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हम सभी के पास बहुत सारे आदर्श या स्वरूप (पैटर्न) होते हैं, जिनका हम अपने जीवन के हर पल में पालन करते हैं। ये पैटर्न या यूं कहें कि ये आदतें स्वचालित या सहज होती हैं और इस बात को परिभाषित करती हैं कि ‘हम कौन हैं’। इसमें से कुछ आदतें ऐसी होती हैं, जिनकी वजह से हमें खुद पर गर्व महसूस होता है तो वहीं कुछ ऐसी भी होती हैं, जिनसे हम इतनी नफरत करते हैं कि उन्हें खुद से भी स्वीकार करना नहीं चाहते।

बहुत से लोग हर नए साल के मौके पर न्यू ईयर रेजोलूशन बनाते हैं, जिसमें कुछ नई आदतें विकसित करने का संकल्प लेते हैं। बहुत से लोग तो हर नए महीने के साथ न्यू मंथ रेजोलूशन (संकल्प) भी बनाते हैं - ये मुश्किल और चिढ़ पैदा करने वाली आदतें या पैटर्न जो हमारे जीवन पर एक तरह से नियंत्रण कर लेती हैं, उनसे छुटकारा पाने का हमारा एक तरीका होता है।

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अपनी आदतों को बदलना इतना मुश्किल क्यों है?
सबसे पहले इस प्रक्रिया को समझने की कोशिश करते हैं। हमारा शरीर और सबसे जरूरी हमारा दिमाग एक स्वचालित छंटाई मशीन की तरह काम करता है। हमारा शरीर (मस्तिष्क सहित) इस तरह से योजनाबद्ध है कि वह अपने अंदर ही संतुलन खोजता है। ऐसे में अगर उसे किसी ऐसे वायरस का पता चलता है, जो शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है, तो क्या होता है? शरीर अपने आप काम करने में लग जाता है। शरीर जितना हो सकता है उतना ज्यादा मजबूत और शक्तिशाली एंटीबॉडीज का उत्पादन करने लगता है उस दुश्मन से लड़ने के लिए जो हमारे सिस्टम में प्रवेश कर अराजकता फैलाने की कोशिश कर रहा हो।

रोजाना दिन और रात में हम जो रूटीन फॉलो करते हैं वह कुछ और नहीं बल्कि हमारे शरीर का खुद को संतुलन में रखने का अपना तरीका है। समय-समय पर, यह प्राकृतिक मशीन, असंतुलन को महसूस करती है। अगर हम किसी प्रॉजेक्ट को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हमारा शरीर थका हुआ महसूस करने लगता है, तो यही वह सिस्टम है जो हमारे लक्ष्यों को पूरा करने में हमारी मदद करता है। अगर इसे मदद की जरूरत होती है हमें इसकी सेवा में रहने के लिए प्रेरित किया जाएगा। बेशक, नजर में हमारे अपने लक्ष्य ही होते हैं।

एक कप कॉफी जो हम पीते हैं, जिस ढंग से हम खड़े होते हैं, ये जानते हुए भी कि हम ओवरइटिंग कर रहे हैं वो अतिरिक्त कौर जो हम खा लेते हैं - ये सब हमारी आदते हैं, जिनके बारे में मैं लगातार कितनी ही बातें कर सकती हूं। लेकिन आप समझ गए होंगे कि मैं किस बारे में बात कर रही हूं। 

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ये सभी कार्य हमारे बुद्धिमान और प्रतिभाशाली दिमाग के तर्क की अवहेलना करते हैं। मैंने ऐसा क्यों किया? मुझे पता था कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। लेकिन उस क्षण में, ऐसा लगा जैसे किसी ने मुझ पर कब्जा कर लिया और इससे जुड़े सभी तर्क कम शक्तिशाली और कम महत्वपूर्ण लगने लगे, इस बात का फैसला करने में कि मैंने उस क्षण में क्या किया और क्यों किया। हर बार जब हम उस विषम चक्र में फंसकर गिरने वाले होते हैं तो ऐसा लगता है मानो कोई छिपी हुई शक्ति हमारा अधिग्रहण कर लेती है, यह हमारे शरीर का तरीका है अपनी जरूरतों के प्रति संतुलन बनाए रखने का।

क्या आप जानते हैं कि इन आदतों से छुटकारा पाना और भी मुश्किल क्यों हो जाता है?

यह हमारी स्मृति या याददाश्त है उन सभी कार्यों की जिन्होंने अतीत में शरीर का संतुलन बनाए रखने में हमारी मदद की है। हां, अब आप समझ सकते हैं कि हमारा शरीर कितनी शक्तिशाली मशीन है। हमारा दिमाग, आश्चर्यजनक रूप से उन सभी यादों को संग्रहित करके रखता है, जिन कामों को हम करते हैं। फिर चाहे वे काम हमने पिछले हफ्ते किए हों, पिछले साल, पिछले दशक या फिर तब-जब हम बहुत छोटे थे।

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एक बार फिर, यह स्वचालित है, स्वैच्छिक या स्वाभाविक है और बिना किसी सचेत प्रयास के है। हमारा मन जो हमारे शरीर की सेवा में लगा रहता है, वह पूरी मेहनत से हमारे सभी अनुभवों का वर्गीकरण करता है कि इनमें से कौन से अनुभव मददगार हैं और कौन से नहीं, पल-पल में जीवित रहने और हमारे अस्तित्व के प्रति, यह वह कार्य है, जिसे प्रकृति ने हमारे दिमाग को सौंपा है।

अलग-अलग जीवित प्रजातियों पर किए गए अध्ययन को लेकर बहुत सारी रिसर्च मौजूद है जो इस बात को स्पष्ट रूप से दिखाती है कि बहुत जीवों में अपने अनुभवों को याद रखने की क्षमता होती है; उन प्रजातियों वाले जीवों में भी, जिनमें हम इंसानों जैसा विकसित न्यूरोलॉजिकल सिस्टम नहीं होता है। इसलिए कल्पना कीजिए कि हमारा दिमाग कितना कुशल होगा यह सुनिश्चित करने में कि हम न केवल जीवित रहें, बल्कि कुछ ऐसा भी करें जिससे भविष्य में आने वाली पीढ़ियां हमें याद रखें।

लिहाजा अगली बार, जब आप खुद पर सख्त हों, पूरी तरह से हारा हुआ, तबाह और बर्बाद महसूस करें तो इस वास्तविकता को याद रखें। आप दुनिया के सबसे शक्तिशाली सिस्टम के खिलाफ खड़े हैं।

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