संक्षेप में सुनें

कलर ब्लाइंडनेस एक ऐसी स्थिति है जिसमें कुछ रंगों में अंतर करने की क्षमता सामान्य से काम हो जाती है। इसका अर्थ है कि कलर ब्लाइंडनेस से पीड़ित व्यक्ति को लाल, हरे, नीले या इनका मिश्रण देखने में परेशानी होती है। ऐसा बहुत कम होता है कि किसी व्यक्ति की रंग देखने की क्षमता ही चली जाए (इसे कहते मोनोक्रोमसी हैं)। बहुत से लोग यह हैं कि कलर ब्लाइंडनेस से पीड़ित व्यक्ति को केवल काले और सफेद रंग ही दिखते हैं। यह एक गलत धारणा है। कलर ब्लाइंडनेस के कई अलग-अलग प्रकार और स्तर हैं।

भारत में कलर ब्लाइंडनेस का प्रचलन पुरुषों में 8% और महिलाओं में केवल 0.5% है।

हम रंग कैसे देखते हैं?
मानवीय आँख रेटिना (आंख के अंदर की ओर झिल्ली) को हल्का सा उत्तेजित करके रंग देखती है। रेटिना रॉड और कॉन्स कोशिकाओं से बनी होती है।

रॉड कोशिकाएं (Rod Cells) -

रॉड कोशिकाएं रेटिना के घेरे में स्थित होती हैं। यह हमें रात को देखने में मदद करती हैं, लेकिन यह रंगों में अंतर नहीं कर सकती।

कॉन्स कोशिकाएं (Cones Cells) -

कॉन्स कोशिकाएं रेटिना के केंद्र में स्थित होती हैं, यह रात में देखने में मदद नहीं करती हैं, लेकिन दिन के समय के दौरान रंगों को समझने में सक्षम होती हैं। कॉन्स कोशिकाओं को तीन प्रकार में विभाजित किया जाता है -

  1. एल-कॉन कोशिकाएं जो लाल रौशनी को महसूस करती हैं।
  2. एम-कॉन कोशिकाएं जो हरी रौशनी को महसूस करती हैं।
  3. एस-कॉन कोशिकाएं जो नीली रौशनी को महसूस करती हैं।

कलर ब्लाइंडनेस का निदान स्वयं किया जा सकता है। यह तब होता है जब रंग महसूस करने वाली कॉन कोशिकाएं मस्तिष्क को संकेत नहीं भेज पाती हैं। यह आमतौर पर या तो पारिवारिक कारणों की वजह से होता है या ऑप्टिक तंत्रिका या रेटिना के रोगों द्वारा होता है। यह समस्या एक्स-क्रोमोजोम से जुड़ी है और लगभग हमेशा एक मां से अपने बेटे में होती है।

कलर ब्लाइंडनेस उम्र बढ़ने, आंख की समस्याओं (जैसे मोतियाबिंद, ग्लूकोमा), आंखों की चोटों, कुछ दवाइयों के दुष्प्रभावों के कारण हो सकता है। पारिवारिक कारणों से हुआ कलर ब्लाइंडनेस जीवन भर रहता है। लाल-हरा रंगों का कलर ब्लाइंडनेस पारिवारिक कारणों से होता है। यह सबसे आम प्रकार का कलर ब्लाइंडनेस है। (और पढ़ें - ग्लूकोमा के लक्षण)

कलर ब्लाइंडनेस को मापने के लिए कई परीक्षण उपलब्ध हैं लेकिन सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला परीक्षण ईशारा प्लेट टेस्ट है। कलर ब्लाइंडनेस का कोई इलाज नहीं है हालांकि, लोगों को रंगों को महसूस करने के लिए लेंस के विशेष सेट की आवश्यकता होती है।

  1. कलर ब्लाइंडनेस (वर्णान्धता) के प्रकार - Types of Colour Blindness in Hindi
  2. कलर ब्लाइंडनेस (वर्णान्धता) के लक्षण - Colour Blindness Symptoms in Hindi
  3. कलर ब्लाइंडनेस (वर्णान्धता) के कारण - Colour Blindness Causes in Hindi
  4. कलर ब्लाइंडनेस (वर्णान्धता) से बचाव - Prevention of Colour Blindness in Hindi
  5. कलर ब्लाइंडनेस (वर्णान्धता) का परीक्षण - Diagnosis of Colour Blindness in Hindi
  6. कलर ब्लाइंडनेस (वर्णान्धता) का इलाज - Colour Blindness Treatment in Hindi
  7. कलर ब्लाइंडनेस (वर्णान्धता) के जोखिम और जटिलताएं - Colour Blindness Risks & Complications in Hindi
  8. कलर ब्लाइंडनेस (वर्णान्धता) में परहेज़ - What to avoid during Colour Blindness in Hindi?
  9. कलर ब्लाइंडनेस (वर्णान्धता) में क्या खाना चाहिए? - What to eat during Colour Blindness in Hindi?
  10. कलर ब्लाइंडनेस (वर्णान्धता) के डॉक्टर

कलर ब्लाइंडनेस तीन प्रकार का होता है जिसमें से प्रत्येक के उप-प्रकार हैं -

लाल-हरा कलर ब्लाइंडनेस
पारिवारिक कारणों से हुए कलर ब्लाइंडनेस का सबसे सामान्य प्रकार लाल कॉन या हरे कॉन रंगद्रव्य की क्षति या कम कार्य कर पाने के कारण होता है। लाल-हरा कलर ब्लाइंडनेस चार प्रकार का होता है -

  1. प्रोटेनॉम्ली (Protanomaly) - यह कलर ब्लाइंडनेस लाल कॉन रंगद्रव्य के आसामान्य होने के कारण होता है। इस प्रकार के कलर ब्लाइंडनेस में लाल, नारंगी और पीले रंग हरे दिखते हैं और रंग उज्ज्वल नहीं होते हैं। यह स्थिति सौम्य होती है और आमतौर पर दैनिक जीवन पर इसका असर नहीं होता है।
  2. प्रोटेनॉपिआ (Protanopia) - इस कलर ब्लाइंडनेस में लाल कॉन रंगद्रव्य काम करना बंद कर देते हैं और लाल रंग काला दिखाई देता है। नारंगी, पीले और हरे रंग के कुछ प्रकार सभी पीले रंग के रूप में दिखाई देते हैं।
  3. ड्यूटेरानॉम्ली (Deuteranomaly) - यह कलर ब्लाइंडनेस का सबसे आम प्रकार है। इसमें हरा कॉन रंगद्रव्य असामान्य होता है। इसमें पीला और हरा रंग लाल दिखाई देते है और बैंगनी और नीले रंग को पहचानना मुश्किल होता है। यह स्थिति सौम्य होती है और आमतौर पर दैनिक जीवन पर इसका असर नहीं होता है।
  4. ड्यूटेरानॉपिआ (Deuteranopia) - इस कलर ब्लाइंडनेस में हरे कॉन रंगद्रव्य काम करना बंद कर देते हैं। वे लाल रंगों को भूरा-पीला और हरे रंग को गहरा पीला जैसा देखते हैं।

नीला-पीला कलर ब्लाइंडनेस
नीला-पीला कलर ब्लाइंडनेस लाल-हरे कलर ब्लाइंडनेस से दुर्लभ है। इसमें नीले कॉन रंगद्रव्य (ट्राइटन) या तो होते ही नहीं हैं या सीमित कार्य करते हैं। नीले-पीले कलर ब्लाइंडनेस के दो प्रकार होते हैं।

  1. ट्राइटोनॉमलि (Tritanomaly) - इसमें नीले कॉन रंगद्रव्य कम कार्य करते हैं। इसमें नीला रंग हरा दिखाई देता है और गुलाबी से पीले और लाल में फरक करना मुश्किल हो सकता है।
  2. ट्राइटेनॉपिआ (Tritanopia) - ट्राइटेनॉपिआ से ग्रस्त लोगों में नीली कॉन कोशिकाओं की कमी होती है। इसमें नीला रंग हरा दिखाई देता है और पीला रंग बैंगनी या हल्के भूरे रंग का दिखता है।

पूर्ण कलर ब्लाइंडनेस (मोनोक्रोमसी)
पूर्ण कलर ब्लाइंडनेस (मोनोक्रोमैसी) वाले लोगों को रंग बिलकुल दिखाई नहीं देते हैं और उनकी दृष्टि की स्पष्टता भी प्रभावित हो सकती है। दो प्रकार के मोनोक्रोमसी होते हैं -

  1. कॉन मोनोक्रोमसी (Cone monochromacy) - इसमें तीन कॉन सेल रंगद्रव्य में से दो या तीनो काम नहीं करते। लाल कॉन मोनोक्रोमसी, हरी कॉन मोनोक्रोमसी और नीली कॉन मोनोक्रोमसी होती है। कॉन मोनोक्रोमसी वाले लोगों को रंगों में भेद करने में परेशानी होती है क्योंकि मस्तिष्क को विभिन्न प्रकार के कॉन से आए संकेतों की ज़रुरत होती है रंगों को देखने के लिए। जब केवल एक प्रकार का कॉन काम करता है तो यह तुलना संभव नहीं होती है।
  2. रॉड मोनोक्रोमसी (Rod monochromacy) - यह जन्म से मौजूद होता है। इसमें कॉन कोशिकाओं में से कोई भी कार्यात्मक रंगद्रव्य नहीं होता है। रॉड मोनोक्रोमसी वाले लोगों को दुनिया काले, सफेद और ग्रे रंग में दिखती है। रॉड मोनोक्रोमसी वाले लोग उज्ज्वल वातावरण में फोटोफोबिक और बहुत असुविधाजनक होते हैं।

कलर ब्लाइंडनेस के मुख्य लक्षण हैं -

  1. सामान्य तरीके से रंगों और रंगों की चमक को देखने में समस्या।
  2. सामान्य रंगों के बीच अंतर को बताने में असमर्थता।

अक्सर, कलर ब्लाइंडनेस के लक्षण इतने हल्के होते हैं कि कुछ लोगों को पता ही नहीं चलता की कि उन्हें इसकी समस्या है। जब कोई बच्चा रंगों को सीख रहा होता है, तो माता-पिता को कलर ब्लाइंडनेस के लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

गंभीर परिस्थितियों में पाए जाने वाले अन्य लक्षण निम्नलिखित हैं -

  1. कुछ रंगों  पहचानने में असमर्थता। उदाहरण के लिए लाल और हरे रंगों के बीच के अंतर न बता पाना लेकिन नीले और पीले रंगों में आसानी से बता देना।
  2. केवल कुछ रंगों को देख पाना।
  3. केवल काले, सफेद, और ग्रे रंग देख पाना (दुर्बल मामलों में)।
  4. कुछ रंगों में फर्क करने की कम क्षमता।
  5. पढ़ने में कठिनाई।
  6. पलकों का गिरना।
  7. एक रंग के कुछ प्रकारों को ही देखा पाना।
  8. कई रंग देखने में कठिनाई।
  9. रंगों के नाम गलत बताना।
  10. दृष्टि में दोहरापन (डिप्लोपिआ)।
  11. आंख में दर्द होना।
  12. आँखों की गतिविधि में तीव्रता (दुर्लभ मामलों में)।
  13. सबसे गंभीर रूप को छोड़कर, कलर ब्लाइंडनेस दृष्टि के तीखेपन को प्रभावित नहीं करती है।
  14. कभी-कभी, दृष्टि की कमज़ोर होना।

यदि आपकी आंखें सामान्य हैं, तो आप अलग-अलग रंगों में अंतर कर सकते हैं लेकिन अगर आपकी कॉन कोशिकाओं में एक या अधिक प्रकाश-संवेदनशील रसायनों की कमी होती है, तो आप केवल दो प्राथमिक रंग देख सकते हैं। कलर ब्लाइंडनेस होने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं -

  1. पारिवारिक विकार
    पारिवारिक कारणों से होने वाली रंग दृष्टि की समस्याएं महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में अधिक सामान्य होती हैं। सबसे आम कलर ब्लाइंडनेस लाल-हरे रंग की होती है जबकि नीले-पीले रंग की कलर ब्लाइंडनेस बहुत कम होती है। कोई भी रंग न देख पाने की संभावनाएं बहुत कम hoti हैं। पारिवारिक विकार के कारण आपको हल्के, मध्यम या गंभीर स्तर का विकार हो सकता है। पारिवारिक विकार के कारण हुई कलर ब्लाइंडनेस आमतौर पर दोनों आँखों को प्रभावित करती है और इसकी तीव्रता आपके जीवनकाल में नहीं बदलती।
     
  2. रोग
    कुछ ऐसी परिस्थितियां जो कलर ब्लाइंडनेस का कारण बन सकती हैं, वह हैं सिकल सेल एनीमिया, मधुमेह, आख की मैक्युलर डिजनरेशन (मैक्यूला का व्यपजनन), अल्जाइमर रोग, ग्लूकोमा, पार्किंसंस रोग, शराब की पुराणी लत और ल्यूकेमिया। इसमें एक आँख दूसरे की तुलना में अधिक प्रभावित हो सकती है और कलर ब्लाइंडनेस का इलाज किया जा सकता अगर उससे जुडी बीमारी का इलाज हो।
     
  3. कुछ दवाएं
    कुछ दवाएं जो हृदय की समस्याएं, उच्च रक्तचाप, स्तंभन दोष, संक्रमण, तंत्रिका संबंधी विकार और मनोवैज्ञानिक समस्याओं का इलाज करती हैं, कलर ब्लाइंडनेस भी कर सकती हैं।
     
  4. उम्र का बढ़ना
    आपकी उम्र बढ़ने के साथ-साथ रंगों को देखने की आपकी क्षमता धीरे-धीरे कम होती है।
     
  5. रसायन
    कार्यस्थल में कुछ रसायनों का के संपर्क में आना जैसे कार्बन डाइसल्फ़ाइड और उर्वरक, कलर ब्लाइंडनेस कर सकते हैं।

कलर ब्लाइंडनेस का निदान आमतौर पर एक नियमित आँख के परीक्षण के दौरान हो जाता है। इसलिए बच्चों का 4 साल की उम्र में कलर ब्लाइंडनेस का परीक्षण किया जाना चाहिए। यह रोका नहीं जा सकता है, लेकिन इससे स्वास्थ्य के लिए कोई खतरा नहीं होता है। इससे असुविधा हो सकती है लेकिन रोज़मर्रा की जिंदगी पर इससे कोई बाधा नहीं होती।

कलर ब्लाइंडनेस के अधिकांश मामले पारिवारिक कारणों के कारण होते हैं इसलिए, इन्हें रोका नहीं जा सकता।

हालांकि, बच्चों में कलर ब्लाइंडनेस का शीघ्र निदान इसकी प्रकृति और गंभीरता को समझने में मदद कर सकता है। इससे बाद में होने वाले किसी भी प्रभाव को नियंत्रित करने और कठिनाइयों को कम करने के लिए उपायों के उपयोग किया जा सकता है।

अगर आप दृष्टि की कमी से सम्बंधित कोई दवा ले रहे हैं तो आपकी दृष्टि की नियमित जाँच होनी चाहिए।

कलर ब्लाइंडनेस का निदान निम्नलिखित तरह से किया जा सकता है -

  1. पारिवारिक चिकित्सा इतिहास सहित पूर्ण शारीरिक जाँच।
  2. कलर ब्लाइंडनेस का निदान उन परीक्षणों से किया जा सकता है जो निर्धारित करते हैं कि आप कितनी अच्छी तरह रंग पहचान पाते हैं। यह आमतौर पर एक नियमित आँख के परीक्षण के दौरान ही किया जाता है।

कलर ब्लाइंडनेस टेस्ट इस प्रकार हैं - 

  1. इशिहारा कलर टेस्ट (Ishihara Color Test)
    इशिहारा कलर टेस्ट लाल-हरे रंग के अंधापन के लिए सबसे आम परीक्षण है। इसमें आपको रंगीन बिंदुओं का एक समूह दिखाया जाता है और उनमें एक पैटर्न ढूंढने की कोशिश करने का निर्देश दिया जाता है, जैसे कि कोई वर्ण या संख्या। जिन पैटर्नों को आप देख पाते हैं, उनके आधार पर आपके डॉक्टर ये निर्धारित करते हैं की आपको क्या समस्या है।
     
  2. न्यूएर कैम्ब्रिज कलर टेस्ट (Newer Cambridge Color Test)
    न्यूएर कैम्ब्रिज कलर टेस्ट, इशिहारा कलर टेस्ट के समान होता है लेकिन यह एक कंप्यूटर मॉनीटर पर होता है। इसमें आपको सी आकार की पहचान करनी होती है जो कि पीछे के रंग से अलग होती है।
     
  3. एनोमेलोस्कोप (Anomaloscope)
    एनोमेलोस्कोप टेस्ट में दो अलग-अलग प्रकाश स्रोतों का उपयोग किया जाता है। इसका लक्ष्य होता है कि प्रकाश के दोनों स्रोतों की चमक और रंग का मिलान करना।
     
  4. एचआरआर (हार्डी रैंड और राइटलर) सीयूडोइसोक्रोमैटिक कलर टेस्ट [HRR (Hardy Rand and Rittler) Pseudoisochromatic Color Test]
    यह परीक्षण लाल-हरे रंग के कलर ब्लाइंडनेस का परीक्षण है। यह कलर ब्लाइंडनेस के लिए परीक्षण करने के लिए रंग प्लेट का उपयोग करता है।
     
  5. फर्नसवर्थ-मूनसेल 100 ह्यू टेस्ट (Farnsworth-Munsell 100 Hue Test)
    इसमें आपको कुछ रंगीन चिप्स को रंग कि समानता के आधार पर उनकी व्यवस्था करने को कहा जाता है। रंग दृष्टि की समस्याओं से ग्रस्त लोग रंगीन चिप्स को सही तरीके से व्यवस्थित नहीं कर पाते हैं। 

वर्तमान में, कलर ब्लाइंडनेस का कोई इलाज नहीं है। रंगीन फिल्टर या कॉन्टैक्ट लेन्स उपलब्ध हैं जो कि कुछ परिस्थितियों में इस्तेमाल किए जा सकते हैं (स्पष्ट दृष्टि बढ़ाने में मदद करने के लिए और रंगों को पहचानना आसान बनाने के लिए। लेकिन कई मरीज़ उन्हें असुविधाजनक मानते हैं)।

रंगीन कॉन्टैक्ट लेंस
रंगीन कॉन्टैक्ट लेंस कुछ रंगों को मंद या उज्ज्वल दिखा सकते हैं और कुछ रंग दृष्टि की कमियों में मदद कर सकते हैं। कुछ लोग यह दावा करते हैं कि एक आंख में लेंस पहनकर उनकी दृष्टि और कामकाज में मदद मिलती है। हालाँकि, ऐसा नहीं है कि वास्तव में लेंस उन्हें अधिक रंग देखने में मदद करते हैं। लेंस दृष्टि को धुंधला कर सकते हैं और अन्य खतरनाक परिस्थितियां भी बना सकते हैं।

इलेक्ट्रॉनिक आंख
इलेक्ट्रॉनिक आंख हाथ में पकड़ने वाला एक उपकरण है जो रंगों की पहचान करता है। इस उपकरण में, एक ऑडियो सिंथेसाइज़र होता है जो रंग की पहचान करके जोर से बोलता है।

  1. यदि आपके बच्चे को कलर ब्लाइंडनेस है तो आप रंगों की पहचान करने में उसकी मदद कर सकते हैं जैसे कपड़ों के रंग पहचानना, सहायक उपकरण इस्तेमाल करना, ट्रैफिक लाइट पर हरे, पीले और लाल रंगों की जगह की पहचान करवाना और संकेतों का अर्थ आकारों के आधार पर बताना। स्कूल में पढ़ने की चीज़ों में भी आपको बदलाव करना पड़ सकता है। शिक्षकों को सूचित करें कि आपके बच्चे के लिए रंगों से सम्बंधित कार्य उपयुक्त नहीं हैं।
  2. आमतौर पर, कलर ब्लाइंडनेस से प्रभावित लोग अपनी हालत के साथ समायोजन करना सीख जाते हैं। आप कलर ब्लाइंडनेस से प्रभावित व्यक्ति की मदद इन प्रकारों से कर सकते हैं -
  3. दोस्तों या परिवार के सदस्यों से रंग समन्वय करने में मदद करवाना (यह विशेष रूप से गंभीर कमी के मामलों में आवश्यक है)।
  4. घर में उचित रोशनी का होना सुनिश्चित करना और काम करने की जगह का रंगों में भेद करने में मदद करने के लिए पर्याप्त होना सुनिश्चित करना।
  5. शिक्षकों को समस्या के बारे में सूचित करना ताकि सीखने की चीज़ों को संशोधित किया जा सके या शिक्षण विधियों को समायोजित किया जा सके।
कलर ब्लाइंडनेस से जुड़े जोखिम कारक -
  1. ग्लूकोमा या मैक्युलर डिजनरेशन (आख की मैक्यूला का व्यपजनन) जैसे आंख के विकार होना।
  2. गठिया के लिए प्लैक्यूनिल नामक दवा लेना।
  3. लम्बे समय से शराब की लत्त होना।
  4. अल्जाइमर रोग या पार्किंसंस रोग होना।
  5. कुछ कैंसर जैसे कि ब्लड कैंसर (ल्यूकेमिया)।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि जोखिम कारक होने का मतलब यह नहीं है कि आपको यह समस्या होगी ही। साथ ही, जोखिम वाले कारक के न होने का मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को यह समस्या नहीं हो सकती।

कलर ब्लाइंडनेस की जटिलताएं -

  1. व्यवसाय की सीमाएं।
  2. कुछ नियमित/दैनिक कार्य करने में कठिनाई।
  3. ड्राइविंग में कठिनाई, विशेष रूप से ट्रैफिक लाइट के रंगों के बीच भेद करने में समस्याएं।

यदि आपको कलर ब्लाइंडनेस है तो निम्नलिखित चीज़ों का ध्यान रखें -

  1. निम्न रंगों के संयोजनों से बचें
    हरा-लाल; हरा-भूरा; नीला-बैंगनी; हरा-नीला; हल्का हरा-पीला; नीला-ग्रे; हरा-ग्रे; हरा-काला।
     
  2. रंग की पतली रेखाओं का उपयोग न करें
    कुछ कलर ब्लाइंडनेस से ग्रस्त लोग किसी रंग की ज़्यादा मात्रा में होने से उसे देख पाते हैं। यदि रंग की एक पंक्ति बहुत पतली है, तो उन्हें सही रंग दिखाई नहीं देगा।
     
  3. कम उज्वलता से बचें
    कलर ब्लाइंडनेस से ग्रस्त लोग व्यक्तियों को उज्जवल रंगों में अंतर करना आसान लगता है जबकि मंद रंगों में वह अंतर नहीं कर पाते।

कलर ब्लाइंडनेस में निम्नलिखित चीज़ें खाना लाभकारी हो सकता है -

  1. गाजर
    सभी नारंगी फल और सब्ज़ियों में विटामिन ए का अग्रदूत होता है जो आँखों से गुज़रने वाली हल्की ऊर्जा को अवशोषित करने में मदद करता है और रात में कम रोशनी के स्तर को समायोजित करता है।
     
  2. पालक
    पालक और अन्य पत्तेदार सब्ज़ियों जैसे ब्रोकोली में ज़ेक्सेन्थिन और ल्यूटिन होता है, जो मैक्युलर डिजनरेशन (आख की मैक्यूला का व्यपजनन) और मोतियाबिंद होने के जोखिम को कम करते हैं।
     
  3. संतरे
    संतरे विटामिन सी से युक्त होते हैं। एक अध्ययन में पाया गया है कि जिन महिलाओं ने 10 साल या इससे अधिक समय के लिए विटामिन सी पूरक लिए हैं, उनके मोतियाबिंद होने के जोखिम में 64% कटौती हुई है।
     
  4. जामुन
    जामुन उन केशिकाओं को मज़बूत बनाने में मदद करते हैं जो आंखों में रक्त और पोषक तत्व प्रदान करते हैं।
     
  5. तेल युक्त मछली
    ओमेगा -3 सूजन को कम करने में मदद करता है जिससे ड्राई आई हो सकता है।
     
  6. बादाम
    यह शरीर में कोशिकाओं के ऑक्सीडियेशन को रोकने में मदद करता है जो यूवी किरणों के संपर्क की वजह से मोतियाबिंद की प्रगति को धीमा कर सकता है और उम्र से संबंधित मैक्युलर डिजनरेशन (आख की मैक्यूला का व्यपजनन) को कम कर सकता है।
Dr. Nishant Singh

Dr. Nishant Singh

ऑपथैल्मोलॉजी

Dr. Rahul Sharma

Dr. Rahul Sharma

ऑपथैल्मोलॉजी

Dr. Vaibhev Mittal

Dr. Vaibhev Mittal

ऑपथैल्मोलॉजी

क्या आप या आपके परिवार में किसी को यह बीमारी है? सर्वेक्षण करें और दूसरों की सहायता करें

और पढ़ें ...