीन को रिलीज करने लगती है। साथ ही वे प्रो-कोलाजन का भी निर्माण करने लगते हैं जो बाद में कोलाजन में बदल जाता है ताकि एयर सैक में मौजूद फाइबर से मरहम पट्टी की जा सके। मदद करने की बजाए इस मरहम लगाने वाले तत्व की वजह से ज्यादा समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
  • जैसे ही इन्फ्लेमेशन शुरू होता है कोशिकाएं, सफेद रक्त कोशिका को भेजती हैं और कोशिका के अंदर तरल पदार्थ भरने लगता है। प्रभावित एयर सैक के बगल में मौजूद केशिकाओं के अंदर छोटे-छोटे खून के थक्के बनने लगते हैं।
  • इस दौरान मैक्रोफेजेज टीएनएफ-ए, आईएल-1, आईएल-6 और आईएल-8 जैसे साइटोकीन्स को रिलीज करते रहते हैं।
  • एयर सैक की दीवार और रक्त धमनी की बाहरी दीवार जो एयर सैक के बगल से गुजर रही होती है उसे नुकसान पहुंचता है। ऐसा सफेद रक्त कोशिकाओं और मरम्मत के लिए गुजर रहे तरल पदार्थ के कारण होता है। एक बार जब ये दीवारें टूट जाती हैं उसके बाद तरल पदार्थ इन केशिकाओं से निकलकर एयर सैक में लीक होने लगता है।
  • प्रोटीन और तरल पदार्थों की यह वृद्धि ही सीटी-स्कैन में फेफड़ों में मौजूद कांच की अपारदर्शिता के तौर पर नजर आता है।

साइटोकीन्स मुख्य रूप से प्रोटीन है जिसका निर्माण प्रतिरक्षा कोशिकाएं (जैसे- माक्रोफेजेस, न्यूट्रोफिल्स और लिम्फोसाइट्स जिसमें टी-सेल्स, बी सेल्स और एनके सेल्स शामिल है) एक दूसरे से बात करने के लिए करती हैं। साइटोकीन्स कई अलग-अलग प्रकार के होते हैं और उनका स्पष्ट किरदार और उत्पादन मापदंड होता है। अनुसंधानकर्ताओं द्वारा अब तक निम्नलिखित प्रकार के साइटोकीन्स के बारे में खोज की गई है:

  • इंटरल्युकिन्स : इंटरल्युकिन्स (आईएल) करीब 40 प्रकार का होता है जिन्हें उनके काम और वे किन रिसेप्टर्स के साथ जुड़े हुए हैं इसके आधार पर बांटा जाता है। उदाहरण के लिए- आईएल-1 अल्फा, आईएल-1 बीटा, आईएल-2, आईएल-6, आईएल-8 और आईएल-29। ये इंटरल्युकिन्स अलग-अलग तरह के काम करते हैं जैसे- प्रतिरक्षा कोशिकाओं को सक्रिय करना, कोशिका पृथक्करण और ज्यादा साइटोकीन्स का उत्पादन करना। माइक्रोबायोलॉजी और मोलेक्यूलर बायोलॉजी नाम के जर्नल में प्रकाशित 'इंटू द आई ऑफ द साइटोकीन स्टॉर्म' के मुताबिक साइटोकीन्स, अक्यूट फेज सिगनलिंग को बढ़ा देते हैं, प्राइमरी इंफेक्शन वाली जगह पर प्रतिरक्षा कोशिकाओं को पहुंचाते हैं, एपिथेलियम कोशिका को सक्रिय करते हैं और सेकंडरी साइटोकीन का उत्पादन करते हैं। आपने कोविड-19 से होने वाली मौत के संबंध में इंटरल्युकिन्स का नाम सुना होगा। वास्तव में, आईएल-6 एक प्रोइंफ्लेमेट्री साइटोकीन है जिसे कोविड-19 की गंभीर बीमारी से जोड़कर देखा जाता है।
  • ट्यूमर नेक्रोसिस फैक्टर : ट्यूमर नेक्रोसिस फैक्टर या टीएनएफ साइटोकीन्स का संबंध कई वायरल बीमारियों जैसे- इबोला वायरस और डेंगू फीवर में नकारात्मक नतीजों से है। इन साइटोकीन्स में से टीएनएफ-ए को सेप्सिस में इसके रोल के लिए जाना जाता है। दुनियाभर में जितने लोग हर साल सेप्सिस से मरते हैं उतने कैंसर से नहीं मरते। टीएनएफ के अत्यधिक उत्पादन का लिंक ऑटोइम्यून बीमारियों से भी है। हालांकि टीएनएफ इन्हीबीटर्स कई बार उन लोगों को प्रिस्क्राइब किया जाता है जिन्हें इन्फ्लेमेट्री बाउल डिजीज (आईबीडी) और क्रॉन्स डिजीज हो। अनुसंधानकर्ताओं की मानें तो ये प्रोइन्फ्लेमेट्री साइटोकीन्स साइटोटॉक्सिक टी सेल्स को सक्रिय बनाती हैं।
  • इंटरफेरॉन्स : ये साइटोकीन्स और दूसरे रोगाणुओं से लड़ने में शरीर की मदद करते हैं। इंटरफेरॉन्स (आईएफएनएस) जन्मजात इम्यूनिटी के लिए जिम्मेदार होते हैं और साथ ही साथ अनुकूलनीय इम्यूनिटी के लिए भी। कोविड-19 जैसे वायरल इंफेक्शन के मामले में आईएफएन गामा इम्यून सिस्टम के माक्रोफेजेस को सक्रिय करता है जिससे इन्फ्लेमेशन ट्रिगर होता है और टीएच1 कोशिका की प्रतिक्रिया नियंत्रित होती है। मददगार टी सेल्स इम्यून सिस्टम का ही हिस्सा हैं। टीएच1 प्रतिक्रिया सी8+ कोशिकाओं को रिलीज करने के लिए जिम्मेदार होती हैं जो विशिष्ट एंटीवायरल को रिलीज करते हैं ताकि बीमारी से लड़ा जा सके।
  • कीमोकाइन्स : केमिकल स्टीमूली के मुताबिक ये साइटोकीन्स कोशिकाओं की गतिविधियों के लिए जिम्मेदार होते हैं। ये प्रोटीन ल्यूकोसाइट्स की भर्ती करते हैं ताकि वे आकर इंफेक्शन से लड़ सकें।
  • कॉलोनी-स्टिमुलेटिंग फैक्टर्स : ये प्रोटीन्स कई दूसरे कार्य करने के साथ ही मैक्रोफेजेस और ग्रैनुलोसाइट्स (दोनों सफेद रक्त कोशिकाओं का प्रकार हैं) के उत्पादन के लिए जिम्मेदार होते हैं।

अमेरिका के द एनआईएच नैशनल कैंसर इंस्टिट्यूट ने साइटोकीन की जो परिभाषा दी है उसके मुताबिक, "एक बेहद गंभीर प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया जिसमें शरीर बहुत ज्यादा मात्रा में साइटोकीन को खून में बहुत जल्दी जल्दी रिलीज करने लगता है...कई बार साइटोकीन स्टॉर्म बेहद गंभीर या जानलेवा भी साबित हो सकता है क्योंकि इसके कारण एक साथ कई अंग काम करना बंद कर सकते हैं या फेल हो सकते हैं। इसे हाइपरसाइटोकीनेमिया भी कहते हैं।" इंस्टिट्यूट के मुताबिक साइटोकीन स्टॉर्म के बाहर से दिखने वाले कुछ संकेत इस प्रकार हैं:

जांच के वक्त डॉक्टर को शरीर के कुछ अंग खासकर लिवर और स्प्लीन बढ़े हुए भी नजर आ सकते हैं। साइटोकीन रिलीज सिंड्रोम इम्यूनोथेरेपी का साइड इफेक्ट है। इसे अत्यधिक साइटोकीन्स के उत्पादन के तौर पर भी जाना जाता है। साइटोकीन रिलीज सिंड्रोम से जुड़े कुछ लक्षण इस प्रकार हैं:

एचआईवी-एड्स की एक दुर्लभ जटिलता जिसे हीमोफैगोसाइटिक लिम्फोहिस्टियोसाइटोसिस (एचएलएच) कहते हैं की वजह से होने वाले साइटोकीन स्टॉर्म के कारण ये लक्षण नजर आ सकते हैं:

  • बुखार
  • स्प्लीन का बढ़ना
  • लिवर का बढ़ना
  • कम्प्लीट ब्लड काउंट असामान्य होना (न्यूट्रोफिल काउंट खून के 1 हजार प्रति माइक्रोलीटर से कम हो सकता है, हीमोग्लोबिन 9 ग्राम प्रति डीएल से कम हो सकता है और प्लेटलेट काउंट 1 लाख के नीचे हो सकता है)
  • खून में ट्राइग्लिसराइड का लेवल अत्यधिक होना या फिर खून में फाइब्रिनोजेन का लेवल बेहद कम होना
  • हीमोफैगोसाइटोसिस
  • तंत्रिका संबंधी समस्याएं जैसे- अटैक्सिया (चलने में दिक्कत), मानसिक स्तर में बदलाव और दौरे पड़ना
  • मसूड़ों से खून आना और दांत गिरना
  • स्किन पर चक्त्ते पड़ना 
  • पेट में लगातार दर्द रहना
  • उल्टी आना
  • डायरिया
  • भूख न लगना

साइटोकीन स्टॉर्म इनमें से किसी भी वजह से ट्रिगर हो सकता है फिर चाहे वह बैक्टीरियल इंफेक्शन हो, वायरल इंफेक्शन, किसी तरह की चोट, सर्जरी के बाद होने वाला इंफेक्शन इत्यादि। लेकिन इसके होने का स्पष्ट कारण क्या है इसके बारे में अब तक कोई जानकारी नहीं मिली है। कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि कुछ लोग आनुवांशिक रूप से पहले से ही प्रवृत्त होते हैं इस चीज के लिए कि उनके शरीर में अनुपात से अधिक इम्यून प्रतिक्रिया होगी।

साइटोकीन रिलीज सिंड्रोम कई बार कुछ दवाइयों और थेरेपीज की वजह से भी ट्रिगर हो सकता है जैसे- सीएआर-टी थेरेपी कैंसर के लिए और दूसरी इम्यूनोथेरेपीज जिसमें हमारा इम्यून सिस्टम संभावित रूप से जानलेवा बीमारियों से लड़ाई करता है।

इसका कारण चाहे जो हो, साइटोकीन स्टॉर्म इन्फ्लेमेट्री प्रोटीन के खुद ही जारी रहने और रिलीज होने की घटना है या फिर किसी कारण से इन्फ्लेमेशन को नियंत्रित न कर पाने की अक्षमता। ये प्रोटीन, क्षतिग्रस्त हिस्से को दुरुस्त करने के लिए सफेद रक्त कोशिकाओं को बुलाते हैं। हालांकि इसकी शुरुआत तो मददगार और मजबूत करने वाली प्रक्रिया के तौर पर होती है, लेकिन यह तब खतरनाक और जानलेवा बनने लगता है जब अचानक बहुत ज्यादा मात्रा में प्रोइन्फ्लेमेट्री साइटोकीन्स का उत्पादन होने लगता है। रक्त धमनियां जो इस प्रोटीन को क्षतिग्रस्त उत्तकों तक पहुंचने की इजाजत देती हैं, वे आखिरकार टपकने लगती हैं। इसके बाद प्रतिरक्षा कोशिकाएं (इम्यून सेल्स) स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला करने लगती हैं जिससे अंदरूनी अंगों को बहुत ज्यादा नुकसान होने लगता है।

लक्षण और संदर्भ के अलावा डॉक्टर कुछ डायग्नोस्टिक्स की भी मदद लेते हैं यह जानने के लिए कि किसी को साइटोकीन स्टॉर्म का खतरा है या नहीं:

  • सी-रिऐक्टिव प्रोटीन: लिवर के द्वारा इन प्रोटीन्स को रिलीज किया जाता है। खून में सी-रिऐक्टिव प्रोटीन के बढ़े हुए लेवल को साइटोकीन स्टॉर्म से भी जोड़कर देखा जाता है। 
  • एरिथ्रोसाइट सेडिमेंटेशन रेट: डॉक्टर कई बार एरिथ्रोसाइट सेडिमेंटेशन रेट (ईएसआर) टेस्ट का सुझाव भी देते हैं क्योंकि ईएसआर में अचानक कमी आना पबी साइटोकीन स्टॉर्म से जुड़ा हो सकता है।
  • प्रोकैल्सिटोनिन: प्रोकैल्सिटोनिन टेस्ट उन मामलों में ज्यादा फायदेमंद होता है जहां साइटोकीन स्टॉर्म किसी बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से होता है ना की वायरल इंफेक्शन की वजह से। इसे सेप्सिस का पता लगाने में इस्तेमाल किया जाता है।
  • प्रोटीन सिरम एमिलॉयड ए, फेरिटिन और फाइब्रिनोजेन का बढ़ा हुआ लेवल भी डॉक्टरों को अलर्ट करता है कि व्यक्ति के शरीर में कुछ तो गलत हो रहा है।
  • अंगों को होने वाले नुकसान का पता लगाने वाले टेस्ट जिसमें कंप्लीट ब्लड काउंट के अलावा लिवर फंक्शन टेस्ट के जरिए भी प्रॉब्लम का पता लगाया जा सकता है। 
  • हाइपोएल्बमीनेमिया: अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि हाइपोएल्बुमीनेमिया या खून में एल्बुमिन के लेवल में कमी भी इस बात का संकेत हो सकती है कि साइटोकीन के कारण हुए नुकसान की वजह से खून आसपास के उत्तकों में लीक हो रहा है।
  • कोविड-19 से संबंधित साइटोकीन स्टॉर्म के बारे में अब भी डॉक्टर फुलप्रूफ टेस्ट का पता लगाने में जुटे हैं। ऐसा करना बेहद जरूरी है क्योंकि अगर बीमारी के बारे में जल्दी पता चल जाएगा तो बीमारी को गंभीर होने से और कोविड-19 से होने वाली मौतों को कम किया जा सकेगा।

इसके बारे में रिसर्च फिलहाल जारी है। अभी के लिए वैज्ञानिकों का कहना है कि डॉक्टरों और मेडिकल प्रफेशनल्स को इन डायग्नोस्टिक्स पर नजर रखनी चाहिए:

  • न्यूट्रोफिल्स-टू-लिम्फोसाइट रेशियो (एनएलआर) जो इन्फ्लेमेशन का शुरुआती संकेतक है। अगर इसे सभी कोविड-19 मरीजों में मॉनिटर किया जाए तो इस बात की पहचान करना आसान हो जाएगा कि किसे गंभीर बीमारी होगी। एनएलआर की अधिक उपस्थिति का संबंध हृदय रोग और कैंसर के मरीजों के स्वास्थ्य के बुरे नतीजों और मृत्यु से भी है।
  • न्यूट्रोफिल-टू-सीडी8+ टी सेल रेशियो (एन8आर) भी एक शुरुआती मार्कर है जिसका संबंध गंभीर कोविड-19 से है
  • खून की जांच की जाए ताकि जाने-माने इन्फ्लेमेट्री मार्कर खासतौर पर साइटोकीन आईएल-6 का लेवल बढ़ा है या नहीं इसका पता लगाया जा सके
  • उत्तकों को होने वाले संकेतों का पता लगाया जाए खासकर अक्यूट किडनी इंजुरी, हृदय को होने वाला नुकसान या लिवर नुकसान के संदर्भ में
  • खून का थक्का जमने की प्रक्रिया का अतिसक्रिय (ओवरऐक्टिव) होना

साइटोकीन स्टॉर्म की समस्या से पीड़ित मरीज की सेहत बेहद तेजी से खराब होने लगती है। बाद से स्टेज में तो साइटोकीन स्टॉर्म की वजह से कई अंगों को भी नुकसान होने लगता है जैसे:

साइटोकीन स्टॉर्म से जुड़ी जटिलताओं को कोविड-19 की वजह से होने वाली मौत के तौर पर भी जाना जाता है।

साइटोकीन स्टॉर्म का इलाज उसके कारण पर निर्भर करता है। अब तक डॉक्टर बैक्टीरियल इंफेक्शन और कैंसर इम्यूनोथेरेपी की वजह से होने वाले साइटोकीन स्टॉर्म के बारे में काफी कुछ जानते हैं। हालांकि साइटोकीन स्टॉर्म जो वायरल इंफेक्शन की वजह से होता है वह एक नया क्षेत्र है। कोविड-19 के संदर्भ में देखें तो डॉक्टर मौजूदा समय में इम्यूनोसप्रेसेंट जैसे- स्टेरॉयड डेक्सामेथेसोन, सेलेक्टिव साइटोकीन इन्हीबिटर्स और एंटी-इन्फ्लेमेट्री दवाइयों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इनमें वे दवाइयां शामिल हैं जिससे रुमेटायड आर्थराइटिस का इलाज किया जाता है ताकि कोविड-19 मरीजों में गंभीर बीमारी और मौत के खतरे को कम किया जा सके।

 

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उत्पाद या दवाइयाँ जिनमें साइटोकीन स्टॉर्म है

संदर्भ

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