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भारत में नहीं बल्कि दुनियाभर के देशों में जन्म के समय शिशु का वजन कितना है इस बात को काफी अहमियत दी जाती है क्योंकि अगर जन्म के समय शिशु का वजन कम है तो हो सकता है कि उसे आगे चलकर कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं या जटिलताओं का सामना करना पड़े। जन्म के समय अगर नवजात का वजन कम हो तो माता-पिता की चिंता बढ़ जाती है क्योंकि ऐसे मामलों में नवजात की मृत्यु का खतरा भी कई गुना अधिक होता है।

जन्म के समय अगर नवजात शिशु का वजन 2.5 किलोग्राम से कम है तो ऐसी स्थिति को लो बर्थ वेट या जन्म के समय कम वजन के तौर पर देखा जाता है। एक सामान्य नवजात शिशु का औसत वजन 3.62 किलोग्राम के आसपास होता है। आमतौर पर वैसे बच्चे जो प्रीमैच्योर यानी गर्भावस्था के 37 हफ्ते से पहले जन्म लेते हैं वे लो बर्थ वेट वाले होते हैं। इसके अलावा अगर गर्भ में 1 से ज्यादा बच्चे यानी जुड़वां या ट्रिपलेट हों तब भी ऐसे बच्चों का जन्म के समय वजन कम होता है। 

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यूनिसेफ के साल 2015 के आंकड़ों की मानें तो हर साल दुनियाभर के करीब 15 प्रतिशत नवजात शिशु लो बर्थ वेट के साथ जन्म लेते हैं। अगर जन्म के समय आपके शिशु का वजन भी कम था तो वह देखने में सामान्य नवजात शिशु की तुलना में छोटा नजर आएगा, शरीर में बॉडी फैट बेहद कम होने की वजह से शिशु बेहद पतला दिखेगा और धड़ की तुलना में शिशु का सिर बड़ा दिखेगा।

तो आखिर जन्म के समय वजन कम होने का कारण क्या है, कम वजन का होना चिंता की बात क्यों है, इसका इलाज क्या है और कम वजन वाले शिशु की देखभाल के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, इस बारे में हम आपको इस आर्टिकल में बता रहे हैं।

  1. जन्म के समय वजन कम होने का कारण - Janm ke samay vajan kam hone ka karan
  2. जन्म के समय कम वजन का खतरा किसे अधिक है? - Janm ke samay low birth weight ka risk kise zyada hai?
  3. जन्म के समय कम वजन से जुड़ी जटिलताएं - Janm ke samay kam vajan se jude complications
  4. जन्म के समय कम वजन को डायग्नोज कैसे करते हैं? - Janm ke samay kam vajan ko diagnose kaise karte hain?
  5. कम वजन के साथ पैदा होने वाले बच्चों का इलाज - Kam vajan ke sath janm lene wale shishu ka ilaj
  6. जन्म के समय बच्चे का वजन कम न हो, इसके लिए क्या करें? - Shishu ke birth weight kam na ho iske liye kya kare?
जन्म के समय शिशु का कम वजन के डॉक्टर

लो बर्थ वेट (LBW) या जन्म के समय कम वजन के ज्यादातर मामलों में मुख्य कारण नवजात शिशु का प्रीमैच्योर या समय से पहले जन्म लेना होता है। चूंकि ज्यादातर नवजात शिशु, गर्भावस्था के बाद के स्टेज में ज्यादा तेजी से विकसित होते हैं और इस दौरान उनका वजन भी काफी बढ़ता है। लिहाजा वैसे बच्चे जो गर्भावस्था के 37वें हफ्ते से पहले ही जन्म ले लेते हैं वे छोटे और कम वजन (अंडरवेट) वाले होते हैं। 

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समय से पहले जन्म लेने के अलावा कई कारण हैं जिसकी वजह से जन्म के समय बच्चे का वजन कम होता है:

  • इंट्रायूट्राइन ग्रोथ रिस्ट्रिक्शन (IUGR) : ऐसा तब होता है जब शिशु गर्भावस्था के दौरान ठीक तरीके से विकसित नहीं हो पाता और इसके पीछे भी कई तरह के कारण हो सकते हैं, जैसे- गर्भवती महिला की सेहत, बच्चे की स्थिति आदि। आईयूजीआर से पीड़ित शिशु जो फुल टर्म में जन्म लेता है वह देखने में भले ही शारीरिक रूप से मैच्योर हो लेकिन अंदर से कमजोर होता है। आईयूजीआर से पीड़ित शिशु जो प्रीमैच्योर जन्म लेता है वह छोटा और शारीरिक रूप से भी कमजोर होता है।
  • गर्भवती महिला के प्लासेंटा में किसी तरह की समस्या
  • गर्भवती महिला की प्रेगनेंसी में कोई जटिलता हो
  • जन्मजात दोष
  • गर्भावस्था के दौरान शिशु को सही पोषण न मिलना
  • गर्भवती महिला द्वारा प्रेगनेंसी के दौरान अल्कोहल या ड्रग्स का सेवन करना

वैसे तो समय से पहले जन्म लेने वाला कोई भी शिशु छोटा और कम वजन वाला होता है। बावजूद इसके कई और फैक्टर्स हैं जिनकी वजह से जन्म के समय नवजात शिशु का वजन कम हो सकता है :

  • गर्भवती महिला की उम्र : अगर गर्भवती महिला 18 साल से कम उम्र की है तो ऐसी मां से जन्म लेने वाले बच्चे का जन्म के समय वजन कम होने का खतरा काफी अधिक होता है।
  • गर्भ में एक से ज्यादा बच्चे : अगर गर्भवती महिला के गर्भ में एक से ज्यादा बच्चे पल रहे हों तो ऐसे बच्चों का जन्म के समय वजन कम होने का खतरा काफी अधिक होता है क्योंकि इस तरह के बच्चे अक्सर समय से पहले पैदा होते हैं। जुड़वा बच्चों के मामले में करीब 50 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे लो बर्थ वेट वाले होते हैं। 
  • गर्भवती महिला की सेहत : अगर गर्भवती महिला की सेहत ठीक न हो, गर्भावस्था के दौरान उसे सही पोषण न मिल पाए या प्रेगनेंसी के दौरान किसी तरह की जटिलता उत्पन्न हो जाए तो इस तरह के मामलों में भी बच्चे का जन्म के समय वजन कम होने का खतरा रहता है।

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वैसे नवजात शिशु जिनका जन्म के समय वजन कम हो उन्हें आगे चलकर कई तरह की मुश्किलें और जटिलाएं होने का खतरा अधिक होता है। चूंकि शिशु का बेहद छोटा सा शरीर, बाकी बच्चों की तरह मजबूत नहीं है इसलिए उसे खाने में, वजन बढ़ाने में और इंफेक्शन से लड़ने में कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। चूंकि लो बर्थ वेट वाले शिशु के शरीर में बॉडी फैट भी बेहद कम होता है इसलिए उनके लिए सामान्य तापमान में भी खुद को गर्म रखना मुश्किल होता है।

(और पढ़ें : नवजात शिशु को कितना और कितनी बार पाउडर वाला दूध देना चाहिए)

लो बर्थ वेट वाले बच्चों का वजन सामान्य बच्चों की तुलना में कम होता है इसलिए उनका विकास सही तरीके से नहीं हो पाता, उन्हें सेहत से जुड़ी समस्याओं और कई तरह की बीमारियों और प्रीमैच्योर डेथ का भी खतरा काफी अधिक होता है। साधारण भाषा में समझें तो जन्म के समय बच्चे का वजन जितना कम होगा उसे बीमारियां और जटिलताएं होने का खतरा उतना ही अधिक होगा। जन्म के समय कम वजन वाले बच्चों को इन कॉमन हेल्थ प्रॉब्लम्स का सामना करना पड़ता है:

  • जन्म के समय ऑक्सिजन का लेवल कम
  • शरीर का तापमान बनाए रखने में असमर्थ
  • दूध पीने और वजन बढ़ने में मुश्किल
  • इंफेक्शन का खतरा अधिक
  • सांस से जुड़ी समस्याएं जैसे- इंफेंट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम जो अविकसित फेफड़ों के कारण होता है
  • तंत्रिका संबंधी (न्यूरोलॉजिकल) समस्याएं
  • पेट और पाचन से जुड़ी समस्याएं
  • आकस्मिक नवजात मृत्यु सिंड्रोम (सडन इंफेंट डेथ सिंड्रोम sids)

कम वजन के साथ पैदा होने वाले ज्यादातर नवजात शिशुओं को नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) में तब तक रखा जाता है जब तक उनका वजन न बढ़ जाए और वे घर जाने की स्थिति में न आ जाएं।

जन्म के समय बच्चे का वजन कितना होगा इसे प्रेगनेंसी के दौरान ही अलग-अलग तरीकों से अनुमानित किया जा सकता है। इसके लिए गर्भवती महिला के गर्भाशय के ऊपर के हिस्से को प्यूबिक बोन से नापा जाता है। सेंटीमीटर में होने वाली यह नाप 20वें हफ्ते के बाद प्रेगनेंसी का जितना भी हफ्ता हुआ हो उसके अनुकूल होना चाहिए। अगर हफ्तों की संख्या के हिसाब से यह नाप कम है तो बच्चे उम्मीद से छोटा हो सकता है। भ्रूण के साइज को जानने के लिए अल्ट्रासाउंड भी किया जाता है। भ्रूण के सिर, पेट और जांघ की हड्डी के नाप को अनुमानित भ्रूण के वजन से तुलना की जाती है।

इसके अलावा जन्म के कुछ घंटों के अंदर ही नवजात शिशु का वजन लिया जाता है। इस वजन की शिशु द्वारा गर्भ में रहने के समय से तुलना की जाती है और उसे शिशु के मेडिकल रेकॉर्ड में दर्ज कर दिया जाता है। जन्म के समय अगर नवजात शिशु का वजन 2.5 किलो से कम हो तो ऐसे बच्चे को लो बर्थ वेट वाला और 1.5 किलो से कम वजन वाले बच्चे को वेरी लो बर्थ वेट वाले शिशु के तौर पर डायग्नोज किया जाता है।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO की मानें वैसे बच्चे जिनका जन्म के समय वजन कम होता है उन्हें जहां तक संभव हो सिर्फ मां का दूध ही देना चाहिए। ब्रेस्टमिल्क के सेवन से नवजात शिशु का न सिर्फ वजन बढ़ता है बल्कि उसके विकास में भी मदद मिलती है। अगर शिशु को जन्म देने वाली मां किसी भी वजह से शिशु को अपना दूध पिलाने में सक्षम नहीं है तो ह्यूमन डोनर मिल्क का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। नवजात शिशु की भूख और पोषण से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने के लिए फॉर्मूला मिल्क सबसे आखिरी विकल्प होना चाहिए।

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इसके अलावा कम वजन वाले नवजात शिशु का ध्यान कैसे रखना है इसके निर्धारण के लिए आपके बच्चे के डॉक्टर कई बातों को ध्यान में रखते हैं:

  • आपका नवजात शिशु कितने दिन तक मां के गर्भ में रहा, उसकी ओवरऑल सेहत कैसी है और उसे जन्म के समय कोई बीमारी तो नहीं है
  • किसी खास दवा, इलाज, थेरेपी या प्रोसीजर को लेकर बच्चे की सहनशीलता कितनी है
  • नियोनेटल आईसीयू में होती है बच्चे की देखभाल
  • तापमान को कंट्रोल करने वाले खास तरह के बिस्तर
  • खास तरह से दूध पिलाना- कई बार पेट में ट्यूब डालकर, अगर बच्चे खुद से दूध खींच न पा रहा हो या फिर इंट्रावेनस लाइन के जरिए
  • अगर बच्चे में किसी और तरह की जटिलता हो जैसे- अविकसित फेफड़ें या आंत से जुड़ी समस्या तो उन्हें तब तक अस्पताल में रहना पड़ सकता है जब तक उनकी ये समस्या दूर न हो जाए।

अगर जन्म के समय कम वजन वाले बच्चे को किसी और तरह की कोई बीमारी या जटिलता नहीं है तो ऐसे बच्चे शारीरिक विकास में जल्दी ही रफ्तार पकड़ लेते हैं। हालांकि ही उन्हें सामान्य बच्चों की तुलना में ज्यादा बार डॉक्टर के पास फॉलोअप चेकअप के लिए लाना पड़ता है।

अगर प्रीटर्म बर्थ या प्रीमैच्योर बर्थ यानी समय से पहले जन्म लेने की घटना को रोक लिया जाए तो जन्म के समय बच्चे के कम वजन की समस्या को भी काफी हद तक रोका जा सकता है। ऐसे में प्रीमैच्योर बर्थ और जन्म के समय बच्चे का कम वजन, इस समस्या को रोकने का सबसे अच्छा तरीका है गर्भवती महिला का प्रेगनेंसी के दौरान पूरा ख्याल रखा जाए। गर्भावस्था के दौरान समय-समय पर डॉक्टर से चेकअप हो ताकि गर्भवती मां और बच्चे दोनों की सेहत की जांच हो पाए।

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गर्भवती महिला कितने पोषण का सेवन कर रही है और उसने प्रेगनेंसी के दौरान कितना वेट गेन किया है इसका गर्भ में पल रहे बच्चे के वजन और जन्म के समय बच्चे का वजन कितना होगा इससे सीधा संबंध है। लिहाजा बेहद जरूरी है कि गर्भवती महिला स्वस्थ और संतुलित भोजन का सेवन करे और प्रेगनेंसी के दौरान जितना जरूरी हो उतना वजन जरूर बढ़ाए। इसके अलावा गर्भवती महिलाओं को अल्कोहल, सिगरेट और ड्रग्स से भी पूरी तरह से दूर रहना चाहिए क्योंकि इसका भी भ्रूण के विकास पर बुरा असर पड़ता है।

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संदर्भ

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