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त्‍वचा हमारे शरीर का एक अभिन्न अंग है, जो हमें हवा और स्‍पर्श को महसूस करने में भी मदद करती है। आयुर्वेद के अनुसार त्‍वचा रक्त धातु से बनती है एवं त्‍वचा विकारों को कुष्‍ठ रोग कहा गया है। त्रिदोष या धातु के खराब होने, दो अनुचित खाद्य या पेय पदार्थों को एक साथ खाने, बुखार, सूजन या अन्‍य किसी त्‍वचा रोग से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति के साथ बैठने, लेटने या किसी भी तरह से उसके शारीरिक संपर्क में आने के कारण त्‍वचा रोग जैसे कि सोरायसिस हो सकता है।

आयुर्वेद के अनुसार सोरायसिस को क्षुद्र कुष्‍ठ (लघु त्‍वचा रोग) में वर्गीकृत किया गया है जिसमें तीनों दोष शामिल होते हैं। और आयुर्वेद में सोरयासिस के दो प्रकार बताये गए हैं - किटिभ और एककुष्‍ठ।

सोरायसिस के दोनों प्रकार को ठीक करने में गुडूची (गिलोय) असरकारी है। आयुर्वेद में सोरायसिस के इलाज के लिए दो औषधियां आरोग्‍यवर्धिनी वटी और खदिरारिष्ट लाभकारी होती हैं। सोरायसिस को जल्‍दी ठीक करने के लिए जीवनशैली से संबंधित कुछ बदलाव करने होते हैं जिसमें दोष को संतुलित करने के लिए आहार में उचित बदलाव, अनुचित खाद्य पदार्थों को एक साथ न खाना (जैसे मछली के साथ दूध), प्राकृतिक इच्‍छाओं को दबाना और बहुत ज्‍यादा व्‍यायाम न करना एवं तनाव से दूर रहना शामिल है।

(और पढ़ें -तनाव दूर करने के घरेलू उपाय)

  1. आयुर्वेद के अनुसार सोरायसिस होने पर क्या करें और क्या न करें - Ayurved ke anusar Psoriasis me kya kare kya na kare
  2. सोरायसिस के लिए आयुर्वेदिक दवा कितनी लाभदायक है - Psoriasis ka ayurvedic upchar kitna labhkari hai
  3. आयुर्वेद के दृष्टिकोण से सोरायसिस - Ayurveda ke anusar Psoriasis
  4. सोरायसिस का आयुर्वेदिक इलाज - Psoriasis ka ayurvedic ilaj
  5. सोरायसिस की आयुर्वेदिक दवा, जड़ी बूटी और औषधि - Psoriasis ki ayurvedic dawa aur aushadhi
  6. सोरायसिस की आयुर्वेदिक औषधि के नुकसान - Psoriasis ki ayurvedic dawa ke side effects
  7. सोरायसिस की आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट से जुड़े अन्य सुझाव - Psoriasis ke ayurvedic ilaj se jude anya sujhav
  8. सोरायसिस की आयुर्वेदिक दवा और इलाज के डॉक्टर

क्‍या करें

क्‍या न करें

  • खानपान से संबंधित गलत आदतों से दूर रहें।
  • अनाज की नई कटी हुई फसल को न खाएं।
  • अनाज, गुड़ और मूली न खाएं।
  • अनुचित खाद्य पदार्थ जैसे कि मछली के साथ दूध या दूध से बना कोई अन्‍य खाद्य पदार्थ खाने से बचें।
  • ज्‍यादा कड़ा व्‍यायाम न करें और तनाव लेने से बचें। (और पढ़ें - तनाव के लिए योग)
  • प्राकृतिक इच्‍छाओं जैसे कि मल निष्‍कासन और पेशाब आदि न रोकें।
  • शरीर की नाडियों में रुकावट, जलन पैदा करने वाले और भारी खाद्य पदार्थ न खाएं। इसमें तिल, खट्टी चीजें और दूध शामिल है।
  • अधिक मात्रा में नमकीन चीज़ें खाने से बचें।
  • अपने भोजन में मछली, दही और नमक न लें। 

एक अध्‍ययन के निष्‍कर्ष के अनुसार शरीर में से अमा को बाहर निकालने वाली पंचकर्म थेरेपी के वमन और विरेचन कर्म, दोनों ही सोरायसिस के इलाज में प्रभावी होते हैं।

अध्‍ययन में यह बात सामने आई है कि कैशोर गुग्‍गल, खदिरारिष्‍ट, आरोग्‍यवर्धिनी वटी और मंजिष्‍ठादि क्‍वाथ त्‍वचा रोगों जैसे कि एरिथ्रोडर्मा (इसमें त्‍वचा सांप की केंचुली की तरह बाहर निकलने लगती है) और सोरायसिस को नियंत्रित एवं उसे ठीक करने में प्रभावकारी है। 

(और पढ़ें - सोरायसिस के घरेलू उपाय)

आयुर्वेद के अनुसार सोरायसिस के निम्‍न दो प्रकार हैं:

  1. किटिभ: कफ और पित्त दोष के खराब होने के कारण हुए सोरायसिस को किटिभ कहा जाता है। (और पढ़ें - वात, पित्त और कफ में असंतुलन के लक्षण)
  2. एककुष्‍ठ: कफ और वात दोष के खराब होने के कारण हुए सोरायसिस को एककुष्‍ठ कहा जाता है।

किटिभ के लक्षणों में त्‍वचा पर काले या लाल रंग के खुजलीदार चकत्ते शामिल हैं। ये चकत्ते पतले या रूखे होने लगते हैं और कभी-कभी इनमें से रिसाव भी होता है। त्‍वचा पर ये चकत्ते बार-बार बनने लगते हैं। उल्‍टी को रोकने, खराब या अधिक मात्रा में भोजन करने और अनुचित खाद्य पदार्थों (जैसे दूध और मछली) को खाना किटिभ के कुछ कारणों में शामिल हैं।

(और पढ़ें - स्वस्थ जीवन के लिए लाभदायक भोजन के बारे में जानें)

एककुष्‍ठ में त्‍वचा पर मछली जैसे सिल्‍वर रंग की धारियां पड़ने लगती हैं। तनाव से होने वाला बुखार और खानपान की गलत आदतों की वजह से एककुष्‍ठ हो सकता है। 

(और पढ़ें - बुखार का आयुर्वेदिक इलाज)

सोरायसिस के लिए आयुर्वेदिक उपचार

  • निदान परिवार्जन 
    निदान परिवार्जन में रोग के कारण को दूर किया जाता है। किसी भी रोग के प्रथम उपचार के रूप में ये चिकित्सा दी जाती है। निदान परिवार्जन के दो फायदे हैं – इससे रोग कभी दोबारा नहीं होता है और रोग को बढ़ने से भी रोक दिया जाता है। रोग के कारण के आधार पर इस प्रक्रिया में अल्‍फासन (सीमित मात्रा में खाना) की विभिन्‍न प्रक्रियाएं, अन्‍नशन (व्रत) और प्रमिताशन (नपा तुला भोजन करना), लंघन (व्रत) एवं रुक्ष अन्‍नपान सेवन (शुष्‍क खाद्य पदार्थ) का प्रयोग किया जाता है।

किटिभ के लिए आयुर्वेदिक उपचार

  • स्‍नेहन (तेल लगाने की विधि) 
    स्‍नेहन प्रक्रिया में तेल का इस्‍तेमाल किया जाता है। इसमें शरीर को मुलायम बनाने, नमी और पसीना लाने के लिए पूरे शरीर पर तेल लगाया जाता है। लगभग तीन से सात दिनों के लिए स्‍नेहन चिकित्‍सा दी जाती है। स्‍नेहन कर्म में कोमल और सख्‍त दोनों प्रकार की मालिश की जाती है। आमतौर पर इसमें गर्म तेल का इस्‍तेमाल किया जाता है।
    तेल से शरीर की मालिश करने के अलावा स्‍नेहपान (तेल या घी पीना) की भी सलाह दी जाती है। किटिभ के इलाज के लिए स्‍नेहन कर्म में करंज और तुवर्क के तेल के प्रयोग की सलाह दी जाती है।
     
  • शोधन चिकित्‍सा (शुद्धिकरण कर्म)  
    एककुष्‍ठ के लिए शोधन चिकित्‍सा में वमन (औषधियों से उल्‍टी), विरेचन (दस्‍त) और रक्‍तमोक्षण (खून निकालने की विधि) किया जाता है।
    • वमन 
      औषधियों से उल्‍टी करवाने की विधि को वमन कर्म कहा जाता है। ये पंचकर्म थेरेपी में से एक है एवं पेट को साफ और नाडियों तथा छाती से बलगम और अमा (विषाक्‍त पदार्थों) को साफ करने के लिए वमन किया जाता है। बुखार, पल्‍मोनरी टीबी और दस्‍त के इलाज में वमन कर्म बहुत उपयोगी है। इसके अलावा ये शुद्धिकरण चिकित्‍सा त्‍वचा रोगों जैसे कि एक्जिमा, सफेद दाग और सोरायसिस के इलाज में भी इस्‍तेमाल की जाती है। ये तेज बुखार, नाक बहने और कफ के खराब होने के कारण हुए बुखार के इलाज में मदद करती है।बवासीर, सीने में दर्द, थकान और मजबूत पाचन अग्नि वाले व्‍यक्‍ति को वमन कर्म की सलाह नहीं दी जाती है। नेत्रहीन, कमजोर और पेट फूलने की समस्‍या से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति को वमन चिकित्‍सा नहीं लेनी चाहिए। वमन में दो प्रकार की जड़ी बूटियों का प्रयोग किया जाता है:
    • विरेचन
      • विरेचन की प्रक्रिया में शरीर को साफ किया जाता है और इसका प्रभाव बहुत जल्‍दी दिखाई देता है। इस प्रक्रिया में शरीर से अतिरिक्‍त पित्त को साफ किया जाता है।
      • विरेचन कर्म कई प्रकार के त्‍वचा रोगों जैसे कि त्‍वचा पर चकत्ते, चेचक और चेहरे का रंग फीका पड़ने के इलाज में मदद करता है। ये अंधापन, विष, आंतों में दर्द और उल्टी से भी राहत दिलाता है। (और पढ़ें - चेचक में क्या करना चाहिए)
      • इसमें कड़वे रेचक जैसे कि एलोवेरा, सेन्‍ना और रूबर्ब का इस्‍तेमाल विरेचन प्रक्रिया में रेचन (जुलाब) के लिए किया जाता है। शहद, उबले हुए दूध और घी का इस्‍तेमाल हल्‍के विरेचन के लिए किया जाता है।
      • खराब पाचन, अल्‍सर, दस्‍त और हाल ही में बुखार से ठीक हुए मरीज़ को विरेचन कर्म की सलाह नहीं दी जाती है। (और पढ़ें - पाचन क्रिया कैसे सुधारे)
         
    • रक्‍त मोक्षण
  • शमन चिकित्‍सा 
    एककुष्‍ठ के लिए शमन चिकित्‍सा में पाचन (पाचन शक्‍ति में सुधार), रक्‍तशोधन (खून को साफ करना) और त्वचा पर औषधियां लगाई जाती हैं। (और पढ़ें - खून साफ करने के घरेलू उपाय)
    • पाचन
      पाचन की प्रक्रिया में व्‍यक्‍ति की पाचन शक्‍ति में सुधार के लिए पाचक दिए जाते हैं। इससे उसकी आंतों और पेट की सेहत में भी सुधार आता है। जीरा, हल्‍दी, धनिया और सेंधा नमक का इस्‍तेमाल पाचन कर्म में पाचक के रूप में किया जाता है।
       
    • रक्‍त शोधन 
      शोधन चिकित्‍सा में शरीर को पूरी तरह से साफ किया जाता है और खराब हुए दोष में संतुलन लाया जाता है। रक्‍तशोधन प्रक्रिया का इस्‍तेमाल शरीर में खून को साफ करने के लिए किया जाता है। इस चिकित्‍सा का प्रयोग किसी रोग के प्रमुख इलाज या पूर्व उपचार प्रक्रिया के रूप में किया जाता है। गंभीर रूप से बीमार व्‍यक्‍ति को शोधन चिकित्‍सा नहीं दी जाती है। इसके अलावा जो व्‍यक्‍ति रेचक या चिकित्‍सीय उल्‍टी को सहन नहीं कर सकता है उसे भी रक्‍तशोधन नहीं दिया जाता है। रक्‍तशोधन में बस्‍ती (एनिमा), विरेचन और स्‍नेहन जैसी कुछ चिकित्‍साएं दी जाती हैं। कैंसर और लिवर एवं मूत्र प्रणाली से संबंधित रोगों के इलाज में ये चिकित्‍सा सफल रही है। 
       
    • औषधि लगाना 
      सोरायसिस के इलाज के लिए आयुर्वेदिक चिकित्‍सक तेल (औषधीय या शुद्ध तेल), लेप (जड़ी बूटियों से तैयार पेस्‍ट) और धारा चिकित्‍सा (औषधीय तरल या तेल को शरीर पर डालने की विधि) की सलाह देते हैं। इस चिकित्‍सा में त्‍वचा को नमीयुक्‍त और मुलायम बनाया जाता है। इस प्रकार सोरायसिस में परतदार त्‍वचा से छुटकारा मिलता है। (और पढ़ें - त्वचा को मुलायम बनाने के तरीके)

सोरायसिस के लिए आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां

किटिभ के इलाज में निम्‍न जड़ी बूटियों का इस्‍तेमाल किया जाता है:

  • गुडूची
    • गुडुची को रोग प्रतिरोधक शक्ति में सुधार लाने के लिए जाना जाता है। ये तीनों दोषों को ठीक करने की क्षमता रखती है। (और पढ़ें - रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले खाद्य पदार्थ)
    • इसमें रक्‍तशोधक (खून को साफ करने वाले) तत्‍व होते हैं जो कि परिसंचरण और पाचन तंत्र पर कार्य करते हैं एवं विभिन्‍न त्‍वचा रोगों को ठीक करने में मदद करते हैं।
    • गुडुची अर्क और पाउडर के रूप में उपलब्‍ध है। इस जड़ी बूटी का पाउडर दो सप्‍ताह तक दिन में दो बार या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं।
    • गुनगुने पानी या शहद के साथ खाने के बाद गुडुची चूर्ण लेना चाहिए। गुडुची किटिभ के साथ-साथ एककुष्‍ठ के इलाज में भी उपयोगी है।

एककुष्ठ के इलाज में निम्‍न जड़ी बूटियों का इस्‍तेमाल किया जाता है:

  • सरिवा (श्‍यामलता)
    • आयुर्वेद में इसे मूत्रवर्द्धक, पसीना लाने और शक्‍तिवर्द्धक के रूप में जाना जाता है। ये शरीर के तंत्रिका और परिसंचरण प्रणाली पर कार्य करती है।
    • इस पौधे की जड़ और डंठल का इस्‍तेमाल सिफलिस, हाथी पांव और त्‍वचा रोगों के इलाज में काढ़े के रूप में किया जाता है।
    • सरिवा को दो से तीन सप्‍ताह तक दिन में तीन बार खाने के बाद चूर्ण के रूप में या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं। गुनगुने पानी या शहद के साथ सरिवा चूर्ण लेना चाहिए।
       
  • हरिद्रा (हल्‍दी)
    • हरिद्रा में जीवाणुरोधी, उत्तेजक और सुगंधक गुण मौजूद होते हैं। ये प्रमुख तौर पर पाचन, श्‍वसन और मूत्र प्रणाली पर कार्य करती है। हरिद्रा कई रोगों जैसे कि पीलिया, डायबिटीज, एडिमा, एनीमिया और त्‍वचा विकारों के इलाज में उपयोगी है।
    • ये प्राकृतिक जीवाणुनाशक है इसलिए घाव और चोट के इलाज में हरिद्रा मदद करती है। हरिद्रा को अर्क, दूध के काढ़े के रूप में इस्‍तेमाल या पेस्‍ट के तौर पर त्‍वचा पर लगाया जाता है।
    • हल्‍दी को दो से तीन सप्‍ताह तक दिन में तीन बार खाने के बाद चूर्ण के रूप में या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं। गुनगुने पानी या शहद के साथ हरिद्रा चूर्ण लेना चाहिए।
       
  • मंजिष्‍ठा
    • आयुर्वेद में मंजिष्‍ठा को रक्‍तशोधक (खून साफ करने वाली) जड़ी बूटी के रूप में जाना जाता है। ये रक्‍त प्रवाह में सुधार, एमेनोरिया के इलाज, ब्‍लीडिंग को रोकने और विभिन्‍न अंगों जैसे कि किडनी और लिवर के कार्य को नियंत्रित करने में मदद करती है। (और पढ़ें - खून को साफ करने वाले आहार)
    • ये कई रोगों के इलाज और त्‍वचा की रंगत को निखारने में मदद करती है। चोट और घाव के निशान से जल्‍दी छुटकारा पाने में भी मंजिष्‍ठा मदद करती है। (और पढ़ें - त्वचा की रंगत निखारने के उपाय)
    • मंजिष्‍ठा का काढ़ा पी सकते हैं या फिर इसे पेस्‍ट के रूप में त्‍वचा पर लगा भी सकते हैं।
    • मंजिष्‍ठा चूर्ण को दो से तीन सप्‍ताह तक दिन में तीन बार खाने के बाद चूर्ण के रूप में या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं। गुनगुने पानी या शहद के साथ चूर्ण लेना चाहिए।

सोरायसिस के लिए आयुर्वेदिक औषधियां

सोरायसिस के इलाज के लिए निम्‍न औषधियों का इस्‍तेमाल किया जाता है:

  • आरोग्‍यवर्धिनी वटी
    • ये शरीर की संपूर्ण सेहत में सुधार लाने में मदद करती है। त्रिदोष को संतुलित करने के लिए आरोग्‍यवर्धिनी वटी लेने की सलाह दी जाती है।
    • आरोग्‍यवर्धिनी वटी में लौह भस्‍म (लोह से बनी राख), शुद्ध पारद (शुद्ध पारद), त्रिफला (आमलकी, विभीतकी और हरीतकी का मिश्रण), गुग्गुल गोंद, ताम्र भस्‍म (तांबे से बनी राख), शिलाजीत और अन्‍य जड़ी बूटियां मौजूद हैं।
    • आयुर्वेद में इस औषधि का इस्‍तेमाल सभी प्रकार के त्‍वचा रोगों के इलाज में किया जाता है। ये भूख को बढ़ाती है और पाचन में सुधार कर अनियमित मल निष्‍कासन की समस्‍या से छुटकारा दिलाती है। (और पढ़ें - भूख बढ़ाने का उपाय)
       
  • खदिरारिष्ट
    • इस औषधि में कृमिघ्‍न (कीड़ों का नाश करने वाले) गुण होते हैं। ये प्रमुख तौर पर रक्‍त और आंतों के कार्य पर असर करती है।
    • खदिरारिष्‍ट आंतों में बने घाव को ठीक करने में मदद करती है एवं ये माइक्रोबियल रोधी प्रभाव देती है, विशेषत: त्‍वचा रोग पैदा करने वाले सूक्ष्‍म जीवों पर खदिरारिष्‍ट ज्‍यादा असरकारी है।
    • ये कई प्रकार के त्‍वचा रोगों के इलाज में असरकारी है जिसमें किटिभ भी शामिल है। ये शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर धातुओं में संतुलन लाने में मदद करती है।
    • आंतों और दिल में मौजूद अमा (विषाक्‍त पदार्थ) को बाहर निकालने में खदिरारिष्‍ट मदद करती है।

एककुष्‍ठ के इलाज में निन्‍म औषधियों का प्रयोग किया जाता है:

  • मंजिष्‍ठादि क्‍वाथ
    • मंजिष्‍ठा की जड़ का इस्‍तेमाल त्‍वचा विकारों में किया जाता है। ये सोरायसिस, अनेक फंगल संक्रमण और खुजली में उपयोगी पाई गई है। (और पढ़ें - फंगल इन्फेक्शन में क्या खाएं)
    • रोग के इलाज के लिए इसका इस्‍तेमाल क्‍वाथ (काढ़े) या पुल्टिस के रूप में किया जा सकता है। क्‍वाथ संकुचन लाता है और शरीर के लिए रक्‍तशोधक एवं शक्‍तिवर्द्धक के रूप में कार्य करता है।
    • मंजिष्‍ठादि क्‍वाथ को दो से तीन सप्‍ताह तक दिन में दो बार खाने के बाद या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं।
       
  • कैशोर गुग्‍गुल
    • कैशोर गुग्‍गुल त्‍वचा रोगों के इलाज और घावों को भरने में उपयोगी है। एडिमा और एक्‍ने के निशान को भी इससे दूर किया जा सकता है। (और पढ़ें - एक्ने क्या है)
    • यह मुख्य रूप से शरीर में पित्त संबंधी बदलावों को रोक कर काम करती है। वटी (गोली) के रूप में उपलब्‍ध इस मिश्रण को दो से तीन सप्‍ताह तक दिन में दो बार भोजन से पहले गुनगुने पानी या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं। 

व्यक्ति की प्रकृति और कई कारणों के आधार पर चिकित्सा पद्धति निर्धारित की जाती है इसलिए उचित औषधि और रोग के निदान हेतु आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श करें।

  • हेपेटाइटिस या पीलिया और अत्‍यधिक पित्त से ग्रस्‍त गर्भवती महिलाओं को हरीद्रा का इस्‍तेमाल करने से बचना चाहिए।
  • अगर किसी व्‍यक्‍ति को बहुत ज्‍यादा ठंड लगती है तो उसे मंजिष्‍ठा का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्‍योंकि इस पौधे से शरीर में वात दोष बढ़ सकता है।
  • आरोग्‍यवर्धिनी वटी में पारे जैसे भारी धातु होती हैं इसलिए इसकी अधिक खुराक लेना जहरीला हो सकता है। बच्‍चों, स्तनपान कराने वाली और गर्भवती महिलाओं को इस मिश्रण का प्रयोग बिलकुल भी नहीं करना चाहिए। (और पढ़ें - स्तनपान से जुड़ी समस्याएं)

आयुर्वेद के अनुसार सोरायसिस दो प्रकार का होता है – एक किटिभ और दूसरा एककुष्‍ठ। आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां और औषधियां दोनों प्रकार के सोरायसिस के इलाज में उपयोगी होती हैं एवं इनका कोई हानिकारक प्रभाव भी नहीं होता है तथा ये सोरायसिस के लक्षणों से राहत दिलाने में भी प्रभावकारी हैं। खानपान से संबंधित उचित आदतों के साथ-साथ बेहतर जीवनशैली से सोरायसिस को ठीक करने में मदद मिल सकती है। 

(और पढ़ें - त्वचा की देखभाल कैसे करें)

Dr. Ajai Singh Chauhan

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आयुर्वेदा

Dr. Jyoti Kumbar

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Dr. Bibin M. V.

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References

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