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बाहर के दूषित वातावरण और कई अन्य कारणों के चलते व्यक्ति को हमेशा ही रोगों का खतरा बना रहता है। लेकिन मजबूत प्रतिरक्षा तंत्र के द्वारा आप कई तरह के रोगों से बिना इलाज के ही सुरक्षित रहते हैं और आपके प्रतिरक्षा तंत्र में एंटीबॉडी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। रोगाणुओं के दुष्प्रभाव को कम व नष्ट करने का कार्य इन्हीं एंटीबॉडीज के द्वारा किया जाता है। शरीर में एंटीजन के प्रवेश करने के बाद एंटीबॉडी का बनना शुरू हो जाता है।

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इस लेख में आपको एंटीबॉडी के बारे में बताया गया है। साथ ही आपको एंटीबॉडी के प्रकार, एंटीबॉडी के कार्य और एंटीबॉडी की खोज आदि के बारे में भी विस्तार से बताने का प्रयास किया गया है। 

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  1. एंटीबॉडी के बारे में जानकारी - Antibodies ki jankari in Hindi
  2. एंटीजन की जानकारी - Antigen ke bare me jankari in Hindi
  3. एंटीजन और एंटीबॉडी के बीच संबंध - Antigens aur antibodies ke bich sambandh

एंटीबॉडी क्या है - Antibodies kya hai

एंटीबॉडी को इम्युनोग्लोबुलिन भी कहा जाता है। यह शरीर द्वारा उत्पन्न प्रोटीन है, जो एंटीजन नामक बाहरी हानिकारक तत्वों से लड़ने में मदद करता है। शरीर में एंटीजन प्रवेश करने के बाद प्रतिरक्षा तंत्र को एंटीबॉडीज बनाने के लिए उत्तेजित करते हैं। एंटीबॉडीज एंटीजन के साथ जुड़कर या एंटीजन को बांध देते हैं। इसके साथ ही एंटीबॉडीज एंटीजन को निष्क्रिय भी करते हैं। एक स्वस्थ व्यस्क के शरीर में हजारों की संख्या में एंटीबॉडी होते हैं। 

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एंटीबॉडीज विशेष तरह की सफेद रक्त कोशिकाओं से स्त्रावित होने वाले Y आकार के प्रोटीन होते हैं। इनमें वायरस और बैक्टीरिया जैसे रोगाणुओं को पहचानने की क्षमता होती है। व्यक्ति के शरीर में मौजूद हजारों प्रकार के अलग-अलग एंटीबॉडीज विशेष तरह के रोगाणुओं से बचाव का कार्य करते हैं। उदाहरण के तौर पर शरीर में मौजूद हजारों एंटीबॉडीज में केवल चिकन पॉक्स को नष्ट करने वाला एंटीबॉडी ही इसके वायरस को नुकसान पहुंचाता है और नष्ट करता है।

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एंटीबॉडी के प्रकार - Antibodies ke prakar

एंटीबॉडी के विभिन्न प्रकार होते हैं। इनके प्रकार को आगे विस्तार से बताया गया है।

एंटीबॉडी के प्रकार

एंटीबॉडी का विशेष प्रकार शरीर में उसके कार्य और भूमिका के बारे में बताता है। हर प्रकार के एंटीबॉडी के नाम के आगे आईजी (Ig) शब्द का प्रयोग किया जाता है, यहां पर आईजी इम्युनोग्लोबुलिन के लिए प्रयोग किया जाता है, जबकि इसके बाद का शब्द विशेष तरह के एंटीबॉडी को दर्शाता है।

  • आईजीएम (IgM):
    रोगाणुओं के शरीर में प्रवेश करने के बाद यह एंटीबॉडी बनना शुरू हो जाता है। यह पांच तरह की इकाईयों से मिलकर बना होता है, जिससे इसकी मात्रा अधिक हो जाती है। यह एंटीबॉडी अपने लक्ष्य पर मजबूती से चिपक जाता है। संक्रमण के प्राथमिक चरण के लिए आईजीएम एंटीबॉडी महत्वपूर्ण होता है। इस प्रकार के एंटीबॉडीज कई बार संक्रमण (जैसे हर्पिस) के दोबारा शरु होने पर भी बनने लगते हैं। इसके अलावा कई बार किसी रोग के दोबारा होने पर भी शरीर में यह एंटीबॉडीज बनना शुरू हो जाते हैं। (और पढ़ें - जननांग दाद का इलाज)
     
  • आईजीए (IgA):
    इस प्रकार के एंटीबॉडीज श्लेष्मा, लार, आंसु और मां के दूध में मौजूद होते हैं। यह श्लेष्मा झिल्ली में होने वाले रोगाणुओं से बचाव करते हैं और नवजात शिशु को निष्क्रिय प्रतिरक्षा प्रदान करते हैं। (और पढ़ें - माँ का दूध बढ़ाने के तरीके)
     
  • आईजीडी (IgD):
    यह प्रतिरक्षा तंत्र की शुरुआती प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण होता है। यह बी सेल में पाया जाता है और एक रिसेप्टर (प्रतिक्रिया करने वाला) की तरह कार्य करता है। एंटीबॉडी के इस प्रकार को अच्छी तरह से नहीं समझा गया है और इसके कार्यों पर अभी अधिक खोज की जा रही है। (और पढ़ें - हीमोग्लोबिन की कमी का इलाज)
     
  • आईजीजी (IgG):
    यह प्राथमिक और द्वितीय प्रतिक्रिया वाला एंटीबॉडी होता है, जो ब्लड प्लाज्मा में पाया जाता है। यह एंटीबॉडी प्लेसेंटा (placenta) से होता हुआ नवजात शिशु तक पहुंच कर निष्क्रिय प्रतिरक्षा प्रदान करता है। यह एंटीबॉडी टीकाकरण और संक्रमण के बाद दीर्घकालिक प्रतिरक्षा प्रदान करता है। (और पढ़ें - प्लेसेंटा प्रिविआ का उपचार)
     
  • आईजीई (IgE):
    यह एंटीबॉडी एलर्जिक प्रतिक्रिया के लिए जिम्मेदार होते हैं। यह सामान्यतः फेफड़ों, त्वचा और श्लेष्मा झिल्ली में पाये जाते हैं। जब आईजीई रोगाणुओं को इकट्ठा कर देते हैं, तो इससे हिस्टेमाइन (histamine) प्रतिक्रिया शुरु होती है। हिस्टेमाइन प्रतिक्रिया में एलर्जी के लक्षण सामने आने लगते हैं। यह एंटीबॉडी शरीर को परीजीवी कीड़ों से बचाने में भी मदद करते हैं।

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एंटीबॉडी के कार्य - Antibodies ke karya

जैसे ही बाहरी एंटीजन आपके शरीर में प्रवेश करते हैं, वैसे ही प्रतिरक्षा तंत्र सक्रिय हो जाता है। इस दौरान केमिकल प्रतिरक्षा तंत्र के विभिन्न हिस्सों को सक्रिय होने का संकेत देते हैं। इस प्रक्रिया में वायरस सबसे पहले बी सेल (B cells) नाम की कोशिका में मिल जाते हैं। इसके बाद बी सेल एंटीजन के अनुकूल एंटीबॉडी का उत्पादन करते हैं।

एंटीबॉडीज बनने के बाद वायरस से चिपक जाते हैं और इसके बाद एंटीजन को नष्ट करने की प्रक्रिया शुरू होती है। इस दौरान एंटीबॉडीज द्वारा चिन्हित एंटीजेन्स को नुकसान पहुंचाने के लिए टी सेल (T cells) को आदेश मिलता है। इससे एंटीजन नष्ट हो जाते हैं।  

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एंटीबॉडी का निर्माण कैसे होता है - Antibodies ka nirman kaise hota hai

एंटीबॉडी विशेष तरह की सफेद रक्त कोशिकाओं द्वारा बनाएं जाते हैं। इन विशेष तरह की सफेद रक्त कोशिकाओं को बी सेल या बी लिम्फोसाइट्स भी कहा जाता है। एंटीजन बी सेल (B cells) की सतह को बांधकर उसे उत्तेजित करते हैं, जिससे बी सेल समान कोशिकाओं (क्लोन) के समूह में विभाजित हो जाती है। इस तरह के पूर्ण विकसित बी सेल को प्लाज्मा सेल (plasma cells) भी कहा जाता है और यह सेल लसिका ग्रंथि और रक्तसंचार में लाखों एंटीबॉडीज को स्त्रावित करते हैं। जैसे जैसे एंटीबॉडी रक्त में घूमना शुरू करते हैं, वैसे ही वह एंटीजन को नष्ट और कम करने का काम करने लगते हैं। 

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एंटीबॉडी कम होने के कारण - Antibodies kam hone ke karan

एंटीबॉडी के कम होने के कारण उसके प्रकार के आधार पर अलग-अलग होते हैं। जो निम्नलिखित है:

  • आईजीजी (IgG) की कमी:
    आईजीजी की कमी के कारण को दो भागों में रखा जाता है, जैसे प्राथमिक और अन्य कारण। शोधकर्ता आईजीजी के प्राथमिक कारणों के बारे में पता नहीं लगा सके हैं, लेकिन इसमें अनुवांशिकता महत्वपूर्ण मानी जाती है। आयु, पोषण की कमी, दवाएं जैसे कीमोथैरेपी और एचआईवी संक्रमण आईजीजी कम होने के अन्य कारण माने जाते हैं। इसमें व्यक्ति में कान का संक्रमण, निमोनिया, ब्रोंकाइटिस, साइनस व अन्य श्वसन तंत्र संक्रमण के लक्षण दिखाई देते हैं। (और पढ़ें - निमोनिया के घरेलू उपाय)
     
  • आईजीएम (IgM) की कमी:
    आईजीएम की कमी के कारण अभी तक पता नहीं चल पाए हैं। इसकी कमी के पीछे कई कारक जिम्मेदार होते हैं। कुछ परिवार में इस तरह की समस्या के मामले देखे गए हैं, लेकिन किस विशेष तरह के जीन्स की वजह से यह समस्या होती इस बारे में कोई जानकारी मौजूद नहीं है। जिन व्यक्तियों के क्रोमोसोम्स में असमानताएं होती हैं, उनमें यह स्थिति देखी जाती है। (और पढ़ें - डीएनए टेस्ट क्या है)
     
  • आईजीए (IgA) की कमी:
    आईजीए की कमी इम्युनोडेफिसिंयेसी सिंड्रोम का सबसे आम प्रकार है। आईजीए की कमी होने पर अधिकतर लोग स्वस्थ दिखाई देते हैं। लेकिन आईजीए की कमी के कारण संक्रमण, एलर्जी, दस्त और स्वप्रतिरक्षित रोग होने की संभावना अधिक होती है। इसकी कमी के कारण के बारे पता नहीं चल सका है। इस स्थिति में व्यक्ति के शरीर में आईजीए की पूर्ण कमी होती है। आईजीए श्वसन तंत्र, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट, श्लेष्मिक प्रतिरक्षा और संक्रमण से बचाव में अहम भूमिका निभाते हैं। (और पढ़ें - दस्त में क्या खाना चाहिए)
  • आईजीई (IgE) की कमी:
    आईजीई की कमी को मुख्य रूप से कुछ विशेष तरह के सिंड्रोम जैसे आईजीएम की अधिकता व अन्य के साथ संबंधित माना जाता है। इसके अलावा कुछ सुक्ष्मजीवों के कारण भी यह स्थिति उत्पन्न हो जाती है। (और पढ़ें - दस्त रोकने के घरेलू उपाय)
  • आईजीडी (IgD) की कमी:
    आईजीडी की कमी के कारणों के बारे में पता नहीं चल सका है। कई तरह के अनुवांशिक कारणों को इससे संबंधित पाया जाता है।  

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एंटीजन क्या होते हैं? - Antigens kya hai

एंटीजन (रोगाणु) तत्व प्रतिरक्षा तंत्र को उत्तेजित करने में सक्षम होते हैं, यह विशेष रूप से लिम्फोसाइट्स (lymphocytes) को सक्रिय करते हैं।

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लिम्फोसाइट्स शरीर में मौजूद संक्रमण से लड़ने वाली सफेद रक्त कोशिकाएं होती है। आमतौर पर एंटीजन को दो रूपों में पहचाना जाता है, जिसमें बाहरी एंटीजन (heteroantigens/ foreign antigens) और शरीर के अंदर बनने वाले एंटीजन (autoantigens/self antigens) को शामिल किया जाता है।

एंटीजन बैक्टीरिया, वायरस या केमिकल हो सकते हैं। बाहरी एंटीजन शरीर के बाहर के रोगाणु होते हैं। जबकि ऑटोएंटीजन्स अपने आप व्यक्ति के शरीर के अंदर बनने लगते हैं। सामान्यतः शरीर खुद ही रोगाणुओं को नष्ट कर देता है, लेकिन स्व- प्रतिरक्षित विकार होने पर व्यक्ति के शरीर में ऐसे ऑटो एंटीबॉडीज (auto antibodies) बनने लगते हैं, जो गलती से व्यक्ति के अंगों और ऊतकों पर प्रतिक्रिया करने लगते हैं। 

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एंटीजन के प्रकार - Antigens ke prakar

एंटीजन के प्रकार को एंटीजन की उत्पत्ति और प्रतिरक्षा तंत्र के प्रभाव के आधार पर निम्नलिखित दो भागों में बांटा जाता है।

उत्पत्ति के आधार पर एंटीजन के प्रकार

  • एक्सट्रोजिनस एंटीजेन्स (Extrogenous antigens):
    इस तरह के एंटीजेन्स शरीर में प्रवेश करके रक्त व शरीर के तरल के साथ घूमना शुरू कर देते हैं। (और पढ़ें - फेफड़ों में इन्फेक्शन का इलाज)
     
  • इंडोजिनस एंटीजेन्स (Endogenous antigens):
    इसमें शरीर की कोशिकाएं एंटीजेन्स को बनाती है। (और पढ़ें - पाचन तंत्र के रोग का इलाज)
     
  • ऑटो एंटीजेन्स (auto antigens):
    ऑटोएंटीजेन्स आमतौर पर एक सामान्य प्रोटीन या कई प्रोटीन का जटिल रूप होते हैं, जो एक विशिष्ट स्व-प्रतिरक्षीत बीमारी से पीड़ित रोगियों में पाए जाते हैं। सामान्य स्थिति में तो ये एंटीजेन्स  प्रतिरक्षा तंत्र के निशाने पर नहीं होते हैं, लेकिन आनुवांशिक व अन्य बाहरी कारकों की वजह से ऐसा हो जाता है। (और पढ़ें - प्रोटीन की कमी का इलाज)

प्रतिरक्षा तंत्र के प्रभाव पर आधारित एंटीजन

  • इम्युनोजन (Immunogen/ Complete antigen):
    इसमें एंटीजन प्रतिरक्षा तंत्र पर स्वयं प्रतिक्रिया करते हैं। (और पढ़ें - विटामिन के फायदे)
     
  • हैप्टन्स (Haptens/ Incomplete antigens):
    इस तरह के एंटीजन्स को प्रतिरक्षा तंत्र पर प्रतिक्रिया करने के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता होती है। 

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एंटीजन के कार्य - Antigens ke karya

एंटीजन शरीर में प्रवेश करके प्रतिरक्षा तंत्र को उत्तेजित करता है। इसके बाद प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है। 

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एंटीजन वो तत्व होते है जो शरीर में प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिक्रिया को उत्तेजित करते हैं। प्रतिरक्षा तंत्र में प्रतिक्रिया होने की वजह से एंटीबॉडी का निर्माण शुरू हो जाता है। इसको इम्युनोग्लोबिन प्रोटीन भी कहा जाता है। इम्युनोग्लोबिन सामान्य रूप से प्रतिरक्षा कोशिकाओं को बनाने का काम करती है, इन कोशिकाओं को प्लाज्मा सेल्स के नाम से भी जाना जाता है।

एंटीबॉडी रक्त प्लाज्मा के माध्यम से शरीर में घूमना शुरू कर देते हैं और यह सफेद रक्त कोशिकाओं (लिम्फोसाइट्स) की सतह से जुड़ जाते हैं।     

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