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परिचय

“मनोवैज्ञानिक परीक्षण” (साइकोलॉजिकल टेस्टिंग) टेस्टों की एक ऐसी श्रंखला या सीरीज होती है जिसमें कई प्रकार के “मनोवैज्ञानिक टेस्ट” (साइकोलॉजिकल टेस्ट) किये जाते हैं। ये टेस्ट विशेष रूप से किसी व्यक्ति में उसके व्यवहार की जांच करते हैं, जिसे “सेंपल ऑफ बिहेवियर” कहा जाता है। जब किसी व्यक्ति को कोई काम दिया जाता है, तो उस काम पर व्यक्ति के प्रदर्शन को व्यवहार का सेंपल या उदाहरण कहा जाता है। व्यवहार के कुछ सेंपल ऐसे टेस्ट के द्वारा प्राप्त किये जाते हैं जिनमें मरीज को कुछ लखना-पढ़ना होता है। ये मनोवैज्ञानिक परीक्षण के सबसे आम टेस्टों में से हैं। टेस्टों में मरीज से पेंसिल और पेपर से काम करवाया जाता है, जिससे मनोवैज्ञानिक परीक्षण के परिणाम निकाले जाते हैं। 

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ऐसा माना जाता है कि अच्छी तरह से किया गया टेस्ट व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक रचना को दर्शाता है, जैसे स्कूल के किसी विषय में प्रदर्शन, संज्ञानात्मक क्षमता, योग्यता, भावनात्मक और व्यक्तित्व स्थिति आदि। टेस्ट के रिजल्ट में किसी प्रकार का बदलाव, मरीज की मनोवैज्ञानिक रचना में बदलाव दर्शाता है। हालांकि जिस मनोवैज्ञानिक रचना का टेस्ट किया गया है उसी के बदलाव का पता लगाया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक परीक्षण के पीछे के विज्ञान को “साइकोमेट्रिक्स” (Psychometrics) कहा जाता है।

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  1. मनोवैज्ञानिक परीक्षण क्या है? - Manovaigyanik parikshan kya hai in Hindi?
  2. मनोवैज्ञानिक परीक्षण के प्रकार - Manovaigyanik parikshan ke prakar in Hindi
  3. मनोवैज्ञानिक परीक्षण के नियम - Manovaigyanik parikshan ke niyam in Hindi
  4. मनोवैज्ञानिक परीक्षण की नैतिकता - Manovaigyanik parikshan ki naitikta in Hindi
  5. मनोवैज्ञानिक परीक्षण के परिणाम - Manovaigyanik parikshan ke result in Hindi

साइकोलॉजिकल टेस्टिंग क्या है?

मनोवैज्ञानिक परीक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कई मनोवैज्ञानिक टेस्ट किये जाते हैं। इन मनोवैज्ञानिक टेस्टों की मदद से किसी व्यक्ति के व्यवहार, व्यक्तित्व और उसकी कार्य क्षमताओं का अंदाजा लगाया जाता है। मनोवैज्ञानिक परीक्षण को “मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन” (Psychological assessment) के नाम से भी जाना जाता है। मनोवैज्ञानिक परीक्षण को लगभग हमेशा मनोचिकित्सक (“साइकोलॉजिस्ट”) के द्वारा किया जाता है, जिनके पास इसको करने के लिए लाइसेंस होता है। साइकोलॉजिस्ट ही ऐसे प्रोफेशनल डॉक्टर होते हैं जो मनोवैज्ञानिक परीक्षण कर सकते हैं और उसके परिणामों के बारे में समझा सकते हैं। 

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कभी भी सिर्फ मनोवैज्ञानिक परीक्षण नहीं करने चाहिए। मनोवैज्ञानिक टेस्टों के साथ-साथ शारीरिक मेडिकल टेस्ट भी किए जाने चाहिए ताकि यह पता लगाया जा सके कि किसी रोग के कारण तो मरीज में ये मनोवैज्ञानिक लक्षण विकसित नहीं हो रहे हैं। यदि मेडिकल टेस्टों को मनोवैज्ञानिक टेस्टों से पहले कर लिया जाए तो उससे समस्या का और बेहतर तरीके से अंदाजा लगाया जा सकता है। यदि मेडिकल टेस्टों के पहले ना किया जाए तो ये मनोवैज्ञानिक परीक्षणों में उलझनें पैदा कर सकते हैं और उनके परिणामों को विवाद्य बना सकते हैं।

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मनोवैज्ञानिक परीक्षण कितने प्रकार के हो सकते हैं?

मनोवैज्ञानिक परीक्षणों की कई व्यापक श्रेणियां हैं:

आईक्यू टेस्ट (IQ test):

आईक्यू टेस्ट का इस्तेमाल बुद्धि क्षमता मापने के लिए किया जाता है, जबकि अचीवमेंट टेस्ट का इस्तेमाल क्षमता का उपयोग करने के विकास का स्तर मापने के लिए किया जाता है। इस प्रकार के टेस्टों में, जिस व्यक्ति के टेस्ट किये जा रहे हैं उनको कुछ काम करने के लिए दिए जाते हैं। इन कामों पर व्यक्ति जो प्रतिक्रिया देते हैं, उन्हें निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुसार सावधानीपूर्वक वर्गीकृत किया जाता है। जब टेस्ट पूरा हो जाता है तो उसके रिजल्ट की औसत आंकड़ों के साथ तुलना की जाती है। यह तुलना आमतौर पर समान उम्र या ग्रेड लेवल के लोगों के साथ ही की जाती है।

रवैया परीक्षण (Attitude tests):

एट्टीट्यूड टेस्ट में किसी घटना, व्यक्ति या वस्तु के बारे में किसी व्यक्ति की भावनाओं का आंकलन किया जाता है। किसी ब्रांड या वस्तु के लिए किसी व्यक्ति की प्राथमिकता को निर्धारित करते के लिए मार्केटिंग में एट्टीट्यूड स्केल का उपयोग किया जाता है।

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रुचि परीक्षण (Interest tests):

मनोवैज्ञानिक परीक्षणों में किसी व्यक्ति की रुचि और उसकी पसंद (प्राथमिकता) का पता लगाया जाता है। इन टेस्टों का इस्तेमाल मुख्य रूप से करियर संबंधी परामर्श लेने के लिए किया जाता है। रुचि टेस्ट में रोजाना उपयोग की जाने वाली ऐसी चीजों को शामिल किया जाता है, जिन्हें वह व्यक्ति पसंद करता है। तर्क यह है कि अगर व्यक्ति दिए गए कार्य में उन लोगों के समान रूचि और प्राथमिकता दिखाता है जो इन कार्यों में सफल हो चुके हैं, तो ऐसे में टेस्ट लेने वाले व्यक्ति को इस कार्य से संतुष्टि मिलने की संभावना बढ़ जाती है। 

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योग्यता परीक्षण (Aptitude test):

योग्यता टेस्ट में विशिष्ट क्षमताओं को मापा जाता है, जैसे अवधारणात्मक, संख्यात्मक या स्थानिक योग्यता। कई बार इन टेस्टों को विशेष रूप से खास कार्य के लिए किया जाता है, लेकिन ऐसे कुछ टेस्ट भी उपलब्ध हैं जो सामान्य सीखने की क्षमता को मापते हैं। 

न्यूरोसाइकोलॉजिकल टेस्ट (Neuropsychological tests):

यह टेस्ट कुछ विशेष रूप से डिजाइन किए गए कार्यों से मिलकर बनता है, जिनका उपयोग साइकोलॉजिकल संबंधी फंक्शन्स की जांच करने के लिए किया जाता है। ये फंक्शन मस्तिष्क की किसी विशेष रचना या हिस्से से जुड़े होते हैं। 

कुछ ऐसी बीमारी या चोटें होती हैं जो न्यूरोकॉग्निटिव फंक्शनिंग को प्रभावित कर देती हैं, ऐसी स्थितियों के बाद होने वाली क्षति की जांच करने के लिए न्यूरोसाइकोलॉजिकल टेस्ट का उपयोग एक क्लिनिकल संदर्भ में किया जाता है। जब इस टेस्ट का रिसर्च के लिए इस्तेमाल किया जाता है, इस दौरान इन परीक्षणों का मुख्य कार्य न्यूरोसाइकोलॉजिकल क्षमताओं की पहचान करना होता है। 

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व्यक्तित्व टेस्ट (Personality test):

मनोवैज्ञानिक परीक्षणों में व्यक्तित्व का परीक्षण या तो “ऑब्जेक्टिव टेस्ट” रूप में या फिर “प्रोजेक्टिव टेस्ट” के रूप में किया जाता है:

  • ऑब्जेक्टिव टेस्ट को “रेटिंग टेस्ट” भी कहा जाता है, इन टेस्टों की प्रतिबंधित प्रक्रिया होती है, जैसे सही और गलत जवाबों की पहचान करना और या पैमाने पर रेटिंग करना। ऑब्जेक्टिव पर्सनैलिटी टेस्ट को बिज़नेस के लिए भी डिजाइन किया जा सकता है, जिसकी मदद से प्रतिभावान कर्मचारियों का मूल्यांकन किया जाता है। (और पढ़ें - व्यक्तित्व विकास के टिप्स)
  • प्रोजेक्टिव टेस्ट को “फ्री रिस्पांस टेस्ट” भी कहा जाता है। इस टेस्ट में किसी व्यक्ति की स्वतंत्र प्रतिक्रिया की जांच की जाती है, जैसे किसी असाधारण तस्वीर पर व्यक्ति की व्याख्या या प्रतिक्रिया। कुछ प्रोजेक्टिव टेस्टों का इस्तेमाल आजकल बेहद कम ही किया जाता है, क्योंकि इन टेस्टों में समय अधिक लगता है और इनकी वैधता और विश्वसनीयता भी विवादास्पद है। (और पढ़ें - व्यक्तित्व विकार के प्रकार)

सेक्सोलॉजिकल टेस्ट (Sexological test): 

सेक्सोलॉजी (यौन-क्रियाओं की विद्या) के लिए किये जाने वाले टेस्ट काफी कम हैं। यौन संबंधी बीमारियों व अन्य समस्याओं का पता लगाने के लिए सेक्सोलॉजी टेस्ट एक अलग प्रकार का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन प्रदान करता है।

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मनोवैज्ञानिक परीक्षण के क्या नियम होते हैं?

मनोवैज्ञानिक परीक्षण के परिणाम को पूरी तरह से केवल एक ही टेस्ट में आए परिणाम पर आधारित नहीं किया जा सकता। हर व्यक्ति में कई अलग-अलग प्रकार की योग्यताएं और क्षमताएं हो सकती हैं, जिनका मूल्यांकन कई अलग-अलग प्रकार के टेस्ट करके किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक परीक्षण के दौरान एक साइकोलॉजिस्ट मरीज के व्यवहार की योग्यताओं और सीमाओं का मूल्यांकन करते हैं और प्राप्त किये गए परिणाम से एक विषयपरक एवं तर्कपूर्ण रिपोर्ट तैयार करते है। हालांकि वह रिपोर्ट को एक सहायक तरीके से समझाता है। मनोवैज्ञानिक परीक्षण के दौरान टेस्टिंग में पाई जाने वाली सिर्फ व्यक्ति की कमजोरियों को ही नोट नहीं किया जाता, बल्कि उसके मजबूत पहलूओं  को भी नोट किया जाता है।

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ऐसे बहुत सारे मूल सिद्धांत हैं जो मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का आधार बनते हैं। 

  • किए गए टेस्ट व्यक्ति के व्यवहार के नमूने होते है।
  • ये टेस्ट सीधे तौर पर लक्षणों व क्षमताओं को नहीं दिखाते, लेकिन इनकी मदद से उन व्यक्तियों (जिनका परीक्षण हो रहा है) के व्यवहार को लेकर कुछ अनुमान लगाए जा सकते हैं।
  • टेस्ट में पर्याप्त विश्वसनीयता और वैधता होनी चाहिए।
  • अस्थायी रूप से हुई थकान, चिंता या तनाव की स्थिति व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक टेस्ट के परिणाम और अन्य टेस्टों के प्रदर्शन को भी प्रभावित कर सकती हैं। इसके अलावा व्यक्तित्व या व्यवहार में किसी प्रकार की गड़बड़ी या फिर मस्तिष्क में चोट लगने से भी मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के रिजल्ट खराब अा सकते हैं।
  • टेस्ट के रिजल्ट की व्याख्या व्यक्ति की शिक्षा, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, दैहिक विकलांगता जैसी सभी बातों को ध्यान में रखते हुए की जानी चाहिए। 
  • मनोवैज्ञानिक टेस्ट के रिजल्ट व्यक्ति के सहयोग और प्रेरणा पर निर्भर करते हैं। 
  • एक ही क्षमता को मापने के लिए किये जाने वाले विभिन्न टेस्ट रिजल्ट भी अलग-अलग हो सकते हैं। 
  • परीक्षण के परिणामों की अन्य व्यवहारिक आंकड़ों और व्यक्ति की मेडिकल संबंधी पिछली जानकारी और बर्ताव के संबंध में व्याख्या की जानी चाहिए, और उनको इनसे अलग नहीं समझना चाहिए।

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मनोवैज्ञानिक परीक्षण की क्या नैतिकता होती है?

मनोवैज्ञानिक परीक्षण एक शक्तिशाली उपकरण होता है लेकिन इसकी प्रभावशीलता टेस्ट करने वाले और टेस्ट के रिजल्ट की व्याख्या करने वाले व्यक्ति पर निर्भर करती है। यदि टेस्ट को सावधानीपूर्वक और बुद्धिमता से किया जाए तो, मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन एक व्यक्ति को अपने बारे में अधिक जानने और खुद को अंदर से अच्छे से समझने में मदद करता है। अगर इस टेस्ट को ठीक तरीके से ना किया जाए तो यह ऐसे व्यक्ति को भ्रमित कर सकता है जो अपने जीवन या उपचार के लिए महत्वपूर्ण निर्णय लेने की सोच रहा हो। यह संभावित रूप से उस व्यक्ति के लिए हानिकारक भी हो सकता है। 

एक अच्छे साइकोलॉजिस्ट को इस बारे में पता होता है और मनोवैज्ञानिक परीक्षण की रिपोर्ट लिखते समय वे इस बारे में काफी ध्यान रखते हैं। वे अपनी रिपोर्ट भी बेहद सावधानी से बनाते हैं, उसे सुस्पष्ट रखते हैं ताकि उनका मरीज इसे समझ सके। इसके अलावा वे व्यक्ति के साथ बहुत ही सावधानी से बात करते हैं और अपनी भाषा का बहुत ध्यान रखते हैं, ताकि सामने वाला भयभीत या सशंकित न हो और बेहद सावधानी से वस्तुस्थिति को समझ सकें ।

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मनोवैज्ञानिक परीक्षण के रिजल्ट को किस तरह समझा जाता है?

मनोवैज्ञानिक परीक्षण का आशय ही अलग अलग प्रकार के मनुष्यों की विशेषताओं और चरित्र -चित्रण का अध्ययन करना है। इन्हें आदर्श या मानक-संदर्भित (Norm-referenced) या मानदंड-संदर्भित (Criterion-referenced) तरीके से समझा जा सकता है। नोर्म का मतलब यहां पर आबादी के सामान्य आंकड़ों से है। 

मनोवैज्ञानिक परीक्षण के रिजल्ट की आदर्श या मानक-संदर्भित व्याख्या आबादी के सामान्य आंकड़ों के साथ व्यक्ति के परीक्षण के रिजल्ट की तुलना करके की जाती है। आम तौर पर, आबादी का परीक्षण करने के बजाय प्रतिनिधित्व के सेंपल या एक समूह का परीक्षण किया जाता है। यह नोर्म्स का ग्रुप या नोर्म्स के सेट प्रदान करता है।

नोर्म्स की एक प्रतिनिधित्व को “बेल कर्व” (Bell curve) कहा जाता है। नोर्म्स मनोवैज्ञानिक टेस्ट को मानकीकरण (Standardized) करने के लिए उपलब्ध होते हैं, जिनकी मदद से यह पता चलता है कि कैसे किसी व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक टेस्ट के परिणामों की तुलना नोर्म्स के समूह से की जा सकती है। नोर्म्स रिफ्रेंस्ड स्कोर आमतौर पर मानक स्कोर (जेड) पैमाने पर रिपोर्ट किये जाते हैं। 

मनोवैज्ञानिक परीक्षण के रिजल्ट की मानदंड-संदर्भित व्याख्या किसी व्यक्ति के प्रदर्शन की तुलना अन्य लोगों के प्रदर्शन की बजाए कुछ विशेष कसौटी के तहत आने वाले लोगों से की जाती है। उदाहरण के लिए जैसे स्कूल में लिया गया टेस्ट हर एक विषय के लिए अलग स्कोर प्रदान करता है।  जैसे कि एक विद्यार्थी भूगोल  के टेस्ट में 80% अंक प्राप्त कर सकता है। (यहां उसकी उसी विषय से जुड़े और उसी श्रेणी के लोगों के बीच कार्यदक्षता मापी जाती है।) मानदंड-संदर्भित स्कोर व्याख्याएं आमतौर पर मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के बजाय उपलब्धि परीक्षणों (Achievement tests) पर अधिक लागू होती हैं।

अक्सर टेस्ट के रिजल्ट की व्याख्या दोनों तरीकों से की जाती है। भूगोल के टेस्ट में 80 प्रतिशत प्रश्नों के उतर ठीक से देने से विद्यार्थी क्लास में 84वें स्थान पर पहुंच जाता है, जिसका मतलब होता है कि उसका प्रदर्शन 83 प्रतिशत विद्यार्थियों से अच्छा है और 16 प्रतिशत विद्यार्थियों से खराब है।

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