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कहा जाता है कि हंसी ‘सबसे अच्छी दवा’ है। लेकिन क्या यह किसी को शारीरिक समस्या दे सकती है? क्या हंसने से भी ‘लकवा’ हो सकता है? अगर इस सवाल ने आपको हैरान कर दिया है तो हम आपको बता दें कि इसका जवाब, हां है। ऐसा क्यों, इस बारे में जानने से पहले जॉर्डन कूमर के बारे में जान लेते हैं।

जॉर्डन कूमर ब्रिटेन में रहती है। 15 वर्षीय इस छात्रा को एक विचित्र शारीरिक समस्या है। वह जब भी हंसती है तो 'मसल्स पैरालिसिस' का शिकार हो जाती है। ऐसा केवल जॉर्डन के साथ नहीं है। डेली मेल की एक रिपोर्ट बताती है कि ब्रिटेन के हर दो हज़ार लोगों में से एक को यह समस्या है। मेडिकल भाषा में इसे नार्कोलेप्सी और कैटाप्लेक्सी कहते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक जॉर्डन कैटाप्लेक्सी से पीड़ित है। इस दिमागी विकार में हंसने पर व्यक्ति की मांसपेशियां कस जाती हैं। ऐसा ज्यादा गुस्सा करने की वजह से भी हो सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक इस समस्या में तेज हंसने या गुस्सा करने से शरीर के किसी विशेष हिस्से या हिस्सों में मांस-पेशियां सुन्न या कमज़ोर पड़ जाती हैं। यह एक तरह से ‘मसल्स पैरालिसिस’ जैसा अटैक होता है। इसी के चलते मरीज हंसते-हंसते सुन्न हो जाता है और गिर पड़ता है। हालांकि इस स्थिति में उसका दिमाग काम कर रहा होता है।

जॉर्डन कूमर के साथ भी ऐसा ही है। उसे अपनी बीमारी का पता जून 2017 में चला। एक दिन वह और उसका परिवार किसी बात पर जोर-जोर से हंस रहा था। तभी अचानक जॉर्डन कुछ सेकेंडों के लिए जमीन पर गिर पड़ी। बाद में इस तरह के अनुभव आम हो गए। जॉर्डन जब भी हंसती, उसकी मांसपेशियां कमजोर पड़ जातीं और वह गिर पड़ती। घरवालों ने उसका मेडिकल टेस्ट कराया तो पता चला कि उसे कैटाप्लैक्सी है। यह विकार नार्कोलेप्सी की श्रेणी में ही आता है। 

वहीं, नार्कोलेप्सी एक ऐसा विकार है जिससे पीड़ित व्यक्ति दिन में कई बार सो जाता है। एनएचएस के अनुसार नार्कोलेप्सी किसी वायरल संक्रमण के कारण हो सकता है। किसी प्रकार का संक्रमण, हार्मोनल बदलाव और मानसिक तनाव इस समस्या की शुरुआत में लक्षण के रूप में दिखाई देते हैं। इसके प्रभाव में व्यक्ति अपने सोने और जागने के चक्र को नियंत्रित नहीं कर पाता।

ऐसा क्यों होता है, इसका सटीक कारण आज तक पता नहीं चल सका है। यह इस डिसऑर्डर से ग्रस्त लोगों की समस्या को मानसिक रूप से और बढ़ाता है। इस बारे में जॉर्डन कहती है, ‘इस रोग को समझना मेरे लिए बेहद मुश्किल था। शुरुआत में मैं बहुत दुखी थी। मैं यह समझ ही नहीं पा रही थी कि मुझे क्या हुआ है। मेरे बहुत सारे सपने हैं। मुझे बहुत कुछ करना है। यह सुनना कि इस रोग के चलते मेरा पूरा जीवन प्रभावित होगा, मेरे लिए बहुत ही मुश्किल था।’

वहीं, जॉर्डन की मां का कहना है, ‘हमें लगता था कि यह उसके युवा होने के लक्षण हैं। लेकिन धीरे-धीरे यह स्थिति विकट हो गई। वह सामान्य तरह से बैठे-बैठे या चुप होते सो जाती थी। उसका चेहरा सुस्त होने लगता। जीभ लड़खड़ाने लगती और ढीली पड़ जाती थी। इन सबके साथ उसे मतिभ्रम होने लगा, साथ ही बुरे सपने भी आ रहे थे।’ वह आगे कहती हैं, 'डॉक्टरों का कहना है कि हमारी बेटी को नार्कोलेप्सी के साथ कैटाप्लैक्सी भी है और यह स्थिति कभी भी ठीक नहीं होगी।'

कितनी गंभीर है कैटाप्लेक्सी

कैटाप्लेक्सी का शिकार होने पर व्यक्ति की जुबान लड़खड़ाने लगती है, जबड़ा ढीला पड़ने लगता है, जुबान अस्पष्ट हो जाती है और उसे धुंधला दिखने लगता है। अधिक गंभीर रूप लेने पर लकवे जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। मरीज पूरी तरह होश में होता है, लेकिन उसे अंदर से बंधा हुआ महसूस होता है।

मेडिटेशन से नियंत्रण की कोशिश

कम जानकारी के अलावा दुर्भाग्य से कैटाप्लेक्सी या नार्कोलेप्सी के इलाज को लेकर भी खास उन्नति नहीं हुई है। ऐसे में जॉर्डन और उनके जैसे मरीज मेडिटेशन से खुद को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं। ऐसे लोगों को अपने सहयोगियों और करीबी लोगों के साथ की काफी जरूरत होती है। जॉर्डन की मां ने उसके दोस्तों और अध्यापकों को इस स्थिति के बारे में बता दिया है। अब जब भी जॉर्डन सोती हुई दिखती है तो वे उसके कंधे पर हाथ रख देते हैं जिससे वह जाग जाती है।

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