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कोविड-19 महामारी की वजह से दुनियाभर में एक शब्द सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने लगा है। यह शब्द है 'सोशल डिस्टेंसिंग'। कोविड-19 के लिए जिम्मेदार नए कोरोना वायरस सार्स-सीओवी-2 को और ज्यादा फैलने से रोकने के लिए भारत समेत कई देशों में सोशल डिस्टेंसिंग की नीति अपनाई जा रही है। इसके चलते करोड़ों लोगों ने एक-दूसरे से दूरी बनाते हुए खुद को घरों में बंद कर लिया है। लेकिन अब इस सोशल डिस्टेंसिंग की नीति को एक नए शब्द 'फिजिकल डिस्टेंसिंग' से चुनौती मिलती दिख रही है।

दरअसल, कई जानकारों और मेडिकल विशेषज्ञों का कहना है कि फिजिकल डिस्टेंसिंग यानी (लोगों के बीच की) 'शारीरिक दूरी', सोशल डिस्टेंसिंग से बेहतर विकल्प है। यह बात ऐसे समय में कही जा रही है, जब खुद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सोशल डिस्टेंसिंग के बजाय फिजिकल डिस्टेंसिंग शब्द का इस्तेमाल करना शुरू किया है। कई मेडिकल विशेषज्ञों ने डब्ल्यूएचओ की इस नई शब्दावली को 'सही दिशा' में उठाया गया कदम बताया है।

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डब्ल्यूएचओ की आधिकारिक वेबसाइट पर दी गई कोविड-19 से जुड़ी टाइमलाइन से यह पता चल जाता है कि अब संयुक्त राष्ट्र की यह शाखा लोगों को कोरोना वायरस से दूर रखने की शब्दावली में बदलाव कर रही है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें बताती हैं कि बीती 20 मार्च को डब्ल्यूएचओ के अधिकारियों ने एक वक्तव्य में कहा कि इस महामारी के चलते जहां फिजिकल डिस्टेंसिंग बनाए रखना बेहद जरूरी है, वहीं इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि हम सामाजिक रूप से अपने परिवार और प्यार करने वालों से अलग हो जाएं।

डब्ल्यूएओ की एपिडेमियॉलजिस्ट मारिया वैन केरखोव ने कहा, 'आज तकनीक इस स्तर की है कि हम शारीरिक उपस्थिति के बिना ही कई तरीकों से एक-दूसरे से जुड़े रह सकते हैं। लिहाजा हम अब (सोशल डिस्टेंसिंग शब्द में) बदलाव के तहत फिजिकल डिस्टेंस कहना शुरू कर रहे हैं, क्योंकि हम चाहते हैं कि लोग एक-दूसरे से जुड़े रहें।'

गलत अर्थ न निकालें लोग
डब्ल्यूएचओ ने जो बात कही, उसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि लोग घरों से निकल कर पहले की तरह मिलना-जुलना शुरू कर दें। उसका मकसद यह समझाना है कि सोशल डिस्टेंसिंग का अर्थ एक-दूसरे से शारीरिक दूरी बनाए रखना है। लेकिन चूंकि कई लोग 'सोशल' शब्द की वजह से इस दूरी को 'समाज से कटना' या 'बातचीत बंद कर देना' समझ रहे हैं (ताकि वे बीमारी की चपेट में न आएं), इसलिए इसके मनोवैज्ञानिक और सामाजिक दुष्प्रभावों को ध्यान में रखते हुए अब फिजिकल डिस्टेंसिंग शब्द का इस्तेमाल शुरू किया गया है। ऐसे में इसकी संभावना है कि जल्दी ही सभी जगह सोशल डिस्टेंसिंग की जगह फिजिकल डिस्टेंसिंग प्रचलित हो जाए।

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क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
अमेरिका की स्टैन्फोर्ड यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफेसर जेरेमी फ्रीस एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान से बातचीत में कहते हैं, 'सोशल डिस्टेंसिंग सुन कर लगता है कि लोगों को आपस में संपर्क बंद कर देना चाहिए, जबकि एक समुदाय के रूप में एक-दूसरे से शारीरिक दूरी बनाते हुए हमें ज्यादा से ज्यादा रक्षात्मक होना चाहिए। निश्चित ही एक-दूसरे की शारीरिक सुरक्षा के मद्देनजर हमें फिजिकल डिस्टेंसिंग रखनी चाहिए, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य भी जरूरी है और समाज से दूर हो जाना इसके लिए अच्छा नहीं है।'

वहीं, लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में सामाजिक मनोविज्ञान और कार्य-पद्धति अनुसंधान के प्रोफेसर मार्टिन बोअर भी इस भाषायी बदलाव का स्वागत करते हैं। उनका कहना है, 'मुझे शुरू से ही भाषायी चयन के रूप में 'सोशल डिस्टेंसिंग' दुर्भाग्यपूर्ण लगा। असली अर्थ तो फिजिकल 'डिस्टेंस ही था'।' मार्टिन ने आगे कहा, 'शारीरिक दूरी मीटर या सेंटीमीटर में देखी जाती है। यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के बीच भौगोलिक दूरी बताती है, जबकि सोशल डिस्टेंसिंग को सामाजिक सीमाओं के तहत मांपा जाता है। यह अच्छी बात है कि डब्ल्यूएचओ ने अब पिछली गलती ठीक करने की कोशिश की है।'

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भारत के लिए इस बदलाव का महत्व
यह अब लग रहा है कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया और अन्य प्लेटफॉर्मों पर जल्दी ही सोशल डिस्टेंसिंग की जगह, फिजिकल डिस्टेंसिंग का इस्तेमाल होने लगेगा। भारत के संदर्भ में इसका काफी महत्व है, क्योंकि यहां सरकार से लेकर आम लोगों तक सोशल डिस्टेंसिंग शब्द बहुत ज्यादा प्रचलित हो चुका है। सरकार कोरोना वायरस से संबंधित हर अभियान में इसी शब्द का इस्तेमाल कर रही है।

हालांकि कोविड-19 के मामले में भारत सरकार डब्ल्यूएचओ के निर्देशों का अच्छे से पालन कर रही है, ऐसे में हो सकता है कि सरकार के स्तर पर नई शब्दावली देखने को मिले। अब देखना यह है कि यहां आम लोगों के जहन में स्थापित हो चुके सोशल डिस्टेंसिंग शब्द का सही अर्थ समझाने के लिए वह क्या कदम उठाती है।

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