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कोविड-19 के इलाज के संबंध में स्टेरॉयड आधारित ड्रग्स की क्षमता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक स्वीकृति मिलती दिख रही है। ये स्टेरॉयड न सिर्फ सस्ते हैं, बल्कि बाजार में आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। बुधवार को इन स्टेरॉयड को लेकर हुए अंतरराष्ट्रीय क्लिनिकल ट्रायलों के प्रकाशन से इस बात की पुष्टि हो गई है कि ये कोविड-19 के गंभीर मरीजों के लिए जिंदा बच जाने की उम्मीद जगाते हैं। यहां तक कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस बात को स्वीकार करते हुए कोरोना वायरस के ट्रीटमेंट को लेकर अपने दिशा-निर्देशों में बदलाव कर दिया है। कोविड-19 महामारी की शुरुआत में स्टेरॉयड आधारित ट्रीटमेंट की क्षमता पर सवाल उठाने के बाद अब उसने जोर देते हुए कहा है कि सार्स-सीओवी-2 के गंभीर मरीजों का इलाज स्टेरॉयड्स की मदद से किया जाना चाहिए। हालांकि हल्के मरीजों के लिए उसने साफ कहा है कि उन पर स्टेरॉयड ट्रीटमेंट न आजमाया जाए।

इन स्टेरॉयड के जरिये कोविड-19 के मरीजों के इलाज से जुड़े पांच शोधपत्र प्रकाशित करने वाली चर्चित मेडिकल पत्रिका जामा ने कहा है कि अब स्टेरॉयड कोविड-19 का 'मानक उपचार' हैं। पत्रिका ने कोरोना संक्रमण से ग्रस्त 1,700 से ज्यादा मरीजों पर हुए तीन अलग-अलग स्टेरॉयड आधारित क्लिनिकल ट्रायलों का संयुक्त डेटा और उनका विश्लेषण प्रकाशित किया है। रिपोर्ट में पत्रिका ने बताया है कि हरेक स्टेरॉयड से मरीजों के मरने का खतरा कम हुआ है। इस पर जामा के प्रधान संपादक डॉ. हावर्ड सी बॉचनर ने कहा है, 'अब यह साफ तौर पर दिख रहा है कि स्टेरॉयड (कोविड-19 का) मानक उपचार हैं।'

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न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, पत्रिका में प्रकाशित अध्ययनों के लेखकों ने कॉर्टिकोस्टेरॉयड आधारित ड्रग्स को कोविड-19 के खिलाफ पहली पंक्ति के ट्रीटमेंट के रूप में स्वीकार किए जाने की बात कही है। अभी तक केवल एक ड्रग को कोविड-19 के गंभीर मरीजों पर आजमाया जाता रहा है। यह दवा है गिलीड साइंसेज द्वारा निर्मित रेमडेसिवीर, जो न सिर्फ महंगी है, बल्कि सीमित स्टॉक के चलते सभी मरीजों के पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है। वहीं, इसके इस्तेमाल से कोविड-19 के मरीजों की मृत्यु दर कम होने के भी पुख्ता प्रमाण नहीं मिलते हैं। 

लेकिन डेक्सामेथासोन, हाइड्रोकॉर्टिसोन और मिथाइलप्रेडनिसोलोन जैसे स्टेरॉयड से लोगों और डॉक्टरों की मुश्किलें कम हो सकती हैं। बताया गया है कि कोरोना संक्रमण के चलते अतिसक्रिय हुए इम्यून सिस्टम को दबाने और इनफ्लेमेशन, सूजन तथा दर्द को कम करने में ये स्टेरॉयड कारगर हैं। उल्लेखनीय है कि कोविड-19 के कई मरीज वायरस के कारण नहीं, बल्कि इसके संक्रमण के खिलाफ शरीर में पैदा हुए इम्यून रेस्पॉन्स की अतिसक्रियता के चलते मारे गए हैं और कॉर्टिकोस्टेरॉयड इसे कम करने में सक्षम पाए गए हैं। 

बीते जून महीने में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने डेक्सामेथासोन के क्लिनिकल ट्रायलों के आधार पर दावा किया था कि इस स्टेरॉयड आधारित ड्रग से कोविड-19 के गंभीर मरीजों को मरने से बचाया जा सकता है। तब इस दवा को कोरोना वायरस का इलाज ढूंढने में लगे कई वैज्ञानिकों ने 'बड़ी कामयाबी' बताया था। लेकिन उसी दौरान कई मेडिकल विशेषज्ञों ने कोरोना संक्रमण को ठीक करने के लिए स्टेरॉयड के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई थी। इन लोगों का मानना था कि स्टेरॉयड के इस्तेमाल से लोगों को कई तरह के दुष्प्रभाव झेलने पड़ सकते हैं, खासकर बुजुर्ग मरीजों को जिनकी संख्या कोरोना वायरस के मरीजों में सबसे ज्यादा है। इन जानकारों की दलील दी थी कि स्टेरॉयड से मरीजों को कई अन्य प्रकार के संक्रमण हो सकते हैं, उनके खून में ग्लूकोस का लेवल बढ़ सकता है और उन्हें उलझन और बेहोशी की समस्या का सामना करना पड़ सकता है।

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एक बात यह भी कही गई कि स्टेरॉयड से केवल कोविड-19 के गंभीर मरीजों का इलाज किया गया, सामान्य या कम गंभीर मरीजों पर इसके फायदों या नुकसानों की कोई निश्चित जानकारी नहीं है। वहीं, स्टेरॉयड कितनी मात्रा में देना है और इस तरह का ट्रीटमेंट कितने समय तक चलाना चाहिए, इस संबंध में भी कोई स्पष्टता नहीं है। इन तर्कों के आधार पर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के दावे के बाद भी स्टेरॉयड आधारित कई क्लिनिक ट्रायलों पर रोक लगा दी गई थी। लेकिन अब कई वैज्ञानिकों ने कुल मिलाकर स्टेरॉयड्स को कोविड-19 के गंभीर मरीजों के इलाज में भरोसेमंद बताया है।

अध्ययन के नतीजे
जामा की जिस रिपोर्ट के आधार पर स्टेरॉयड्स को कोविड-19 के गंभीर मरीजों का मानक इलाज बताया जा रहा है, उसमें बताया गया है कि कैसे क्लिनिकल ट्रायल में इन ड्रग्स ने कोविड-19 के ऐसे एक-तिहाई मरीजों की जान बचाई, जिनकी हालत नाजुक बनी हुई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, अध्ययन में शामिल जिन 1,700 से ज्यादा मरीजों में से 1,282 को डेक्सामेथासोन ड्रग दिया गया, उनमें मृत्यु दर 36 प्रतिशत तक घट गई। ट्रायल में 374 अन्य मरीजों को हाइड्रोकॉर्टिसोन स्टेरॉयड दिया गया था। उनमें मौतों की दर 31 प्रतिशत तक कम हो गई। वहीं, 47 मरीजों में मिथाइलप्रेडनिसोलोन स्टेरॉयड ड्रग से मृत्यु दर नौ प्रतिशत तक कम हुई है। डब्ल्यूएचओ के एक कार्यकारी समूह ने इन ट्रायल के विश्लेषण का काम किया था।

इसके बाद डब्ल्यूएचओ ने चेतावनी देते हुए कहा है कि इन स्टेरॉयड के इस्तेमाल में किसी तरह का भेदभाव न किया जाए, लेकिन कोरोना वायरस के हल्के मरीजों पर इन्हें न आजमाया जाए, क्योंकि उन्हें इससे फायदा मिलने की संभावना कम है और साइड इफेक्ट होने का खतरा है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, स्टेरॉयड के अनुचित इस्तेमाल से इनकी वैश्विक आपूर्ति में कमी हो सकती है, जिसके चलते वे मरीज इनसे वंचित हो सकते हैं, जिन्हें वाकई में इनकी जरूरत है। इस बीच, ब्राजील में भी डेक्सामेथासोन से जुड़े क्लिनिकल ट्रायलों के सकारात्मक परिणाम आने की खबर है। बताया गया है कि वहां कोविड-19 के 299 गंभीर मरीजों को यह ड्रग दिया गया था, जिससे इन मरीजों में ठीक होने की दर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और उन्हें वेंटिलेटर से हटा लिया गया है।

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