देश में कोविड-19 महामारी के बीच अन्य संक्रामक बीमारियों से जुड़े नए मामलों ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। दिल्ली में जहां कोरोना के साथ डेंगू संक्रमण का डबल अटैक देखने को मिल रहा है तो वहीं महाराष्ट्र में अब कांगो फीवर को लेकर अधिकारी अलर्ट हो गए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक महाराष्ट्र के पालघर जिले में स्थानीय प्रशासन ने अपने सभी अफसरों को कांगो फीवर के संभावित प्रसार के खिलाफ सतर्क रहने के लिए कहा।

जिला प्रशासन ने कहा कि कोरोना वायरस के प्रकोप के बीच कांगो फीवर एक चिंता का विषय हो सकता है। इसलिए जिले के सभी मीट एवं पॉल्ट्री विक्रेताओं समेत उपभोक्ताओं और पशुपालकों को कांगो फीवर से अलर्ट रहने और एहतियात बरतने के लिए कहा है। अधिकारियों की मानें तो समय पर सावधानी बरतना आवश्यक है क्योंकि कांगो फीवर का कोई विशिष्ट और उपयोगी इलाज अभी तक उपलब्ध नहीं है।

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क्‍या है कांगो फीवर?
कांगो फीवर वायरल बुखार है जो कि नैरोवायरस की वजह से होता है। इसका पूरा नाम क्रीमियाई कांगो हीमोरेजिक फीवर (सीसीएचएफ) है। यह हीमोरेजिक वायरस बुन्‍याविरिदई परिवार से है। ऐसा माना जाता है कि ये बुखार सबसे पहले अफ्रीका के देशों क्रिमिया और कांगो में पाया गया था और इसीलिए इसका नाम क्रिमीयन कांगो फीवर पड़ा। ये बीमारी अफ्रीका, एशिया और मध्‍य पूर्व में ज्‍यादा पाई जाती है। हालांकि, उत्तरी यूरोप और भूमध्‍य सागर में भी पाई जाती है।

यह बीमारी प्रमुख तौर पर इक्‍सोडिड टिक यानी चिचड़ी के काटने या टिक्‍स के आसपास रहने वाले जानवरों जैसे कि मवेशी, भेड़ और बकरी से फैलती है। लेकिन ये बीमारी संक्रमित व्‍यक्‍ति के शरीर से होने वाले किसी भी तरह के स्राव के सीधे संपर्क में आने पर भी हो सकती है। पशु और कृषि उद्योग में काम करने वाले लोगों को इस बीमारी का खतरा सबसे अधिक होता है।

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कांगो फीवर के लक्षण
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार टिक के काटने के बाद तीन से नौ दिनों के भीतर कांगो फीवर के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। लेकिन अगर संक्रमित व्यक्ति से यह बीमारी किसी को होती है तो इसके लक्षण पांच से 13 दिनों में सामने आते हैं। किसी भी कारण से कांगो फीवर हुआ हो, तो इसके लक्षण निम्न होते हैं:

कांगो फीवर के 30 से 40 फीसदी मामलों में मरीज की मृत्यु हो जाती है और अधिकतर मौतें बीमार होने के दूसरे हफ्ते में होती हैं। उचित इलाज के बावजूद इस बीमारी के ठीक होने या मरीज की हालत में कोई सुधार का कोई संकेत 9 से 10 दिन बाद ही दिखाई देता है। (और पढ़ें- टिक बाइट्स के लक्षण, कारण)

गुजरात कनेक्शन से कांगो फीवर फैलने की आशंका
महाराष्ट्र के पालघर के पशुपालन विभाग के डिप्टी कमिश्नर डॉ. प्रशांत डी कांबले ने एक सर्कुलर के तहत बताया कि गुजरात के कुछ जिलों में कांगो फीवर से जुड़े कई मामलों की पुष्टि हुई है जिसके बाद महाराष्ट्र के सीमावर्ती जिलों में भी कांगो फैलने की आशंका है क्योंकि पालघर गुजरात के वलसाड जिले के करीब है।

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सर्कुलर में कहा गया है, "यह वायरल बीमारी एक विशेष प्रकार के टिक द्वारा एक जानवर से दूसरे जानवर में फैलती है। वहीं, संक्रमित जानवरों के खून के संपर्क में आने और संक्रमित जानवरों के मांस खाने से यह बीमारी इंसानों में फैलती है। अगर बीमारी का समय पर निदान और उपचार नहीं किया जाता है, तो 30 प्रतिशत रोगियों की मृत्यु हो जाती है।" यही वजह है कि विभाग ने अधिकारियों को सभी आवश्यक सावधानी बरतने और ऐहतियाती कदम उठाने का निर्देश दिया है।

गुजरात में कांगो फीवर से जुड़े कई मामलों की पुष्टि
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो हाल ही में गुजरात में कांगो फीवर से जुड़े चार मामलों की पुष्टि हुई थी जिसमें से एक मरीज की मौत भी हो चुकी है। इसके चलते ही पालघर प्रशासन ने यह अलर्ट जारी किया है।

रिपोर्ट के मुताबिक इस साल राज्य में क्रीमिया कांगो हैमोरेजिक फीवर (CCHF) के चार मामले सामने आए, जिनमें से तीन मामले नैशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (NCDC) के "साप्ताहिक प्रकोप" रिपोर्ट में दर्ज किए गए हैं। हालांकि गुजरात राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने दावा किया कि इस साल कांगो फीवर का अधिक प्रकोप देखने को नहीं मिला है और पिछले साल की तुलना में काफी कम मामले दर्ज हुए हैं। गौरतलब है कि बीते वर्ष गुजरात में कांगो फीवर से जुड़े 35 मामलों की पुष्टि हुई थी, जिसमें से 17 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी।

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राजस्थान में भी था कांगो फीवर का प्रभाव
गुजरात के पड़ोसी राज्य राजस्थान में बीते साल कांगो फीवर का असर देखने को मिला था। यहां सितंबर, 2019 में जोधपुर में दो बच्‍चों को कांगो फीवर से पीड़ित होने पर अस्‍पताल में भर्ती करवाया गया। गौरतलब है कि इन दोनों बच्चों को अपने पिता से ये बीमारी हुई थी।

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