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डाउन सिंड्रोम - Down Syndrome in Hindi

Dr. Medhavi AgarwalMBBS,MD

December 22, 2020

December 22, 2020

डाउन सिंड्रोम
डाउन सिंड्रोम

भारत में 1000 बच्चो में से 1 बच्चा डाउन सिंड्रोम के साथ पैदा होता है। इस विकार से चार लाख से अधिक भारतीय पीड़ित हैं और फिर भी चारों ओर इसकी जागरूकता बहुत कम है। सामान्य बच्चों की तुलना में, डाउंस सिंड्रोम से पीड़ित बच्चो का मानसिक और शारीरिक विकास धीमा रहता है। डाउन सिंड्रोम एक अलग आकर के चेहरे, बौद्धिक विकलांगता (intellectual disability) और विकास में देरी (developmental delays) का कारण बनता है।

सबसे पहले इसके सामान्य लक्षणों को वर्गीकृत ब्रिटिश डॉक्टर जॉन लैंग्डन डाउनस ने किया था इसलिए इनके नाम पर इस विकार का नाम रखा गया। 21 मार्च को वर्ल्ड डाउन सिंड्रोम दिवस मनाया जाता है। आइए जानते हैं डाउन सिंड्रोम से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में  -

डाउन सिंड्रोम के लक्षण - Down Syndrome Symptoms in Hindi

डाउन सिंड्रोम से पीड़ित अधिकतर बच्चों की माँसपेशियां और जोड़ ढीले होते हैं। डाउन सिंड्रोम वाले कई बच्चे हृदय, आंत, कान या श्वास संबंधी समस्याओं के साथ भी पैदा होते हैं। सामान्य बच्चों की तुलना में, इन बच्चों में बुद्धि का स्तर काफी कम होता है। यह अतिरिक्त आनुवंशिक सामग्री (genetic material) मानसिक और शारीरिक विकास को धीमा कर देती है।

डाउन सिंड्रोम वाले बच्चों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जैसे हार्ट सर्जरी, श्वसन समस्या, अल्जाइमर और कैंसर का सामना करना आदि।

वो माता-पिता जिनके घर में डाउन सिंड्रोम वाले बच्चे ने जन्म लिया है, वो चिंतित और दुखी रहते हैं। लेकिन उचित समर्थन और उच्च मेडिकल मदद के साथ डाउन सिंड्रोम से पीड़ित बच्चों के जीवन को सुधारा जा सकता है।

डाउन सिंड्रोम के कारण - Down Syndrome Causes in Hindi

सामान्य रूप से शिशु 46 क्रोमोसोम के साथ पैदा होता है। 23 क्रोमोसोम का एक सेट शिशु अपने पिता से और 23 क्रोमोसोम का एक सेट अपनी माँ से ग्रहण करता है। लेकिन डाउन सिंड्रोम तब होता है जब माता या पिता अतिरिक्त क्रोमोसोम का योगदान करते हैं। डाउन सिंड्रोम से पीड़ित शिशु में एक अतिरिक्त 21वा क्रोमोसोम आ जाता है जिससे उसके शरीर में क्रोमोसोम्स की संख्या बढ़कर 47 हो जाती है। यदि आप 35 या उसके अधिक उम्र के बाद गर्भवती होती हैं, यदि आपके किसी भाई या बहन को यह विकार हुआ है या अगर पहले बच्चे को डाउन सिंड्रोम है, तो दूसरे बच्चे में भी इसका ख़तरा बढ़ जाता है।

डाउन सिंड्रोम का पता कैसे लगाएँ - How is Down Syndrome Diagnosed in Hindi

दुनिया भर के बच्चों में डाउन सिंड्रोम सबसे आम गुणसूत्र आनुवंशिक असामान्यता (chromosomal genetic abnormality) है।

भारत के लगभग सभी शहरों में अच्छे क्लीनिक हैं जो डाउन सिंड्रोम स्क्रीनिंग टेस्ट करते हैं - जो गर्भावस्था के 13 या 14 सप्ताह के भीतर किया जाता है। यह एक गैर-इनवेसिव स्क्रीनिंग टेस्ट है जो केवल इतना बताता है कि आपके शिशु को डाउन सिंड्रोम होने की कितनी संभावना है। उच्च जोखिम वाले लोगों के लिए, गर्भाशय में एक सुई लगाकर डाउन सिंड्रोम का पता लगाया जाता है। इसके बारे में जानकारी के लिए कई अन्य तरीके अपनाए जाते हैं जैसे – ड्यूल टेस्ट, ट्रिपल टेस्ट, अल्ट्रा सोनोग्राॅफी इत्यादि। इन परीक्षणों के बाद सही समय में उचित इलाज किया जा सकता है।

(और पढ़ें - गर्भावस्था में पेट में दर्द और गर्भवती महिला के लिए भोजन)

डाउन सिंड्रोम का इलाज है - Down Syndrome Treatment in Hindi

आजकल डाउन सिंड्रोम वाले लोग पहले की बजाए ज्यादा लंबा जीवन जी रहे हैं। 1983 में औसत जीवन प्रत्याशा 25 साल होती थी, जबकि आज यह बढ़कर 60 साल हो गई है।

डाउन सिंड्रोम से पीडित रोगी के लिए परेशानियां तो कई होती हैं, यहां तक ​​कि उनके लिए हर दिन चुनौतियों से भरा होता है, लेकिन अच्छी खबर यह है कि डाउन सिंड्रोम वाले व्यक्तियों के अधिकांश परिवार काफ़ी खुश और सकारात्मक हैं और उन्होने इस डाउन सिंड्रोम के साथ अच्छे से जीना सीख लिया है।



डाउन सिंड्रोम के डॉक्टर

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