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9 महीनों की गर्भावस्था के बाद आपको एक माँ की भूमिका निभानी होती है। हालांकि नयी नयी मां बनी महिलाओं के लिए बच्चे की देखभाल कर पाना थोड़ा कठिन होता है।

इस नए जीवन में प्रवेश करने के बाद, आपके शरीर में महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं। इस प्रसवोत्तर अवधि में, जो डिलीवरी के तुरंत बाद शुरू होती है, आपका शरीर प्रसव के दौरान कम हुयी शक्ति को दोबारा उत्पन्न करने की कोशिश करता है और गर्भावस्था से पहले के आकार में आने की कोशिश करता है।

जितना ज्यादा आप इन समस्यायों के बारे में जानेंगी, उतने ही बेहतर तरीके से आप शारीरिक और भावनात्मक बदलावों का सामना कर पाएंगी जो कि गर्भधारण के बाद महिलाओं में आते हैं।

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  1. प्रसव के बाद की प्रमुख समस्या - Postpartum problems in Hindi
  2. बच्चे के जन्म के बाद समस्यायों के कारण और इलाज - Causes and treatment of problems after childbirth in Hindi
  3. डिलीवरी के बाद की समस्याएं और उनके उपाय के डॉक्टर

महिलाओं को डिलीवरी के बाद अनेकों समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जिनमें कुछ अधिक गंभीर भी होती हैं। इनमें से कुछ प्रमुख समस्याएं इस प्रकार हैं:

  1. पोस्टपार्टम संक्रमण, (गर्भाशय संक्रमण, मूत्र पथ संक्रमण या किडनी संक्रमण)
  2. प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव
  3. पेरिनियल क्षेत्र में दर्द (योनि और मलाशय के बीच का हिस्सा)
  4. योनि डिस्चार्ज
  5. स्तन समस्याओं, जैसे स्तनों में सूजन, संक्रमण और दुग्ध नलिकाओं का भर जाना।
  6. खिंचाव के निशान
  7. बवासीर और कब्ज
  8. मूत्र या मल असंयम
  9. बाल झड़ना
  10. प्रसव के बाद अवसाद
  11. सेक्स के दौरान दर्द या असुविधा
  12. गर्भावस्था के पहले का शारीरिक आकार वापस लाने में कठिनाई।

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बच्चे के जन्म के बाद होने वाली समस्याएं और उनके इलाज इस प्रकार हैं:

1. प्रसव के बाद रक्तस्राव (Postpartum Hemorrhage)

प्रसव के तुरंत बाद थोड़ा रक्तस्राव होना तो सामान्य होता है, लेकिन अत्यधिक रक्तस्राव केवल 2% डिलीवरी में होता है। यह स्थिति अक्सर लम्बी डिलीवरी, कई बच्चों के जन्म के बाद या जब गर्भाशय संक्रमित हो जाता है तब उत्पन्न होती है।

डिलीवरी के बाद गर्भाशय का ठीक से संकुचन न हो पाने या फिर गर्भाशय, गर्भाशय ग्रीवा या योनि में चोट होने के कारण ऐसा होता है।

यदि रक्तस्राव, प्रसव के एक या दो हफ्ते बाद शुरू होता है, तो यह प्लेसेंटा के टुकड़े के गर्भ में रह जाने के कारण हो सकता है। यह ऊतक सर्जरी द्वारा निकाल दिया जाता है। घर आने के बाद, अगर आपको भारी रक्तस्राव हो तो तुरंत अपने डॉक्टर को इसकी जानकारी दें।

हालांकि, हो सकता है कि आपके कोई गांठ हो जिसका घर पर उपचार नहीं किया जा सकता, ऐसे में अपने डॉक्टर से संपर्क करें।

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2. गर्भाशय संक्रमण (Uterine Infections)

आम तौर पर प्लेसेंटा, प्रसव के दौरान गर्भाशय से अलग हो जाती है और जन्म देने के बाद 20 मिनट में योनि से बाहर कर दी जाती है। यदि प्लेसेंटा के टुकड़े गर्भाशय में रह जाते हैं, तो यह संक्रमण उत्पन्न कर सकता है।

प्रसव के दौरान एम्नियोटिक सैक (Amniotic sac - भ्रूण को बाहर से सुरक्षा प्रदान करने वाली थैली) का संक्रमण, डिलीवरी के बाद गर्भाशय के संक्रमण का कारण हो सकता है। फ्लू होने पर तेज़ बुखार, तेज धड़कनें, असामान्य सफेद रक्त कोशिकाओं की मात्रा बढ़ना, गर्भाशय में सूजन और असहजता तथा गंध युक्त डिस्चार्ज आमतौर पर गर्भाशय संक्रमण के संकेत होते हैं। गर्भाशय संक्रमण का आमतौर पर एंटीबायोटिक दवाओं के कोर्स द्वारा इलाज किया जाता है।

3. किडनी संक्रमण (Kidney Infections)

जब मूत्राशय में बैक्टीरिया फैल जाते हैं, तब किडनी संक्रमण होता है, जिसमें बार बार पेशाब के लिए जाना, मूत्रत्याग की तीव्र इच्छा, तेज बुखार, आम तौर पर बीमार सा महसूस होना, पीठ के निचले हिस्से या साइड में दर्द, कब्ज और पेशाब करते समय दर्द होने जैसे लक्षण महसूस होते हैं। इसके इलाज के लिए डॉक्टर एंटीबायोटिक्स दवाओं का कोर्स करने के लिए कहते हैं। मरीजों को बहुत सारा पानी पीने और किसी भी बैक्टीरिया की स्क्रीनिंग के लिए मूत्र का नमूना देने के लिए कहा जाता है।

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4. पेरिनियल (योनि और मलद्वार के बीच की जगह) दर्द

जिन महिलाओं की नार्मल डिलीवरी होती है, उनमें पेरिनियल दर्द होना काफी आम बात है। इन ऊतकों में डिलीवरी के दौरान खिंचाव या चोट लग सकती है, जिससे उनमें सूजन, चोट और दर्द महसूस हो सकता है। ये असुविधाएं एपीसीओटॉमी द्वारा बढ़ भी सकती हैं। एपीसीओटॉमी में योनि को ठीक रखने के लिए डिलीवरी के दौरान कभी-कभी पेरिनियम में चीरा लगाया जाता है।

ओवर-द-काउंटर दर्द निवारक दवाएं इसमें मदद कर सकती हैं। जब आपको ये दर्द महसूस हो, तो कीगल एक्सरसाइज करें। ये आपकी योनि की मांसपेशियों को मज़बूत करते हैं। अगर योनि क्षेत्र में अत्यधिक या लगातार दर्द हो रहा है, तो व्यायाम करना बंद कर दें और डॉक्टर से परामर्श करें।

5. योनि डिस्चार्ज (Vaginal discharge)

प्रसव के बाद शुरूआती कई हफ्तों के लिए, रक्तयुक्त और अधिक डिस्चार्ज होना सामान्य होता है। इस डिस्चार्ज, में रक्त और प्लेसेंटा के अवशेष होते हैं और इसे लोकिया (Lochia) भी कहा जाता है।

6. स्तनों में सूजन या अतिरिक्तता

कभी-कभी शिशु, मां के स्तनों से पूरा दूध नहीं पी पाता है, उस स्थिति में दूध सूखता नहीं है बल्कि इसकी अधिकता हो जाती है, जिस कारण कई समस्याएं भी होती हैं। जब दूध आपके स्तनों में आता है (प्रसव के दो से चार दिन बाद), आपके स्तन बहुत बड़े, कठोर और पीड़ादायक हो जाते हैं। इसका इलाज आप सही फिट की ब्रा पहन कर और अपने स्तनों पर बर्फ लगा के कर सकती हैं।

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7. मैस्टाइटिस (Mastitis)

मैस्टाइटिस या स्तन संक्रमण होने पर, आमतौर पर स्तनों में असहजता और लालिमा का अनुभव होता है। स्तन संक्रमण, बैक्टीरिया के कारण भी हो सकता है और इससे संक्रमित होने पर तनाव, थकावट या निपल्स में दरार सी पड़ने लगती है, जिसके परिणामस्वरूप बुखार, ठंड लगना, थकान, सिरदर्द या मतली और उल्टी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इन लक्षणों में से कोई भी महसूस होने पर डॉक्टर के पास जाएं। वो इन स्थितियों का एंटीबायोटिक दवाओं से उपचार करेंगे।

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8. भरी हुयी नलिकाएं (Clogged Ducts)

भरी हुयी दुग्ध नलिकाओं के कारण, लालिमा, दर्द, सूजन या स्तन में गांठ पैदा हो सकती है, लेकिन ये ही लक्षण मैस्टाइटिस के होते हैं। लेकिन इसमें फ्लू जैसे लक्षण, स्तन संक्रमण, दरारें, आदि नहीं होते हैं।

इसके उपचार के लिए जब तक स्तन न हो लगातार स्तनों की मालिश करें, गर्म और नम पैक दर्द वाले स्थान पर कई बार लगाने से इस समस्या का समाधान हो सकता है। हालांकि, यदि आपके गांठ है तो जल्द से जल्द डॉक्टर से संपर्क करें।

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स्ट्रेच मार्क्स

स्ट्रेच मार्क्स गर्भावस्था के दौरान कई महिलाओं के स्तनों, जांघों, कूल्हों और पेट पर दिखाई देते हैं। ये लाल निशान, हार्मोनल परिवर्तन और त्वचा में खिंचाव के कारण होते हैं जो प्रसव के बाद तक रहते हैं। हालांकि ये कभी भी पूरी तरह से गायब नहीं होते। समय के साथ फीके ज़रूर पड़ जाते हैं। जबकि कई महिलाएं इन्हें हटाने के लिए विशेष प्रकार की क्रीम, लोशन और तेलों का उपयोग करती हैं।

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9. बवासीर और कब्ज़

बवासीर और कब्ज, बढ़े हुए गर्भाशय और गर्भ के निचले हिस्से की नसों में दबाव पड़ने से बढ़ जाते हैं, ये दोनों ही स्थितियां प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के बाद महिलाओं में होना सामान्य हैं। ओवर-द-काउंटर मिलने वाले मलहम और स्प्रे के साथ खाने में फाइबर युक्त चीज़ें और तरल पदार्थ, आमतौर पर कब्ज और बवासीर की सूजन में आराम पहुंचाते हैं।

एक हवादार, डोनट के आकार का तकिया, जो किसी भी दवा की दुकान पर मिलता है, बैठने में मदद करता है। डॉक्टर से पूछे बिना लैक्सेटिव, एनीमा (Enemas- मरीज को मल और मूत्र लाने के लिए लगाया जाता है) का उपयोग न करें। खासकर यदि आपकी एपीसीओटॉमी हुयी है या पेरिनियल क्षेत्र में टांके लगे हैं।

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10. मूत्र और मल असंयमितता

बच्चे के जन्म के बाद कुछ महिलाओं में मूत्र और मल असंयम भी हो जाता है।

खासकर हँसते और खांसते समय मूत्र का अनजाने में निकास, आमतौर पर गर्भावस्था और प्रसव के दौरान मूत्राशय के खिंचने के कारण होता है। आमतौर पर, आपकी मांसपेशियों को टोन होने और सामान्य अवस्था में लौटने के लिए समय की आवश्यकता होती है। आप कीगल एक्सरसाइज करके इस प्रक्रिया को और जल्दी कर सकती हैं।

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इस बीच के समय में, सुरक्षात्मक जांघिया या सैनिटरी नैपकिन का उपयोग करें। यदि समस्या बनी रहती है, तो अपने डॉक्टर से बात करें वो समस्या को दूर करने के लिए दवा लिख सकती हैं। यदि आप दर्द या जलन का अनुभव करती हैं, या बहुत तेज़ पेशाब आने का अनुभव करती हैं तो अपने डॉक्टर को बताएं यह मूत्राशय के संक्रमण का संकेत हो सकता है।

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10. बाल झड़ना

डिलीवरी के बाद जब आपका बच्चा 6 महीने का हो जाता है तब आपके बालों की चमक कम हो जाती है साथ ही साथ अधिक बाल झड़ने लगते हैं। डिलीवरी के कई महीनों बाद (या जब स्तनपान कराना कम या समाप्त हो जाता है), कई महिलाओं को बालों के झड़ने से डर लगने लगता है क्योंकि वो बहुत अधिक मात्रा में झड़ते हैं।

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11. डिलिवरी के बाद डिप्रेशन

हार्मोनों के स्तर में परिवर्तन, नवजात शिशु की देखभाल करने की नई जिम्मेदारी के कारण, कई महिलाओं को चिंता या गुस्से का सामना करना पड़ता है। अधिकतर के लिए, यह मनोदशा और हल्का डिप्रेशन कई दिनों या सप्ताह तक चलता है। या स्थिति आमतौर पर प्रसव के तीन महीने बाद स्पष्ट हो जाती है।

इसके इलाज के लिए सबसे पहले, पारिवारिक और करीबी मित्रों का समर्थन प्राप्त करें। अपनी भावनाओं को उनके साथ साझा करें, और अपने शिशु की देखभाल करने में उनकी मदद लें।

यदि डिप्रेशन के परिणामस्वरूप आपकी बच्चे में रुचि कम होना या आत्महत्या या हिंसक विचारों, असामान्य व्यवहार आदि लक्षण सामने आते हैं, तो तत्काल डॉक्टर से संपर्क करें। इन लक्षणों में अधिक गंभीर स्थिति का संकेत हो सकता है जिसे डिलीवरी के बाद मनोविकृति (Postpartum psychosis) कहा जाता है।

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12. सेक्स के दौरान असुविधा

डिलीवरी के बाद जब आप शारीरिक और भावनात्मक रूप से सहज महसूस करने लगें तब आप सेक्स कर सकती हैं। नार्मल डिलीवरी के बाद, योनि ऊतकों के पूरी तरह से ठीक होने तक सेक्स न करें। आम तौर पर डॉक्टर प्रसव के बाद चार से छह हफ़्तों तक सम्भोग न करने की सलाह देते हैं। सिजेरियन डिलीवरी के बाद, भी आपके डॉक्टर आपको कम से कम छह हफ्ते तक इंतजार करने की सलाह देंगे।

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13. गर्भावस्था से पूर्व के आकार को पुनः प्राप्त करना

गर्भधारण के बाद वजन कम करने, कम हुयी ऊर्जा वापस लाने, तनाव को दूर करने और मांसपेशियों में ताकत लाने का सबसे अच्छा तरीका व्यायाम है। जब तक आपकी सिजेरियन डिलीवरी, गर्भावस्था में जटिलताओं आदि की सम्भावना न हो, तब तक आप व्यायाम कर सकती हैं। यदि आप गर्भावस्था के दौरान और पहले व्यायाम करती हैं, तो आपको प्रसव के बाद फिटनेस का भी ज़रूर ध्यान होगा और आप व्यायाम ज़रूर करेंगी, लेकिन तुरंत तेज़ एक्सरसाइज जैसे कूदने आदि की कोशिश न करें।

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प्रसव के बाद शरीर में किसी भी असामान्य परिवर्तन से अवगत रहें। अगर आपको निम्न लक्षणों में से कोई भी अनुभव होता है तो तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करें। हो सकता है कि वो लक्षण किसी गंभीर जटिलता का संकेत हों।

  1. सामान्य मासिक धर्म से अधिक रक्तस्राव।
  2. योनि या पेरिनियल क्षेत्र में लगातार बढ़ता हुआ दर्द।
  3. 100.4 डिग्री फ़ारेनहाइट बुखार।
  4. स्पर्श करने पर पीड़ादायक स्तनों में गर्माहट महसूस होना।
  5. पैरों में दर्द, सूजन या असहजता।
  6. खांसी या सीने में दर्द
  7. पेशाब के दौरान दर्द या जलन या पेशाब का लगातार और अचानक अनुभव।
  8. मतली या उल्टी
  9. डिप्रेशन, बच्चे में रुचि न होना या आत्मघाती और हिंसक विचार मन आना।

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