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कुछ दिन पहले एएनआई न्यूज एजेंसी ने उत्तर प्रदेश की सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी में हुई रैगिंग के मामले की खबर दी। एएनआई के अनुसार इटावा मे स्थित सैफई यूनिवर्सिटी में फर्स्ट ईयर के 150 छात्रों का जबरदस्ती सिर मुंडवाया गया और फिर अपने सीनियर्स के सामने परेड करवाई गई।

2019 सत्र की कक्षाएं शुरु होने के बाद यह ऐसा दूसरा मामला सामने आया है। 18 अगस्त को लगभग 10 बजे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), भोपाल के छात्रों द्वारा यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन की एंटी-रैगिंग हैल्पलाइन में इसकी शिकायत भी दर्ज की गई थी। इस मामले में एम्स भोपाल से नो छात्रों को सस्पेंड भी कर दिया गया था।

एक प्रोफेशनल कॉलेज में रैगिंग होना कोई आम बात नहीं है। 4 मई 2001 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने रैगिंग के हाानिकारक प्रभावों के बारे में जिक्र भी किया था।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश आर.सी. लोहाटी और जज बृजेश ने लिखा था कि रैगिंग के बहुत से तरीके हो सकते हैं। इसे बोलकर, लिखकर, कोई संकेत देकर या किसी अन्य प्रकार की शारीरिक प्रक्रिया करके किया जा सकता है। ऐसी कोई क्रिया करना जिसमें विद्यार्थी से छेड़छाड़, हाथापाई या अन्य प्रकार से शारीरिक कष्ट पहुंचाया जाए, अधिक झगड़ालू या अशिष्टता से व्यवहार करके उसे सताने या चिढ़ाने कोशिश की जाए, शारीरिक या मानसिक रूप से डराने की कोशिश या फिर उसे सबके सामने कोई अनुचित गतिविधि करने को कहा जाए जिससे विद्यार्थी को शर्मिंदगी महसूस हो आदि ये भी रैगिंग के उदाहरण हैं, क्योंकि इससे उनपर शारीरिक व मानसिक रूप से विपरीत प्रभाव पड़ता है।

हानिरहित मजाक और मस्ती से परे रैगिंग से विद्यार्थियों के स्वास्थ्य पर कई गंभीर प्रभाव डालती है, जिनमें तीन मुख्य हैं:

  • डिप्रेशन:
    यह एक प्रकार का मानसिक विकार होता है, डिप्रेशन में मरीज कम से कम 2 हफ्ते तक गंभीर रूप से उदास रहता है। आमतौर पर उदासी के साथ-साथ खुद को दोषी या नकारा समझना और नींद व भूख में बदलाव होना आदि समस्याएं भी हो जाती हैं। डिप्रेशन किसी व्यक्ति के हर पहलू को प्रभावित कर सकता है।
    डिप्रेशन व चिंता विकार से किसी व्यक्ति के व्यवहार व बोल-चाल का तरीका बदल सकता है। हाल ही में चीन की एक यूनिवर्सिटी में 477 विद्यार्थियों के साथ किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि चिंता और डिप्रेशन से व्यक्ति अधिक आवेगशील हो जाता है और अधिक सोच-विचार नहीं कर पाता है। इसलिए डिप्रेशन से पीड़ित विद्यार्थी अक्सर परिणाम के बारे में सोचे बिना ही कोई कदम उठा लेते हैं।
     
  • तनाव:
    रैगिंग से शरीर में कोर्टिसोल नाम का स्ट्रेस हार्मोन स्रावित होने लग जाता है। MyUpchar से जुड़े डॉ. आयुष पांडे के अनुसार यह हार्मोन हमें बाहरी मानसिक उत्तेजनाओं से लड़ने में मदद करता है। हालांकि असाधारण रूप से गंभीर तनाव से यह प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है।
     
  • अचानक से तनाव महसूस होना:
    इसे मोमेंट्री स्ट्रेस भी कहा जाता है, जो किसी अत्यधिक मानसिक दबाव के बारे में सोचकर या उसकी आशंका से होता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को चिंता, क्रोध, थकान, स्पष्ट रूप से सोच ना पाना और खुद पर भरोसा ना करना आदि समस्याएं होने लगती हैं, साथ ही इस स्थिति में व्यक्ति की मानसिक व शारीरिक क्षमताएं भी प्रभावित हो जाती हैं।
    इससे होने वाली शारीरिक समस्याएं जिनमें सीने में जलन से लेकर पीठ दर्द, इरीटेबल बाउल सिंड्रोम, सांस फूलना और हाई ब्लड प्रेशर होने जैसी कई समस्याएं हो सकती हैं।
     
  • चिंता विकार:
    इसमें व्यक्ति को गंभीर रूप से चिंता महसूस होने लगती है। व्यक्ति को चिंता विकार में आमतौर पर ज्यादा पसीना आना, चक्कर आना, जी मिचलाना, दिल की धड़कन बढ़ जाना, पैनिक अटैक होना और नींद न आना आदि समस्याएं होने लगती हैं।
    myUpchar.com की सीनियर मेडिकल ऑफिसर डॉ. अर्चना निरूला ने बताया कि “चिंता बहुत शक्तिशाली हो सकती है।” डॉ. अर्चना निरूला आगे बताती हैं कि “चिंता से ग्रस्त विद्यार्थियों को अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने में बहुत मुश्किल होती है और जब वे अपने कार्य पूरा नहीं कर पाते हैं, तो उनमें आत्म सम्मान की कमी हो जाती है। ऐसे में उनको नींद ना आने और खाना ना पचने जैसी समस्याएं भी हो जाती हैं। ऐसे मामलों में विद्यार्थियों को फोबिया, डिप्रेशन, पैनिक विकार और खुदकुशी के खयाल आना आदि गंभीर समस्याएं हो जाती हैं।” 

डॉ. अर्चना निरूला ने बताया कि “मेडिकल स्कूलों में आने वाले नए विद्यार्थियों में अधिक निराशा व तनाव होता है।” वे आगे बताती हैं कि “ये विद्यार्थी पहले ही अपने पिछले कुछ साल प्रतिस्पर्धा के माहौल में बिता चुके होते हैं, जिस दौरान से अपने इग्जाम की तैयारी कर रहे होते हैं और एडमीशन से संबंधित चिंतित रहते हैं। अब ये रैगिंग का तनाव और किसी के मजाक का पात्र बनना उनके साहस को तोड़ देता है।”

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