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बधाई हो, आपका नवजात शिशु अब 3 महीने का हो गया है और इस स्टेज में आप अपने जिगर के टुकड़े के साथ लाइफ को और ज्यादा इंजॉय कर पाएंगी। बच्चे की पहली हंसी हो या फिर अपने पसंदीदा खिलौने को या फिर आपके चेहरे को पकड़ने की कोशिश- 3 महीने का बच्चा इस दौरान काफी कुछ करने की कोशिश करता है। इस दौरान आपका शिशु पहले से ज्यादा ऐक्टिव नजर आता है और इसका मतलब ये है कि आपको बच्चे के साथ और ज्यादा समय बिताना होगा, ज्यादा इंगेजमेंट दिखानी होगी ताकि उन्हें उनके जरूरी विकास के लिए जिन चीजों की जरूरत हो वो आप उसे दे पाएं।

बच्चे के 3 महीने का होते-होते बच्चे की फीडिंग यानी खानपान और नींद का समय और ज्यादा संतुलित हो जाता है। इसका मतलब है कि आपको भी आराम करने के लिए कुछ ज्यादा समय मिल सकता है। बच्चे की नींद, खानपान और खेल का समय नियमित बनाने के साथ-साथ आपको इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि आपका शिशु जिस वातावरण में बड़ा हो रहा है वह भी पूरी तरह से सुरक्षित हो। जैसे-जैसे आपका शिशु बड़ा होता जाएगा वह सामानों को कसकर पकड़ना, खुद से इधर-उधर लुढ़कना या पेट के बल लेटे हुए खुद को आगे की तरफ धकेलना भी सीख जाएगा।

(और पढ़ें: जन्म के तीसरे सप्ताह में शिशु के विकास से जुड़े सभी सवाल और उनका जवाब)

इसका साफ मतलब ये है कि आपको अपने घर में बच्चे के लिए अलग-अलग हिस्सों को बेबी-प्रूफ यानी सुरक्षित बनाने की जरूरत होगी। इसके अतिरिक्त शिशु को नियमित रूप से पीडियाट्रिशन के पास चेकअप के लिए लेकर जाएं और इस स्टेज पर जितने भी टीके लगने जरूरी हों उनमें से एक भी टीका मिस न हो जाए इस बात का पूरा ध्यान रखें। नवजात शिशु के विकास से जुड़े इन शुरुआती स्टेज में कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं भी सामने आ सकती हैं। इसमें आकस्मिक नवजात मृत्यु सिंड्रोम (SIDS) का खतरा भी शामिल है। लिहाजा किसी भी तरह के खतरे को बच्चे के आसपास से कम करने की कोशिश करें।

इस वक्त जब आप हर समय सिर्फ अपने नवजात बच्चे का ध्यान रखने के बारे में सोचती रहती हैं, ऐसे में नई मां होने की वजह से आपको भी प्रसव के बाद उचित देखभाल की जरूरत है। इस स्टेज में शिशु को नियमित रूप से ब्रेस्टफीडिंग की जरूरत होती है, लिहाजा आपको अपने खानपान का पूरा ध्यान रखना चाहिए। अगर आप डिलिवरी के बाद अपने वजन को लेकर परेशान हैं तो कुछ एक्सर्साइज कर सकती हैं या फिर कोई ऐक्टिविटी रूटीन अपना सकती हैं। याद रखें, अगर आप हेल्दी और ऐक्टिव रहेंगी तो आप अपने शिशु का बेहतर ध्यान रख पाएंगी और बच्चे के साथ को भी इंजॉय कर पाएंगी।

(और पढ़ें: नवजात शिशु को कपड़े में लपेटने का फायदा और उसका सही तरीका)

ऐसे में 3 महीने के बच्चे के विकास, वजन, देखभाल, नींद से जुड़ी सभी बातों के बारे में इस लेख में पढ़ें।

  1. अपने शिशु के साथ आपकी बॉन्डिंग - shishu ke sath apki bonding
  2. आपसे संपर्क स्थापित करने के लिए शिशु के नए-नए तरीके - shishu ke communicate karne ke tarike
  3. 3 महीने के शिशु को दूध पिलाना - 3 month ke shishu ki feeding
  4. 3 महीने का शिशु कितना सोता है? - 3 mahine ka shishu kitna sota hai?
  5. 3 महीने के शिशु के लिए टीकाकरण - 3 mahine ke baby ka vaccination
  6. 3 महीने के शिशु के लिए सुरक्षा से जुड़े ऐहतियात - 3 month baby ke liye safety precaution
  7. 3 महीने के शिशु के साथ अपना ध्यान कैसे रखें? - 3 month baby ke sath apna dhyan kaise rakhe?
  8. 3 महीने के शिशु का विकास - 3 month baby develpoment
  9. 3 महीने के शिशु का विकास और देखभाल से जुड़ी अहम बातें के डॉक्टर

बच्चे के जन्म के पहले घंटे के बाद से ही मां को यह बताया जाता है कि उन्हें अपने शिशु के साथ स्किन-टू-स्किन कॉन्टैक्ट बनाए रखना चाहिए। शिशु के जन्म के 3 महीने बाद आपके और शिशु के बीच यह शुरुआती बॉन्डिंग एक नई तरह की हो जाएगी। खासकर इसलिए क्योंकि शिशु के मस्तिष्क में मौजूद टेम्पोरल लोब यानी शंख पालि पहले से ज्यादा विकसित है। 3 महीने का होते-होते शिशु अपनी मां के चेहरे, आवाज और खुशबू को बेहतर तरीके से पहचानना सीख जाता है और आपकी हंसी और मुस्कुराहट पर अपनी प्रतिक्रिया भी देता है। लिहाजा जैसे-जैसे शिशु की मांसपेशियां बढ़ रही हैं आप शिशु के साथ अपनी बॉन्डिंग को बेहतर बनाते जाएं।

(और पढ़ें: शिशु के जन्म के बाद का पहला घंटा)

वो दिन गए जब आपका बच्चा सिर्फ रोकर आपसे अपनी संपर्क स्थापित करने या अपनी परेशानी बताने की कोशिश करता था। अब आपका बढ़ता बच्चा खिलखिलाने लगेगा, लाड़-प्यार से भरी धीमी आवाज निकालेगा और हंसकर आपसे बात करने की कोशिश करेगा। जैसे-जैसे शिशु का मस्तिष्क विकसित होता जाएगा वैसे-वैसे उनकी बोली भी।

लिहाजा इस स्टेज पर बेहद जरूरी है कि आप दिनभर बच्चे से बातें करती रहें। आप बच्चे से अपने बारे में बात कर सकती हैं कि आप क्या कर रही हैं, शिशु को कहानियां सुनाती सकती हैं, गाना गा सकती हैं। ऐसा करने से बच्चे की बोली (स्पीच) को विकसित करने में मदद मिलेगी। बच्चे के नींद का पैटर्न सही बना रहे इसके लिए आप रोजाना रात में सोने से पहले कहानी सुनाने को आदत के तौर पर भी शामिल कर सकती हैं।

(और पढ़ें: इन 8 वजहों से रोते हैं ज्यादातर बच्चे)

जब तक आपका नवजात शिशु 6 महीने का नहीं हो जाता आप उसे ठोस आहार नहीं दे सकतीं इसलिए इस समय बेहद जरूरी है कि आप अपने शिशु को सिर्फ अपना दूध ही पिलाएं। बच्चे को ब्रेस्टफीडिंग करवाना न सिर्फ बच्ची की सेहत के लिए बल्कि मां की सेहत के लिए भी कई तरह से फायदेमंद है। 3 महीने का होते-होते आपके शिशु का फीडिंग पैटर्न यानी दूध पीने का तरीका भी नियमित हो जाता है। वैसे तो हर बच्चा अलग होता है लेकिन औसतन आपको हर 3-4 घंटे में शिशु को दूध पिलाने की जरूरत पड़ेगी। इस महीने में आपको रात के समय एक या दो बार बच्चे को दूध पिलाने की जरूरत पड़ सकती है।

(और पढ़ें: बच्चे को कराती हैं स्तनपान तो कैसा होना चाहिए आपका खानपान, जानें)

ब्रेस्टफीडिंग करवाने वाली मांओं को यह बात याद रखनी चाहिए कि वे बच्चे को दूध पिलाने के साथ-साथ उसे जरूरी पोषक तत्व और एंटीबॉडीज दे रही हैं। लिहाजा अगर आप बच्चे को दूध पिलाने के दौरान बीमार पड़ जाएं तो डॉक्टर को जरूर बताएं कि आप बच्चे को ब्रेस्टफीडिंग करवाती हैं ताकि डॉक्टर आपको जो दवाइयां दें वह सेफ हों। अगर किसी मेडिकल कंडिशन की वजह से आप बच्चे को अपना दूध नहीं पिला सकतीं तब आपको शिशु को डिब्बे वाला फॉर्मूला मिल्क पिलाना चाहिए।

3 महीने का होते-होते आपके शिशु की नींद का पैटर्न भी नियमित हो जाता है जिस वजह से आप भी पहले की तुलना में कुछ ज्यादा आराम कर पाएंगी। इस स्टेज पर हो सकता है कि आपका शिशु रात में एक या दो बार दूध पीने के लिए जगे। इसके साथ-साथ दिन के समय भी आपका शिशु 4 से 5 घंटे की नींद लेने लगता है। ऐसे में जब बच्चा सो रहा हो तो आप भी आराम कर अपनी नींद पूरी कर सकती हैं।

इस समय तक आपका शिशु नींद से जुड़े संकेत देने लगता है। चिड़चिड़ापन दिखाना, आंखें मलना, रोने लगना या फिर अपनी उंगली या अंगूठे को चूसने लगना इस बात का संकेत है कि शिशु को नींद आ रही है। जैसे ही ये संकेत दिखें कमरे की रोशनी बंद कर दें या मद्धम रोशनी कर लें। ऐसा करने से शिशु के नींद के पैटर्न को नियमित करने में मदद मिलेगी। जब बच्चा सो रहा हो तो उसे जबरन उठाने की कोशिश न करें और शिशु के आसपास तेज आवाज भी न करें।

(और पढ़ें- शिशु को सुलाने के टिप्स ताकि वह रात भर पूरी नींद ले सके)

जब तक शिशु 12 महीने का नहीं हो जाता आकस्मिक नवजात मृत्यु सिंड्रोम (sids) का खतरा बना रहता है, लिहाजा कोशिश करें कि आपके शिशु के नींद से जुड़ा वातावरण सुरक्षित हो। ऐसे में शिशु को सुलाते वक्त इन जरूरी बातों का ध्यान रखें:

  • शिशु को हमेशा पीठ के बल सुलाएं और कभी भी पेट के बल न सुलाएं।
  • जहां तक हो शिशु के बिस्तर को सुरक्षित बनाएं और उस पर किसी भी तरह का खिलौना, कंफर्टर, अतिरिक्त तकिया या कुशन न रखें।
  • शिशु को अपने ही कमरे में सुलाएं लेकिन अपने बिस्तर पर नहीं, अगल बिस्तर पर क्योंकि वयस्कों का बिस्तर शिशु के लिए सेफ नहीं होता।
  • सोने के कमरे को बहुत ज्यादा गर्म न करें। कमरा हल्का गर्म होना चाहिए लेकिन इतना भी नहीं कि पसीना निकलने लगे।
  • अगर आप शिशु को सुलाने के लिए चुसनी (पैसिफायर) का इस्तेमाल कर रही हैं तो चुसनी को भूल से भी शिशु के गले में या कपड़े से न बांधें।
  • जब शिशु सो रहा हो तो बीच-बीच में उसे चेक कर लें उस पर नजर रखें लेकिन बेवजह शिशु को नींद से न जगाएं।

जन्म के बाद पहले और दूसरे महीने में शिशु का सभी जरूरी टीकाकरण हो जाता है इसलिए तीसरा महीना पूरी तरह से वैक्सीनेशन-फ्री होता है। हालांकि आपको अपने बच्चे की सेहत को लेकर सतर्क रहना चाहिए। साथ ही महीने में एक बार शिशु को चेकअप के लिए पीडियाट्रिशन के पास जरूर लेकर जाएं। शिशु के तीसरे महीने में अगर आपको निम्नलिखित में से कोई भी संकेत नजर आए तो शिशु को लेकर तुरंत डॉक्टर के पास जाएं:

  • अगर शिशु को सूखी खांसी हो या फिर शिशु बीच-बीच में सिसकी ले रहा हो।
  • 8 हफ्ते के बाद भी अगर शिशु हंस न रहा हो, मुस्कुरा न रहा हो।
  • अगर आपका शिशु ठीक से दूध न पी रहा हो।
  • अगर शिशु अपनी मुट्ठी या उंगलियों को बहुत टाइट से बंद कर रहा हो।
  • अगर तेज आवाज सुनकर भी आपका शिशु भौंचक्का नहीं हो रहा डर नहीं रहा।
  • लंबे समय तक शिशु को चुप कराने के बाद भी अगर शिशु चुप न हो रहा हो।

वैसे तो पूरे घर को बेबी-प्रूफ करने की जरूरत नहीं है लेकिन वे सभी जगहें जहां शिशु सोता हो, खेलता हो या आराम करता हो वे सभी जगहें शिशु के लिहाज से पूरी तरह से सुरक्षित होनी चाहिए। इस दौरान इन जरूरी बातों का ध्यान रखें:

  • अब चूंकि आपका बच्चा खुद से लुढ़ सकता है, चीजें कसकर पकड़ने लगा है तो ध्यान रखें कि आपका शिशु फर्नीचर से नीचे न गिर जाए, किसी चीज या दीवार से सिर न मार ले, या फिर किसी तेज धार वाली या नुकीली चीज को न पकड़ ले या फिर किसी चादर या तकिए में उलझकर दम न घोंट लें।
  • किसी भी समय अपने शिशु को बिलकुल अकेला न छोड़ें।
  • शिशु को सुलाते वक्त इस बात का ध्यान रखें कि पूरा वातावरण सुरक्षित हो। साथ ही अगर कोई नर्स या रिश्तेदार शिशु को सुला रही हो तब भी आप वहां मौजूद रहें।
  • अगर आपके शिशु ने अंगूठा चूसना शुरू कर दिया है तो ध्यान रखें कि शिशु का अंगूठा हमेशा साफ हो ताकि कीटाणुओं को मुंह के अंदर जाने से रोका जा सके।
  • इस बात का भी पूरा ध्यान रखें कि शिशु की सेहत से जुड़ी कोई भी बात आपके नजर से चूक न जाए।
  • ध्यान रखें कि कोई भी शिशु के आसपास धूम्रपान न करे और शिशु के ईर्द-गिर्द अगरबत्ती जलाने से भी बचें। इन चीजों से शिशु का दम घुट सकता है और उसे फेफड़ों की बीमारी हो सकती है।

(और पढ़ें: बच्चों के अंगूठा चूसने की आदत कैसे छुड़ाएं)

इस वक्त जब आपका पूरा फोकस अपने शिशु को साफ और स्वच्छ रखने, दूध पिलाने, खुश रखने, आराम कराने में है, ऐसे में अपना ध्यान भी आपको ही रखना है क्योंकि आपका शिशु हर चीज के लिए पूरी तरह से आप पर ही निर्भर है। लिहाजा आपकी शारीरिक और मानसिक सेहत का इस वक्त पूरी तरह से ठीक होना जरूरी है। ऐसे में जब आपका शिशु 3 महीने का हो जाए उस दौरान आपको भी अपना ध्यान कैसे रखना है, जानें:

  • हर चीज खुद से ही करने की कोशिश न करें। इसमें कोई शक नहीं कि शिशु आपकी जिम्मेदारी है लेकिन जब आपको ब्रेक की जरूरत हो तो कुछ जिम्मेदारियों को आप अपने जीवनसाथी, शिशु के रिश्तेदार, दादा-दादी, नाना-नानी के साथ भी शेयर कर सकती हैं।
  • स्वस्थ और संतुलित भोजन खाएं। आप बच्चे को अपना दूध पिला रही हैं इसलिए आपको भी जरूरी पोषक तत्वों की जरूरत है ताकि आपका एनर्जी लेवल बना रहे और आप बीमारियों से दूर रहें। अपने खाने में अनाज, प्रोटीन, हेल्दी कार्बोहाइड्रेट्स, फल और सब्जियां शामिल करें। साथ ही कैफीन, एल्कोहल और धूम्रपान से दूर रहें।
  • अब तक तो आपने अपना प्रेगनेंसी वेट घटा लिया होगा लेकिन अगर अब भी कुछ वजन बाकी है तो आप अपने लिए एक्सर्साइज या फिजिकल ऐक्टिविटी की एक रूटीन बनाएं। इससे आपको फिट रहने में मदद मिलेगी।
  • खुद को व्यस्त रखने के लिए आप चाहें तो किताबें पढ़ सकती हैं, लाइट मूड वाली फिल्में देख सकती हैं या फिर फोन पर ही दोस्तों या रिश्तेदारों से बातें कर सकती हैं। नई मांओं के लिए शुरुआती कुछ महीनों में मातृत्व का अहसास अकेलेपन से भरा हो सकता है। ऐसे में आपके पास एक सपोर्ट ग्रुप होना चाहिए जिससे आप अपनी बातें शेयर कर पाएं। ऐसा करने से आप डिप्रेशन और मानसिक समस्याओं से दूर रह पाएंगी।
  • मातृत्व और बचपन हर किसी के लिए अलग अनुभवों से भरा होता है। लिहाजा परिवार या दोस्तों के बाकी बच्चों की तुलना में अपने बच्चे के विकास को लेकर गैर-जरूरी प्रेशर न लें। साथ ही साथ आपके पैरंट्स, रिश्तेदार या दोस्त जिस तरह से अपने बच्चे को पाल रहे हैं अगर आप उस तरह से चीजें नहीं कर पा रही हैं तो इसका भी प्रेशर न लें। यह कोई रेस नहीं है। बेवजह की चिंका आपकी और शिशु की बेचैनी बढ़ाएगी।

(और पढ़ें: प्रेगनेंसी के बाद अपना पेट कम करने के उपाय)

जैसे-जैसे शिशु की हड्डियां और मांसपेशियां मजबूत होती जाएंगी शिशु की गतिविधियों में भी इजाफा होता जाएगा। आपका शिशु पहले की तुलना में बेहतर तरीके से देख और सुन पाएगा और परिचित चेहरे और आवाजों को सुनकर उन्हें पहचानने की कोशिश करेगा। इस दौरान आपको अपने शिशु में निम्नलिखित डिवेलपमेंट्स नजर आएंगे:

  1. शिशु अपने सिर को ऊपर की तरफ नियंत्रित रखना सीख जाएगा - shishu sir ko sidha rakhna seekh jaega
  2. शिशु अंगूठा चूसना शुरू कर सकता है - baby angutha chusne lagega
  3. शिशु के देखने की क्षमता बेहतर हो रही है - shishu ka vision behtar hoga
  4. चीजों को कसकर पकड़ने लगता है आपका शिशु - saman ko tight se pakadne lagega apka shishu
  5. आपका शिशु खुद से इधर-उधर लुढ़क सकता है - roll over karna seekh jaega shishu

शिशु अपने सिर को ऊपर की तरफ नियंत्रित रखना सीख जाएगा - shishu sir ko sidha rakhna seekh jaega

चूंकि आपके शिशु की पीठ और गर्दन की मांसपेशियां मजबूत बन रही हैं इसलिए आप देखेंगी कि पीठ के बल लेटे हुए भी आपका शिशु अपने सिर को उठाने की कोशिश करेगा। अगर आप थोड़ा सपोर्ट देकर शिशु को बैठाने की कोशिश करें तो आप देखेंगी कि वह कुछ सेकंड के लिए अपने सिर को सीधा और स्थिर रख पाएगा। जब बच्चा पेट के बल लेटकर खेल रहा हो उस वक्त उसे जरूरी सपोर्ट दें ताकि शिशु की गर्दन की विकसित होती मांसपेशियों को टेस्ट करने का मौका मिल सके। बच्चे को सिर्फ पीठ के बल लिटाकर छोड़ देने की बजाए, जितनी देर शिशु जगा रहे उसे पेट के बल लिटाकर खेलने का पूरा मौका दें ताकि बच्चे की गर्दन और कंधे की मांसपेशियां विकसित हो पाएं।

शिशु अंगूठा चूसना शुरू कर सकता है - baby angutha chusne lagega

इस समय तक आपका शिशु अपने शरीर को पहचानने लगता है और मूवमेंट्स के प्रति आकर्षित नजर आता है- खासकर हाथ को लेकर। यही वजह है कि हर थोड़ी थोड़ी देर में शिशु अपने हाथ को मुंह के पास लाने की कोशिश करता है और कई बार तो नींद में अंगूठा चूसता हुआ भी नजर आता है। इस स्टेज पर अंगूठा चूसना बेहद सामान्य सी बात है। इसलिए इसे बुरा आदत समझकर परेशान होने की जरूरत नहीं। बहुत से शिशु शुरुआती दिनों में अंगूठा चूसते हैं लेकिन जैसे ही वे 3 साल के आसपास के होते हैं अपने आप ही यह आदत छोड़ देते हैं।

शिशु के देखने की क्षमता बेहतर हो रही है - shishu ka vision behtar hoga

जन्म के तुरंत बाद नवजात शिशु चीजों और सामानों पर फोकस नहीं कर पाता लेकिन जैसे ही आपका शिशु 3 महीने का होता है वह अपनी आंखों के नजदीक रखी चीजों और सामानों को बेहतर ढंग से देखने और पहचानने लगता है। अगर आपका हाथ, चेहरा या कोई सॉफ्ट टॉय बच्चे की नजर से 8 से 15 इंच की दूरी पर होगा तो शिशु उसे पहचानने और उसके अनुसार प्रतिक्रिया देने की कोशिश करेगा। हालांकि उनकी फोकस करने की क्षमता अब तक विकसित नहीं हुई होती है। यही वजह है कि कई बार ऐसा लग सकता है कि आपके शिशु में भेंगापन है।

चीजों को कसकर पकड़ने लगता है आपका शिशु - saman ko tight se pakadne lagega apka shishu

जैसे-जैसे आपके शिशु के हाथ और पैर में गतिशीलता और चंचलता बढ़ती है वैसे-वैसे शिशु अपनी नजरों की पहुंच के अंदर मौजूद चीजों को पकड़ने की कोशिश करने लग जाता है। 3 महीने का होते-होते आपका शिशु चीजों को कसकर पकड़ना सीख लेता है। हालांकि इस समय तक उसकी पकड़ इतनी मजबूत नहीं होती कि वह काफी देर तक किसी चीज या खिलौने को पकड़कर रखे। शिशु की मांसपेशियों मजबूत बनें इसके लिए जरूरी है कि आप शिशु को अलग-अलग चीजें पकड़ने को दें। बच्चों के खेल में सॉफ्ट टॉयज और रंग-बिरंगे झुनझुनों को जरूर शामिल करें।

आपका शिशु खुद से इधर-उधर लुढ़क सकता है - roll over karna seekh jaega shishu

अगर आप अपने 3 महीने के शिशु को पेट के बल लिटा देती हैं तो हो सकता है कि वह अचानक ही इधर-उधर लुढ़कर आपको सरप्राइज कर दे। ऐसा इसलिए क्योंकि धीरे-धीरे समय के साथ शिशु की कोहनी, घुटना और हिप के जॉइंट्स भी विकसित हो रहे हैं। हालांकि इस बात का पूरा ध्यान रखें कि इधर-उधर लुढ़कते वक्त शिशु कहीं से गिरकर खुद को चोट न लगा ले।

Dr. Yeeshu Singh Sudan

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पीडियाट्रिक

Dr. Veena Raghunathan

Dr. Veena Raghunathan

पीडियाट्रिक

Dr. Sunit Chandra Singhi

Dr. Sunit Chandra Singhi

पीडियाट्रिक

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References

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