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पोलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस) महिलाओं के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला सबसे आम हार्मोन संबंधी विकार है। पीसीओएस ज्यादातर मेटाबॉलिज्म संबंधी गंभीर विकारों से जुड़ा होता है, जैसे इन्सुलिन रेसिसटेंस, टाइप 2 डायबिटीज, मोटापा, मूड संबंधी विकार और सामान्य जीवन को प्रभावित करने वाली अन्य समस्याएं। इसी तरह से स्लीप एपनिया का भी इन मेटाबॉलिक विकारों और सामान्य जीवन को प्रभावित करने वाली स्थितियों से काफी मजबूत संबंध देखा गया है। मोटापा इन दोनों स्थितियों के शुरुआती संकेत के रूप में विकसित हो सकता है।

जिन महिलाओं की उम्र अभी प्रजनन आयु से कम है, उनमें स्लीप एपनिया और पीसीओएस दोनों एक साथ होने की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है। यह ध्यान में रखना जरूरी है, कि पीसीओएस के इलाज के लिए हाल ही में दिए गए मेडिकल निर्देश स्लीप एपनिया की जल्दी जांच करवाने का संकेत देते हैं। खासतौर पर ऐसी महिलाओं के लिए जो पीसीओएस के साथ-साथ मोटापे से भी ग्रस्त हैं।

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  1. पीसीओएस और स्लीप एपनिया के बीच संबंध - PCOS Aur Sleep Apnea Me Sambandh
  2. पीसीओएस में स्लीप एपनिया का परीक्षण - PCOS Me Sleep Apnea Ka Parikshan
  3. पीसीओएस में स्लीप एपनिया का इलाज - PCOS Me Sleep Apnea Ka Treatment

पीसीओएस और स्लीप एपनिया के बीच में संबंध

जिन महिलाओं को सामान्य रूप से मासिक धर्म आते हैं, पीसीओएस उनमें से लगभग 6 से 15 प्रतिशत महिलाओं को प्रभावित करता है। पीसीओएस में आमतौर पर एंड्रोजन का स्राव बढ़ जाना, मोटापा और इन्सुलिन रेसिसटेंस शामिल है। जिनसे प्रारंभिक शुरुआत ग्लूकोज सहन ना होना (30 से 40%), टाइप 2 डायबिटीज (10%) और कार्डियोवास्कुलर डिजीज आदि विकसित होने के जोखिम बढ़ जाते हैं। स्वास्थ्य संबंधी इन गंभीर समस्याओं के अलावा पोलिसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम और स्लीप के बीच एक मजबूत संबंध देखा गया है।

दूसरी ओर प्रकाशित किए गए एक शोध के अनुसार ठीक से नींद न आने या कम नींद आने की स्थिति को इन्सुलिन रेसिसटेंस, ग्लूकोज इंटॉलरेंस, हाइपरटेंशन और डिस्लिपाइडिमीया (कोलेस्ट्रॉल या लिपिड फैट का अधिक स्तर) जैसे मेटाबॉलिज्म संबंधी विकारों के जोखिम कारक माना गया है। स्लीप एपनिया श्वसन संबंधी विकार होता है, इस स्थिति में मरीज को बार-बार सांस लेने में रुकावट महसूस होने लगती है और खर्राटे भी आते हैं। इस स्थिति के दौरान सांस रुकने की स्थिति कुछ सेकेंड से लेकर कुछ मिनट तक रह सकती है। जब सांस लेने में रुकावट व खर्राटे की समस्या अधिक हो जाती है, तो इस से स्वास्थ्य संबंधी कई जटिलताएं भी विकसित हो जाती हैं।

स्लीप एपनिया और पीसीओएस के बीच के संबंधों पर कई प्रकार की रिसर्च की जा चुकी हैं, कई खोजकर्ता इन दोनों विकारों व इनसे संबंधित समस्याओं के बीच सटीक संबंध का पता करने में लगे हैं। हालांकि यह देखा गया है कि पीसीओएस से ग्रस्त जिन महिलाओं के शरीर का वजन सामान्य से अधिक (मोटापा) है, तो उनको स्लीप एपनिया होने का खतरा अत्यधिक होता है। इसके अलावा इन दोनों रोगों का एक साथ विकसित होने का खतरा समय के साथ बढ़ता रहता है।

दूसरी तरफ से अभी तक सिर्फ एक ही ऐसी रिसर्च को प्रकाशित किया गया है, जिसमें पीसीओएस से ग्रस्त दुबली-पतली महिलाओं में स्लीप एपनिया के प्रचलन के बारे में बताया गया है। आश्चर्य की बात है कि इस स्टडी में इनके बीच में कोई संबंध नहीं बताया गया है।

ऐसा माना जाता है कि स्लीप एपनिया को विकसित करने के लिए पोसीओएस एक पूर्व-निर्धारित (जोखिम) कारक के रूप में काम करता है। हालांकि महिलाओं को स्लीप एपनिया होने के बाद भी पीसीओएस हो सकता है। स्लीप एपनिया और पीसीओएस दोनों से ग्रस्त महिला को इस बात का पता होना भी बहुत जरूरी है, कि स्लीप एपनिया पीसीओएस के लक्षणों को भी बढ़ा सकता है, जैसे इन्सुलिन रेसिसटेंस, हाइपरटेंशन, थकान और शरीर का वजन कम ना कर पाना आदि।

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पीसीओएस के मरीजों के लिए स्लीप एपनिया का परीक्षण कैसे किया जाता है?

ऐसे कारकों का पता लगाना बहुत जरूरी है, जो संभावित रूप से पीसीओएस के लक्षणों को गंभीर होने से बचाव कर सकते हैं। इसलिए स्लीप एपनिया का इलाज करना डॉक्टर के लिए बहुत जरूरी हो जाता है।

मरीज के सोने से संबंधित आदतों के बारे में जानकर स्लीप एपनिया का पता लगाया जा सकता है। नींद संबंधी आदतें  मुख्य रूप से दो तरीकों से रिकॉर्ड की जाती हैं।

इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राम, यह काफी सटीक टेस्ट होता है, जिसमें मरीज के सोने के दौरान उसके मस्तिष्क की गतिविधियों की जांच करके नींद के पैटर्न का पता लगाया जाता है। साथ ही साथ इस दौरान मरीज के शरीर से एक मॉनिटर जोड़ा जाता है, जो उसकी सांसों की गतिविधियों को स्क्रीन पर दिखाता है। यह टेस्ट सिर्फ मरीज को स्लीप लैब में सुलाकर ही किया जा सकता है।

यदि मरीज का स्वास्थ्य ठीक ना होने के कारण वह स्लीप लैब में सो नहीं पा रहा है, तो ऐसे में स्लीप स्टडी परीक्षण किया जाता है। स्लीप स्टडी को घर पर भी किया जा सकता है।

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पीसीओएस में स्लीप एपनिया का इलाज कैसे किया जाता है?

किसी व्यक्ति को दोनों समस्याएं एक साथ होना डॉक्टर को और अधिक चिंतित कर सकता हैा। जैसा कि पीसीओएस एक स्वास्थ्य संबंधी सिंड्रोम है, इसलिए इसमें स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याएं होती हैं, जैसे हर्सुटिज्म, बांझपन, मोटापा और अनियमित मासिक धर्म आदि। इस सभी समस्याओं को ठीक करने के लिए पीसीओएस का इलाज दो तरीकों से किया जाता है। एक में बांझपन का इलाज किया जाता है और दूसरे में पीसीओएस के दीर्घकालिक लक्षणों को कंट्रोल करके रखा जाता है,जैसे हर्सुटिज्म, बांझपन, मोटापा और मासिक धर्म नियमित रूप से ना आना। इन सभी समस्याओं को कंट्रोल करने के लिए वजन घटाना, उचित पोषण और दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है।

जब पीसीओएस के साथ स्लीप एपनिया हो जाता है, तो ऐसे में स्लीप एपनिया को कंट्रोल करना भी बहुत जरूरी हो जाता है। इसके लिए सबसे पहले वजन घटाने की प्रक्रिया और सीपीएपी (Continuous positive airway pressure) प्रक्रिया शुरू की जाती है। सीपीएपी प्रक्रिया में मरीज को एक मास्क लगाया जाता है, जो एक उचित दबाव के साथ मरीज में मुंह के माध्यम से हवा धकेलता है। इस प्रक्रिया के दौरान व्यक्ति सो रहा होता है। यदि व्यक्ति सीपीएपी मशीन का इस्तेमाल करने में सक्षम नहीं है, तो अन्य ओरल उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है। ये उपकरण जबड़े के आगे की तरफ खींच लेते हैं और हवा लिए बिना किसी रुकावट के रास्ता बनाते हैं।

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References

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