ऑक्सीजन थेरेपी इलाज का एक तरीका है जिसमें मरीजों को जब सांस लेने में मुश्किल होने लगती है तो उन्हें अतिरिक्त (पूरक) ऑक्सीजन दिया जाता है। जब कोई बीमार मरीज खुद से सांस के जरिए सही तरीके से ऑक्सीजन नहीं ले पाता है तो उन्हें ये थेरेपी दी जाती है। ऐसा आमतौर पर उन लोगों के साथ होता है जिन्हें पहले से फेफड़ों से जुड़ी कोई बीमारी हो जैसे- अस्थमा, क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (copd), निमोनिया या फिर स्वास्थ्य से जुड़ी कोई और समस्या जैसे- हार्ट फेलियर या स्लीप ऐप्निया आदि।

कोविड-19 के मरीज जिनमें बीमारी के गंभीर लक्षण हो जाते हैं, जिन्हें सांस लेने में मुश्किल होने लगती है, हाइपोक्सिया यानी शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने लगती है, ऐसे मरीजों को भी ऑक्सीजन थेरेपी दी जाती है। इस थेरेपी की मदद से मरीज के शरीर में ब्लड ऑक्सीजन का लेवल बढ़ने लगता है और मरीज को बेहतर महसूस होता है। इस लेख के माध्यम से हम आपको यह बता रहे हैं कि आखिर ऑक्सीजन थेरेपी है क्या और किसी मरीज को इस थेरेपी की जरूरत है या नहीं, इस बारे में डॉक्टर कैसे जानते हैं।

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  1. ऑक्सीजन थेरेपी क्या है? - What is oxygen therapy in Hindi
  2. ऑक्सीजन थेरेपी की जरूरत कब होती है? - When is oxygen therapy needed in Hindi
  3. ऑक्सीजन थेरेपी कैसे की जाती है - How is oxygen therapy done in Hindi
  4. घर पर ऑक्सीजन थेरेपी से जुड़े दिशा-निर्देश - Guidelines related to oxygen therapy at home in Hindi
  5. ऑक्सीजन थेरेपी के साइड इफेक्ट्स - Oxygen Therapy Side Effects in Hindi
  6. कोविड-19 के मरीज के लिए ऑक्सीजन थेरेपी क्या है? के डॉक्टर
  7. ऑक्सीजन कंसंट्रेटर क्या है
  8. ऑक्सीजन सिलेंडर क्या है

ऑक्सीजन बेहद महत्वपूर्ण गैस है और इंसान जीवित रह सके और शरीर से जुड़ी सभी क्रियाएं बेहतर तरीके से काम कर सकें इसके लिए ऑक्सीजन का बेहद अहम रोल है। हम जो भी हवा सांस के जरिए शरीर के अंदर लेते हैं उसमें से 21 प्रतिशत हिस्सा ऑक्सीजन का होता है। हमारे फेफड़े ऑक्सीजन को सोख लेते हैं और फिर उसे खून तक पहुंचा देते हैं। इसके बाद खून में मौजूद हीमोग्लोबिन, ऑक्सीजन को लेकर शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुंचाने का काम करता है। 

अगर आपको फेफड़ों से जुड़ी कोई बीमारी हो जाए, फेफड़ो में सूजन या जलन हो जाए, फेफड़ों में किसी तरह का घाव हो जाए या फिर अगर फेफड़े क्षतिग्रस्त हो जाएं तो फेफड़े, खून तक उचित मात्रा में ऑक्सीजन नहीं पहुंचा पाते। जब खून में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है तो इस स्थिति को हाइपोक्सिमिया कहते हैं। वहीं, दूसरी तरफ हाइपोक्सिया एक बेहद गंभीर स्थिति है जिसमें पूरा शरीर या शरीर के उत्तकों तक सही मात्रा में ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाता। हाइपोक्सिया होने का एक बेहद सामान्य कारण हाइपोक्सिमिया है। 

अगर किसी मरीज के खून में ऑक्सीजन का लेवल कम हो जाता है तो उसे ऑक्सीजन थेरेपी की जरूरत है या नहीं इस बात का फैसला डॉक्टर लेते हैं। अगर किसी मरीज के खून में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है तो उसमें निम्नलिखित लक्षण नजर आते हैं:

कई बार ऑक्सीजन की कमी से शरीर के उत्तक (टीशू) भी क्षतिग्रस्त होने लगते हैं। निम्नलिखित परिस्थितयां अगर उत्पन्न हो जाएं तो मरीज को ऑक्सीजन थेरेपी की जरुरत हो सकती है:

  • स्लीप ऐप्निया
  • निमोनिया
  • सीओपीडी
  • सिस्टिक फाइब्रोसिस
  • हार्ट फेलियर का लास्ट स्टेज
  • अस्थमा का गंभीर अटैक

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लक्षणों के अलावा कई और चीजें हैं जिनके आधार पर आपके डॉक्टर को यह पता चलता है कि आपके शरीर के खून में ऑक्सीजन लेवल की कमी हो गई है:

  • पल्स ऑक्सिमेट्री टेस्ट एक ऐसा टेस्ट है जिसमें एक छोटे से क्लिप जैसे डिवाइस-पल्स ऑक्सिमेटर-का इस्तेमाल कर खून में कितना ऑक्सीजन मौजूद है, इसकी जानकारी मिलती है। इस डिवाइस को मरीज की उंगली, पैर, पैर का अंगूठा, कान, नाक या माथे पर लगाया जाता है। पल्स ऑक्सीमेटर, खून में रोशनी की किरण डालता है और इसके माध्यम से यह जानने की कोशिश करता है कि खून में ऑक्सीजन की मात्रा कितनी है।
  • सामान्य रूप से ब्लड सैचुरेशन यानी खून में ऑक्सीजन के सूखने का लेवल 95 से 100 प्रतिशत के बीच होना चाहिए। अमेरिकन थोरैसिस सोसायटी के मुताबिक, इंसान के शरीर से जुड़ी सभी क्रियाएं सुचारू ढंग से चलें इसके लिए शरीर में ऑक्सीजन सैचुरेशन का लेवल कम से कम 89 प्रतिशत होना चाहिए। ऐसे में जब शरीर का ऑक्सीजन सैचुरेशन लेवल 89 प्रतिशत से नीचे चला जाता है तब शरीर को बाहर से पूरक ऑक्सीजन की जरूरत होती है और तब डॉक्टर ऑक्सीजन थेरेपी का सहारा लेते हैं।
  • आर्टीरियल ब्लड गैस सैचुरेशन ब्लड गैस टेस्ट के जरिए खून में कितना ऑक्सीजन और कितना कार्बड डाइऑक्साइड मौजूद है इसकी एकदम सही और सटीक जानकारी मिल जाती है। इस टेस्ट का इस्तेमाल ये जानने के लिए भी किया जाता है कि आपके फेफड़े इन गैसों को कितनी कुशलता के साथ एक्सचेंज कर पा रहे हैं। इस टेस्ट के लिए डॉक्टर आपकी रक्त धमनी से खून निकालते हैं और उसमें मौजूद गैसों की मात्रा की जांच करते हैं।

इस टेस्ट के नतीजे निम्नलिखित बातों का संकेत देते हैं:

खून में ऑक्सीजन का पार्शियल प्रेशर - सामान्य रूप से 75 से 100 mmHg- और ऑक्सीजन सैचुरेशन के अलावा खून में कार्बन डाइऑक्साइड का पार्शियल प्रेशर और धमनियों में ब्लड pH

ऑक्सीजन के पार्शियल प्रेशर का मतलब है कि आपके फेफड़े कितनी अच्छी तरह से ऑक्सीजन को खून में ट्रांसफर कर रहा है।

pH का मतलब है खून में हाइड्रोजन आयन की मात्रा कितनी है। इसे अंकों में 0 से 14 के बीच लिखा जाता है। 7 से कम के पीएच को ऐसिडिक कहा जाता है और 7 से ऊपर के पीएच को बेसिक या ऐल्कलाइन माना जाता है। खून का सामान्य पीएच 7.38 से 7.4 के बीच होता है। ब्लड पीएच कई फैक्टर्स के आधार पर मेनटेन रहता है। ब्लड पीएच लेवल के कम होने की एक वजह खून में कार्बन डाइऑक्साइड का लेवल बढ़ना है।

उन मरीजों को जिनके शरीर में खून में ऑक्सीजन का पार्शियल प्रेशर 60mmHg से कम हो जाता है उन मरीजों को ऑक्सीजन थेरेपी दी जाती है।

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ऑक्सीजन थेरेपी आमतौर पर फेस मास्क या फिर ट्यूब के जरिए दिया जाता है जिसे मरीज की नाक या विंडपाइप के अंदर डाला जाता है। निम्नलिखित उपकरणों का इस्तेमाल कर ऑक्सीजन को स्टोर करने और डिलिवर करने में किया जाता है:

  • ऑक्सीजन कॉन्सनट्रेटर:
    ये ऐसे उपकरण हैं जो उस हवा को जिसे आप सांस के जरिए शरीर के अंदर लेते हैं और उसमें ऑक्सीजन लेवल को इक्ट्ठा करने लगते हैं और उसे 85 से 95 प्रतिशत के बीच रखते हैं- हवा में ऑक्सीजन का सामान्य लेवल 21 प्रतिशत है। ऐसा करने से मरीज के फेफड़ों को और ज्यादा ऑक्सीजन लेने में मदद मिलती है। बड़े ऑक्सीजन कॉन्सनट्रेटर्स का वजन 14 से 23 किलो के बीच होता है और ये अस्पतालों की मेडिकल गैस पाइपलाइन के जरिए मरीज के बिस्तर तक ऑक्सीजन को पहुंचाने का काम करते हैं। ये ऑक्सीजन कॉन्सनट्रेटर छोटे और पोर्टेबल भी हो सकते हैं जिन्हें घर में इस्तेमाल किया जा सके। कुछ कॉन्सनट्रेटर्स जहां लगातार ऑक्सीजन की सप्लाई करते हैं वहीं कुछ रुक-रुक कर सप्लाई करते हैं।
  • कम्प्रेस्ड गैस सिलिंडर
    जैसा कि नाम से पता चल रहा है इसमें अलग-अलग साइज के कंटेनर्स और सिलिंडर्स में ऑक्सीजन को कम्प्रेस्ड करके भरा जाता है। इन सिलिन्डरों के अंदर 100 प्रतिशत ऑक्सीजन होता है जिसका प्रेशर 15169 केपीए (किलोपास्कल) और 21 डिग्री सेल्सियस होता है। अस्पतालों में जहां बड़े साइज के सिलिंडर का इस्तेमाल होता है जो सीधे मेडिकल पाइप लाइन में गैस की सप्लाई कर सकता है, वहीं घर के लिए छोटे गैस सिलिंडर इस्तेमाल में लाए जाते हैं।
  • लिक्विड ऑक्सीजन
    ऑक्सीजन जब तरल रूप में होती है तो कम जगह घेरती है। इसलिए एक बार में ऑक्सीजन की ज्यादा मात्रा को स्टोर करके रखा जा सकता है। लिक्विड ऑक्सीजन को तैयार करने के लिए ऑक्सीजन को माइनस 300 डिग्री सेल्सियस तापमान पर ठंडा किया जाता है। इस प्रक्रिया में भी 100 प्रतिशत ऑक्सीजन प्राप्त होता है जिसे बड़े साइज से या फिर छोटे पोर्टेबल सिलिंडर में भरकर इस्तेमाल किया जा सकता है।

ऑक्सीजन डिलिवरी सिस्टम

ऑक्सीजन डिलिवरी सिस्टम 2 तरह का होता है- लो फ्लो डिलिवरी सिस्टम और हाई फ्लो डिलिवरी सिस्टम। आपको किस तरह के डिलिवरी सिस्टम की जरूरत है यह कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे- आप किस जगह पर हैं, आपको कितनी ऑक्सीजन की जरूरत है, आपको ऑक्सीजन की जरूरत सिर्फ दिन के समय में है या फिर दिन और रात दोनों समय। कई मामलों में बिजली की आपूर्ति की मौजूदगी और इलाज का खर्च भी इस बात का फैसला करता है कि ऑक्सीजन डिलिवरी सिस्टम कैसा होगा। ऑक्सीजन थेरेपी के लिए कई तरह के डिलिवरी सिस्टम का इस्तेमाल होता है:

लो फ्लो डिलिवरी सिस्टम

इस तरह के सिस्टम में सिर्फ कुछ अतिरिक्त ऑक्सीजन ही मरीज को सांस लेने के लिए दी जाती है। इसमें लगातार ऑक्सीजन देने का काम नहीं होता। ऑक्सीजन की कितनी मात्रा देनी है यह इस बात पर निर्भर करता है कि मरीज की सांस लेने की दर कितनी तेज या धीमी है। लो फ्लो डिलिवरी सिस्टम कुछ इस तरह से हैं:

नेजल कैनुला
ऑक्सीजन वितरण करने के लिए यह एक कॉमन उपकरण है। यह एक तरह का ट्यूब है जिसमें नेजल प्रॉन्ग्स होते हैं। इस नाक के छेद में डाला जाता है और फिर उसे दूसरी तरफ लगे ऑक्सीजन डिलिवरी सिस्टम से जोड़कर रखा जाता है। लंबे समय तक जिन मरीजों को ऑक्सीजन सप्लाई की जरूरत होती है लेकिन कम लेवल में वैसे मरीजों को नेजल कैनुला दिया जाता है। इसके जरिए 24 से 40 प्रतिशत तक ऑक्सीजन दिया जाता है और इसकी फ्लो की दर 1 से 4 एल ऑक्सीजन प्रति मिनट होती है। नेजल कैनुला के जरिए ऑक्सीजन थेरेपी का हाई फ्लो भी दिया जा सकता है लेकिन इससे नाक में ड्राइनेस की दिक्कत हो सकती है। ऐसे मामलों में कई बार ह्यूमिडिफायर का इस्तेमाल किया जाता है। नेजल कैनुला के जरिए मरीज आसानी से बात कर सकते हैं और खाना खा सकते हैं लेकिन इसका साइड इफेक्ट ये है कि नेजल प्रॉन्ग्स आसानी से नाक से निकल जाता है जिस वजह से उसे बार-बार अडजस्ट करना पड़ता है।

फेस मास्क
ऑक्सीजन डिलिवरी सिस्टम का एक और कॉमन तरीका फेस मास्क है। इसमें मरीज की नाक और मुंह के ऊपर एक ऑक्सीजन मास्क लगाया जाता है, जिसे एक बैंड की मदद से मरीज के सिर के पीछे बांध दिया जाता है जिससे वह अपनी जगह से हिलता-जुलता नहीं है। फेस मास्क में छेद बने होते हैं ताकि कार्बन डाइऑक्साइड आसानी से बाहर निकल सके। नेजल कैनुला की तुलना में फेस मास्क ज्यादा सघन ऑक्सीजन देता है। हालांकि मास्क कितना कार्यकुशल है यह इस पर निर्भर करता है कि वह मरीज के चेहरे पर कितनी अच्छी तरह से फिट है। एक सामान्य फेस मास्क 40 से 60 प्रतिशत तक सघन ऑक्सीजन देता है और इसकी दर 6 से 10 एल प्रति मिनट होती है।

नॉन-री-ब्रीदर मास्क
इस तरह के मास्क में फ्लो मीटर से एक बैग जुड़ा होता है। मास्क में ऑक्सीजन के फ्लो को रेग्युलेट करने के लिए जिस यंत्र का इस्तेमाल होता है उसे ही फ्लो मीटर कहते हैं। मास्क और बैग के बीच वन-वे वॉल्व होता है इसलिए हवा मास्क में सिर्फ बैग के जरिए जाती है और दूसरी तरफ से नहीं। शरीर के बाहर निकाली गई हवा मास्क से बाहर निकलती है। सामान्य वॉर्ड्स में इस तरह के मास्क नहीं होते हैं और इसके जरिए ऑक्सीजन की अधिक मात्रा दी जाती है यानी करीब 60 से 80 प्रतिशत ऑक्सीजन 10 से 15 एल प्रति मिनट के हिसाब से।

पार्शियल री-ब्रीदर मास्क
इस तरह का मास्क भी एक हाई फ्लो ऑक्सीजन सिस्टम का हिस्सा है। हालांकि नॉन-री-ब्रीदर मास्क कि तरह इस मास्क में फ्लो मीटर से जो बैग जुड़ा रहता है वह पहले से ही गैस से थोड़ा सा फुला हुआ रहता है। इस तरह के मास्क में हवा के मिक्स होने की घटना भी होती है। वैसे मरीज जिन्हें बहुत ज्यादा सघन ऑक्सीजन सप्लाई की जरूरत होती है लेकिन कम समय के लिए उन्हें इस तरह का मास्क दिया जाता है। इससे 80 से 90 प्रतिशत सघन ऑक्सीजन मिल पाती है और वह भी 10 से 12 एल प्रति मिनट की दर से।

हाई फ्लो डिलिवरी सिस्टम

इस तरह के उपकरण में व्यक्ति जितनी सांस ले रहा है उसमें कुल हवा को दिया जाता है। वैसे मरीज जिन्हें स्पष्ट रूप से और लगातार ऑक्सीजन सप्लाई की जरूरत होती है उन्हें इस सिस्टम से ऑक्सीजन दिया जाता है। इस तरह के डिलिवरी सिस्टम के कुछ उदाहरण हैं:

वेन्चुरी मास्क
यह भी एक हाई फ्लो ऑक्सीजन थेरेपी मास्क है। हालांकि यह 24 प्रतिशत से लेकर 60 प्रतिशत तक ऑक्सीजन को 4 से 12 एल प्रति मिनट की दर से दे सकता है। मरीज की जरूरत के हिसाब से इस मास्क में ऑक्सीजन के फ्लो को अडजस्ट किया जा सकता है।

ट्रांसट्रैचील कैथेटर्स
एक छोटी सी सर्जरी के जरिए इस उपकरण को सीधे मरीज के विंड पाइप के अंदर जोड़ दिया जाता है। यह एक हाई फ्लो उपकरण है जिसके जरिए ऑक्सीजन की सघनता 60 से 100 प्रतिशत और फ्लो रेट 0.25 से 4 एल प्रति मिनट होता है। इस उपकरण का फायदा ये है कि इसे आसानी से कपड़ों के नीचे छुपाया जा सकता है और यह नेजल कैनुला की तुलना में ज्यादा कंफर्टेबल है। चूंकि इस उपकरण की ट्यूब को सीधे शरीर के अंदर डाला जाता है इसलिए नियमित रूप से इसकी सफाई भी की जानी चाहिए।

दूसरी हाई फ्लो डिलिवरी सिस्टम
कुछ दूसरे ऑक्सीजन डिवाइस की बात करें तो ये हैं- टी-ट्यूब, ट्रैचियोस्टोमी कॉलर्स और फेस टेंट। ये हाई ऑक्सीजन फ्लो ट्यूब होते हैं जिसका इस्तेमाल मरीज को वेंटिलेटर सपोर्ट से हटाने के लिए किया जाता है। ये सभी उपकरण नेबुलाइजर से जुड़े होते हैं जिनसे एरोसोल का निर्माण होता है और ये 30 से 100 प्रतिशत ऑक्सीजन 8 से 10 एल प्रति मिनट की दर से देते हैं।

पल्स डोज डिवाइस

इन उपकरणों की मदद से ऑक्सीजन की बचत होती है और ये ऑक्सीजन सिर्फ तभी देते हैं जब मरीज को इसकी जरूरत होती है। इन उपकरणों से 75 प्रतिशत तक इस्तेमाल की गई ऑक्सीजन की बचत होती है और प्रति सांस 10 से 40 एमएल ऑक्सीजन मिल जाता है। इस तरह के सिस्टम के साथ सभी तरह के ऑक्सीजन स्टोरेज डिवाइस यूज किए जा सकते हैं- लिक्विड, कॉन्सनट्रेटेड या सिलिंडर कोई भी। हालांकि इस डिवाइस का साइड इफेक्ट ये है कि अगर मरीज पूरी ताकत के साथ सांस न ले पाए तो यह डिवाइस ट्रिगर नहीं होता। ऐसे लोगों के लिए पल्स डोज डिवाइस यूज नहीं करना चाहिए।

कंटिन्यूअस पॉजिटिव एयरवे प्रेशर (सीपीएपी) थेरेपी

जिन लोगों को स्लीप ऐप्निया की समस्या होती है उनके साथ इस थेरेपी को यूज किया जाता है। ये उपकरण मास्क या नेजल कैनुला के रूप में होते हैं और इनके साथ एक मोटर जुड़ी होती है जो ट्यूब में हवा को फूंकती है। सीपीएपी उपकरण हवा के प्रेशर को मेनटेन रखता है ताकि मरीज का वायुमार्ग खुला रहे और वे सोते वक्त भी आसानी से सांस ले पाएं। इस डिवाइस की गलत बात ये है कि इससे मरीज को क्लॉस्ट्रोफोबिक महसूस हो सकता है जिससे उनकी नाक बह सकती है।

हाइपरबैरिक ऑक्सीजन थेरेपी

इस थेरेपी में मरीज को एक छोटे से चैम्बर में रखा जाता है। यह इतना बड़ा तो होता है जिसमें मरीज बैठ या लेट सके। इसके अंदर मरीज सिर्फ शुद्ध ऑक्सीजन ही सांस के जरिए अंदर लेता है। इसे ऐसा मरीजों को दिया जाता है जिन्हें संक्रमण के जरिए हाइपोक्सिया होने का का खतरा रहता है, कुछ खास स्थिति में होने वाले घाव और कार्बन मोनोऑक्साइड से हुई पॉइजनिंग। इस थेरेपी की मदद से टीशू में ऑक्सीजन की सघनता बढ़ती है जिससे बीमारी ठीक होने लगती है और हानिकारक बैक्टीरिया का विकास कम होने लगता है। स्टडीज में यह बात सामने आयी है कि यह थेरेपी एचआईवी वायरस के खिलाफ भी कारगर है। यह शरीर में फ्री रैडिकल्स की संख्या बढ़ाता है ताकि व्यक्ति के डीएनए के बाहर वायरस को छिपने की जगह न मिल पाए।

हापरबैरिक थेरेपी सिर्फ उन्हीं लोगों को दी जाती है जिन्हें पहले से फेफड़े की कोई बीमारी हो, सर्दी, बुखार या कानों से जुड़ी कोई दिक्कत या कानों की सर्जरी हुई हो। यह थेरेपी सभी लोगों को नहीं दी जाती और जिन लोगों को दी भी जाती है वे भी इस ऑक्सीजन चैम्बर में एक सेशन के दौरान 2 घंटे से ज्यादा देर के लिए नहीं बैठ सकते।

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ऑक्सीजन थेरेपी जीवनरक्षक है लेकिन यह भी एक तरह की दवा या इलाज ही है जिसे डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मचारी की देखरेख और दिशा-निर्देश के तहत ही किया जाना चाहिए। ऐसे में घर पर ऑक्सीजन थेरेपी दिए जाने के दौरान कुछ निर्देशों का पालन होना चाहिए:

  • डिवाइस के आसपास धूम्रपान बिलकुल न करें। हालांकि ऑक्सीजन खुद ज्वलनशील नहीं होता लेकिन यह आग की मदद जरूर करता है। इसलिए किसी भी तरह की ज्वलनशील चीज से इस डिवाइस को कम से कम 2 मीटर की दूरी पर रखें और अगर आप ऑक्सीजन थेरेपी पर हैं तो आपको पूरी तरह से धूम्रपान से दूर रहना चाहिए।
  • ऑक्सीजन सिलिंडर को सही तरीके से रखें ताकि उनके गिरने या लीक होने का खतरा न रहे।
  • इस बात का ध्यान रखें कि आपके घर के सभी बिजली के उपकरण सही हालत में हों ताकि किसी भी तरह की स्पार्किंग का खतरा न हो खासकर ऑक्सीजन सिलिंडर के आसपास।
  • अगर आप यात्रा कर रहे हैं तो आपके या मरीज के डिवाइस में कितनी ऑक्सीजन है इसकी जानकारी आपको होनी चाहिए।

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आमतौर पर ऑक्सीजन थेरेपी को सुरक्षित माना जाता है लेकिन इसके कुछ साइड इफेक्ट्स भी हैं:

  • ऊंघाई या झपकी आना
  • सिरदर्द खासकर सुबह के समय
  • हर वक्त थका हुआ महसूस करना
  • नाक का सूख जाना या नाक से खून आना

हाइपरबैरिक ऑक्सीजन थेरेपी के साइड इफेक्ट्स कुछ इस तरह से हैं- क्लॉस्ट्रोफोबिक महसूस होना, कानों में प्रेशर फील होना, सिरदर्द और थकान। अगर आपको खुद में इनमें से कोई भी साइड इफेक्ट दिखे तो अपने डॉक्टर से बात करें। लंबे समय तक हाई लेवल ऑक्सीजन के संपर्क में रहने से कुछ लोगों के शरीर में ऑक्सीजन टॉक्सिटी यानी विषाक्ता का भी खतरा हो सकता है। यही वजह है कि डॉक्टर से पूछे बिना ऑक्सीजन थेरेपी नहीं लेनी चाहिए।

अगर ऑक्सीजन विषाक्तता हो जाती है तो श्वसन-नली और ब्रॉन्काई में सूजन-जलन होने लगती है जिससे फेफड़ों में मौजूद वायुकोष भी क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। ऑक्सीजन से जुड़ी विषाक्तता के लक्षण 24 घंटे के अंदर दिखने लगते हैं और इसमें छाती में दर्द, भारीपन और सांस लेने में मुश्किल जैसे लक्षण भी दिखते हैं।

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