25-हाइड्रोक्सी विटामिन डी (25-hydroxy vitamin D) टेस्ट, शरीर में विटामिन डी के स्तर पर नजर रखने का सबसे बेहतर तरीका माना जाता है। खून में '25-हाइड्रोक्सी' विटामिन डी की मात्रा का कम होना एक अच्छा संकेत होता है, जो आपके शरीर में विटामिन डी की मात्रा को बताता है। अगर आपके शरीर में विटामिन डी की मात्रा अत्याधिक कम या ज्यादा होती है तो इस टेस्ट की मदद से उसे तय कर लिया जाता है।

इस टेस्ट को 25-ओएच विटामिन डी (25-OH vitamin D) और कैलेसीडियल 25- हाइड्रोक्सीकोलेकैल्सीफोएरोल (Calcidiol 25-hydroxycholecalcifoerol) टेस्ट भी कहा जाता है। यह ऑस्टियोपोरोसिस (हड्डियों में कमजोरी) और रिकेट्स (हड्डियों में विकृति) की जाँच हेतु एक महत्वपूर्ण हो टेस्ट हो सकता है।

विटामिन डी, दो रूपों में मौजूद होता है, विटामिन डी3 (cholecalciferol) और विटामिन डी2 (ergocalciferol)। विटामिन डी3 को पशु उत्पादों का सेवन करके और त्वचा को धूप के संपर्क में लाकर प्राप्त किया जा सकता है, जबकि विटामिन डी2 को पेड़-पौधों से मिलने वाले खाद्य पदार्थों से छोटी मात्रा में प्राप्त किया जा सकता है। 

  1. विटामिन डी टेस्ट कब करवाना चाहिए? - When to get Vitamin D Test in Hindi
  2. विटामिन डी टेस्ट क्या होता है? - What is Vitamin D Test in Hindi?
  3. विटामिन डी टेस्ट क्यों किया जाता है - What is the purpose of Vitamin D Test in Hindi
  4. विटामिन डी टेस्ट से पहले - Before Vitamin D Test in Hindi
  5. विटामिन डी टेस्ट के दौरान - During Vitamin D Test in Hindi
  6. विटामिन डी टेस्ट के बाद - After Vitamin D Test in Hindi
  7. विटामिन डी टेस्ट के क्या जोखिम होते हैं - What are the risks of Vitamin D Test in Hindi
  8. विटामिन डी टेस्ट के परिणाम का क्या मतलब होता है - What do the results of Vitamin D Test mean in Hindi

विटामिन डी टेस्ट कब करवाना चाहिए?

डॉक्टर कई अलग-अलग वजहों से '25-हाइड्रोक्सी' विटामिन डी टेस्ट करवाने का अनुरोध कर सकते हैं। इस टेस्ट की मदद से इस बात का पता लगाया जा सकता है कि हड्डियों में कमजोरी व अन्य असामान्यताओं का कारण कहीं विटामिन डी के स्तर में कमी या अधिकता तो नहीं। इसका इस्तेमाल उन लोगों के स्वास्थ्य पर नजर रखने के लिए भी किया जाता है, जिनमें विटामिन डी की कमी होने के उच्च जोखिम हैं।

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जिन लोगों में विटामिन डी का स्तर कम होने का उच्च जोखिम होता है, उनमें निम्नलिखित शामिल हैं -

  • जो लोग सूरज के संपर्क में बहुत ही कम आते हैं।
  • वृद्ध लोग।
  • मोटापे से ग्रसित लोग।
  • शिशु जो केवल स्तनपान करते हैं।
  • जिन लोगों ने गैस्ट्रिक बाईपास सर्जरी करवाई हुई है।
  • कुछ ऐसी बीमारीयां जो आंतों को प्रभावित करती हैं और शरीर को पोषक तत्व अवशोषित करना मुश्किल बना देती है, जैसे क्रोहन रोग।

अगर डॉक्टरों नें विटामिन की कमी का पहले ही पता लगा लिया है, तो वे फिर भी विटामिन डी टेस्ट करवाने के लिए बोल सकते हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके की उपचार ठीक से काम कर रहा है या नहीं।

विटामिन डी टेस्ट क्या होता है?

विटामिन डी, शरीर में कैल्शियम और फॉस्फेट को नियंत्रित करने में मदद करता है। विटामिन डी शरीर को कैल्शियम अवशोषित करने में भी मदद करता है, जिससे जिंदगी भर हड्डियां मजबूत रहती हैं। शरीर द्वारा विटामिन डी को उपयोग करने से पहले, विटामिन डी शरीर की विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजरता है। इसका सबसे पहला परिवर्तन लिवर में होता है। यहां पर विटामिन डी को एक केमिकल में बदला जाता है, जिसे '25-हाइड्रोक्सी' विटामिन कहा जाता है। विटामिन डी टेस्ट द्वारा खून में इसी केमिकल की मात्रा को मापा जाता है।

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विटामिन डी टेस्ट क्यों किया जाता है?

'25-हाइड्रोक्सी' विटामिन डी टेस्ट यह जानने का सबसे सटीक तरीका है कि आपके शरीर में विटामिन डी की कितनी मात्रा है। टोटल 25-हाइड्रोक्सी विटामिन डी का स्तर, शरीर में विटामिन डी की पर्याप्त मात्रा का संकेत देता है। टेस्ट का रिजल्ट यह दिखाता है कि आप पर्याप्त मात्रा में विटामिन डी ले रहे हैं या नहीं। अगर आपको विटामिन डी के लिए सप्लिमेंट्स या धूप द्वारा विटामिन लेने की जरूरत है तो इसका भी टेस्ट की मदद से पता लगा लिया जाता है।

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विटामिन डी टेस्ट का उपयोग निम्नलिखित के लिए किया जाता है:

  • अगर विटामिन डी की मात्रा में अधिकता या कमी के कारण हड्डियों में कमजोरी, हड्डियों की विकृति, या कैल्शियम के असामान्य मेटाबॉलिज्म (असामान्य कैल्शियम, फास्फोरस, पीटीएच द्वारा रिफ्लेक्ट किया हुआ) आदि की समस्या है तो उसका पता लगाने के लिए इस टेस्ट का इस्तेमाल किया जाता है।
  • पैराथायराइड ग्रंथि (Parathyroid Gland) के कार्यों से संबंधित समस्याओं की जांच करना और उन पर नजर रखना, क्योंकि विटामिन डी के एक्टीवेशन के लिए पीटीएच (Parathyroid Hormone) जरूरी होता है। 
  • इस टेस्ट का इस्तेमाल उन लोगों पर नजर रखने के लिए भी किया जाता है, जिनमें विटामिन डी की कमी होने के काफी अधिक जोखिम हैं।
  • उन लोगों की स्वास्थ्य स्थिति पर नजर रखने के लिए जो वसा को अवशोषित करने से जुड़ी बीमारियों से ग्रसित हैं, जैसे सिस्टिक फाइब्रोसिस और क्रोहन रोग। क्योंकि, विटामिन डी, वसा के साथ घुलनशील विटामिन होता है और इसे वसा की तरह आंतों से अवशोषित किया जाता है।
  • जिन लोगों की गैस्ट्रिक बाईपास सर्जरी हुई है और वे पर्याप्त मात्रा में विटामिन डी को अवशोषित नहीं कर पा रहें, उनके स्वास्थ्य पर नजर रखने के लिए भी विटामिन डी टेस्ट किया जाता है।
  • जब डॉक्टर द्वारा विटामिन डी, कैल्शियम, फास्फोरस और मैग्निशियम सप्लिमेंट्स आदि लिखे जाते हैं, तो उनकी प्रभावशीलता पर नजर रखने के लिए भी विटामिन डी टेस्ट किया जा सकता है।

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विटामिन डी टेस्ट से पहले क्या किया जाता है?

आम तौर पर टेस्ट करवाने से पहले कुछ खाना-पीना छोड़ने के आवश्यकता नहीं होती। हालांकि, यह लेबोरेटरी और उसके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली टेस्ट की विधि पर निर्भर करता है। इसलिए अगर लेबोरेटरी के अनुसार कुछ दिशानुर्देश मिले हैं तो उनका पालन करना चाहिए। डॉक्टर आपको टेस्ट से 6 या 8 घंटे पहले कुछ खाने या पीने से मना कर सकते हैं।

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विटामिन डी टेस्ट के दौरान क्या किया जाता है?

इस टेस्ट के लिए मरीज की बाजू से नर्स या डॉक्टर द्वारा खून का सैंपल लिया जाता है।

इस टेस्ट की प्रक्रिया में सबसे पहले मरीज की बाजू के उपरी हिस्से पर बैंड या पट्टी लपेट कर बांध दी जाती है, जिसे नसों में खून का बहाव रुक जाता है और वे खून से भरकर स्पष्ट दिखने लग जाती है। उसके बाद जहां सुई लगानी होती है, वहां एंटीसेप्टिक द्वारा साफ किया जाता है और फिर नस में सुई लगा दी जाती है। सुई लगने और निकलने के दौरान आपको हल्की सी चुभन महसूस होगी। सुई से एक ट्यूब या शीशी जुड़ी होती है, जिसमें खून का सैंपल एकत्रित किया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया कुछ ही मिनट का समय लेती है। बच्चों और शिशुओं में खून के नमूने के लिए अक्सर उनकी उंगली पर ही हल्की सी सुई लगाकर खून का सैंपल ले लिया जाता है।

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विटामिन डी टेस्ट के बाद क्या किया जाता है?

खून का सैंपल निकाल लेने के बाद सुई निकाल ली जाती है और खून बहने से रोकने के लिए उस जगह पर रुई का टुकड़ा रख दिया जाता है या बैंडेेज लगा दी जाती है। खून निकलने के दौरान हल्की सी चुभन महसूस होती है और बाद में हल्का सा निशान या नीला भी पड़ सकता है।

विटामिन डी टेस्ट के क्या जोखिम हो सकते हैं?

टेस्ट हेतु खून निकालना थोड़ा दर्द दे सकता है। हालांकि, हर व्यक्ति की नसें व धमनियां आकार में दूसरे व्यक्ति से छोटी या बड़ी हो सकती हैं, यहां तक की एक हाथ की नसें दूसरे हाथ की नसों से आकार और बनावट में अलग हो सकती हैं। खून निकालना किसी एक व्यक्ति में दूसरे व्यक्ति के मुकाबले दर्दनाक व कठिन भी हो सकता है या कम दर्द वाला और आसान भी हो सकता है।

हालांकि, इसमें स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम कम ही होते हैं, यह काफी हद तक संभव है किसी व्यक्ति को नीचे दी गई जटिलाओं में से एक या अधिक महसूस हो सकती हैं -

  • अत्याधिक खून बहना,
  • बेहोशी या सिर घूमना,
  • हेमाटोमा (त्वचा के नीचे खून जमा होना)
  • संक्रमण (त्वचा में छेद होने के कारण संक्रमण का भी हल्का सा जोखिम बन जाता है।)

विटामिन डी टेस्ट के रिजल्ट का क्या मतलब होता है?

टेस्ट का रिजल्ट आपकी उम्र, लिंग और टेस्ट के लिए इस्तेमाल की गई टेस्ट विधियों पर निर्भर करता है। अलग-अलग लेबोरेटरी के रिजल्ट में भी थोड़ा बहुत अंतर मिल ही जाता है।

विटामिन डी के स्तर को 25-हाइड्रोक्सी स्तर द्वारा नैनोमोल्स/लीटर (nmol/L) या नैनोग्राम/मिली लीटर (ng/mL) के माप में मापा जाता है। जिसके परिणाम निम्नलिखित संकेत दे सकते हैं -

  • कमी: 30 नैनोमोल्स/लीटर से कम। (12 ng/mL)
  • संभावित कमी:  30 नैनोमोल्स/लीटर से 50 नैनोमोल्स/लीटर (20 ng/mL) के बीच।
  • सामान्य स्तर: 50 नैनोमोल्स/लीटर से 125 नैनोमोल्स/लीटर के बीच।
  • अधिकतम स्तर: 125 नैनोमोल्स/लीटर से अधिक।

अगर आपके शरीर में विटामिन डी का स्तर कम हो गया है और आपको हड्डियों में दर्द के लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो आपके डॉक्टर हड्डियों की सघनता (मजबूती) की जांच करने के लिए एक स्पेशल स्कैन कर सकते हैं। हड्डियों के स्वास्थ्य स्थिति को पता करने के लिए इसी दर्दरहित स्कैन का इस्तेमाल किया जाता है।

खून में 25-हाइड्रोक्सी विटामिन डी की कमी होने के निम्न कारण हो सकते हैं:

  • आप पर्याप्त और संतुलित भोजन नहीं खा रहे हैं (जिसमें विटामिन डी हो)।
  • आपकी आंतें विटामिन डी को पूरी तरह से अवशोषित नहीं कर पा रही हैं।
  • सूरज से विटामिन डी प्राप्त करने के लिए आप बाहर पर्याप्त समय नहीं बिता रहे हैं।
  • लिवर के रोग व किडनी के रोग,
  • कुछ प्रकार की दवाएं लेना, जिनमें फेनीटोइन, फीनोबार्बिटल और रिफम्पिं शामिल हैं।

कुछ प्रमाणों के मुताबिक विटामिन डी की कमी कुछ अन्य रोग जैसे कैंसर, प्रतिरक्षा प्रणाली रोग और ह्रदय संबंधी रोगों से भी जुड़ी हुई हो सकती है।

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विटामिन डी का उच्च स्तर आम तौर पर विटामिन की अधिक गोलियां लेने या अन्य सप्लिमेंट्स लेने के कारण होता है। विटामिन डी की उच्च खुराक 'हाइपर विटामिनोसिसडी' (Hypervitaminosis D) नामक स्थिति पैदा कर सकती है। हाइपर विटामिनोसिस काफी दुर्लभ स्थिति होती है, पर इसकी स्थिति गंभीर होने पर यह आपको लिवर व किडनी से संबंधित समस्याओं के जोखिम में डाल सकती है।

विटामिन डी के उच्च स्तर का कारण बहुत ही कम मामलों में खाए गए खाद्य पदार्थ या धूप से ली गई विटामिन डी हो पाता है।