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डायबिटीज एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है जो बाद में कई जानलेवा बीमारियों को बढ़ावा देती है। हालांकि, शुगर को नियंत्रित करने के लिए उपचार के कई विकल्प मौजूद हैं, लेकिन इसे और बेहतर तरीके से कैसे कंट्रोल किया जाए इसकी खोज में वैज्ञानिक लगे हुए हैं। इसी के तहत एक नई रिसर्च के जरिए शोधकर्ताओं ने पाया कि विशेष प्रकार की इंसुलिन टाइप 2 डायबिटीज के रोगियों के लिए असरदार तो होगी साथ ही साथ यह इंजेक्शन के भार को कम करने का काम भी करेगी। रिसर्च के अनुसार हफ्ते में एक बार ली जाने वाली आइकोडेक नामक इंसुलिन (insulin icodec) नियमित रूप से रोज ली जाने वाली इंसुलिन ग्लार्गिन यू 100 (insulin glargine U100 ) के समान ही प्रभावशाली है। इस रिसर्च को स्वास्थ्य के क्षेत्र की पत्रिका 'न्यू इंग्लिश जर्नल ऑफ मेडिसिन' में प्रकाशित किया गया है।

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रोगियों की सुविधा के तहत तैयार किया इंजेक्शन- शोधकर्ता
बेसल इंसुलिन इंजेक्शन की फ्रीक्वेंसी में कमी करके टाइप 2 डायबिटीज के रोगियों के लिए उपचार को और सुविधाजनक बनाए जाने पर अक्सर विचार होता आया है। मतलब अगर रोज लगने वाले इंजेक्शन की संख्या को कम किया जाए तो रोगियों के लिए इस उपचार को स्वीकार करना और उसका पालन करना और भी आसान होगा। इसी के आधार पर इंसुलिन आइकोडेक को तैयार किया है जो कि एक बेसल इंसुलिन एनालॉग है। इसे सप्ताह में सिर्फ एक बार इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे इलाज भी बेहतर तरीके से होगा। 

इंसुलिन (आइकोडेक) के प्रभाव को जानने के लिए शोधकर्ताओं ने 26 हफ्तों के ट्रायल का फेज-2 आयोजित किया, जिसमें कुल 247 प्रतिभागियों को शामिल किया गया था। यह डबल ब्लाइंड ट्रायल था। प्रतिभागियों को रैंडम्ली यानी किसी को आइकोडेक तो किसी को ग्लार्गिन यू 100 दी गई थी। यहां अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह जानना था कि इंसुलिन ग्लार्गिन यू 100 (रोजाना एक बार) की तुलना में आइकोडेक (सप्ताह में एक बार) कितनी प्रभावी और सुरक्षित हो सकती है। वो भी टाइप 2 डायबिटीज के उन मरीजों में जिन्हें पहले लंबे समय तक इंसुलिन उपचार नहीं मिला था। इसके अलावा उन मरीजों के साथ भी जिनका टाइप 2 डायबिटीज अधूरे तरीके से नियंत्रित था वो भी तब जब उन्होंने उपचार के तौर पर मेटफोर्मिन लिया या फिर वो बिना डिपेपटाइडल पेप्टाइड्स 4 इनहिबिटर के थे।

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बेसलाइन यानी शुरू से लेकर 26 हफ्ते तक ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन के प्राइमरी एंडप्वाइंट में परिवर्तन दिखाई दिया। हाइपोग्लाइसीमिया और इंसुलिन से संबंधित प्रतिकूल घटनाओं के एपिसोड समेत सुरक्षा के आखिरी बिंदुओं का भी मूल्यांकन किया गया। शोधकर्ताओं ने अध्ययन के निम्नलिखित परिणामों को कुछ इस प्रकार पाया -

  • आधारभूत विशेषताएं दो समूहों में समान थीं। मतलब बेसलाइन ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन स्तर आइकोडेक समूह के रोगियों में 8.09% और ग्लार्गिन समूह में 7.96% था।
  • अनुमान के मुताबिक आइकोडेक वाले समूह में आधारभूत परिवर्तन के बाद ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन स्तर 1.33 प्रतिशत अंक था, जबकि ग्लार्गिन समूह के लोगों में यह 1.15 प्रतिशत अंक था। इस तरह पता चलता है कि 26 हफ्तों तक यह बदलाव क्रमशः 6.69% और 6.87% था। 
  • अनुमान के मुताबिक बेसलाइन से लेकर एंडप्वाइंट तक दोनों समूहों के बीच बदलाव का अंतर 0.18 प्रतिशत अंक था। 
  • साथ ही शोधकर्ताओं ने पाया कि लेवल 2 या लेवल 3 की गंभीरता के साथ हाइपोग्लाइसीमिया की दर कम थी।

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शोधकर्ताओं ने ध्यान दिया कि इंसुलिन-संबंधित प्रमुख प्रतिकूल घटनाओं में समूह आधारित कोई अंतर नहीं था। अतिसंवेदनशीलता और इंजेक्शन-साइट प्रतिक्रियाओं की दर भी कम थी। इसके अलावा, अधिकांश प्रतिकूल घटनाएं हल्की या कम प्रभावी थीं और परीक्षण में शामिल दवाओं से संबंधित कोई गंभीर परिणाम नजर नहीं आए। इसलिए, उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि टाइप 2 डायबिटीज के रोगियों के उपचार में इंसुलिन आइकोडेक (सप्ताह में एक बार), इंसुलिन ग्लार्गिन यू 100 के समान प्रभावी और सुरक्षित भी है।

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