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सर्वाइकल रेडिक्यूलोपैथी क्या है?

रेडिक्यूलोपैथी तंत्रिकाओं से संबंधी रोग है। जब रीढ़ की हड्डियों के बीच से निकलती हुई तंत्रिकाएं दो हड्डियों, मांसपेशियों के बीच या किसी अन्य दबाव में आकर बंद हो जाती हैं और ठीक से काम नहीं कर पाती तो मरीज का प्रभावित हिस्सा सुन्न हो जाता है और उसे दर्द, झुनझुनी व जलन आदि महसूस होने लगती है।

सर्वाइकल रेडिक्यूलोपैथी भी इनमें से एक है, जिसमें गर्दन के पास की कशेरुकाओं (Cervical radiculopathy) के पास से निकलने वाली तंत्रिकाओं पर दबाव बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में ये तंत्रिकाएं कई बार ठीक से काम करना बंद कर देती हैं और कुछ मामलों में गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त भी हो जाती हैं। रीढ़ की हड्डी का जो हिस्सा गर्दन में होता है (सर्वाइकल स्पाइन), उसमें छोटी-छोटी कशेरुकाएं होती हैं, जो खोपड़ी से रीढ़ की हड्डी को जोड़ते हैं।

सर्वाइकल रेडिक्यूलोपैथी के लक्षण क्या हैं?

सर्वाइकल रेडिक्यूलोपैथी के कुछ लक्षण हर व्यक्ति के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। लेकिन, शरीर के एक तरफ बांह, गर्दन, छाती, कंधे और पीठ के ऊपरी हिस्से में दर्द होना सर्वाइकल रेडिक्यूलोपैथी के सबसे प्रमुख लक्षण माना गया है। हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि शरीर के एक हिस्से में ही दर्द व अन्य तकलीफें हों, कई बार सर्वाइकल रेडिक्यूलोपैथी में एक साथ शरीर के दोनों तरफ भी लक्षण देखे जा सकते हैं।

सर्वाइकल रेडिक्यूलोपैथी से ग्रस्त व्यक्ति को कुछ इस प्रकार से लक्षण महसूस होते हैं -

  • प्रभावित हिस्सा सुन्न होना या झुनझुनी महसूस होना
  • जिस तरफ दर्द है उस तरफ की बांह में कमजोरी महसूस होना
  • दर्द वाला हिस्से के ठीक से काम न कर पाना
  • दर्द वाली बांह या कंधे के हिलने पर दर्द बढ़ जाना

डॉक्टर को कब दिखाएं?

यदि आपको दो या तीन दिनों से लगातार एक तरफ कंधे या बांह में ऊपरोक्त में से कोई भी लक्षण महसूस हो रहा है। इसके अलावा यदि आपको हड्डियों से जुड़ी कोई समस्या है या फिर पहले कभी रेडिक्यूलोपैथी से संबंधित समस्या हो चुकी है, तो फिर आपको दर्द को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

सर्वाइकल रेडिक्यूलोपैथी के कारण क्या हैं?

कोई भी शारीरिक स्थिति या समस्या जिससे तंत्रिकाओं (नर्व रूट) पर दबाव पड़ता है, वे सर्वाइकल रेडिक्यूलोपैथी का कारण बन सकती हैं। ऐसा आमतौर पर हड्डियों व मांसपेशियों को कमजोर बनाने वाली समस्याओं के कारण होता है, जिसमें धीरे-धीरे समय बीतने पर सर्वाइकल स्पाइन कमजोर पड़ जाती है। रीढ़ की हड्डी व उसके आसपास की मांसपेशियां कमजोर पड़ने पर उनके बीच से निकली हुई तंत्रिकाओं पर दबाव पड़ने लगता है और सर्वाइकल रेडिक्यूलोपैथी के लक्षण विकसित होने लगते हैं।

इसके अलावा चोट लगने के कारण भी कई बार सर्वाइकल रेडिक्यूलोपैथी रोग हो सकता है। उदाहरण के लिए रीढ़ की हड्डी या उसके आस-पास चोट लगने से कशेरुकाएं अपनी सामान्य जगह से हिल जाती हैं और परिणामस्वरूप उनके बीच से निकली हुई तंत्रिकाओं पर दबाव बढ़ जाता है।

रीढ़ की हड्डी में ट्यूमर, कैंसर या संक्रमण होने पर भी सर्वाइकल रेडिक्यूलोपैथी रोग हो सकता है। इसके अलावा कुछ अन्य स्थितियां भी हैं, जो सर्वाइकल रेडिक्यूलोपैथी रोग होने के खतरे को बढ़ाती हैं -

  • पहले कभी रेडिक्यूलोपैथी हुई होना
  • अत्यधिक धूम्रपान करना
  • अधिक वजन उठाने का काम करना
  • अधिक कंपन वाले वाहन या मशीनें चलाना
  • अक्सर खेल-कूद में भाग लेना (एक खिलाड़ी)

सर्वाइकल रेडिक्यूलोपैथी का परीक्षण कैसे किया जाता है?

सर्वाइकल रेडिक्यूलोपैथी का परीक्षण करने के लिए डॉक्टर सबसे पहले आपके द्वारा महसूस किए जाने वाले लक्षणों के बारे में विस्तृत रूप से पूछेंगे। साथ ही साथ डॉक्टर आपके स्वास्थ्य से संबंधित पिछली जानकारियों के बारे में भी आपसे जानेंगे। उसके बाद आपकी गर्दन, बांह, कंधे और दर्द ग्रस्त अन्य भागों का बारीकी से परीक्षण किया जाता है। अंदरूनी समस्याओं का पता लगाने के लिए कुछ टेस्ट किए जा सकते हैं -

  • एक्स रे - कशेरुकाओं के बीच की दूरी व अन्य चोट आदि की जांच करने के लिए
  • सीटी स्कैन - सर्वाइकल स्पाइन की और साफ तस्वीर प्राप्त करने के लिए ताकी किसी बारीक चोट आदि का पता लगाया जा सके
  • एमआरआई - तंत्रिकाओं या नरम ऊतकों में हुई क्षति का पता लगाने के लिए
  • इलेक्ट्रोमायोग्राफी - मांसपेशियों की कार्यकुशलता का पता लगाने के लिए

सर्वाइकल रेडिक्यूलोपैथी का इलाज कैसे किया जाता है?

कुछ लोगों में सर्वाइकल रेडिक्यूलोपैथी के लक्षण धीरे-धीरे कम होकर अपने आप गायब हो जाते हैं और ऐसे में इलाज की जरूरत नहीं पड़ती है। हालांकि, यदि दर्द अधिक है या फिर अपने आप ठीक नहीं हो रहा है, तो डॉक्टर सामान्य इलाज प्रक्रिया शुरू करते हैं।

नॉन सर्जिकल ट्रीटमेंट

सर्वाइकल रेडिक्यूलोपैथी के इलाज में मुख्य रूप से दवाएं या शारीरिक थेरेपी या फिर इन दोनों को एक साथ उपयोग किया जाता है, जो इस प्रकार हैं -

  • दवाएं -
    इनमें कॉर्टिकोस्टेरॉयड व नॉनस्टेरॉयडल दवाएं शामिल हैं, जो सूजन व दर्द को कम करने का काम करती हैं जैसे आइबुप्रोफेन या नेपरॉक्सेन। स्टेरॉयड दवाएं खाने के लिए और इंजेक्शन के रूप भी दी जा सकती हैं। यह इंजेक्शन आमतौर पर रीढ़ की हड्डी को ढकने वाली श्लेष्म झिल्ली (ड्यूरा) में लगाया जाता है।
     
  • शारीरिक थेरेपी -
    इसमें सर्वाइकल ट्रैक्शन और मोबिलाइजेशन प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें कुछ उपकरणों की मदद से रीढ़ की हड्डी को थोड़े खिंचाव के साथ सीधा करने का प्रयत्न किया जाता है। ऐसा इसलिए ताकि कशेरुकाओं के बीच की दूरी को उचित रूप से बढ़ाया जा सके। इसके अलावा एक्सरसाइज व अन्य जीवनशैली सुधार भी अपनाए जा सकते हैं।

सर्जिकल ट्रीटमेंट

यदि दर्द अत्यधिक है या इमेजिंग टेस्ट से मिले रिजल्ट से डॉक्टर को पता चला है कि तंत्रिका में अधिक दबाव पड़ा हुआ है, तो सर्जरी करने पर विचार किया जा सकता है। सर्जरी के दौरान तंत्रिकाओं पर पड़े दबाव को हटा दिया जाता है, ताकि वे ठीक से काम कर सकें।

  1. सर्वाइकल रेडिक्यूलोपैथी के डॉक्टर
Dr. Deep Chakraborty

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Dr. Darsh Goyal

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