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इस टेस्ट से खून में एंटी-मुलेरियन हार्मोन (एएमएच) की मात्रा मापी जाती है। एएमएच, महिला और पुरुष दोनों के प्रजनन ऊतकों में बनता है। एएमएच का काम और स्तर आपकी उम्र और लिंग पर निर्भर करता है। 
एएमएच पेट में पल रहे बच्चे के यौन अंगों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। गर्भावस्था के पहले सप्ताह में बच्चे के प्रजनन अंगों का विकास शुरू हो जाता है। भ्रूण में पहले से ही बेटा (XY जीन) या बेटी (XX जीन) होने के जीन मौजूद होते हैं। 

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  1. एंटी-मुलेरियन हार्मोन टेस्ट क्या होता है? - What is Anti-mullerian Hormone Test in Hindi?
  2. एंटी-मुलेरियन हार्मोन टेस्ट क्यों किया जाता है? - What is the purpose of AMH Test in Hindi?
  3. एंटी-मुलेरियन हार्मोन टेस्ट से पहले - Before AMH Test in Hindi
  4. एंटी-मुलेरियन हार्मोन टेस्ट के दौरान - During AMH Test in Hindi
  5. एंटी-मुलेरियन हार्मोन टेस्ट के परिणाम का क्या मतलब होता है? - What do the results of AMH Test mean in Hindi?

महिलाओं में मासिक धर्म के दौरान एएमएच का स्तर स्थिर रहता है इसलिए एंटी-मुलेरियन हार्मोन (एएमएच) टेस्ट मासिक धर्म के दौरान कभी भी किया जा सकता है। यह ओवरियन (एग) रिजर्व के लिए मार्कर का काम करता है। इसकी जांच एएमएच ब्लड टेस्ट से की जाती है। 

एएमएच टेस्ट से सटीक परिणाम पाने के लिए इस टेस्ट को एन्ट्रल फॉलिक काउंट (एएफसी) के साथ किया जाता है। यह टेस्ट महिला की दोनों ओवरीज में छोटे फोलिकल्स की संख्या बताता है। एएफसी टेस्ट को एक्सपर्ट फर्टिलिटी अल्ट्रॉसाउंड स्कैन की मदद से किया जाता है। इस टेस्ट से महिलाओं की प्रजनन क्षमता का आंकलन किया जा सकता है।

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आइए जानते हैं कि किसी महिला की प्रजनन क्षमता को मापने के लिए एएमएच टेस्ट की क्यों जरूरत होती है। सामान्य और स्वस्थ महिला में एएमएच स्तर का 1.0 नैनोग्राम/मिली होता है। 1.0 नैनोग्राम/मिली से कम मात्रा होने पर आपको डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। जल्द उपचार कराने पर इसकी मात्रा बढ़ाकर सफलतापूर्वक गर्भधारण किया जा सकता है। 3.0 नैनोग्राम/मिली से अधिक होने पर भी आपको डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। यह पोलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (पीसीओएस) का संकेत हो सकता है। अगर एएमएच का स्तर बहुत कम है तो इसका मतलब है कि आपकी प्रजनन क्षमता बहुत कम है।

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यह जांच कराने से ठीक पहले आपको उपवास जैसा कुछ नया नहीं करना है। यहां तक कि जांच के लिए खून में भी कुछ मिनटों का समय लगता है। आपको जांच रिपोर्ट भी एक सप्ताह के आसपास के समय में मिल जाएगी। 
ज्यादातर शोधों में इस बात को पता चला है कि गर्भनिरोधक दवाएं एएमएच टेस्ट के लेवेल को प्रभावित नहीं करती हैं लेकिन वे आपके शरीर में अन्य तरह के हार्मोन्स के स्तर को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए यह जांच कराने से पहले डॉक्टर आपसे गर्भनिरोधक दवाओं का तीन महीनों तक सेवन न करने की सलाह दे सकते हैं। अगर आप प्रजनन से संबंधित किसी अन्य तरह की दवाओं को सेवन कर रहे हैं तो इस बारे में अपने डॉक्टर से जरूर बताएं क्योंकि प्रजनन से जुड़े इलाज शुरू करने से पहले आपको उन दवाओं का सेवन बंद करना पड़ सकता है। 

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एएमएच टेस्ट एक तरह का ब्लड टेस्ट है। इसमें आपकी नसों से खून का सैपल लेकर उसकी जांच की जाती है। यह टेस्ट बहुत आसान है लेकिन इसे करने के लिए कुछ विशेष यंत्रों की जरूरत होती है। इसलिए इस टेस्ट को कराने के लिए आपको डॉक्टर के पास जाना होगा। इस टेस्ट को नियमित कराने की जरूरत नहीं होती है।

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जैसा कि ऊपर बताया गया है, एएमएच का स्तर 3.0 नैनोग्राम/मिली से अधिक होना पॉलीसिस्टिक ओवरियन सिंड्रोम (पीसीओएस) का संकेत हो सकता है। इसका मतलब है कि ओवरी में कई तरह की फॉलिकल्स का विकास हो रहा होता है। अगर आप एआरटी यानी असिस्टेड रिप्रोडक्टिव ट्रीटमेंट कराने की सोच रहे हैं तो आपके लिए ओवरियन हाइपरसिस्टिमुलेशन सिंड्रोम का खतरा हो सकता है।

एएमएच का स्तर 3 से 7 नैनोग्राम/मिली होने का मतलब है कि आपका ओवरियन रिजर्व सामान्य है और प्रजनन क्षमता के कम होने के दूसरे कारण हैं। अगर आपका एएमएच स्तर सामान्य है उसके बावजूद आप गर्भधारण नहीं कर पा रही हैं तो आपको अपने शारीरिक स्वास्थ्य, पौष्टिक आहार, एक्सरसाइज और अन्य तरह की विधियां अपनाने के अलावा कुछ अन्य जांच भी करवाने पड़ सकते हैं। 

एएमएच का स्तर 0 से 0.6 नैनोग्राम/मिली के बीच होने की स्थिति में आपको आईवीएफ या एफएसएच की जांच कराने की जरूरत है। इस रिजल्ट के आने पर डॉक्टर आपको ओवरियन रिजर्व के कम होने की समस्या बता सकते हैं।

ओवरियन रिजर्व भी गर्भावस्था से जुड़ी समस्याओं के बारे में काफी जानकारियां देता है। ऐसा परिणाम आने पर आपको अपने एएमएच का लेवल बढ़ाने के लिए उपचार की जरूरत पड़ सकती है। अगर आप गर्भधारण करना चाहती हैं और स्पर्म की संख्या में कमी नहीं है तथा आपका एएमएच भी सामान्य है तो इस स्थिति में डॉक्टर आपसे लाइफस्टाइल से संबंधित अन्य तरह की सावधानियां बरतने को कह सकते हैं क्योंकि उनके कारण भी गर्भधारण में समस्याएं आ सकती हैं।

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