देश में कोविड-19 बीमारी के मामले बढ़ते देख सरकार और प्रशासन के स्तर पर कई कदम उठाए जा रहे हैं। एक तरफ मरीजों की जांच के लिए टेस्टिंग किट्स की आपूर्ति और लैबोरेटरीज की संख्या में इजाफा किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ गंभीर रूप से बीमार हुए लोगों के लिए हजारों की संख्या में वेंटिलेटर्स का इंतजाम किए जाने की बात कही गई है। हाल में सरकार ने 40,000 वेंटिलेटर्स बनवाने की बात कही थी। वहीं, कोरोना वायरस संकट से निपटने के लिए पहले से मौजूद, लेकिन खराब, वेंटिलेटर्स को ठीक करने के लिए निर्देश जारी किए जाने से संबंधित रिपोर्टें भी मीडिया में प्रकाशित हुईं।
लेकिन यह सवाल कुछ लोगों को इस सोच में डाल सकता है कि आखिर कोविड-19 के किसी मरीज को वेंटिलेटर पर लिटाने की जरूरत कब पड़ती है और ऐसा होने का मतलब क्या है। इस रिपोर्ट में इन दो जरूरी सवालों पर चर्चा करेंगे।
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वेंटिलेटर की जरूरत कब?
मेडिकल जानकारों के मुताबिक, कोरोना वायरस इन्सानी शरीर में प्रवेश करते ही सांस की तकलीफ पैदा करता है। वह फेफड़ों तक पहुंचने से पहले सांस से जुड़े वायु मार्ग पर हमला करता है। फेफड़ों तक हवा पहुंचाने में इन वायु मार्गों की अहम भूमिका होती है। कोरोना वायरस सार्स-सीओवी-2 इन मार्गों की सतह को नुकसान पहुंचाता है। इससे शरीर असहज रूप से उत्तेजित होने लगता है। परिणामस्वरूप, वायु मार्गों की सतहों से जुड़ी नसों में जलन होने लगती है। स्थिति तब और विकट हो जाती है, जब संक्रमण वायु मार्गों के अंत तक यानी वायु कोष (एयर सैक) तक पहुंच जाता है।
वायु मार्ग से जुड़े शरीर के इस अंदरूनी हिस्से को 'एलवियोलाई' कहते हैं। फेफड़ों में गैस (ऑक्सीजन, कार्बन डाईऑक्साइड) की जो अदला-बदली (या विनिमय) होती है, उसके लिए एलवियोलाई जिम्मेदार होता है। कोरोना वायरस से अगर यह अंग संक्रमित हो जाए तो वायु मार्गों में सूजन होने लगती है। इससे फेफड़ों की ऑक्सीजन को ट्रांसफर करने की क्षमता प्रभावित होती है। यह मरीज के निमोनिया से पीड़ित होने का लक्षण है, जो कोविड-19 बीमारी के गंभीर लक्षणों में शामिल है। इसके चलते पीड़ित व्यक्ति न तो ठीक से ऑक्सीजन ले पाता है और न ही कार्बन डाईऑक्साइड छोड़ पाता है। निमोनिया के चलते मरीज की मौत भी हो सकती है। रिपोर्टों के मुताबिक, इस स्थिति में कोविड-19 के मरीज को वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत पड़ती है। लेकिन वेंटिलेटर की मदद से कोविड-19 के मरीज को बचाने की कितनी संभावना रहती है?
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क्या कहते हैं शोध और विशेषज्ञ?
इस बारे में चीन, अमेरिका और इटली में कई छोटे शोध किए गए हैं। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक, इन शोधों से यह तथ्य सामने आया है कि वेंटिलेटर सपोर्ट पर रहने वाले ज्यादातर कोविड-19 मरीज जीवित नहीं रह पाते, और जिनकी जान बच जाती है, वे स्वयं सांस लेने की हालत में नहीं रहते। यानी उन्हें सांस लेने के लिए मशीन की जरूरत पड़ती है। इस संबंध में अभी तक का सबसे बड़ा शोध लंदन स्थित 'इंटेन्सिव केयर नेशनल ऑडिट एंड रिसर्च सेंटर' ने किया है। इस संस्थान ने कोविड-19 के 98 ऐसे मरीजों का अध्ययन किया, जिन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया था। शोध में पाया गया कि युनाइटेड किंगडम के इन मरीजों में से केवल 33 मरीज ही जिंदा बच सके।
चीन के वुहान शहर में किए गए शोध का सैंपल छोटा है। लेकिन यह बताने के लिए काफी है कि वेंटिलेटर पर कोविड-19 के मरीजों के बचने की संभावना कितनी रहती है। शोध के तहत 22 मरीजों का अध्ययन किया गया। पता चला कि इनमें से केवल तीन मरीज वेंटिलेटर से जीवित उठे थे। वहीं, वॉशिंगटन में 18 मरीजों का अध्ययन किया गया। इसमें पाया गया कि इनमें से नौ मरीज यानी 50 प्रतिशत मरीज जिंदा बच गए थे। लेकिन इन नौ मरीजों में से तीन खुद सांस लेने की हालत में नहीं रह गए थे।
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वहीं, पहले किए गए शोध यह भी बताते हैं कि कोरोना के मरीज को एक बार वेंटिलेटर पर लिटाने का मतलब यह है कि वहां उसे हफ्तों तक रहना पड़ सकता है। जानकारों के मुताबिक, वेंटिलेटर पर ज्यादा से ज्यादा समय तक रहने का मतलब यह है कि मरीज का बचना मुश्किल है।
कोरोना के मरीजों को बचा पाने में वेंटिलेटर कितने सहायक होंगे, इस बारे में वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी की स्पेशल केयर स्पेशलिस्ट टिफनी ओसबॉर्न एक रिपोर्ट में कहती हैं, 'यह चिंता वाली बात है कि जिन लोगों को वेंटिलेशन की जरूरत है, उनमें से कितने बच पाते हैं। हमें नहीं पता वेंटिलेटर्स से कितनी मदद मिल पाएगी। शायद वे कम समय के लिए किसी को जिंदा रख सकें। लेकिन क्या उन पर लंबे समय तक रहने के बाद कोई जीवित रहेगा, इसे लेकर हम आश्वस्त नहीं हैं।'
टिफनी ऑसबोर्न ने जो बात कही, उसे इस तथ्य से और बल मिलता है कि कोविड-19 से होने वाला निमोनिया, फ्लू के चलते होने वाले निमोनिया की अपेक्षा फेफड़ों को ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। यह नुकसान अक्सर इतना ज्यादा होता है कि वेंटिलेटर से भी मरीज की जान नहीं बचाई जा पाती। न्यूयॉर्क स्थित डॉनल्ड एंड बारबरा स्कूल ऑफ मेडिसिन की क्रिटिकल केयर डॉक्टर नेजिन हाफीजेदाह कहती हैं कि आम तौर पर मरीज एंटीबायोटिक देने से रिकवर कर जाते हैं, लेकिन कोविड-19 के मामले में ऐसा नहीं है। उन्होंने बताया, 'दुर्भाग्य से कोविड-19 से जुड़े निमोनिया की दवा नहीं है।'
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उत्पाद या दवाइयाँ जिनमें कोरोना वायरस के मरीज को कब वेंटिलेटर पर ले जाया जाता है, जानें इससे कोविड-19 के मरीज के बचने की संभावना पर क्या कहते हैं शोध और विशेषज्ञ है
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