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नए कोरोना वायरस सार्स-सीओवी-2 के संक्रमण से उबर चुके लोगों का वैश्विक आंकड़ा 17 लाख से भी ज्यादा है। यह संख्या मृतकों के मुकाबले करीब छह गुना है। लेकिन जिन लोगों ने इस जानलेवा वायरस को हराया है, उनमें से कुछ के लिए यह एक लंबी लड़ाई के पहले संघर्ष में जीत हासिल करने जैसा हो सकता है। आगे चलकर उन्हें और कई संघर्षों यानी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते रहना पड़ सकता है, जिसकी वजह कोविड-19 से जुड़ी है।

दरअसल, कोविड-19 से उबर चुके कुछ मरीजों में सांस की कमी, थकान और बदनदर्द की समस्या उनमें वायरस के खत्म होने के कई महीनों बाद भी नहीं गई है। चीन के शहर वुहान और चीनी प्रशासन वाले हांगकांग में हुए छोटे पैमाने के कुछ अध्ययनों में यह बात निकल कर आई है। इन अध्ययनों में पाया गया है कि कोविड-19 को मात दे चुके कुछ लोगों के फेफड़े, हृदय और लिवर अभी तक ठीक से काम नहीं कर रहे हैं और यह केवल शुरुआत है।

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बीमारी के दीर्घकालिक प्रभावों की ट्रैकिंग
कोरोना वायरस सार्स-सीओवी-2 से जुड़े इस तथ्य को अब सभी मेडिकल विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यह केवल फेफड़ों पर हमला नहीं करता है, बल्कि आंखों की पुतलियों से लेकर पैरों की उंगलियों और आंतों से लेकर किडनी तक को अलग-अलग प्रकार से नुकसान पहुंचाता है। ऐसे में वायरस को खत्म करने में शरीर का ज्यादातर इम्यून सिस्टम खप जाता है, जो अपनेआप में एक चिंता की बात है।

यही कारण है कि शोधकर्ताओं ने इस नई बीमारी के दीर्घकालिक प्रभावों को ट्रैक करना शुरू कर दिया है। वहीं, इसी तरह के वायरसों से अतीत में आई महामारियों के अनुभव बताते हैं कि इनके शारीरिक प्रभाव एक दशक से भी ज्यादा समय तक बने रह सकते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक, 2002-03 में सार्स-सीओवी-1 कोरोना वायरस से फैली बीमारी सिवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम यानी सार्स से बचे कई लोगों में अगले 12 सालों तक फेफड़ों के संक्रमण, हाई कोलेस्ट्रॉल और तेजी से बीमार होने के अलावा अन्य शारीरिक समस्याएं देखने को मिलती रहीं।

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'वर्तमान पीढ़ी का पोलियो है नया कोरोना वायरस'
कोरोना वायरस के दीर्घकालिक प्रभावों ने मेडिकल विशेज्ञों को चिंता में डाला है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन का इलाज करने वाले डॉक्टर निकोलस हार्ट तो इसे 'वर्तमान पीढ़ी का पोलियो' तक बताते हैं। वे मानते हैं कि कोविड-19 महामारी दुनिया में अपने कई बुरे अनुभव छोड़ जाएगी और वैश्विक स्वास्थ्यगत ढांचे को बदल कर रख देगी। यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलायिना में महामारी विशेषज्ञ डॉ. किम्बर्ली पावर्स कहते हैं, 'इन दीर्घकालिक समस्याओं का मरीजों पर बहुत बड़ा असर पड़ेगा। उनका इलाज करने वाले डॉक्टर और आसपास का स्वास्थ्यगत ढांचा भी अलग-अलग प्रकार से प्रभावित होंगे।'

ठीक हुए कुछ मरीज नहीं दिख रहे 'ठीक'
हांगकांग स्थित एक अस्पताल के अधिकारी कोविड-19 के कोई 20 मरीजों पर अध्ययन कर रहे हैं। इन लोगों को बीमारी से ठीक होने के बाद अस्पताल से छुट्टी मिले दो महीने से ज्यादा वक्त हो गया है। लेकिन आधे मरीजों में लंग इन्फेक्शन की समस्या अभी तक बनी हुई है। उनके फेफड़े ठीक प्रकार से नहीं फूल रहे हैं या कहें उनमें ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का प्रवाह सामान्य नहीं है। वहीं, वुहान में हुए एक अध्ययन में सामने आया कि कैसे वहां कोरोना वायरस से उबर चुके 25 मरीज सामान्य तरीके से काम नहीं कर पा रहे थे।

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वुहान में ही हुए एक अन्य अध्ययन में कोविड-19 के कोई 70 मरीजों के सीटी स्कैन से पता चला कि वे डिस्चार्ज होने के एक महीने बाद भी फेफड़ों से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे थे। इसके अलावा चीन के साथ इटली के मरीजों से जुड़े डेटा के आधार पर शोधकर्ताओं ने जाना है कि कोविड-19 से ठीक होने के बाद कुछ मरीजों को आने वाले समय में हृदय संबंधी दीर्घकालिक समस्याएं भी हो सकती हैं। मरीजों में इन समस्याओं के बने रहने की वजह का पता लगाने के लिए ही वैज्ञानिक सार्स से जुड़े अनुभवों को देख रहे हैं।

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