कोरोना वायरस के मरीजों में दिमाग से जुड़ी समस्याएं बढ़ती जा रही है। विशेषज्ञ इसे 'कोविड ब्रेन फॉग' कह रहे हैं। वहीं, पीड़ितों का कहना है कि उन्हें खुद के डिमेंशिया से पीड़ित होने का सा एहसास होता है। कोविड-19 से जुड़ी यह अपनी तरह की एक विशेष समस्या बनती जा रही है, जिसमें बीमारी से उबरने के बाद मरीजों में मेमरी लॉस, कन्फ्यूजन, फोकस करने में कठिनाई, चक्कर आना आदि लक्षण देखने को मिल रहे हैं। अमेरिका में कोविड-19 ब्रेन फॉग एक ट्रेंड की तरह सामने आया है। कोरोना संक्रमण से उबरने वाले मरीज कई तरह की मानसिक शिकायतें कर रहे हैं। अखबार ने कुछ लोगों की प्रतिक्रियाएं प्रकाशित की हैं।

अमेरिकी नागरिक माइकल रीगन मार्च में कोरोना वायरस से संक्रमित हुए थे। उससे कुछ दिन पहले ही वे पेरिस घूमने गए थे। लेकिन अब उन्हें इस ट्रिप के बारे में कुछ भी याद नहीं है। एक अन्य मरीज एरिका टेलर कोविड-19 से उबरने के कई हफ्तों बाद भी उलझन में रहती हैं और कई चीजें भूल जाती हैं। वे अपनी कार तक को नहीं पहचान पातीं। हैरानी की बात यह है कि उनके पास जो कार है, वैसी उनके अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स में किसी और के पास नहीं है। इसी तरह, 53 साल की नर्स लीजा मिजेल जुलाई में सार्स-सीओवी-2 की चपेट में आई थीं। वे भी अपने रूटीन ट्रीटमेंट और लैब टेस्ट के बारे में भूल जाती हैं। उपचार के इन प्रकारों के लिए कौन सी शब्दावली इस्तेमाल की जाती है, यह बताने के लिए उन्हें अपने सहयोगियों की मदद लेनी पड़ रही है। मरीजों को अटेंड कर रूम से निकलने के बाद वे भूल जाती हैं कि उन्होंने उनसे क्या कहा था।

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एनवाईटी की रिपोर्ट में शिकागों की चर्चित हेल्थ व्यवस्था नॉर्थवेस्टर्न मेडिसिन के न्यूरो-इन्फेक्शियस प्रमुख डॉ. आइगर कॉरलनिक कहते हैं, 'हजारों मरीज हैं, जिनके साथ ऐसा हो रहा है। वर्क फोर्स पर पड़े इसके प्रभाव से काफी कुछ (नकारात्मक) देखने को मिल सकता है।' वैज्ञानिक साफ तरह से नहीं समझ पा रहे हैं कि कोरोना संक्रमण के बाद मरीजों में ब्रेन फॉग के मामले क्यों आ रहे हैं। वे इस बात से आश्चर्यचकित हैं कि केवल गंभीर ही नहीं, बल्कि हल्के और मध्यम स्तर के कोविड-19 मरीजों में भी ऐसे प्रभाव देखने को मिल रहे हैं। एक और दिलचस्प बात यह है कि इन लोगों को पहले से कोई मेडिकल समस्या नहीं थी। फिलहाल इस बारे में कुछ थ्योरी सामने आई हैं। इनके मुताबिक, कोरोना वायरस के चलते ब्रेन फॉग तब देखने को मिलता है, जब बॉडी का इम्यून सिस्टम विषाणु के खिलाफ रेस्पॉन्ड करना बंद नहीं करता या शरीर में हुई इन्फ्लेमेशन रक्त वाहिकाओं से लेकर दिमाग तक पहुंच जाती है।

समस्या की वजह स्पष्ट नहीं हो पा रही है, लेकिन लक्षण साफ पता चल रहे हैं। मेडिकल विशेषज्ञों के मुताबिक, रिकवरी के बाद कोविड-19 मरीजों में उलझन, प्रलाप और अन्य प्रकार के विकृत मानसिक फंक्शन देखने को मिल रहे हैं, जिसे इन्सेफेलोपैथी कहते हैं। कोरोना वायरस के चलते श्वसन संबंधी समस्या पैदा होने के बाद अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों में यह कंडीशन सामने आती है। बताया गया है कि ऐसे संक्रमितों को तुलनात्मक रूप से ज्यादा समय तक अस्पताल में रहना पड़ सकता है और उनकी मृत्यु दर भी ज्यादा हो सकती है। रिकवरी के बाद भी ये लोग रोजमर्रा के काम पहले की तरह मैनेज नहीं कर पा रहे।

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पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर के कारण ब्रेन फॉग?
तमाम थ्योरीज के बीच कोविड ब्रेन फॉग के पीछे के एक संभावित कारण का पता लगाया गया है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के डेविड गेफेन स्कूल ऑफ मेडिसिन के क्लिनिकल प्रोफेसर और न्यूरोसाइकोलॉजिस्ट एंड्रयू लेविन और शिकागो स्थित रोजलिंड फ्रैंकलिन यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिसिन एंड साइंस की ग्रैजुएट स्टूडेंट एरिन कासेडा ने अपने अध्ययन के आधार पर कहा है कि कोविड ब्रेन फॉग कोरोना संक्रमण से ठीक होने के बाद पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) के कारण हो सकता है। इन वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस से होने वाली दो अन्य बीमारियों सार्स और मेर्स का हिस्टॉरिकल डेटा खंगालने के बाद यह संभावना जताई है। इनके शोधपत्र को दि क्लिनिकल न्यूरोसाइकोलॉजिस्ट नामक पत्रिका ने प्रकाशित किया है।

खबर के मुताबिक, शोधपत्र के बारे में बात करते हुए डॉ. लेविन कहते हैं, 'हमारा मकसद न्यूरोसाइकोलॉजिस्ट में यह जागरूकता लाना है कि कोविड-19 को मात देने वाले लोगों की जानकारी और भावना से जुड़ी समस्याओं का आंकलन करते समय आपको पीटीएसडी पर विचार करना चाहिए। अगर हम मूल्यांकन के दौरान किसी मानसिक बीमारी की पहचान करते हैं और मानते हैं कि वह कंडीशन पीड़ितों की कार्यक्षमता को प्रभावित कर रही है तो हम चाहेंगे कि पहले उस समस्या का इलाज हो और उसके नियंत्रित होने के बाद रीटेस्ट किए जाएं।'

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वहीं, डॉ. कासेडा कहती हैं, 'एक बार ट्रीटमेंट मिलने के बाद उम्मीद करनी चाहिए कि उनके साइकायट्रिक लक्षणों में कुछ कमी आई होगी। अगर वे फिर भी बने रहते हैं, तब हमारे पास यह बताने के और सबूत होंगे कि असल समस्या कुछ और है।' अध्ययन में इन वैज्ञानिकों ने पाया है कि सार्स और मेर्स के कई सर्वाइवर्स में पीटीएसडी का खतरा बढ़ गया था। उनकी मानें कोविड-19 के मामले में पीटीएसडी के लक्षण कोरोना संक्रमण को खत्म करने के लिए उठाए जा रहे उपचार के आक्रामक तरीकों (जैसे इन्ट्यूबेशन और वेंटिलेश) की प्रतिक्रिया का नतीजा हो सकते हैं। अध्ययन के मुताबिक, ये तरीके पहले से डरे हुए मरीजों के लिए ट्रॉमेटिक हो सकते हैं।

इसी तरह के परिणाम स्वास्थ्यकर्मियों में भी देखने को मिल सकते हैं, जो कोरोना वायरस की रोकथाम की वजह से लगातार इस स्तर के तनाव और डर का सामना कर रहे हैं। इसके अलावा, महामारी की वजह से जो लोग आइसोलेशन में रह रहे हैं, उनमें भी चिंता के चलते पीटीएसडी जैसे लक्षण पैदा हो सकते हैं, जिससे उनके सोचने और याद करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।


उत्पाद या दवाइयाँ जिनमें कोरोना वायरस के रिकवर मरीजों में बढ़ रहे कोविड ब्रेन फॉग के मामले, नए शोध में पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर को बताया गया संभावित कारण है

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