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विश्वभर में 29 अक्टूबर को 'वर्ल्ड स्ट्रोक डे' मनाया जाता है, इसका उद्देश्य लोगों के बीच स्ट्रोक से बचने, उसके इलाज और देखभाल के बारे में जागरूकता फैलाना है। विश्व में मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा कारण स्ट्रोक है, इस साल 1 करोड़ 45 लाख लोग स्ट्रोक का शिकार हुए हैं, जिनमें से 55 लाख लोगों की मृत्यु हो गई।

सर्दियों के मौसम में स्ट्रोक के मामलों में न सिर्फ इजाफा होता है, बल्कि गर्मियों के मुकाबले स्ट्रोक और भी बदतर हो जाता है। अध्ययनों से पता चला है कि फिनलैंड, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, जर्मनी, ताइवान, चीन, ईरान और भारत जैसे देशों में सर्दियों के दिनों में स्ट्रोक के मामले ज्यादा सामने आते हैं। 

हालांकि, सर्दियों में स्ट्रोक के अधिकतर मामलों को रोका या कम किया जा सकता है, क्योंकि इन दिनों में स्ट्रोक का मुख्य कारण बार-बार संक्रमण, धूप की कमी, डिप्रेशन, घर के अंदर रहना और व्यायाम की कमी है। सर्दियों में स्ट्रोक के मामले एट्रियल फाइब्रिलेशन (अनियमित दिल की धड़कन) के कारण भी बढ़ते हैं। 

स्ट्रोक कभी भी, किसी को भी, कहीं भी हो सकता है। वर्तमान समय में स्ट्रोक दुनियाभर में विकलांगता का सबसे बड़ा कारण है और मृत्यु की दूसरी सबसे बड़ी वजह है, लेकिन अमूमन सभी मामलों में स्ट्रोक को रोका जा सकता था। 

स्ट्रोक आने के बाद जो लोग स्वस्थ हो जाते हैं उन्हें कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जिसमें शारीरिक विकलांगता, बातचीत करने में मुश्किल होना, सोचने और महसूस करने की स्थिति में बदलाव, साधारण कार्य न कर पाना, आय और सोशल नेटवर्क (लोगों से मिलना-जुलना) में कमी शामिल है।

स्ट्रोक का सबसे मुख्य कारण हाई बीपी है, इसके अलावा स्ट्रोक के कारणों में धूम्रपान, डायबिटीज मेलिटस, तंबाकू चबाना, कोरोनरी आर्टरी रोग (हृदय को रक्त, ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की आपूर्ति करने वाली प्रमुख रक्त वाहिकाएं क्षतिग्रस्त या बीमार हो जाती हैं), डिसलिपिडेमिया (खून में लिपिड का स्तर बहुत ज्यादा या बहुत कम हो जाना), गर्भनिरोधक गोलियां, शराब का सेवन, एट्रियल फाइब्रिलेशन और पहले कभी स्ट्रोक पड़ना भी शामिल है। इस समस्या से ग्रस्त होने की संभावना 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में होती है।

स्‍ट्रोक का शरीर पर प्रभाव:

जब ऑक्‍सीजन युक्‍त खून मस्तिष्‍क तक नहीं पहुंच पाता है, तब स्‍ट्रोक की समस्या हो सकती है। मस्तिष्‍क की कोशिकाएं क्षतिग्रस्‍त हो जाती हैं और ऑक्‍सीजन न मिलने पर ये मर भी सकती हैं। कभी-कभी कोशिकाएं कुछ समय के लिए काम करना बंद कर देती हैं। स्‍ट्रोक का तुरंत इलाज करने की जरूरत होती है, वरना ये जानलेवा साबित हो सकता है। स्‍ट्रोक के बाद शरीर के कई हिस्‍सों पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।

आइए जानते हैं कि स्‍ट्रोक का शरीर पर क्‍या असर पड़ता है:

  • स्‍ट्रोक के बाद व्‍यक्‍ति को दूरी या गहराई का पता लगाने में दिक्‍कत आ सकती है या उसे साफ देखने में भी परेशानी हो सकती है।
  • भावनाओं को नियंत्रित करने की क्षमता कम हो सकती है। ऐसा तब होता है जब मस्तिष्‍क का वह हिस्सा क्षतिग्रस्‍त हो जाए जो व्‍यवहार को नियंत्रित करता है।
  • इस स्थिति के बाद व्‍यक्‍ति को खाना निगलने में भी दिक्‍कत हो सकती है, जिसे डिस्‍फेजिया कहते हैं। इसमें मस्तिष्‍क के कुछ विशेष हिस्से प्रभावित होते हैं, जो शरीर के तापमान को नियंत्रित करने की क्षमता खो देते हैं।
  • स्‍ट्रोक के बाद यदि कोई व्यक्ति लकवा या मांसपेशियों में कमजोरी जैसी समस्या से जूझ रहा है तो उसे सेक्‍स क्रियाओं में दिक्‍कत आ सकती है।

(और पढ़ें - स्ट्रोक होने पर क्या करना चाहिए)

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