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रेये सिंड्रोम​ होना क्या है?

रेये सिंड्रोम एक बहुत ही दुर्लभ विकार है, जिसमें दिमाग और लिवर को नुकसान होता है। वैसे तो ये सिंड्रोम किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन बच्चों में इसके मामले अधिक देखे गए हैं। ये अधिकतर उन बच्चों को होता है जिन्हें हाल ही में कोई वायरल इन्फेक्शन हुआ है, जैसे चिकन पॉक्स या फ्लू। वायरल संक्रमण होने पर एस्पिरिन लेने से रेये सिंड्रोम होने का खतरा बढ़ जाता है। चिकनपॉक्स या फ्लू में बच्चे को सिरदर्द होता है, लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि ऐसी स्थिति में उसे एस्पिरिन न दें।

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रेये सिंड्रोम​ के लक्षण क्या हैं?

रेये सिंड्रोम के लक्षण सर्दी-जुकाम, फ्लू और चिकनपॉक्स जैसे वायरल संक्रमण होने के कुछ दिनों बाद दिखने लगते हैं। इसमें बार-बार उल्टी आना, दौरे पड़ना, थकान, सांस फूलना और जोश की कमी जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं। जैसे-जैसे समस्या बढ़ती है, व्यक्ति को चिड़चिड़ापन, उग्र व्यवहार, चिंता, उलझन महसूस होना और बेहोश होने जैसे लक्षण अनुभव होने लगते हैं। इसके कारण रोगी कोमा में भी जा सकता है।

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रेये सिंड्रोम​ क्यों होता है?

रेये सिंड्रोम के सटीक कारण का अभी तक पता नहीं चल पाया है, हालांकि ये कई कारणों से हो सकता है। ऐसा माना जाता है कि वायरल इन्फेक्शन के दौरान एस्पिरिन का प्रयोग करने से रेये सिंड्रोम की शुरुआत होती है, खासतौर पर फ्लू और चिकनपॉक्स के दौरान। कुछ मामलों में रेये सिंड्रोम पहले से ही मेटाबोलिक विकार के तौर पर मौजूद होता है जो वायरल इन्फेक्शन के कारण सामने आता है। इसके अलावा कीटनाशक और पेंट थिनर जैसे विषाक्त पदार्थों के संपर्क में आने के कारण भी रेये सिंड्रोम हो सकता है।

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रेये सिंड्रोम का इलाज कैसे होता है?

रेये सिंड्रोम एक गंभीर स्थिति है जो आपातकालीन हो सकती है, इसीलिए इसका जल्दी इलाज होना आवश्यक होता है। रेये सिंड्रोम का कोई इलाज नहीं होता, लेकिन इसके लक्षणों का इलाज या उन्हें कम करने का प्रयास किया जा सकता है। इसके लिए बच्चे को अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है और डॉक्टर इस बात का ध्यान रखते हैं कि बच्चे के शरीर में पानी की कमी न हो और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन सही रहे। जिन बच्चों को रेये सिंड्रोम के कारण दौरे पड़ रहे हैं, उन्हें दौरे नियंत्रित करने के लिए दवाएं दी जाती हैं। गंभीर मामलों में बच्चे की सांस को सामान्य रखने के लिए सांस लेने की मशीन या रेस्पिरेटर का उपयोग किया जाता है। रेये सिंड्रोम का निदान जितनी जल्दी होता है, व्यक्ति के ठीक होने की संभावना भी उतनी ही अधिक होती है नहीं तो इसके कारण व्यक्ति के दिमाग को स्थायी नुकसान हो सकता है।

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