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जब डिलीवरी योनि द्वारा होती है तो कभी कभी बच्चे को बाहर आने के लिए थोड़ी और जगह की आवश्यकता होती है जिसके लिए महिलाओं की योनि और गुदा (Anus) के बीच के क्षेत्र जिसे पेरिनियम (Perineum) कहते हैं, फट जाती है और उसमें  टांका लगाना पड़ता है। खासकर ये स्थिति उन महिलाओं में उत्पन्न होने की संभावना अधिक होती है जो पहली बार मां बनती हैं। लगभग दस में से नौ महिलाओं में चीरा लगाना पड़ता है। यह सुनने में खतरनाक लगता है, लेकिन सबसे अच्छी बात यह है कि ये चीरे छोटे होते हैं और इनमें से कुछ में तो टांके लगाने की भी आवश्यकता नहीं होती है। पेरिनियम के फटने को चार वर्गों में बांटा गया है। तीसरे और चौथे डिग्री के चीरे काफी दुर्लभ होते हैं, लेकिन इनमें काफी दर्द होता है। जब बच्चा योनि मार्ग से निकलता है तो उस दौरान आपको चोट भी लग सकती है।

(और पढ़ें - प्रसव पीड़ा और नॉर्मल डिलीवरी)

  1. डिलीवरी के बाद टांकों की आवश्यकता - Requirement of perineal stitches after vaginal birth in Hindi
  2. पेरिनियम क्षेत्र के फटने के चरण - Degrees of perineal tear after childbirth in Hindi
  3. पेरिनियल क्षेत्र की सिलाई - Stitching the perineal tears in Hindi
  4. पेरिनियल टांकों की देखभाल के टिप्स - Tips to taking care of perineal stitches in Hindi
  5. पेरिनियल टांकों में संक्रमण - Perineal stitches infection in Hindi
  6. टांकों की पीड़ा को कम करने के उपाय - Tips for soothing the tender perineum region in Hindi
  7. टाँके लगवाने के बाद डॉक्टर के पास किन स्थितियों में जाना पड़ सकता है - When to go to the doctor after stitching in Hindi
  8. प्रसव के बाद टांके और उनकी देखभाल के डॉक्टर

जब बच्चा योनि मार्ग से गुजरता है, तो उसे बाहर आने के लिए अधिक स्थान की आवश्यकता होती है और इस वजह से पेरिनियम खिंचती है और फट जाती है। डिलीवरी के तुरंत बाद पेरिनियल क्षेत्र के फटने की जांच की जाती है और उसकी देखभाल की जाती है। डॉक्टर आपको लोकल एनेस्थीसिया देकर पेरिनियम क्षेत्र को सुन्न करेंगे और फिर फटे हुए स्थान पर टांके लगाएंगे। आपको थोड़ा सा भी दर्द हो तो डॉक्टर को बताएं।

फटे हुए क्षेत्र को संक्रमण से बचाने के लिए टांके लगाकर सिला जाता है। डिलीवरी की सुविधा के लिए और अनियमित रूप से पेरिनियम के फटने से बचने के लिए, जानबूझकर लगाए गए चीरे के लिए टांकों की आवश्यकता होती है। इस सर्जिकल चीरे को एपिसियोटमी (Episiotomy) कहा जाता है।

एपिसियोटमी केवल तभी किया जाता है जब इसकी आवश्यकता होती है और ये डॉक्टर ही बता सकते हैं। हालांकि बहुत आम नहीं हैं। इस प्रक्रिया में प्रसूती चिमटी (Forceps) या वेंटूस (Ventouse- यह वैक्यूम उपकरण होता है जिसे बच्चे के सिर पर लगा कर उसे बाहर निकाल लिया जाता है) का प्रयोग होता है। इस स्थिति में डॉक्टर आपके पेरिनियम को काट देंगे और बच्चे का जन्म आसानी से हो जायेगा।

(और पढ़ें - डिलीवरी के बाद की समस्याएं और उनके उपाय)

आम तौर पर पेरिनियम क्षेत्र के फटने की चार डिग्री होती हैं जो निम्न प्रकार हैं:

पहली डिग्री

इस प्रकार का चीरा छोटा होता है। यह आम तौर पर बिना टांकों के भी ठीक हो जाता है। इनकी वजह से आम तौर पर बहुत कम या कोई परेशानी नहीं होती क्योंकि ये त्वचा या योनि की बाहरी परत और ऊतक में होते हैं।

दूसरी डिग्री

इस प्रकार के चीरे गहरे होते हैं और मांसपेशियों तक पहुंच जाते हैं। ये चीरे परत दर परत सिले जाते हैं और बंद कर दिए जाते हैं। इनसे आपको कुछ हद तक परेशानी होगी और कुछ हफ्तों में आप ठीक हो जाएंगी। इस प्रक्रिया में टांके गल जाते हैं।

तीसरी डिग्री

इसमें पेरिनियल क्षेत्र की त्वचा और मांसपेशियों में, गहरा और गंभीर चीरा होता है। कभी-कभी, यह मलाशय क्षेत्र के आसपास की मांसपेशियों तक पहुंच जाता है। लगभग 4% महिलाओं में इस  डिग्री का चीरा लगता है और इससे आपको कई महीनों तक काफी दर्द होता है।

चौथी डिग्री

इस डिग्री का चीरा सबसे गंभीर प्रकार का चीरा होता है और गुदा की मांसपेशियों से भी आगे तक फैला होता है। इस मामले में हमेशा टांकों की ज़रूरत होती है। तीसरी और चौथी डिग्री के चीरे आपको गुदा अनियमितता के जोखिम में डाल सकते हैं।

डॉक्टर लोकल एनेस्थीसिया देकर पेरिनियम क्षेत्र को सुन्न कर देते हैं और फिर बहुत सावधानी से उस चीरे की सिलाई करके उसमें टांका लगाते हैं।

ये टांके बाद में कम पीड़ादायक और कम असहज हो जाते हैं। इसके अलावा ये खुद ही गल जाते हैं इन्हें बाद में कटवाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

तीसरे या चौथे डिग्री के टांकों के मामले में सिलाई, ऑपरेशन थियेटर में की जाती है। दर्द गंभीर होता है तब रीढ़ की हड्डी या एपिड्यूरल एनेस्थीसिया आवश्यक होता है।

मूत्र को इकट्ठा करने के लिए मूत्राशय में एक पतला ट्यूब (कैथेटर) डाला जाता है। इससे पेरिनियम के आस पास संक्रमण नहीं होता और वो क्षेत्र भी सूखा रहता है। एंटीबायोटिक दवाइयां टांकों को जल्दी ठीक होने में मदद करती हैं। दर्द को दूर करने के लिए दर्द निवारक दवा दी जाती है। प्राकृतिक उपचार की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए खूब सारा आराम करने की सलाह दी जाती है। आपको अगले 24 घंटों के लिए देर तक बैठने के लिए भी मना किया जाता है।

(और पढ़ें - एंटीबायोटिक दवा लेने से पहले ज़रूर रखें इन बातों का ध्यान)

पेरिनियल टांके दर्दनाक हो सकते हैं, इसलिए आपको उनकी देखभाल करने की जरूरत है और उपचार प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए हर संभव प्रयास करें। टांकों के उपचार में मदद करने के लिए कुछ युक्तियां निम्न प्रकार हैं:

  1. संक्रमण से बचने के लिए टांकों वाले क्षेत्र को साफ रखें।
  2. रोज़ाना स्नान करें और स्वच्छता का पूरा पूरा ध्यान रखें।
  3. शौचालय का उपयोग करने से पहले और बाद में अच्छे एन्टीसेप्टिक साबुन से अपने हाथ धोएं।
  4. सैनिटरी पैड नियमित रूप से बदलें।
  5. रोज़ पैल्विक व्यायाम करें। इससे रक्त परिसंचरण में सुधार होता है और उपचार की प्रक्रिया तेज  गति से होती है।
  6. बिस्तर पर आराम करें और टांके वाले हिस्से को कम से कम 10 मिनट के लिए हवा में बिना पैंटी के रहने दें अर्थात टांकों में हवा लगने दें।
  7. आपको ढीले कॉटन के नेकर पहनने चाहिए और टाइट फिटिंग के ट्राउजर बिलकुल नहीं पहनने चाहिए। ढीले नेकर हवा के आदान प्रदान में सुविधा प्रदान करते हैं।
  8. अधिक से अधिक, लगभग 3 से 4 लीटर तरल पदार्थों का सेवन करें। फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ जैसे ब्राउन राइस, बिना चोकर निकले आटे की रोटी, सब्जियां और फल। इससे कब्ज नहीं होता और आप स्वस्थ रहती हैं।
  9. पांच दिनों तक संक्रमण से खुद को बचाने के लिए एंटीबायोटिक दवाएं लेती रहें। निविदा टायरों के कब्ज और तनाव को रोकने के लिए जुलाब दिए जाते हैं
  10. अपने आप को पीछे से आगे की ओर हमेशा सूखा रखें। इससे योनि में बैक्टीरिया नहीं जाते हैं।
  11. डिलीवरी के 24 घंटे बाद सिटज़ बाथ या हिप बाथ किया जाता है।
  12. कीगल व्यायाम इसके उपचार के लिए बहुत ही ज़रूरी होता है। इससे इलाज की प्रक्रिया तेज़ हो जाती है।

(और पढ़ें - डिलीवरी के बाद एक्सरसाइज)

पेरिनियल टांकों के बाद, आपको संक्रमण से बचने के लिए 5 दिनों के लिए एंटीबायोटिक दवाओं के सेवन की सलाह दी जाती है। डॉक्टर भी आपको लैक्सेटिव लिख सकते हैं ताकि आपके लिए मलत्याग करना आसान हो सके। गंभीर टीकों के मामले में, आपको सलाह दी जाएगी कि टांके पर कोई दबाव न डालें, और दर्द निवारक दवाओं के बारे में आप अपने डॉक्टर से पूछ सकती हैं। हालांकि पैरासिटामोल एक सुरक्षित विकल्प होता है, लेकिन फिर भी हम आपको यह सुझाव देंगे कि आप डॉक्टर द्वारा निर्धारित दर्द निवारक का ही उपयोग करें। निम्नलिखित संकेत पेरिनियल टांकों में संक्रमण की संभावना बताते हैं:

  1. अत्यधिक बुखार
  2. चीरे की जगह पर दर्द या लालिमा का अनुभव।
  3. टांकों में तेज़ गंध या डिस्चार्ज होना।
  4. चीरे में से खून बहने लगे।
  5. हवा निकालते समय अगर मलत्याग हो जाये।

(और पढ़ें - योनि डिस्चार्ज)

दर्दनाक टांके आपको काफी परेशान कर सकते हैं। यहां कुछ आसान टिप्स दिए गए हैं जो आपको पीड़ादायक हिस्से को शांत करने के लिए अपनाने चाहिए:

  1. पेरिनियम पर जमे हुए या ठन्डे जैल पैड लगाएं। इस पैक को नीचे पहनने के फलालैन के साफ़ वस्त्र में लपेटें। लेकिन बहुत लंबे समय तक न रखें। एक दिन में पैक को दो बार लगाएं।
  2. जब भी आप पेशाब करें, तो पेरीनियल क्षेत्र पर गुनगुने पानी को डालें।
  3. जब तक टाँके सूख न जाएं टैम्पोन का प्रयोग न करें।
  4. अगर दर्द या सूजन बनी रहती है तो डॉक्टर से परामर्श करें।
  5. बैठने के लिए कुशन का प्रयोग करें।
  6. यदि दर्द गंभीर है तो आप इबुप्रोफेन (ibuprofen) भी ले सकती हैं। कोई भी दर्द निवारक लेने से पहले डॉक्टर से परामर्श लें।
  7. पेरिनियम को साफ और शुष्क रखें।

टाँके लगवाने के बाद निम्नलिखित कुछ आपातकालीन स्थितियां हैं जिनमें तुरंत उपचार की आवश्यकता होती है, इसलिए इनमें से किसी का भी अनुभव होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें:

  1. अगर टाँके बदबूदार और दर्दनाक हो जाते हैं तो यह संक्रमण का संकेत हो सकता है।
  2. मल को नियंत्रित करने में कठिनाई।
  3. हवा पास करने में दर्द होना।
  4. पेशाब में दर्द।
  5. टांकों से बदबूदार डिस्चार्ज निकलना।
  6. चुभन वाले और गंभीर दर्द का अनुभव होना।
  7. बार-बार मूत्र त्याग करना।
  8. पेट के निचले हिस्से और पेरिनियम क्षेत्र के आसपास दर्द होना।
  9. ठण्ड लगकर बुखार आना।
  10. योनि से थक्के निकलना।
Dr. Dhavan Patel

Dr. Dhavan Patel

सामान्य चिकित्सा

Dr. Priya Patel

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Dr. Giri Prasath

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