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जीन एडिटिंग से जुड़ी तकनीक क्रिस्प्र ने हाल के सालों में किसी बीमारी के इलाज और उसके संपूर्ण रोकथाम को लेकर दुनियाभर के मेडिकल विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है। अब कहा जा रहा है कि मानव भ्रूण के वंशाणुओं में (किसी बीमारी से) संबंधित सुधार कर यह तकनीक भविष्य में होने वाले बच्चों और आने वाली पीढ़ियों को कुछ विशेष वंशागत बीमारियों से मुक्त करने का काम कर सकती है। फिलहाल क्रिस्प्र तकनीक ऐसा सुरक्षित ढंग से करने के लिए पर्याप्त रूप से परिपक्व नहीं है, लेकिन भविष्य में इसकी क्षमता बढ़ने का दावा अभी से किया जाने लगा है। ऐसे में इसके इस्तेमाल से जुड़े नियमों को तय करने का काम यूरोप-अमेरिकी वैज्ञानिक संगठनों से लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के स्तर पर किया जा रहा है। हाल में ऐसे वैज्ञानिकों और नीतिशास्त्रियों की एक अंतरराष्ट्रीय समिति ने इस संबंध में अपनी नई रिपोर्ट पेश की है। इसमें बतौर निष्कर्ष में कहा गया है कि संशोधित मानव भ्रूण (एडिटेड एम्ब्रियो) का इस्तेमाल तब तक प्रेग्नेंसी विकसित करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि वैज्ञानिक इसकी पुष्टि न कर दें कि इतना सटीक जेनेटिक एडिट विश्वसनीय ढंग से बिना किसी गैर-इरादतन बदलाव के किया जा सकता है।

हालांकि वैज्ञानिकों ने यह भी कहा है कि ऐसी क्षमता हासिल कर लेने के बाद भ्रूण की जीन एडिटिंग केवल विशेष और सीमित परिस्थितियों में की जानी चाहिए। उनका कहना है कि अगर किसी देश में वंशागत मानव वंशाणु संशोधन (हेरिटेबल ह्यूमन जीनोम एडिटिंग) की अनुमति दे दी जाए तो इसका शुरुआती इस्तेमाल केवल उन गंभीर बीमारियों की रोकथाम के लिए किया जाना चाहिए, जो किसी एक जीन में होने वाले बदलाव या म्यूटेशन के कारण होती हैं, मिसाल के लिए सिस्टिक फाइब्रोसिस, सिकल सेल अनीमिया, मस्क्यूलर डिस्ट्रॉफी आदि। रिपोर्ट लिखने वाले लेखकों (वैज्ञानिक) का मत है कि एम्ब्रियो एडिटिंग उन दंपती की मदद के लिए इस्तेमाल की जानी चाहिए, जिनका स्वस्थ बच्चा होने की संभावना बहुत कम है।

क्या है पूरा मामला?
दरअसल, साल 2019 में चीन के एक शोधकर्ता ही जियानकुई ने दावा किया था कि उन्होंने जेनेटिक म्यूटेशन के साथ मानव भ्रूण को विकसित करने में जीन-एडिटिंग टूल (क्रिस्प्र) का इस्तेमाल किया था। जियानकुई का कहना था कि उन्होंने भ्रूण को एचआईवी और एस्टाब्लिश प्रेग्नेंसी से बचाने के लिए इस तकनीक का प्रयोग किया था। इसके परिणाम स्वरूप दुनिया में पहली बार वंशाणु-संशोधित बच्चों का जन्म हुआ था। चीनी वैज्ञानिक के इस दावे ने अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय में हंगामा मचा दिया था। उनके प्रयोग को कई शोधकर्ताओं ने गलत करार देते हुए उनकी कड़ी आलोचना की थी और इसे गैर-जिम्मेदार प्रयास करार दिया था। कुछ वैज्ञानिकों ने तो जीन-एडिटिड बच्चों के पैदा होने पर प्रतिबंध लगाने तक की मांग तक कर दी थी। 

इस बीच, कुछ देशों के राष्ट्रीय आयोगों ने मिलकर एक समिति का आयोजन किया। वहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी अलग से कमीशन का गठन किया ताकि इस मुद्दे पर कुछ बुनियादी नियम सुझाए जा सकें। दूसरी तरफ, दिसंबर 2019 में चीन की एक अदालत ने ही जियानकुई को तीन साल की जेल की सजा सुना दी। लेकिन इसी दौरान यूएस नेशनल एकेडमी ऑफ मेडिसिन, यूएस नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस और यूके की साइंस एकेडमी रॉयल सोसायटी ने चीनी वैज्ञानिक दावे के बाद एक संयुक्त पैनल का गठन किया। इसी पैनल की रिपोर्ट में विशेष परिस्थितियों में भ्रूण विकास के लिए जीन एडिटिंग तकनीक का इस्तेमाल करने की बात कही गई है।

क्या कहती है रिपोर्ट?
जेनेटिक ब्लड डिसऑर्डर्स, वंशागत अंधापन और कुछ विशेष कैंसर के इलाज ढूंढने के प्रयासों के तहत क्रिस्प्र तकनीक पहले से क्लिनिकल ट्रायलों में आजमाई जा रही है। लेकिन ये ट्रायल वयस्क लोगों पर किए जा रहे हैं। इससे अलग, भ्रूण संशोधन में क्रिस्प्र न सिर्फ डीएनए में बदलाव कर सकती है, बल्कि भावी नवजात में भी इस तकनीक के परिणाम देखने को मिल सकते हैं। यही कारण है कि जीन एडिटिंग की मदद से तैयार हुए भ्रूण इस बारे में जानने वालों के लिए आकर्षण की वजह बन रहे हैं। लेकिन यह आकर्षण जोखिम भरा होने के साथ-साथ सैद्धांतिक रूप से तनावपूर्ण भी है। ऐसा इसलिए, क्योंकि अगर जीन एडिटिंग में सबकुछ अपेक्षित ढंग से हुआ तो आने वाली पीढ़िया विशेष वंशागत रोग से मुक्त हो सकती हैं। लेकिन अगर कुछ गड़बड़ हुई तो जीन एडिटिंग से भ्रूण में हुए बदलाव भी अनिश्चितकाल तक के लिए पीढ़ियों को प्रभावित कर सकते हैं। ये बदलाव कितने खराब या बुरे होंगे यह अपनेआप में बहस का विषय है।

संभवतः यह बड़ा कारण है कि अब तक किसी भी देश ने जीन एडिटिंग की मदद से भ्रूण विकास करने की अनुमति नहीं दी है। हालांकि दर्जनों देशों में इस तकनीक से बच्चे विकसित करना प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वर्जित भी नहीं है। इन देशों में अमेरिका भी शामिल है। ऐसे में पैनल की 225 पेजों की रिपोर्ट और डब्ल्यूएचओ द्वारा गठित कमीशन के सुझावों के तहत हेरिटेबल जीनोम एडिटिंग को लेकर सरकारों को ये निर्देश दिए जा सकते हैं कि वे अंततः किस प्रकार इस तकनीक का इस्तेमाल करने का फैसला ले सकती हैं। पैनल की रिपोर्ट में कहा गया है कि गंभीर एकल-वंशाणु आधारित बीमारियों के अलावा ऐसी मेडिकल कंडीशन्स - जैसे वंशागत बहरापन - के लिए भी भ्रूण संशोधन पर विचार करने की स्वतंत्रता दी जा सकती है, जो जानलेवा नहीं हैं, लेकिन किसी व्यक्ति की जीवन गुणवत्ता प्रभावित करती हैं। इस पर पैनल की एक सदस्य मिशेल रैमसे का कहना है, 'बीमारी की गंभीरता अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग हो सकती है। एक जेनेटिक कंडीशन किसी देश में नियंत्रण करने योग्य हो सकती है और दूसरे में नहीं।'

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