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कोविड-19 की रोकथाम के लिए कारगर वैक्सीन बनाने की दौड़ में सबसे आगे चल रही दवा कंपनियों में से एक कैनसीन बायोलॉजिक्स द्वारा तैयार की गई वैक्सीन के शुरुआती परीक्षण कामयाब रहे हैं। खबरें हैं कि मार्च-अप्रैल में हुए इस शुरुआती ट्रायल के तहत वैक्सीन को इन्सानों पर आजमाया गया था। इस दौरान प्रतिभागियों को तीन वर्गों में बांट कर अलग-अलग मात्रा के डोज (निम्न, मध्य और उच्च) दिए गए थे। बताया जा रहा है कि वैक्सीन सुरक्षा के साथ प्रतिभागियों के इम्यून सिस्टम को बढ़ाने में सफल रही। 

प्रतिष्ठित विज्ञान एवं स्वास्थ्य पत्रिका दि लांसेट में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, वैक्सीन ने संक्रमण को शरीर में फैलने से रोकने वाले रोग-प्रतिकारकों यानी एंटीबॉडीज को तो प्रेरित किया ही, साथ ही मानव शरीर के इम्यून सिस्टम की सबसे महत्वपूर्ण कोशिकाओं टी-सेल्स को भी बढ़ाने का काम किया। रिपोर्ट में बीजिंग इंस्टीट्यूट ऑफ बायोटेक्नॉलजी और अन्य शोध संगठनों ने कहा है कि अब आगे के रिसर्च में यह देखा जाएगा कि वैक्सीन कोरोना वायरस के खिलाफ कितनी प्रभावी साबित होती है।

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मॉडेर्ना से ज्यादा बड़ा सैंपल
अमेरिकी दवा कंपनी मॉडेर्ना ने भी हाल में कोविड-19 की वैक्सीन के लिए अपने शुरुआती मानव परीक्षणों के सकारात्मक परिणामों को लेकर काफी चर्चा बटोरी थी। लेकिन उसके और कैनसीनो बायोलॉजिक्स के परिणामों में एक बुनियादी अंतर है, जो चीन की कैनसीन बायोलॉजिक्स के दावे को ज्यादा विश्वसनीय बनाता है। 

दरअसल, मेडिकल विशेषज्ञ बताते हैं कि किसी बीमारी की वैक्सीन की क्षमता इस बात पर निर्भर करती है कि वह ट्रायल में कितने लोगों के इम्यून सिस्टम को बढ़ा पाई। मॉडेर्ना के ट्रायल में जहां केवल आठ लोगों पर वैक्सीन आजमाई गई थी, वहीं चीनी कंपनी ने सौ से ज्यादा लोगों को अपने ट्रायल में शामिल किया था। अच्छी बात यह रही कि इनमें से किसी में भी वैक्सीन के गंभीर दुष्प्रभाव नहीं दिखे। ट्रायल के 14वें दिन प्रतिभागियों के शरीर में संक्रमण खत्म करने वाले एंटीबॉडीज बनना शुरू हुए, जो 28वें दिन अपनी क्षमता के चरम (पीक) पर पहुंच गए। इस दौरान यह भी पाया गया कि इम्यून सिस्टम से जुड़ी प्रमुख कोशिका टी-सेल में भी 14वें दिन इजाफा हुआ।

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कैनसीनो बायोलॉजिक्स की वैक्सीन के मॉडेर्ना कंपनी की वैक्सीन से बेहतर होने की वजह केवल सैंपल का अंतर नहीं है। स्टेट न्यूज वेबसाइट पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, मॉडेर्ना के ट्रायल के कथित सकारात्मक परिणामों पर संदेह पैदा होने का एक कारण यह भी है कि कंपनी ने अपने ट्रायल से जुड़े क्रिटिकल डेटा की जानकारी नहीं दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, मॉडेर्ना ने अपने ट्रायल से जुड़ी जानकारी तो साझा की, लेकिन उसका डेटा उपलब्ध नहीं कराया। 

महज आठ लोगों पर हुए ट्रायल को सफल बता कर कंपनी ने अमेरिकी बाजार में अपने स्टॉक की कीमत बढ़वा ली, जबकि वैज्ञानिकों के लिए ऐसा कोई जर्नल आर्टिकल नहीं है, जिसके आधार पर वे कंपनी के दावे को विश्वसनीय मान सकें। यह बात इस तथ्य को जानने के बाद और गंभीर हो जाती है कि जिस नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एलर्जी एंड इन्फेक्शियस डिसीजज (एनआईएआईडी) के साथ मिल कर मॉडेर्ना ने वैक्सीन का टेस्ट किया, वह अपने परिणाम आमतौर पर सबके सामने रखता है। यह दिलचस्प बात है कि एनआईएआईडी ने मॉडेर्ना के दावे से संबंधित न तो कोई प्रेस रिलीज जारी की और न ही किसी तरह की टिप्पणी दी।

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