कोविड-19 को लेकर हुए एक नए शोध में पता चला है कि इस बीमारी से ठीक होने वाले लोगों के शरीर में कोरोना वायरस को खत्म करने वाले एंटीबॉडी ज्यादा समय तक नहीं बने रहते। प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल 'नेचर मेडिसिन' में प्रकाशित इस शोध की मानें तो कोरोना वायरस सार्स-सीओवी-2 के संक्रमण के प्रभाव के चलते इससे बचाने के लिए पैदा हुए रोग-प्रतिकारक या एंटीबॉडी दो से तीन महीने तक ही सक्रिय रहते हैं। शोध के मुताबिक, ऐसा उन मरीजों में विशेष रूप से देखा गया है, जिनमें कोविड-19 के लक्षण कभी दिखाई नहीं दिए, जबकि वे वायरस से संक्रमित थे। 

हालांकि इस नए तथ्य का मतलब यह नहीं है कि ऐसे लोग फिर से वायरस की चपेट में आ सकते हैं। प्रतिष्ठित अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स (एनवाईटी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 'नेचर' पत्रिका में प्रकाशित एक अन्य शोध के हवाले से विशेषज्ञों ने कहा है कि वायरस को खत्म करने की क्षमता रखने वाले एंटीबॉडीज (टी सेल्स और बी सेल्स) कम मात्रा में होने के बावजूद संक्रमण से रक्षा कर सकते हैं।

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नेचर मेडिसिन में प्रकाशित शोध के परिणाम इस ओर जरूर ध्यान खींचते हैं कि जो लोग कोविड-19 से उबर कर स्वस्थ हो चुके हैं, उनके शरीर में वायरस के खिलाफ जनरेट हुई इम्यूनिटी कितनी मजबूत है। शोध के समीक्षा लेखकों ने कहा है कि ऐसे लोगों को 'इम्यूनिटी सर्टिफिके'ट देने से पहले सावधानी बरतने की जरूरत है। नए कोरोना वायरस सार्स-सीओवी-2 से पहले आए अन्य कोरोना वायरसों (जैसे सार्स-सीओवी-1 और मेर्स-सीओवी) से संक्रमित होने के बाद ठीक हुए मरीजों के शरीर में एंटीबॉडी कम से कम एक साल तक बने रहते हैं। नए कोरोना वायरस को लेकर वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि इसे खत्म करने वाले एंटीबॉडी भी इतने ही समय तक बने रहेंगे। हालांकि शोध में ऐसा नहीं पाया गया है।

कैसे किया गया शोध?
शोधकर्ताओ ने कोविड-19 के 37 असिम्प्टोमैटिक मरीजों की तुलना इतने ही सिम्प्टोमैटिक मरीजों से की। चीन के वान्झो जिले में हुए इस शोध में जांचकर्ताओं ने पाया कि असिम्प्टोमैटिक यानी जिन मरीजों में लक्षण नहीं दिखे थे, उनका इम्यून रेस्पॉन्स वायरस के खिलाफ उन मरीजों की तुलना में कमजोर था, जिनमें कोविड-19 के लक्षण दिखाई दिए थे। एनवाईटी के मुताबिक, असिम्प्टोमैटिक मरीजों में एंटीबॉडी नहीं दिखने का स्तर 40 प्रतिशत तक गिर गया था, जबकि सिम्प्टोमैटिक मरीजों में यह दर केवल 13 प्रतिशत पाई गई।

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हालांकि इस शोध का सैंपल साइज काफी छोटा था और शोधकर्ताओं ने इस ओर भी ध्यान नहीं दिया कि दोबारा वायरस के प्रभाव में आने के बाद शरीर के इम्यून सेल्स संक्रमण से कितनी सुरक्षा प्रदान करते हैं या नए एंटीबॉडी बनाते हैं यहां नहीं। इस बारे में कुछ अन्य शोध बताते हैं कि कोरोना वायरस एक मजबूत और सुरक्षा देने वाले इम्यून रेस्पॉन्स को सक्रिय करता है।

कोलंबिया यूनिवर्सिटी में विषाणुविज्ञानी एंजेला रेसम्युसेन कहती हैं कि अधिकतर लोग टी-सेल के बारे में नहीं जानते और ज्यादातर शोध एंटीबॉडी की मात्रा पर फोकस करते हुए किए गए हैं। टी-सेल के अलावा इम्यून सिस्टम में एक रोग-प्रतिकारक कोशिका बी-सेल की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण है। टी-सेल जहां वायरस को खत्म करने का काम करती है, वहीं बी-सेल संक्रमण से लड़ने के लिए तेजी से एंटीबॉडी पैदा करती है। माउंट सिनाई स्थित इकान स्कूल ऑफ मेडिसिन में विषाणुविज्ञानी फ्लोरियन क्रैमर बताती है, 'शरीर में वायरस के फिर आने की जानकारी मिलने के बाद वे (बी सेल्स) जल्दी-जल्दी एंटीबॉडी बनाने लगती हैं।'

नए शोध में पहली दफा संक्रमित होने पर वायरल प्रोटीन के खिलाफ एंटीबॉडी के लेवल का इतना नहीं पाया गया कि उसका पता चल सके। लेकिन दूसरी बार संक्रमित होने पर वायरस के स्पाइक प्रोटीन को टार्गेट करने वाले एंटीबॉडीज की मौजूदगी मिली है।

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बहरहाल, नेचर पत्रिका में ही प्रकाशित दूसरे शोध में कहा गया है कि कम संख्या में होने के बावजूद एंटीबॉडीज वायरस को खत्म कर सकती हैं। विषाणुविज्ञानी एंजेला रेसम्युसेन का इस बारे में कहना है, 'ऐसा लगता है कि कुछ विशेष एंटीबॉडी कम मात्रा में होते हुए भी वायरस को खत्म करने की क्षमता रखती हैं। कम एंटीबॉडी होने से यह तय नहीं होता कि इससे किसी मरीज को दूसरी बार होने वाले संक्रमण से सुरक्षा मिलेगी या नहीं।' सरल भाषा में कहें तो एंटीबॉडीज का लेवल कम होना और इम्यूनिटी का बने रहना दोनों अलग-अलग बाते हैं। रोग-प्रतिकारकों के कम या खत्म हो जाने से रोग-प्रतिकारक क्षमता खत्म नहीं हो जाती।


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