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पोलियो या पोलियोमेलाइटिस, एक अपंग करने वाली और संभावित घातक बीमारी है। यह बीमारी पोलियो वायरस के कारण होती है। यह वायरस व्यक्ति से व्यक्ति में फैलता है और संक्रमित व्यक्ति के मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी पर हमला कर सकता है, जिससे पक्षाघात (शरीर के हिलाया नहीं जा सकता) होने की आशंका होती है।

टीकाकरण लोगों को पोलियो से बचा सकता है। भारत पिछले 7-8 वर्षों से पोलियो मुक्त हो चुका है। लेकिन यह अभी भी दुनिया के अन्य हिस्सों में होता है।

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अगर हम टीकाकरण करवा कर इस वायरस से सुरक्षित नहीं रहते हैं तो इस बीमारी को वापस आने के लिए किसी अन्य देश से आने वाले पोलियो से संक्रमित केवल एक व्यक्ति की ही जरुरत होगी।

यदि पूरी दुनिया से पोलियो की बीमारी को खत्म करने का प्रयास सफल हो जाता है, तो उसके बाद हमें पोलियो के टीके की आवश्यकता नहीं होगी। लेकिन तब तक, हमें अपने बच्चों का टीकाकरण करने की आवश्यकता है।

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इस लेख में विस्तार से बताया गया है कि पोलियो का टीका क्या है, पोलियो वैक्सीन की खोज किसने की और पोलियो का टीका कब लगता है इसके साथ ही पोलियो वैक्सीन के प्रकार, फायदे, साइड इफेक्ट, कीमत और पोलियो वैक्सीन के इतिहास के बारे में भी जानकारी दी गयी है।

  1. पोलियो वैक्सीन क्या है - Polio Vaccine kya hai in hindi
  2. पोलियो वैक्सीन की खोज किसने की - Polio ka tika kisne khoja tha in hindi
  3. पोलियो वैक्सीन के प्रकार - Polio Vaccine types in hindi
  4. पोलियो का टीका कब लगता है - Polio Vaccine schedule in hindi
  5. पोलियो वैक्सीन के फायदे - Polio Vaccine benefits in hindi
  6. पोलियो वैक्सीन के साइड इफेक्ट - Polio Vaccine side effects in hindi
  7. पोलियो के टीके की कीमत - Polio Vaccine cost in india in hindi
  8. पोलियो का टीका कब, क्यों लगवाना चाहिए और लाभ के डॉक्टर

टीका एक ऐसी दवा होती है जिसे आपको किसी बीमारी से बचाने के लिए दिया जाता है। पोलियो का टीका, पोलियो नामक तंत्रिका तंत्र की संक्रामक बीमारी को रोकने के लिए पोलियो वायरस से तैयार किया जाने वाला एक टीका है।

पहला पोलियो का टीका, जिसे निष्क्रिय पोलियो वायरस टीका (आईपीवी: IPV) या साल्क टीका के रूप में जाना जाता है, 1950 के दशक में अमेरिकी चिकित्सक जोनास साल्क द्वारा विकसित किया गया था। इस टीके में मारे गए वायरस होते हैं और यह इंजेक्शन द्वारा आपके शरीर में इंजेक्ट किया जाता है।

आईपीवी का बड़े पैमाने पर उपयोग फरवरी 1954 में शुरू हुआ, जब इसे अमेरिकी स्कूली बच्चों के लिए उपयोग किया गया था। अगले कुछ वर्षों में ही, संयुक्त राज्य अमेरिका में पोलियो की घटनाएं 1,00,000 लोगों पर 18 मामलों से कम होकर 1,00,000 लोगों पर 2 मामलों तक आ गईं।

1960 के दशक में एक अन्य प्रकार का पोलियो टीका बना, जिसे मौखिक या ओरल पोलियो वैक्सीन (ओपीवी) या सबिन टीका कहा जाता है, जिसका नाम आविष्कारक, अमेरिकी चिकित्सक और सूक्ष्म जीव विज्ञानी अल्बर्ट सबिन के नाम पर रखा गया था। ओपीवी में जीवित क्षीणित (कमजोर) वायरस होता है और इसे मुँह से ड्राप के रूप में दिया जाता है।

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पोलियो वैक्सीन का इतिहास बताता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में, दो अलग-अलग टीमों ने पोलियो के टीकों का विकास किया और नवंबर 1935 में अमेरिकन पब्लिक हेल्थ एसोसिएशन की वार्षिक बैठक में अपने परिणामों की सूचना दी। उस समय के अन्य शोधकर्ताओं की प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप दोनों प्रोजेक्ट्स को रद्द कर दिया गया और अगले 20 साल तक किसी शोधकर्ता ने पोलियो का टीका बनाने का प्रयास करने की हिम्मत नहीं की।

इस बैठक के बाद, ब्रोडी, जिनका पोलियो टीका कम से कम आंशिक रूप से तो प्रभावी और सुरक्षित था और जिन्होंने टीकाकरण के बारे में कई महत्वपूर्ण विचार विकसित किए, इनकी वैधता की पुष्टि दो दशक बाद साल्क टीके के विकास के साथ हुई।

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साल्क टीका पहला प्रभावी पोलियो टीका था जिसकाे 1952 में जोनास साल्क और पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय की एक टीम द्वारा विकसित किया गया। इस टीम में जूलियस यंगनर, बायरन बेनेट, एल. जेम्स लुईस और लोरेन फ्रेडमैन शामिल थे। इस टीके को उपयोग करने से पूर्व अभी भी लंबे परीक्षण की आवश्यकता थी। 1954 में इस टीके का बड़े पैमाने पर उपयोग शुरू हो गया।

जिस समय साल्क अपने टीके का परीक्षण कर रहा था, लगभग उसी समय अल्बर्ट सबिन और हिलेरी कोप्रोव्स्की दोनों ने लाइव वायरस का उपयोग कर टीका विकसित करने पर काम करना जारी रखा हुआ था। सबिन और कोप्रोव्स्की दोनों अंततः टीकों के विकास में सफल रहे।

अमेरिका में साल्क टीके के प्रति प्रतिबद्धता के कारण, सबिन और कोप्रोव्स्की दोनों ने अमेरिका के बाहर अपना परीक्षण किया, सबिन ने पहले मेक्सिको में और फिर सोवियत संघ में तथा कोप्रोव्स्की ने कांगो और पोलैंड में यह कार्य किया।

सबिन ने एक तीन गुणों वाला टीका विकसित किया, जिसमें तीनों प्रकार के पोलियो वायरस के कमजोर जीवित अवशेष होते हैं। सबिन द्वारा जीवित वायरस का उपयोग करके बनाए गए टीके का 1961 में व्यावसायिक उपयोग शुरू हो गया।

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पोलियो की वैक्सीन दो रूपों में आती है, जो निम्नलिखित हैं -

ओरल पोलियो वैक्सीन (ओपीवी)
मौखिक या मुँह के द्वारा लिया जाने वाला पोलियो का टीका (जिसे ओपीवी कहा जाता है) मुंह में दो बूंदों के रूप में दिया जाता है। उन देशों में जहां पर खतरनाक पोलियो वायरस अभी भी परिसंचरण में है, इस ओरल पोलियो वैक्सीन (ओपीवी) का उपयोग किया जाता है क्योंकि ओपीवी को उपयोग करने के लिए न्यूनतम प्रशिक्षण और उपकरण की आवश्यकता होती है।

ओरल पोलियो वैक्सीन या जिसे पोलियो ड्राप भी कहा जाता है, पोलियो उन्मूलन के लिए डब्ल्यूएचओ द्वारा अनुशंसित टीका है। ओपीवी की एक खुराक दो बूंदें होती है, जिसे बच्चे के मुँह में डाला जाता है।

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बच्चों को पोलियो के खिलाफ पूरी तरह से सुरक्षित करने के लिए पोलियो ड्राप की कम से कम तीन खुराक की आवश्यकता होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने सिफारिश की है कि पहली खुराक जन्म के समय पर और दूसरी खुराक कम से कम चार सप्ताह बाद दी जाए।

ओरल पोलियो वैक्सीन या ओपीवी पहले मोनोवलेंट ओपीवी होता था जिसका अर्थ है कि इसमें एक ही गुण होता था और बाद में ट्रिवलेंट ओपीवी (टीओपीवी) का विकास किया गया जिसमें तीन गुण है।

तीनों प्रकार के पोलियो वायरस के लिए मोनोवलेंट ओपीवी (एमओपीवी) 1950 के दशक के अंत और 1960 के दशक के आरंभ में पोलियो टीकाकरण के शुरुआती दिनों में बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता था, जो इन टीकों का व्यापक अनुभव प्रदान करता था।

आम तौर पर 1963 से ही ट्रिवलेंट ओपीवी के उपयोग में आसानी और प्रभाव के गुणों के चलते मोनोवलेंट ओपीवी की जगह इसने ले ली। टीओपीवी के उपयोग से, सभी तीन प्रकार के खतरनाक पोलियो वायरस के खिलाफ सुरक्षा एक ही समय में दी जा सकती है।

भारत सरकार टीकाकरण के अपने कार्यक्रम के वर्तमान ट्रिवलेंट ओपीवी संस्करण की जगह बाइवलेंट ओरल पोलियो वैक्सीन (ओपीवी) के उपयोग को बढ़ावा दे रही है। ट्रिवलेंट ओपीवी में पोलियो वायरस के सभी तीन प्रकार (1, 2 और 3) के जीवित और कमजोर रूप होते हैं जबकि बाइवलेंट ओरल पोलियो वैक्सीन में केवल टाइप 1 और 3 वायरस होते है।

इनएक्टिवेटेड पोलियो वैक्सीन (आईपीवी)
इनएक्टिवेटेड पोलियो वैक्सीन या आईपीवी इंजेक्शन द्वारा दिया जाता है। इसमें वायरस के एक निष्क्रिय (मृत) रूप का उपयोग किया जाता है जिसमें पोलियो का कारण बनने की क्षमता नहीं होती है।

निष्क्रिय पोलियो टीका मुख्य रूप से उन देशों में उपयोग किया जाता है जहां पर पोलियो वायरस पहले ही समाप्त हो चुका है।

चूँकि ओपीवी एक जीवित पोलियो वायरस से बना होता है इसलिए जीवित वायरस के टीके से पोलियो के खिलाफ सुरक्षा अत्यधिक प्रभावी होने के बावजूद प्रति वर्ष पोलियो के कुछ मामलों का कारण पोलियो ड्राप या ओरल पोलियो वैक्सीन होते थे।

अमेरिका में सन 2000 में निष्क्रिय पोलियो टीके (आईपीवी) का उपयोग शुरू हो गया। भारत ने नवंबर 2015 से ओरल पोलियो वैक्सीन या पोलियो ड्राप (ओपीवी) के साथ अपने नियमित टीकाकरण कार्यक्रम में इंजेक्शन योग्य पोलियो टीका या इनएक्टिवेटेड पोलियो वैक्सीन (आईपीवी) को भी पेश किया है।

पोलियो वैक्सीन शेड्यूल क्या है?

सभी बच्चों को उनके लिए बनाये गए नियमित टीकाकरण कार्यक्रम के हिस्से के रूप में पोलियो के टीके की 4 खुराक की आवश्यकता होती है।

बच्चों को निम्नलिखित उम्र में खुराक की आवश्यकता होती है -

  • 2 महीने की उम्र में पहली खुराक
  • दूसरी खुराक 4 महीने की उम्र में
  • तीसरी खुराक 6 से 18 महीनों के बीच और
  • चौथी खुराक 4 से 6 साल की उम्र में दी जानी चाहिए।

क्योंकि अधिकांश वयस्कों को उनके बचपन में टीका लगाया जाता है, इसलिए 18 साल और उससे अधिक उम्र के लोगों के लिए पोलियो के नियमित टीकाकरण की सिफारिश नहीं की जाती है।

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लेकिन वयस्कों के निम्नलिखित तीन समूहों के पोलियो वायरस के संपर्क में आने का जोखिम अधिक हो सकता है, इसलिए उनको पोलियो का टीका लगाने पर विचार करना चाहिए -

  • दुनिया के उन हिस्सों में यात्रा करने वाले यात्री जहां पोलियो अभी भी आम है।
  • वे लोग जो प्रयोगशालाओं में ऐसे नमूनों को संभालते हैं जिनमें पोलियो वायरस हो सकते हैं।
  • स्वास्थ्य देखभाल करने वाले वे कर्मचारी जो किसी ऐसे व्यक्ति के साथ संपर्क में रहते हैं जो पोलियो वायरस से संक्रमित हो।

यदि आप इन तीन समूहों में से किसी भी श्रेणी में आते हैं तो आपको पोलियो के टीके लगाने के बारे में अपने डॉक्टर से बात करनी चाहिए। यदि आपको पोलियो के खिलाफ कभी टीका नहीं लगाया गया है, तो आपको आईपीवी की तीन खुराक दी जानी चाहिए, जो निम्नलिखित हैं -

  • पहली खुराक किसी भी समय पर
  • दूसरी खुराक पहली से 1 से 2 महीने बाद और
  • तीसरी खुराक दूसरी से 6 से 12 महीने के बाद दी जानी चाहिए।

यदि आपको पहले एक या दो खुराक दी जा चुकी थी तो आपको शेष एक या दो खुराक लेनी चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि पहली खुराक या अंतिम खुराक के बाद से अब तक कितना समय हो गया है।

हालाँकि, निम्नलिखित श्रेणी के किसी व्यक्ति को पोलियो टीका नहीं लगाया जाना चाहिए -

  • ऐसे लोग जिनका गंभीर एलर्जी प्रतिक्रिया का मेडिकल इतिहास रहा है। (और पढ़े - एलर्जी के घरेलू उपाय)
  • यदि आपको नियोमाइसिन, पॉलीमेक्सिन बी, स्ट्रेप्टोमाइसिन के प्रति एलर्जी की परेशानी है तो आपको पोलियो का टीका नहीं लगाना चाहिए। (और पढ़े - एलर्जी टेस्ट कैसे होता है)
  • यदि आपको मध्यम या गंभीर स्तर की कोई बीमारी है तो आपको पोलियो का टीका लगाने के लिए इस बीमारी के ठीक होने तक इंतजार करना चाहिए।

अगर आपको सर्दी जुखाम जैसी कोई मामूली परेशानी है तो टीका लेने में कोई दिक्कत नहीं है। हालांकि, अगर आपको बुखार या अधिक गंभीर संक्रमण हो, तो आपके डॉक्टर आपको टीका लगाने से पहले कुछ समय प्रतीक्षा करने की सलाह दे सकते हैं।

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पोलियो वैक्सीन के निम्नलिखित फायदे हो सकते हैं -

  • पोलियो वैक्सीन ही पोलियो को रोकने का एकमात्र तरीका है, जो अगर नहीं रोका जाए तो घातक हो सकता है। पोलियो का टीका पोलियो वायरस के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है, यह एक ऐसा वायरस है जो पक्षाघात और मृत्यु तक का कारण बन सकती है।
  • पोलियो का टीका पोलियो जैसी गंभीर और कभी-कभी घातक बीमारी के खिलाफ न केवल आपकी सुरक्षा करता है बल्कि जब आप टीका लगवाते हैं तो आप दूसरों की सुरक्षा में भी मदद करते हैं। क्योंकि यह एक संक्रमण वाली बीमारी है जो एक व्यक्ति से दूसरे में फैल जाती है। (और पढ़ें - बैक्टीरियल संक्रमण का उपचार)
  • आईपीवी का उपयोग जीवित वायरस वाली ओरल पोलियो वैक्सीन या पोलियो ड्राप लेने के बाद पोलियो के विकास के बाकी बचे जोखिम को भी समाप्त कर देता है।

टीकों सहित किसी भी दवा से साइड इफ़ेक्ट या नुकसान की आशंका तो रहती ही है। जहाँ तक पोलियो वैक्सीन के साइड इफेक्ट की बात है तो ये आमतौर पर हल्के होते हैं और अपने आप दूर जाते हैं, लेकिन कुछ गंभीर प्रतिक्रियाएं या रिएक्शन भी हो सकते हैं, जो निम्नलिखित हैं -

  • कुछ लोग जो पोलियो का इंजेक्शन लगवाते हैं उन्हें इंजेक्शन वाली जगह पर दर्द और लाल पड़ने जैसी परेशानी हो सकती है। अन्यथा टीका बहुत सुरक्षित है। ज्यादातर लोगों को इसके लगाने से कोई समस्या नहीं होती है।
  • कभी-कभी टीकाकरण सहित किसी भी चिकित्सा प्रक्रिया के बाद कुछ लोग बेहोश हो जाते हैं। लगभग 15 मिनट के लिए बैठकर या लेटने से गिरने से लगने वाली चोट को रोकने में मदद मिल सकती है। अगर आपको चक्कर आते हैं या कान बजना जैसी परेशानी होती है या देखने में कोई दिक्कत होती है तो अपने डॉक्टर को बताएं।
  • कुछ लोगों के कंधे में दर्द होता है जो इंजेक्शन के कारण होने वाले किसी भी नियमित दर्द से अधिक गंभीर और लंबे समय तक चलने वाला हो सकता है। हालाँकि चिंता की कोई बात नहीं है क्योंकि ऐसा बहुत ही कम होता है। (और पढ़े - कंधे में दर्द का घरेलू उपाय)
  • कोई भी दवा गंभीर एलर्जी का कारण बन सकती है। हालाँकि एक टीके से इस तरह की प्रतिक्रियाएं बहुत दुर्लभ होती हैं, अनुमान लगाया जाता है कि दस लाख खुराक में लगभग 1 में ऐसा होता है और टीकाकरण के कुछ मिनटों या कुछ घंटों के भीतर ही ऐसा होता है। (और पढ़े - एलर्जी होने पर क्या करें)

दुनिया ने पोलियो, एक डरावनी बीमारी जो संक्रमित बच्चों को पक्षाघात का शिकार बना कर छोड़ देती है, के खिलाफ लड़ाई में काफी प्रगति की है।

भारत भी इस मामले में एक अच्छा उदाहरण है। 1985 में देश में 1,50,000 से अधिक पोलियो के मामलों की गणना की गयी थी। जनवरी, 2014 में, बिना किसी नए मामले के सामने आने के तीन साल बाद, वैश्विक पोलियो उन्मूलन पहल की तरफ से औपचारिक रूप से भारत को पोलियो मुक्त घोषित कर दिया है।

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पोलियो के टीके की कीमत का एक अनुमान यहाँ दिया जा रहा है जो केवल सामान्य जानकारी के लिए है, बाजार में कीमतों में कुछ ऊपर-निचे हो सकता है।

ओपीवी या ओरल पोलियो वैक्सीन (जिसे भारत में "पल्स पोलियो प्रोग्राम" में पोलियो ड्रॉप्स के नाम से दिया जाता है) को यदि सरकार अपनी योजना में उपलब्ध कराती है तो यह मुफ्त होती है किन्तु यदि आप किसी निजी क्लिनिक या हॉस्पिटल में इसे लगवाते है तो इसकी कीमत 30 रुपये से लेकर 115 रुपये तक हो सकती है।

आईपीवी या इंजेक्टेबल पोलियो वैक्सीन या सरल शब्दों में कहा जाए तो इंजेक्शन योग्य पोलियो टीके की कीमत लगभग 450 रुपये के आसपास होती है जो आसानी से किसी भी मेडिकल स्टोर पर मिल सकता है। भारत सरकार भी अपने पल्स पोलियो प्रोग्राम के अंतर्गत अब इंजेक्टेबल पोलियो वैक्सीन को शामिल कर चुकी है।

ओपीवी की दो बूंद की खुराक की कीमत इंजेक्टेबल पोलियो वैक्सीन (आईपीवी) से कम होती है, लेकिन आईपीवी का टीका बीमारी के खिलाफ बच्चों को प्रतिरक्षित करने का एक बेहतर तरीका है और यह अधिक सुरक्षित है। क्योंकि इसमें जीवित वायरस नहीं होता है। मगर दुख की बात यह है कि, यह अभी भी अधिक महंगा है।

नोट - ये लेख केवल जानकारी के लिए है। myUpchar किसी भी सूरत में किसी भी तरह की चिकित्सा की सलाह नहीं दे रहा है। आपके लिए कौन सी चिकित्सा सही है, इसके बारे में अपने डॉक्टर से बात करके ही निर्णय लें।

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