हेल्थ इन्शुरन्स लेने के बाद चिंतामुक्त हो जाना शायद यह अच्छे या जागरुक ग्राहक की निशानी नहीं है, आपको हेल्थ इन्शुरन्स पॉलिसी को अच्छे से पढ़ने, उसके नियम व शर्तों को समझने की भी जरूरत है। पूरी जानकारी होने के बाद ही आप जान पाएंगे कि क्लेम सेटलमेंट के लिए पॉलिसीधारक की कुछ जिम्मेदारियां भी होती हैं, जिनको निभाने से आपकी कंपनी का काम आसान होगा व साथ ही आपकी भी मुसीबत के समय मदद हो पाएगी। ऐसे में आज इस आर्टिकल में हम ग्राहकों की तरफ से कुछ बेसिक जिम्मेदारियों और हेल्थ इंश्योरेंस में क्लेम के तरीके बारे में बात करेंगे।

(और पढ़ें - सबसे अच्छा हेल्थ इन्शुरन्स कौन सा है)

  1. क्लेम सेटलमेंट क्या होता है? - What is claim settlement in Hindi
  2. पॉलिसी खरीदने से पहले - Before buying a policy in Hindi
  3. पॉलिसी खरीदते समय ध्यान रखने योग्य बातें - What should you consider before buying an insurance policy in Hindi
  4. पॉलिसी खरीदने के बाद क्या करें - After buying the policy in Hindi
  5. कैसे करें हेल्थ इन्शुरन्स में क्लेम सेटलमेंट? - How to make claim settlement in health insurance in Hindi
  6. ऑफलाइन क्लेम - Offline Claim in Health Insurance in Hindi
  7. हेल्थ इन्श्योरेंस क्लेम के लिए दस्तावेज क्या होने चाहिए - Documents Required while Claiming Health Insurance in Hindi

क्लेम यानी दावा करना होता है। आपने यदि किसी भी प्रकार का बीमा (फैमिली फ्लोटर, व्यक्तिगत स्वास्थ बीमा, पर्सनल एक्सीडेंट इन्शुरन्स इत्यादि) लिया है, तो यही सोचकर लिया होगा कि यदि भविष्य में आपके या परिवार के किसी सदस्य के साथ कोई अनहोनी होती है, तो उस स्थिति में दावा करके बीमा कंपनी से मदद ली जा सके। जब आपको बीमा कंपनी की तरफ से पैसा मिल जाता है तो, उसे क्लेम सेटलमेंट कहते हैं, जबकि अनहोनी/ मेडिकल कंडीशन / इमर्जेंसी के बारे में अपनी बीमा कंपनी को जानकारी देने को क्लेम करना कहते हैं।

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पॉलिसी खरीदने से पहले निम्न बातों का रखें ध्यान

जानें क्लेम रेशियो के बारे में

यदि आप हेल्थ इन्शुरन्स कंपनी से पॉलिसी लेने जा रहे हैं तो एक जागरुक ग्राहक के तौर पर आपको क्लेम रेशियो के बारे में जरूर पता करना चाहिए। रेशियो कम होने का मतलब उस बीमा कंपनी ने कम क्लेम सेटलमेंट किए हैं, जबकि रेशियो ज्यादा होने का मतलब कंपनी ने सेटलमेंट ज्यादा किए हैं। यदि रेशियो ज्यादा है तो यह एक ग्राहक के तौर पर बड़ी अच्छी खबर है, क्योंकि इसका एक और मतलब यह है कि कंपनी के नियम व शर्तों में ज्यादा झंझट नहीं है, तभी ज्यादा संख्या में क्लेम सेटलमेट किए गए हैं।

अब इसे आसान उदाहरण से समझिए - मान लीजिए एक हेल्थ इन्शुरन्स कंपनी के पास 1000 मेडिक्लेम आए हैं और उस कंपनी ने 950 क्लेम का सेटलमेंट कर दिया है, तो ऐसे में कंपनी का क्लेम सेटलमेंट रेशियो 95 फीसदी होगा, जबकि क्लेम को रद्द करने का रेशियो रेट मात्र 5 फीसदी होगा। myUpchar बीमा प्लस के तहत केयर इन्शुरन्स में 95 फीसद से ज्यादा क्लेम रेशियो है और इस मामले में यह दूसरे नंबर पर है।

अब रही बात कि यह क्लेम रेशियो जारी कौन करता है, तो बता दें, बीमा नियामक हर साल क्लेम सेटलमेंट रेशियो से जुड़ा डेटा जारी करती है, ताकि सही ग्राहक के तौर पर आप यह समझ पाएं, कि आपको कौन सी इन्शुरन्स कंपनी से बीमा कराना चाहिए।

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कैशलेस सुविधा के बारे में भी जानकारी जुटाएं

वास्तव में जितनी सुविधाएं मिल जाएं उतनी कम हैं, लेकिन आपकी पॉलिसी में कैशलेस सुविधा है या नहीं, इस बारे में जानना बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह इकलौती ऐसी सुविधा है, जिसके तहत आपको अस्पताल का बिल नहीं चुकाना होता है। बस कुछ आसान सी फॉर्मलिटीज पूरी करनी होती हैं, जिसके बाद बीमा कंपनी उस हॉस्पिटल के साथ मिलकर क्लेम सेटलमेंट कर लेती है। चूंकि, मेडिकल इमर्जेंसी के दौरान ज्यादातर मामलों में अचानक से पैसों की व्य​वस्था नहीं हो पाती है, ऐसे में यह इस सुविधा का होना बेहद जरूरी है। दूसरा, आपको यह भी ध्यान देना होगा कि इस सुविधा का लाभ आप केवल नेटवर्क हॉस्पिटल में ही उठा सकते हैं। इसलिए यह एक ग्राहक की जिम्मेदारी है कि वह पॉलिसी का चुनाव करते समय कैशलेस सुविधा को प्राथमिकता दे।

(और पढ़ें - कैशलेस हेल्थ इन्शुरन्स क्या है)

पॉलिसी खरीदते समय निम्न बातों का रखें ध्यान -

मेडिकल हिस्ट्री भूलकर भी न छुपाएं

बीमा लेने वाले उम्मीदवारों को इस बारे में सावधानी बरतनी चाहिए कि बीमा लेते समय मेडिकल हिस्ट्री (पिछली बीमारियों व उनके इलाज से जुड़ी जानकारी) को न छिपाएं। लोग अक्सर ऐसी गलती करते हैं और फिर जरूरत के समय जब क्लेम नहीं मिलता तो इन्शुरन्स कंपनी और एजेंट को बुरा-भला कहते हैं। हमारी आपको सलाह है कि हेल्थ इन्शुरन्स पॉलिसी लेते समय अपनी मेडिकल हिस्ट्री के बारे में इन्शुरन्स कंपनी को सब सच-सच बता दें। इसके बाद हो सकता है, कंपनी आपसे कुछ अतिरिक्त प्रीमियम लेकर आपको पॉलिसी जारी कर दे, या बिना अतिरिक्त प्रीमियम के भी ऐसा कर सकती है। यह भी हो सकता है कि कंपनी आपको पॉलिसी न दे या किसी खास बीमारी को कवर ही न करे। 

सही से भरें प्रपोजल फॉर्म

प्रपोजल फॉर्म भरते समय एक पॉलिसीधारक की जिम्मदारी है कि वह 

  • खुद फॉर्म भरें
  • जल्दबाजी में फॉर्म न भरें
  • सारे प्वॉइंट्स पढ़ें व समझें
  • उसमें कोई भी अधूरी या गलत जानकारी न दें
  • कोई कॉलम खाली न छोड़ें
  • खाली प्रपोजल फॉर्म पर हस्ताक्षर न करें, क्योंकि इस दस्तावेज में किसी भी जानकारी के लिए आप जिम्मेदार होंगे।
  • आवश्यकताओं के अनुसार पॉलिसी की अवधि का चयन करें।
  • प्रीमियम की राशि ऐसी चुनें, जिसका भुगतान आसानी से कर सकते हैं।
  • प्रीमियम भुगतान फ्रीक्वेंसी चुनें जैसे वार्षिक, अर्ध-वार्षिक, त्रैमासिक या मासिक
  • अपनी सुविधा के अनुसार भुगतान का विकल्प चुनें
  • अपनी पॉलिसी के तहत नॉमिनी चुनें। नॉमिनी का नाम सही से भरें।

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पॉलिसी खरीदने के बाद निम्न बातों का रखें ध्यान -

पॉलिसी को क्रॉस चेक करें

एक बार जब बीमा कंपनी द्वारा प्रपोजल स्वीकार कर लिया जाता है, तो पॉलिसी बॉन्ड उचित समय के भीतर आप तक पहुंच जाना चाहिए, यदि ऐसा नहीं होता है तो यह आपकी जिम्मेदारी है कि इस बारे में बीमा कंपनी से संपर्क करें।

  • जब पॉलिसी बॉन्ड मिल जाता है, तो इसकी जांच करें और सुनिश्चित करें कि पॉलिसी वही है जो आप चाहते थे।
  • यदि आपको पॉलिसी बॉन्ड में किसी तरह का संदेह है, तो स्पष्टीकरण के लिए तुरंत मध्यस्थ/बीमा कंपनी के अधिकारी से संपर्क करें।
  • यदि आवश्यक हो तो सीधे बीमा कंपनी से संपर्क करें।

(और पढ़ें - हेल्थ इन्शुरन्स में क्या-क्या कवर होता है)

नेटवर्क हॉस्पिटल के बारे में पता करें

एक पॉलिसीधारक की जिम्मेदारी होती है कि वह पॉलिसी लेने के बाद सबसे पहले नेटवर्क हॉस्पिटल की सूची देखकर यह जानकारी रखे कि उसके आसपास का कौन सा अस्पताल बीमा कंपनी के साथ सूचीबद्ध यानी लिंक है। ताकि इमर्जेंसी पड़ने पर यदि संभव हो तो उसी अस्पताल में जाया जा सके। इसके अलावा यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि आप जिस अस्पताल में जाना चाहते हैं, क्या वहां उस बीमारी का इलाज होता भी है या नहीं। myUpchar बीमा प्लस के तहत आपको 8300 से भी ज्यादा नेटवर्क अस्पतालों में कैशलेस क्लेम की सुविधा मिलती है।

एक्सक्लुजन लिस्ट के बारे में रहें सावधान

एक्सक्लुजन ऐसे मामले होते हैं, जिनके लिए बीमा कंपनी कवरेज नहीं देती है। इसलिए ग्राहकों की यह जिम्मेदारी है कि वह एक्सक्लुजन लिस्ट जरूरी चेक करें, ताकि उन्हें जानकारी रहे कि वे किस प्रकार की बीमारी/ मेडिकल कंडीशन या ट्रीटमेंट के लिए क्लेम नहीं कर सकते हैं।

संभालकर रखें डॉक्यूमेंट

क्लेम जैसे महत्वपूर्ण मामलों में आपको डॉक्यूमेंट्स को लेकर सावधान रहने की जरूरत है। यह बीमा कराने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह बीमा से संबंधित सभी दस्तावेजों को संभालकर रखें, क्योंकि क्लेम करते समय जिन मामलों में जरूरी कागजात नहीं होते हैं, उनमें क्लेम को रद्द कर दिया जाता है। आमतौर पर इन कागजातों में सर्जरी व दवाइयों से जुड़े बिल, अस्पताल में भर्ती व डिस्चार्ज के पेपर, पूर्व-प्राधिकरण फॉर्म (preauthorization form), और पॉलिसी कार्ड शामिल हैं।

आप चाहें तो जैसे आमतौर पर घरों में दवाइयों के लिए अलग से मेडिकल बॉक्स होता है, वैसे ही इमर्जेंसी दस्तावेजों को भी शुरू से एक जगह रख सकते हैं और इसके बारे में कम से कम एक सदस्य को जरूर बताएं।

जरूरी है समय पर क्लेम करना

क्लेम करना और समय पर क्लेम करना, दोनों में अंतर है। पॉलिसी बॉन्ड में इस बारे में जानकारी दी होती है कि आपको कब क्लेम करना चाहिए। आमतौर पर जब आप प्लान करके नेटवर्क अस्पताल में भर्ती होने की सोचते हैं, तो अपने टीपीए को दो दिन पहले, जबकि अचानक से भर्ती होने के ​मामले में आपको 24 घंटे के अंदर टीपीए को जानकारी देने की जरूरत होती है। क्योंकि देर से क्लेम करने से क्लेम रद्द होने का जोखिम बना रहता है।

(और पढ़ें - टॉप अप हेल्थ इन्शुरन्स क्या है?)

पॉलिसी रिन्यू करना न भूलें

एक जिम्मेदार बीमा पॉलिसीधारक होने के नाते आपको पॉलिसी रिन्यू का समय पता होना चाहिए। आमतौर यह समय एक वर्ष के लिए होता है, इसके बाद आपको रिन्यू कराने की जरूरत होती है। बता दें, लगभग सभी बीमा कंपनियां ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों मोड से पॉलिसी रिन्यू कराने की फैसिलिटी देती हैं। यदि आपने समय रहते रिन्यू नहीं कराया है और उस दौरान क्लेम करने की जरूरत पड़ती है, तो ऐसे में क्लेम खारिज किया जा सकता है।

यदि आपने हेल्थ इन्शुरन्स ले रखा है और कभी क्लेम करने की नौबत आती है, तो ऐसे में क्लेम करने के साथ-साथ क्लेम सेटलमेंट के बारे में भी जानकारी होनी चाहिए। चूंकि हम मुसीबत के समय में पैसों से जुड़े भुगतान को लेकर राहत पाने के लिए हेल्थ इन्शुरन्स कराते हैं, ऐसे में हमें पता होना चाहिए कि क्लेम सेटलमेंट कितने तरीकों से होता है और उनका तरीका क्या है -

कैशलेस क्लेम

यह अपने आप में एक टर्म है, एक सुविधा है, जिसमें अस्पताल में भुगतान करने के लिए पैसे मैनेज करने की जरूरत नहीं होती है। मान लीजिए ऐसा व्यक्ति जिसने हेल्थ इन्शुरन्स लिया है और उसमें कैशलेस सुविधा मौजूद है। यदि उसे किसी मेडिकल कंडीशन या बीमारी की वजह से नेटवर्क अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत पड़ती है तो, वह कैशलेस क्लेम कर सकता है।

यदि व्यक्ति प्लान करके नेटवर्क अस्पताल में इलाज के लिए जाता है, तो उसे पॉलिसी बॉन्ड में बताए गए समय को ध्यान में रखते हुए अपने टीपीए को जानकारी देनी चाहिए। जबकि इसके विपरीत यदि किसी व्यक्ति को इमर्जेंसी में इलाज की जरूरत है, तो उसे भर्ती होने के 24 घंटे के अंदर टीपीए को जानकारी देनी चाहिए। क्लेम के लिए आप अस्पताल में मौजूद बीमा डेस्क पर जाएं और वहां फार्म (preauthorization form) मांगें, उसे सही जानकारी के साथ भरें और फिर जमा कर दें, इस दौरान आपको पॉलिसी कार्ड भी दिखाना होगा। आप चाहें तो इस फॉर्म को बीमा कंपनी की वेबसाइट से डाउनलोड करके, उसका प्रिंटआउट निकालकर उसे भर सकते हैं। इसके बाद अस्पताल बीमा कंपनी को फैक्स के जरिये आपका आवेदन भेजेंगे, वहां आपके द्वारा भेजे गए फार्म की जांच की जाएगी और यदि फॉर्म सही से भरा गया है तो बीमा कंपनी अस्पताल को फैक्स करके यह जानकारी देगी कि उसने क्लेम को अप्रूव कर दिया है। इस पूरे प्रोसीजर में बीमित व्यक्ति को पैसा नहीं देना होगा। लेकिन यदि आपका क्लेम सम-इन्श्योर्ड राशि से ज्यादा का है, तो उस अतिरिक्त राशि का भुगतान आपको करना पड़ सकता है।

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रिइम्बर्समेंट (प्रतिपूर्ति)

यह भी क्लेम करने का एक तरीका है, जिसमें अस्पताल का पूरा बिल मरीज को या उसके परिवार को चुकाना होता है। हालांकि, इलाज के बाद हॉस्पिटल के डिस्चार्ज पेपर के साथ-साथ इलाज से संबंधित सभी पेपर को टीपीए दफ्तर में जमा करना होता है। इसके बाद वह बीमा कंपनी को सभी दस्तावेज भेजते हैं, जहां इनका सत्यापन यानी जांच की जाती है। पेपर चेक करने के बाद बीमा कंपनी हॉस्पिटल को कॉन्टैक्ट करती है और यदि सब कुछ नियम व शर्तों के तहत है, तो आपको अस्पताल का पूरा बिल या कुछ मामलों में बिल का कुछ प्रतिशत बीमित व्यक्ति को लौटा दिया जाता है। ध्यान रहे, रिइम्बर्समेंट के मामले में तुरंत पैसा नहीं मिलता, य​​ह कुछ दिनों के अंतर पर मिलता है। जबकि पोस्ट-हॉस्पिटलाइजेशन खर्चों के मामलों में उपचार के पूरा होने के कुछ दिनों बाद बीमा का पैसा खाते में ट्रांसफर होता है। आमतौर पर बीमा का पैसा 30 दिनों के आसपास ट्रांसफर होता है, लेकिन यह कंपनी पर निर्भर करता है।

हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम स्टेटस कैसे चेक करें?

क्लेम करने के बाद स्टेटस चेक करना भी पॉलिसीधारक या उसके नॉमिनी की जिम्मेदारी है। अपने स्वास्थ्य बीमा दावे की स्थिति ऑनलाइन जांचने के लिए, आपको निम्नलिखित स्टेप्स को फॉलो करना होगा:

  • बीमा कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं।
  • क्लेम पेज पर विजिट करें।
  • जरूरी जानकारी जैसे पॉलिसी नंबर, कस्टमर की आईडी, क्लेम नंबर आदि दर्ज करें और सबमिट करें।
  • इसके बाद आपको स्टेटस पता चल जाएगा।

ऑफलाइन क्लेम करने के लिए बीमित या नॉमिनी को बीमा कंपनी के दफ्तर (पास की शाखा में) जाने की जरूरत होती है। जिन हेल्थ इन्शुरन्स बीमा कंपिनयों में टीपीए (थर्ड पार्ट एडमिनिस्टर) होता है, उनमें आप दफ्तर जाने की बजाय टीपीए के पास जाकर भी क्लेम कर सकते हैं, लेकिन जिनमें टीपीए नहीं होता है उनमें सीधे बीमा कंपनी के दफ्तर से क्लेम होता है और यह सर्विस ज्यादा तेजी से क्लेम सेटलमेंट करती है, क्योंकि यहां आप सीधे दस्तावेज सबमिट करते हैं और यहीं उनका सत्यापन करके क्लेम को सेटलमेंट किया जाता है। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया में कुछ दिनों का समय लग सकता है, जिसका स्टेटस जानने के लिए दफ्तर जाने के साथ-साथ कस्टमर केयर से बात कर सकते हैं।

(और पढ़ें - बीमा प्लस में क्या-क्या कवर मिलता है)

आमतौर पर हेल्थ इन्श्योरेंस क्लेम के लिए निम्नलिखित दस्तावेजों की मांग की जाती है।

  • ओरिजनल इंवेस्टिगेशन रिपोर्ट
  • फार्मेसी बिल व साथ में प्रिस्क्रिपशन (डॉक्टर द्वारा दिया गया)
  • एफआईआर या पोस्टमार्टम रिपोर्ट (यदि ऐसा कुछ हुआ हो तो)
  • अस्पताल के बिल, रसीदें व डिस्चार्ज की रिपोर्ट
  • वैध फोटो आईडी प्रूफ
  • पॉलिसी या हेल्थकार्ड की फोटोकॉपी
  • इलाज करने वाले डॉक्टर की रिपोर्ट
  • डिस्चार्ज समरी (summary)
  • अच्छे से भरा हुआ क्लेम फॉर्म
  • डॉक्टर या सर्जन द्वारा लिखी हुई टेस्ट रिपोर्ट
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