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जब बात त्वचा से जुड़ी बीमारियों की होती है तो बीमारी चाहे छोटी सी हो जिस पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत हो या फिर लंबे समय से चली आ रही त्वचा की कोई समस्या हो, सिद्ध चिकित्सा पद्धति के जरिए त्वचा से जुड़ी समस्याओं का इलाज आसानी से हो जाता है। इतना ही नहीं आयुर्वेद की ही तरह सिद्ध के भी कोई साइड इफेक्ट्स नहीं हैं और इलाज की यह पद्धति ज्यादा खर्चीली भी नहीं है।

सोरायसिस को हिंदी में छाल रोग और तमिल भाषा में कलनजगापदई कहते हैं। सोरायसिस, स्किन से जुड़ी बीमारी है जिसमें स्किन पर लाल, परतदार चकत्ते नजर आने लगते हैं। इसका सबसे ज्यादा असर कोहनी के बाहरी हिस्से और घुटने पर देखने को मिलता है। लेकिन यह चर्म रोग स्किन के किसी भी हिस्से पर हो सकता है। कुछ लोगों को सोरायसिस में त्वचा पर जलन भी होती है और खुजली भी। 

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संक्रामक बीमारी नहीं है सोरायसिस
नेशनल सोरायसिस फाउंडेशन के मुताबिक इस बीमारी की असल वजह क्या है इस बारे में अब तक कोई जानकारी नहीं मिली है लेकिन इस चर्म रोग के बारे में जितनी भी जानकारी उपलब्ध है उसके मुताबिक यह ऑटोइम्यून बीमारी है जो शरीर के इम्यून सिस्टम में गड़बड़ी होने के कारण होती है या फिर आनुवंशिक कारणों के चलते। लेकिन यह संक्रामक बीमारी नहीं है यानी यह छूने से नहीं फैलती। 

20 प्रतिशत आबादी को करती है प्रभावित
राष्ट्रीय सिद्ध संस्थान के मुताबिक सोरायसिस दुनिया की करीब 20 प्रतिशत आबादी को प्रभावित करने वाली बीमारी है। इसका मतलब है कि यह स्किन की बेहद कॉमन बीमारी है। अगर किसी व्यक्ति को बहुत ज्यादा स्ट्रेस या तनाव हो, अगर वह ज्यादा देर तक सूरज की रोशनी में बाहर रहे, अगर तापमान में अचानक बहुत ज्यादा बदलाव हो तो सोरायसिस की यह स्थिति उत्तेजित हो सकती है या बिगड़ भी सकती है। सोरायसिस में त्वचा पर भद्दे घाव हो जाते हैं जिसकी वजह से मरीज को काफी शर्मिंदगी और शारीरिक परेशानी का सामना करना पड़ता है और ऐसी स्थिति को सुरक्षित और प्रभावी रूप से मैनेज करना मुश्किल होता है। 

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खून साफ कर दोष को संतुलित करने पर फोकस
सिद्ध चिकित्सा प्रणाली में, सोरायसिस का इलाज समय के साथ टेस्ट की गई और सुरक्षित औषधियों के सूत्रीकरण के साथ प्रभावी ढंग से किया जा सकता है। सोरायसिस के लिए किए जाने वाले सिद्ध ट्रीटमेंट में लक्षणों में दिलाने की बजाए मुख्य रूप से खून को साफ करने और दूषित या विकृत दोषों को संतुलित करने पर फोकस किया जाता है। सोरायसिस के इलाज में आंतरिक और बाहरी दोनों तरह की दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। 

डीटॉक्स थेरेपी से इलाज की शुरुआत
सालों से शरीर में जमा विषाक्त पदार्थों से छुटकारा पाने और सभी दोषों को संतुलित करने के लिए एक प्रारंभिक डिटॉक्सिफिकेशन थेरेपी के साथ सोरायसिस के इलाज की शुरुआत होती है। इसके बाद आंतरिक सिद्ध दवाइयां दी जाती हैं जिसे जड़ी बूटियों और खनिज पदार्थों को मिलाकर तैयार किया जाता है ताकि खून को साफ कर इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाया जा सके।

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इलाज के दौरान खाने में रखना होता है परहेज
त्वचा पर जो परत बन जाती है उसे ठीक करने के लिए जड़ी बूटियों को मिलाकर तैयार की गई दवाइयां और तेल स्किन के सोरायसिस प्रभावित हिस्से पर बाहर से लगाया जाता है। जितने दिन सिद्ध चिकित्सा चलती है मरीज को खाने में खट्टी और नमकीन चीजें, अंडे से बने उत्पाद, मछली और सीफूड और खट्टे फलों का सेवन न करने और चावल, दूध, हरी सब्जियां और दालों को डायट में शामिल करने की सलाह दी जाती है। 

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