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नौ महीने तक मां अपने गर्भ में शिशु को रखती है और इस पूरे समय में उसे बस अपने शिशु के जन्‍म का इंतजार रहता है। शिशु के जन्‍म पर मां को जो खुशी मिलती है, उसे शब्‍दों में जाहिर कर पाना बहुत मुश्किल है।

मां को जन्म से पहले और बाद में भी अपने शिशु की सेहत व उसके विकास को लेकर चिंता रहती है। डिलीवरी के बाद शिशु के जन्म के शुरुआती पल हर मां के जीवन के सबसे सुनहरे पल होते हैं। अपने शिशु को पहली बार गोद में उठाते ही जैसे प्रसव की पीड़ा का एहसास गायब हो जाता है।

शिशु के जन्म के बाद का पहला घंटा बहुत महत्वपूर्ण होता है और इस समय में होने वाली कुछ जरूरी बातों के बारे में हम आपको यहां बताने जा रहे हैं।

  1. शिशु का पहली बार रोना - Bache ka pehli baar rona
  2. त्वचा से त्वचा का संपर्क क्या है - Skin-To-Skin Care dene ka kya matlab hai
  3. स्किन टू स्किन केयर कैसे दी जाती है - Skin-To-Skin care dene ka tarika
  4. स्किन टू स्किन केयर के लाभ - Skin-To-Skin care ke fayde
  5. पहले घंटे में ब्रेस्टफीडिंग और स्किन टू स्किन केयर - Golden hour me Breastfeeding aur Skin-To-Skin Care ki importance
  6. सिजेरियन और नॉर्मल डिलीवरी के बाद स्किन टू स्किन केयर कैसे दें - Cesarean aur Normal delivery ke baad Skin-To-Skin Care
  7. जन्म के एक घंटे बाद स्किन टू स्किन केयर - Janm ke ek ghante baad Skin-To-Skin care ka nuksan
  8. शिशु के जन्म के बाद का पहला घंटा के डॉक्टर

जन्म के बाद जब शिशु पहली बार रोता है तो जैसे उसकी आवाज सुनकर ही मां की नौ महीने की तकलीफ पल भर में दूर हो जाती है। हर शिशु गर्भ से बाहर आने के तुरंत बाद रोता जरूर है लेकिन क्या आपने कभी ये सोचा है कि शिशु जन्म के तुरंत बाद क्यों रोता है या उसके रोने की क्या वजह है?

जन्म से पहले शिशु को गर्भनाल द्वारा ऑक्सीजन मिलती है और गर्भ में वो खुद से सांस नहीं लेता है। लेकिन जन्म के बाद शिशु पहली बार नाक से सांस लेना शुरू करता  है। जन्म के बाद शिशु के फेफड़ों तक खून पहुंचने में कुछ समय लग सकता है।

(और पढ़ें - नवजात शिशु को कितना दूध पिलाना चाहिए)

फेफड़ों से अतिरिक्त द्रव्य को बाहर निकालने के लिए डॉक्टर शिशु की त्वचा को हल्के हाथों से थपथपाते या फिर कुछ मामलों में विशेष उपकरणों की मदद से मुंह व नाक के जरिए द्रव्य को निकालते हैं। इस बारे में आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि ये सामान्य बात है।

ज्यादातर बच्चे पहली बार रोने के कुछ मिनट बाद शांत हो जाते हैं। इसके बाद शिशु के हाथ और कंधों को हिलाने जैसी छोटी-छोटी गतिविधियों पर ध्यान दिया जाता है। जन्म के बाद एक से दूसरा घंटा बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इस दौरान शिशु स्तनपान करना सीखना है। आमतौर पर इस प्रक्रिया में एक घंटे से ज्यादा का समय लगता है, इसीलिए थोड़ा धैर्य रखें।

पहले नर्स शिशु को साफ करने, उसका वजन तोलने और विटामिन के की दवाएं देने के लिए ले जाती थीं लेकिन अब हुए अध्ययनों से पता चलता है कि जन्म के शुरुआती 60 मिनट मां और शिशु के बीच के रिश्ते को मजबूत करने, मां और शिशु की सेहत एवं शिशु को गरमाई देने के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।

जन्म के बाद के पहले घंटे को “गोल्डन ऑवर” के नाम से भी जाना जाता है। इसमें अन्य कोई भी मेडिकल प्रक्रिया करने की बजाय मां और शिशु के बीच स्किन-टू स्किन कॉन्टेक्ट पर ध्यान दिया जाता है।

मां और नवजात शिशु के बीच स्किन-टू-स्किन कॉन्टेक्ट को “कंगारू मदर केयर” भी कहा जाता है। अध्ययनों के अनुसार नई माओं और शिशु को शारीरिक रूप से भी साथ रहने की जरूरत होती है। अगर मां और शिशु के बीच त्वचा से त्वचा का संपर्क जल्दी और बिना किसी परेशानी के हो तो इससे स्तनपान में भी मदद मिलती है और दोनों की सेहत को भी फायदा पहुंचता है।

वहीं दूसरी तरफ मां और शिशु को बिना किसी वजह के अलग रखना हानिकारक साबित हो सकता है। अगर समय पर शिशु को मां के पास न लाया जाए तो स्तनपान करवाने पर शिशु को दूध खींचने में दिक्कत आ सकती है।

इसके अलावा मां और शिशु को बेवजह दूर रखने से मां की अपने शिशु के प्रति स्नेह में भी कमी आ सकती है। यहां पर इस बात का ध्यान जरूर रखें कि मां बनने के बाद महिलाओं के शरीर में कई बदलाव हो रहे होते हैं। मां और शिशु के लिए एक-दूसरे से जुड़ने का बेहतरीन मौका स्किन-टू-स्किन केयर होता है। यहां तक कि इससे शिशु को गर्माहट मिलती है और उसकी प्रतिरक्षा प्रणाली भी मजबूत होती है।

अब डॉक्टर जन्म के लगभग एक घंटे बाद तक मां और शिशु के बीच स्किन-टू-स्किन केयर की सलाह देते हैं। कुछ मामलों में दो घंटे तक भी स्किन-टू-स्किन केयर किया जा सकता है। इसमें शिशु की कमर को किसी गर्म पर हल्के कंबल से ढक कर शिशु को मां के सीने से लगाया जाता है। इस दौरान सभी मेडिकल प्रक्रियाएं जैसे मां और शिशु की जांच की जा सकती है या ये सभी प्रक्रियाएं एक घंटे के बाद भी की जा सकती हैं।

इस दौरान मां के शरीर में प्रजनन हार्मोन ऑक्सीटोसिन का स्तर बढ़ जाता है जिससे मां और शिशु का संबंध और अधिक गहरा होता है एवं दोनों में ही तनाव कम होता है। स्किन कॉन्टेक्ट से शिशु को गर्भ से बाहर की दुनिया के अनुसार ढलने में भी मदद मिलती है।

स्किन-टू-स्किन केयर में देरी या कोई परेशानी आने से शिशु के व्यवहार पर नकारात्मक असर पड़ सकता और उसके लिए स्तनों से दूध खींचना एवं स्तनपान करना मुश्किल हो सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार यदि मां और शिशु स्वस्थ हैं तो स्किन-टू-स्किन केयर शिशु के जन्म के बाद दस मिनट के अंदर ही शुरू हो जानी चाहिए। इसे जन्म के अगले ही पल या तीन मिनट बाद भी शुरू किया जा सकता है। डब्ल्यूएचओ इस दौरान डॉक्टर और नर्स को सतर्क रहने और किसी भी तरह की कोई दिक्कत दिखने पर तुरंत कोई कदम उठाने की सलाह देती है।

(और पढ़ें - जन्म के बाद पहले 24 घंटों में कैसे सांस लेता है नवजात शिशु)

शिशु की स्पर्श, गंध और गर्माहट को महसूस करने की शक्ति अधिक होती है। इसे "हीटेनेड रिस्पांस" कहते हैं। यही शक्ति उन्हें जन्म के बाद शुरुआती मिनटों में अपने लिए सबसे महत्वपूर्ण चीजों (जैसे दूध और गर्माहट) की पहचान करने में मदद करता है।

जब नवजात को मां के सीने पर रखा जाता है तब शिशु को हीटेनेड रिस्पांस से मां के स्तनों को ढूंढने में मदद मिलती है। अध्ययनों से पता चलता है कि कुछ शिशु जन्म के 15 मिनट बाद ही दूध ढूंढने लग सकते हैं।

शिशु के शरीर के तापमान के अनुसार मां के स्तन खुद को जल्द ही ढाल लेते हैं जिससे हाइपोथर्मिया का खतरा कम हो जाता है। तुरंत स्किन कॉन्टेक्ट होने से शिशु को संक्रमण से सुरक्षा मिलती है। शोधकर्ताओं के अनुसार हीटेनेड रिस्‍पांस शिशु में न्‍यूरोप्रोटेक्टिव तंत्र (न्यूरोनल संरचना के बचाव) को भी सक्रिय कर देता है और तंत्रिका तंत्र के कार्यों को शुरू एवं तनाव को कम करता है।

अध्ययनों के अनुसार स्किन-टू-स्किन केयर न मिलने वाले शिशुओं की तुलना में गोल्डन ऑवर में स्किन-टू-स्किन केयर मिलने वाले शिशुओं में रोने की प्रवृत्ति कम होती है। गोल्डन ऑवर में मां से अलग रखे गए शिशुओं की तुलना में इनका हृदय और श्वसन प्रणाली अधिक स्थिर होती है।

इनका ऑक्सीजन सेचुरेशन लेवल, ब्लड ग्लूकोज लेवल और थर्मल रेगुलेशन (शरीर का तापमान नियंत्रित रखने की क्षमता) भी बेहतर रहती है। दूसरे शब्दों में कहें तो वे बेहतर तरीके से सांस ले पाते हैं, उनका ब्लड ग्लूकोज लेवल ठीक रहता है और वे अपने शरीर का तापमान भी उन बच्चों की तुलना में अधिक ठीक तरह से नियंत्रित कर पाते हैं जिन्हें जन्म के बाद पहले घंटे में ही अपनी मां से अलग कर दिया गया होता है।

इसके अलावा, शोध से यह भी पता चलता है कि जिन शिशुओं को स्किन-टू-स्किन केयर दी जाती है उनमें तनाव का स्तर भी कम होता है। इस बात की पुष्टि के लिए शोधकर्ताओं ने शिशुओं की लार से स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल की जांच भी की थी।

इसके आगे शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि जिन शिशुओं को 60 मिनट से अधिक समय तक स्किन-टू-स्किन केयर दी गई उनमें लगातार कोर्टिसोल का लेवल गिरता चला गया। इसका मतलब है कि जितनी देर तक स्किन संपर्क में रहेगी, उतना ही ज्यादा इसका फायदा मिलेगा।

नवजात शिशु को केवल तीन चीजों की जरूरत होती है - मां की गोद में मिलने वाली गर्माहट की, दूध की और मां की उपस्थिति में स्वयं को सुरक्षित महसूस करने की। स्तनपान इन तीनों ही जरूरतों को पूरा करता है। डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ दोनों ही जन्म के बाद जल्द से जल्द स्तनपान करवाने की सलाह देते हैं।

अध्ययनों के अनुसार जो शिशु इस समय स्तनपान करना सीख जाते हैं, उनमें अगले छह महीने तक ठीक तरह से स्तनपान करने की संभावना अधिक होती है। इसके अलावा मां का पहला दूध यानी कोलोस्ट्रम एंटीबॉडीज से भरपूर होता है जो कि नवजात की संक्रमण से रक्षा करता है।

स्तनपान से नई मां को वजन कम करने में भी मदद मिलती है। ये गर्भाशय में संकुचन (जिससे ब्लीडिंग को रोकने में मदद मिलती है) में भी मददगार है और डिलीवरी के बाद डिप्रेशन का खतरा भी कम होता है। ब्रेस्टफीडिंग को मां और शिशु के लिए सुखद बनाने का सबसे आसान और असरकारी तरीका स्किन-टू-स्किन केयर है।

सिजेरियन डिलीवरी के बाद स्वस्थ माओं और शिशु के बीच स्किन टू स्किन कॉन्टेक्ट ऑपरेशन थिएटर में ही शुरू किया जा सकता है। स्पाइनल एनेस्थीसिया (इससे ऑपरेशन के दौरान मरीज होश में रहता है लेकिन उसे दर्द महसूस नहीं होता है) का उपयोग करने पर सिजेरियन सर्जरी से गुजरने वाली अधिकांश माएं होश में रहती हैं।

सिजेरियन डिलीवरी के बाद माओं के लिए स्किन टू स्किन कॉन्टेक्ट एक बहुत ही सुखद एहसास और अनुभव साबित हुआ है। डॉक्टरों का कहना है कि कुछ माओं का सर्जरी की आगे की प्रक्रियाओं पर ध्यान ही नहीं रहता क्योंकि उनका सारा ध्यान अपने शिशु पर रहता है।

नॉर्मल डिलीवरी के बाद स्वस्थ मां और शिशु को तुरंत स्किन टू स्किन केयर दी जा सकती है। स्किन टू स्किन केयर में केवल तभी देरी करनी चाहिए जब मां या शिशु में से कोई भी एक रिकवरी रूम में हो या एनेस्थीसिया का असर खत्म न हुआ हो।

स्किन टू स्किन केयर से मां जल्दी अपने शिशु की जरूरतों को समझना सीख लेती है। हर बार स्तनपान करवाने पर मां और शिशु दोनों में ही बीटा-एंडोर्फिन हार्मोन का स्तर बढ़ता है। इन्हें हैप्पीनेस हार्मोन भी कहते हैं।

अध्ययनों से पता चलता है कि जिन माओं को उनके शिशु के साथ एक ही कमरे में रखा गया था, उनमें मातृत्व को लेकर आत्मविश्वास अधिक था और शिशु को भी अच्छी नींद मिली। इससे स्तनपान भी आसान होता है। इसके अलावा इन माओं के स्तनों में दूध ज्यादा बना और इन्होंने लंबे समय तक स्तनपान करवाया।

हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होने के बाद भी शिशु के साथ एक ही कमरे में रहने से मां के शारीरिक तनाव और उदासीन भावनाओं में कमी आती है। अन्य अध्ययनों के अनुसार स्किन टू स्किन केयर के कई लाभ हैं जैसे कि मां के स्तनों में दूध की मात्रा बढ़ती है और शिशु व मां दोनों को आराम मिलता है एवं ब्रेस्टफीडिंग के बेहतर परिणाम मिलते हैं।

मातृत्व एक बहुत ही खास और यादगार अनुभव होता है। गोल्डन ऑवर के दौरान और इसके बाद स्किन टू स्किन केयर से मां और शिशु के बीच संबंध गहरा होता है और स्तनपान शुरू करवाने में भी आसानी होती है। इसीलिए इस गोल्डन ऑवर को लेकर किसी भी तरह की लापरवाही नहीं बरती जानी चाहिए।

Dr. Yeeshu Singh Sudan

Dr. Yeeshu Singh Sudan

पीडियाट्रिक

Dr. Veena Raghunathan

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पीडियाट्रिक

Dr. Sunit Chandra Singhi

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