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इस वक्त दुनियाभर में अगर किसी एक चीज की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है तो वह है कोविड-19 वैक्सीन की। कब बनेगी कोविड-19 की वैक्सीन, किसे सबसे पहले मिलेगी वैक्सीन, यह वैक्सीन कितनी प्रभावशाली होगी- इस तरह के सवाल आए दिनों लोगों के मन में उठ रहे हैं। एक तरफ जहां कोविड-19 की कुछ वैक्सीन्स पहले ही परीक्षण के तीसरे और अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं और कई और वैक्सीन्स अंतिम चरण के पास ही हैं, वहीं रूस ने तो वैक्सीन बनाने का दावा भी कर दिया है। ऐसे में वैक्सीन बनाने की दौड़ काफी दिलचस्प हो चुकी है। लेकिन इन सबके बीच पिछले कुछ महीनों में वैक्सीन को लेकर संभावित अस्वीकृति के बारे में भी चिंता जताई जा चुकी है।

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साल 2019 में द लैंसेट पत्रिका में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, वैक्सीन हिचकिचाहट यानी टीके को नामंजूर करना या टीके को स्वीकार करने में देरी दिखाने की समस्या, तब से जारी है जब पहली बार किसी वैक्सीन या टीके का विकास हुआ था। हालांकि, अब सोशल मीडिया की मौजूदगी के कारण टीकाकरण विरोधी (एंटी-वैक्सीनेशन) संदेश पहले से कहीं अधिक तेजी से दुनियाभर में फैल रहे हैं। लैंसेट के आर्टिकल में यह भी सुझाव दिया गया था कि वैक्सीन की सुरक्षा, सामान्य अविश्वास और षड्यंत्र से भरे कई सिद्धांत जिनके बारे में लगातार चर्चा होती है- इस तरह की समस्याओं के कारण बहुत से लोगों को वैक्सीन को स्वीकार करने में मुश्किल आती है।

इस आर्टिकल में हम आपको वैक्सीन यानी टीके से जुड़े 5 सबसे कॉमन मिथक और उनके पीछे की सच्चाई के बारे में बता रहे हैं।

मिथक 1 : इस बात के कोई सबूत नहीं होते कि वैक्सीन या टीका सुरक्षित है

हकीकत : आम लोगों के लिए उपलब्ध होने से पहले अधिकांश वैक्सीन या टीके को परीक्षण के कई स्तरों से गुजरना पड़ता है जिसमें टीके की सुरक्षा और प्रतिरक्षाजनत्व दोनों चीजें शामिल होती हैं। इन परीक्षणों और अध्ययनों के नतीजों को विभिन्न पत्रिकाओं और सरकारी वेबसाइटों पर उपलब्ध कराया जाता है ताकि कोई भी इनके बारे में पढ़ सके।  

रश यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर की वेबसाइट पर प्रकाशित एक लेख बताता है कि टीके की क्षमता, प्रभाव और सुरक्षा के बारे में जानने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि जिस बीमारी के खिलाफ टीका उपलब्ध है, उस विशेष बीमारी के मामलों की संख्या में टीका उपलब्ध होने के बाद कितनी कमी देखने को मिली है।

मिथक 2 : उचित स्वच्छता और साफ-सफाई के जरिए बीमारी को खत्म किया जा सकता है

हकीकत : विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO के अनुसार, पिछले घटनाओं से पता चला है कि अगर हम टीकाकरण करवाने से बचते हैं या इससे भी बदतर की हम टीकाकरण बिलकुल बंद कर देते हैं, तो कुछ बीमारियां ऐसी हैं जो फिर से वापस आएंगी और महामारी का रूप ले लेंगी। सबसे ताजा उदाहरण ब्रिटेन का है, जिसे WHO खसरे से मुक्त देश नहीं मानता है क्योंकि यहां पर  MMR टीकाकरण में कमी और खसरे के मामलों में वृद्धि देखने को मिली है।

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यहां इस बात पर भी ध्यान देना जरूरी है कि पूरी तरह से सफाई और स्वच्छता सुनिश्चित करना एक मुश्किल काम है। अच्छी तरह से साबुन पानी या सैनिटाइजर से हाथ साफ करने, मास्क का इस्तेमाल और स्वच्छता के महत्व के बारे में व्यापक जानकारी दिए जाने के बावजूद पिछले 8 महीनों में कोविड-19 के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। वास्तव में, मास्क के उपयोग जैसे एहतियाती उपायों को लेकर साजिश के सिद्धांत भी देखने को मिल रहे हैं जबकि अनुसंधान से पता चला है कि मास्क का इस्तेमाल कोविड-19 बीमारी के प्रसार को कम करने में प्रभावी हो सकता है।

मिथक 3 : टीकाकरण नहीं होने से सिर्फ मुझ पर ही प्रभाव पड़ेगा

हकीकत : खसरे के हालिया प्रकोप से यह बात स्पष्ट है कि यह दावा वास्तव में सही नहीं है। बीमारी के प्रकोप को रोकने के लिए, एक क्षेत्र में कुछ निश्चित संख्या में लोगों का टीकाकरण किया जाना जरूरी है तभी हर्ड इम्यूनिटी को हासिल किया जा सकता है। जितने अधिक लोग वैक्सीन को खारिज करते हैं, उतना ही अधिक बीमारी के नए प्रकोप की आशंका बढ़ जाती है।

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मिथक 4 : बहुत सारे लोगों को वह बीमारी भी हो जाती है जिसका टीका उन्हें लगा होता है

हकीकत : वैक्सीन या टीका रोगाणु या उसके एक हिस्से के कमजोर, निष्क्रिय या मृत संस्करण से बनाता है। किसी विशिष्ट वैक्सीन के संपर्क में आने के बाद आपका शरीर वैक्सीन द्वारा टार्गेट की गई बीमारी के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है, बीमारी के विकास के संपर्क में आए बिना ही। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वैक्सीन आपके इम्यून सिस्टम को विश्वास दिलाता है कि आप बीमारी के संपर्क में आए हैं।

हालांकि, इसमें एक पेंच भी है: सभी टीके 100 प्रतिशत प्रभावी नहीं होते। इसलिए यदि कोई टीका 99 प्रतिशत प्रभावी है, तो टीका लगने के बाद भी 1 प्रतिशत लोगों की प्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं होगी। ऐसे लोग बीमारी के लिए अतिसंवेदनशील होते हैं और उन्हें वह बीमारी हो सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि टीका प्रभावी नहीं था। 

इस बात को एक उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए 1 हजार छात्रों की क्लास में 5 छात्रों को छोड़कर बाकी सभी किसी विशेष बीमारी के खिलाफ टीका लगवा चुके हैं और टीका 99 प्रतिशत से अधिक प्रभावी है। अगर क्लास के छात्र किसी रोगाणु के संपर्क में आते हैं, तो वे 5 छात्र जिन्हें टीका नहीं लगा था उन्हें वह रोग हो जाएगा और शेष 995 छात्रों में से 1 प्रतिशत से भी कम (मान लीजिए 7 छात्र) छात्रों को यह रोग हो जाएगा। ऐसे में कुल मामलों की संख्या 1 हजार की बजाय सिर्फ 12 होगी।

मिथक 5 : वैक्सीन में ऐसे तत्व होते हैं जो शरीर को हानि पहुंचा सकते हैं

हकीकत : विशेषज्ञ बताते हैं कि कोई भी चीज या सामग्री व्यक्ति को हानि पहुंचा सकती है अगर उच्च मात्रा में उसका सेवन किया जाए। वैक्सीन में फॉर्मल्डिहाइड और एल्यूमीनियम जैसे कुछ तत्व होते हैं, लेकिन वे अत्यधिक कम मात्रा में होते हैं और टीके को सुरक्षित बनाने के लिए इनकी आवश्यकता होती है। वास्तव में, हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इन रसायनों की बहुत अधिक मात्रा के संपर्क में आते हैं।

उदाहरण के लिए, हमारे हर दिन के भोजन और पीने के पानी में लगभग 30 से 50 मिलीग्राम एल्यूमीनियम मौजूद होता है जिसका सेवन हम करते हैं, जबकि टीके की एक खुराक में 0.125 से 0.625 मिलीग्राम से अधिक एल्यूमीनियम नहीं होता है। इसी तरह, टीके में मौजूद फॉर्मल्डिहाइड की मात्रा भी कॉस्मेटिक्स, पेंट, वाहनों में लगे एग्जॉस्ट और कार्पेट जैसी चीजों में मौजूद फॉर्मल्डिहाइड की तुलना में बहुत कम होती है।

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