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पॉलीसिस्टिक ओवरी डिस्‍ऑर्डर यानि पीसीओडी महिलाओं में होने वाला एक हार्मोनल विकार है। पीसीओडी के कारण महिलाओं में बांझपन का खतरा बढ़ जाता है। इस समस्‍या के कारण मासिक धर्म और कार्डिएक की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है।

पीसीओडी (पीसीओएस) से ग्रस्‍त महिलाओं के अंडाशय में कई छोटे सिस्‍ट (अल्‍सर) बन जाते हैं, यह तब होता है जब एक सामान्य मासिक चक्र के नियमित परिवर्तन में बाधा आने लगती है। पीसीओडी न सिर्फ महिलाओं बल्कि 11 साल से अधिक उम्र की लड़कियों को भी हो सकता है। पॉलीसिस्टिक ओवरी का आकार और घनत्‍व सामान्य ओवरी की तुलना में बड़ा होता है। सेक्‍स हार्मोन के असंतुलित होने और शरीर के पुरुष हार्मोन का उत्‍पादन शुरु करने पर पीसीओडी की समस्‍या होने लगती है।

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पीसीओडी का संबंध मासिक धर्म में गड़बड़ी और शरीर में एंड्रोजन हार्मोन का स्‍तर बढ़ने से है। माहवारी में गड़बड़ी के कारण सामान्‍य मासिक धर्म में देरी होना या तीन महीने से ज्‍यादा समय तक माहवारी ही न आने की दिक्‍कत हो सकती है। पीसीओएस के लक्षणों में अनियमित माहवारी, प्रजनन क्षमता में कमी आना, असामान्‍य रूप से वजन बढ़ना और घटना, ह्रदय से संबंधित समस्‍याएं होना, मुहांसे और रैशेज, शरीर पर अनचाहे बाल आना और बाल झड़ना शामिल हैं। 

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पीसीओएस से ग्रस्‍त महिलाओं में इंसुलिन का स्‍तर सामन्‍य से कई ज्‍यादा होता है। इंसुलिन नामक हार्मोन अग्‍नाशय (पैंक्रियाज़) में बनता है। ये शरीर में कोशिकाओं को शुगर (ग्‍लूकोज़) को एनर्जी में बदलने में मदद करता है।

अगर आपके शरीर में पर्याप्‍त मात्रा में इंसुलिन बनना बंद हो जाता है तो ऐसी स्थिति में ब्‍लड शुगर लेवल बढ़ सकता है। इंसुलिन रेजिस्टेंस (इसमें शरीर ठीक तरह से इंसुलिन का प्रयोग नहीं कर पाती है) की स्थिति में भी ऐसा हो सकता है।

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अगर आपको इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्‍या है तो आपका शरीर ब्‍लड शुगर लेवल को सामान्‍य रखने के लिए उच्‍च मात्रा में इंसुलिन बनाने लगता है। इंसुलिन का स्‍तर अधिक होने पर ओवरी में एंड्रोजन (पुरुषों में होने वाला हार्मोन) जैसे कि टेस्‍टोस्‍टेरोन ज्‍यादा बनने लगता है। बॉडी मास इंडेक्‍स यानि बीएमआई (शरीर की ऊंचाई और वजन के आधार पर शरीर में अनुमानित फैट) के सामान्‍य स्‍तर से ज्‍यादा होने पर भी इंसुलिन रेजिस्टेंस हो सकता है। इंसुलिन रेजिस्टेंस वजन घटाने की प्रक्रिया को धीमा कर देता है और इसलिए पीसीओएस से ग्रस्‍त महिलाएं मोटापे का शिकार होने लगती हैं।

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इंसुलिन रेजिस्टेंस और पीसीओडी दोनों को ही नियंत्रित करने में संतुलित आहार अहम भूमिका निभाता है। अगर आप आप अपने आहार में स्‍वस्‍थ खाद्य पदार्थों को शामिल करते हैं तो इसकी मदद से आप जल्‍दी ही पीसीओडी या इंसुलिन रेजिस्टेंस से छुटकारा पा सकती हैं।

आहार में रिफाइंड (शुद्ध) कार्बोहाइड्रेट्स जैसे कि स्‍टार्च और चीनी युक्‍त खाद्य पदार्थों की अधिक मात्रा के कारण इंसुलिन रेजिस्टेंस हो सकता है और इस वजह से वजन कम करना या वजन को नियंत्रित कर पाना और भी ज्‍यादा मुश्किल हो जाता है। अत: पीसीओडी को ठीक एवं नियंत्रित करने के लिए आहार बहुत महत्‍वपूर्ण है। 

शोधकर्ताओं का कहना है कि पीसीओएस में भोजन का महत्‍वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। ऐसे कई खाद्य पदार्थ हैं जिनका सेवन करने से पीसीओएस को नियंत्रित करने में मदद मिलती है एवं कुछ चीज़ें ऐसी भी हैं जिन्‍हें न खाने की सलाह दी जाती है।

पीसीओडी के लक्षणों को नियंत्रित करने में तीन प्रकार की डाइट लाभकारी रहती है जो कि इस प्रकार है:

  • लो ग्‍लाइसेमिक इंडेक्‍स डाइट: लो (कम) जीआई वाले आहार को शरीर आसानी से पचा लेता है। इसका मतलब है कि इन खाद्य पदार्थों की वजह से अन्‍य चीज़ों की तुलना में इंसुलिन लेवल कम बढ़ता है। उदाहरण के तौर पर कार्बोहाइड्रेट की वजह से इंसुलिन का स्‍तर ज्‍यादा तेजी से बढ़ने लगता है। 
    लो जीआई डाइट वाले आहार में साबुत अनाज, दालें, नट्स, बीज, फल, स्‍टार्चयुक्‍त सब्जियां और अन्‍य असंसाधित एवं लो कार्बोहाइड्रेट फूड्स शामिल हैं।
  • एंटी-इंफ्लामेट्री डाइट: एंटी-इंफ्लामेट्री फूड जैसे कि बैरीज़, फैटी फिश, पत्तेदार सब्जियां और एक्‍स्‍ट्रा वर्जिन ऑयल सूजन से संबंधित लक्षणों (जैसे थकान) को कम कर सकते हैं।
  • डैश डाइट: ये एक ऐसा डाइट प्‍लान है जिसमें ज्‍यादा से ज्‍यादा प्राकृतिक खाद्य पदार्थों जैसे कि सब्जियां, फल, सूखे मेवे, मछली, चिकन, मटन, बींस शामिल होते हैं। इस डाइट में कम फैट वाले डेयरी उत्‍पाद लेते हैं। इसमें नमक या सोडियम का सेवन कम करना होता है। डैश डाइट पीसीओएस के लक्षणों को भी नियंत्रित करने में मदद करती है। 

पीसीओएस में गुड फैट:

भोजन में अधिक मात्रा में सैचुरेटेड और ट्रांस फैट लेने की वजह से वजन बढ़ने, हाई ब्‍लड प्रेशर और हाई कोलेस्‍ट्रोल की दिक्‍कत हो सकती है। इसलिए अपने आहार में ऐसी चीज़ों को शामिल करने से बचें। इनकी जगह स्वस्थ असंतृप्त वसा की कम को मात्रा चुनें जो कि वेजिटेबल ऑयल्‍स जैसे कि कैनोला तेल और जैतून के तेल, एवोकैडो और नट्स में पाया जाता है।

फाइबरयुक्‍त आहार:

ज्‍यादा से ज्‍यादा फाइबर खाने से ब्‍लड शुगर लेवल को नियंत्रित करने और कोलेस्‍ट्रोल को कम करने में मदद मिलती है। इसके अलावा फाइबर युक्‍त भोजन करने से पेट लंबे समय तक भरा हुआ महसूस करता है जिससे भूख कम लगती है और आप कम खाना खाते हैं। इससे वजन को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। प्रतिदिन 21 से 25 ग्राम फाइबर खाएं। 

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बैरीज़, नाशपाती, संतरा, अंजीर, किवी, पालक, ब्रोकली, दालें, छोले, सोयाबीन, राजमा खाएं। इसके अलावा गेहूं की भूसी से बने अनाज, साबुत अनाज जई, सूखे मेवे, बीज (जैसे बादाम, अलसी, सूरजमुखी के बीज) जरूर खाएं।

प्रोटीन से भरा भोजन:

फाइबर की तरह प्रोटीन भी लंबे समय तक पेट को भरा हुआ रखता है और इससे आपको भूख कम लगती है। वजन को नियंत्रित करने का ये एक महत्‍वपूर्ण तरीका है। अपने प्रत्‍येक भोजन और स्‍नैक में थोड़ा प्रोटीन जरूर रखें। प्रोटीन में चिकन, बीफ या मछली ले सकते हैं, वहीं शाकाहारी महिलाओं के लिए दालें, सोया, चौथाई कप नट्स या बीज प्रोटीन के बेहतरीन स्रोत हैं। दूध और लो फैट योगर्ट भी प्रोटीन का अच्‍छा स्रोत हैं।

हरी सब्जियां:

अपने आहार में हरी सब्जियों को जरूर शामिल करें। इसमें उच्‍च मात्रा में पोषक तत्‍व और कम कैलोरी मौजूद होती है। इसलिए हरी सब्जियां शरीर को पोषण देने के साथ-साथ वजन कम करने में भी मदद करती हैं। पीसीओएस से ग्रस्‍त महिलाओं को हरी सब्जियां जैसे कि काएल या पालक और विटामिन बी से युक्‍त आहार लेने की सलाह दी जाती है।

पीसीओएस से ग्रस्‍त 80 फीसदी महिलाओं में विटामिन बी की कमी देखी गई है। इस विटामिन की कमी के कारण महिलाओं में इंसुलिन रेजिस्‍टेंस, अनियमित माहवारी, अनचाहे बालों का आना, मोटापा, मां बनने में दिक्‍कत जैसे लक्षण सामने आते हैं। 

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लीन ग्रास-फेड मीट:

किसी भी संतुलित आहार में लीन मीट (कम वसा और उच्‍च मात्रा में प्रोटीन वाला मीट) जरूर होता है। पीसीओडी से ग्रस्‍त महिलाओं के लिए लीन मीट बहुत फायदेमंद होता है। अगर हार्मोनल असंतुलन के कारण वजन कम करने में दिक्‍कत आ रही है तो आपको अपने आहार में लीन मीट को शामिल करना चाहिए।

आहार में वसा की मात्रा का ध्‍यान रखने जितना ही जरूरी है ऑर्गेनिक मांस का सेवन करना। नॉन ऑर्गेनिक मांस (एंटीबायोटिक या विकास हार्मोन के बिना पशुओं द्वारा उत्‍पादित पोल्ट्री, अंडे और डेयरी उत्पाद) में आमतौर पर पशु को दिए जाने वाले उच्‍च स्‍तर के हार्मोन होते हैं और इसका सेवन करने पर इनका सीधा असर मनुष्‍य के हार्मोन लेवल पर पड़ता है। वहीं दूसरी ओर ऑर्गेनिक मांस में पशु हार्मोन का स्‍तर काफी कम होता है इसलिए हार्मोंस के असंतुलन की स्थिति में ये फायदेमंद होता है। 

एंटीऑक्‍सीडेंट्स वाले आहार:

आपको अपने आहार में ऐसी चीज़ों को शामिल करना चाहिए जिसमें एंटीऑक्‍सीडेंट की मात्रा ज्‍यादा हो। इसमें गोजी बैरीज़, ब्‍लूबैरीज, डार्क चॉकलेट और पेकन (छोटा अखरोट) आते हैं एवं इन सभी चीज़ों उच्‍च मात्रा में एंटी-ऑक्‍सीडेंट्स मौजूद होते हैं। वैसे तो एंटीऑक्‍सीडेंट आहार सभी के लिए फायदेमंद होता है लेकिन पीसीओडी की स्थिति में ज्‍यादा लाभकारी सिद्ध होता है।

पीसीओडी से ग्रस्‍त महिलाओं में ऑक्‍सीडेटिव स्‍ट्रेस (शरीर में फ्री रेडिकल्‍स और एंटीऑक्‍सीडेंट्स में असंतुलन) का स्‍तर बहुत ज्‍यादा देखा गया है। आहार में उच्‍च मात्रा में एंटीऑक्‍सीडेंट्स को शामिल कर ऑक्‍सीडेटिव स्‍ट्रेस को कम एवं नियंत्रित किया जा सकता है। इस तरह के खाद्य पदार्थों का चयन करते समय इनका जीआई इंडेक्‍स भी चैक कर लें क्‍योंकि हाई जीआई वाली चीज़ें ब्‍लड शुगर का स्‍तर बढ़ा सकती है। इस वजह से पीसीओएस से ग्रस्‍त महिला में डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है।

पीसीओडी में साबुत अनाज:

पीसीओडी से ग्रस्‍त महिला में सामान्‍य लोगों की तुलना में टाइप 2 डायबिटीज का खतरा चार गुना ज्‍यादा होता है। साबुत अनाज में उच्‍च मात्रा में फाइबर होता है जो कि इंसुलिन के स्‍तर को नियंत्रित करने में मदद करता है।

ब्राउन राइस, गेहूं से बना पास्‍ता, होलव्‍हीट ब्रेड आदि साबुत अनाज में आते हैं। इनका सेवन करने के बाद कार्बोहाइड्रेट देर से रिलीज़ होता है जिससे खून में शुगर धीमी गति से रिलीज़ होता है और ब्‍लड शुगर लेवल नहीं बढ़ता है। 

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संसाधित खाद्य पदार्थ:

संसाधित खाद्य पदार्थों में हाई जीआई होता है जिसका सीधा संबंध इंसुलिन के उत्‍पादन और डायबिटीज से होता है। जैसा कि हमने पहले भी बताया कि पीसीओएस से ग्रस्‍त महिलाओं में डायबिटीज का खतरा ज्‍यादा रहता है इसलिए इन्‍हें अपने आहार में हाई जीआई फूड्स बिलकुल भी नहीं लेने चाहिए। इससे इनका ब्‍लड शुगर लेवल बढ़ सकता है और इन्‍हें डायबिटीज की बीमारी हो सकती है। संसाधिक खाद्य पदार्थों में बिस्‍किट, केक, पैकेटबंद मीट के अलावा कार्बोहाइड्रेट्स जैसे कि सफेद आलू, व्‍हाइट ब्रेड एवं सफेद चावल शामिल हैं।

डेयरी उत्‍पाद:

पीसीओडी में इंसुलिन ग्रोथ फैक्‍टर-1 को समझना बहुत जरूरी है। ये खून में प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला हार्मोन है जो कि शरीर में इंसुलिन की भूमिका और संरचना को प्रभावित करता है। पीसीओएस से ग्रस्‍त महिलाओं में अन्‍य लोगों की तुलना में इंसुलिन ग्रोथ फैक्‍टर-1 का स्‍तर बहुत ज्‍यादा देखा गया है। गाय के दूध से बने उत्‍पादों में मौजूद इंसुलिन ग्रोथ फैक्‍टर-1 की संरचना मनुष्‍य के शरीर के आईएफजी-1 जैसी ही होती है इसलिए गाय के दूध से बने उत्‍पादों का सेवन करने से शरीर में इंसुलिन ग्रोथ फैक्‍टर-1 का स्‍तर बढ़ सकता है।

बैड फैट:

जिन खाद्य पदार्थों में सैचुरेटेड और हाइड्रोजेनिटेड फैट (फूड बनाने के दौरान उनमें हाइड्रोजन मिलाना) होता है वो भी पीसीओएस में फायदेमंद नहीं होते हैं। इनमें क्रीम, चीज़ और वसायुक्‍त लाल मीट और तला हुआ भोजन शामिल है। ये नुकसानदायक वसा शरीर में एस्‍ट्रोजन के उत्‍पादन को बढ़ा देते हैं जिससे पीसीओए के लक्षण और ज्‍यादा दिखने लगते हैं। इसकी वजह से महिलाओं का वजन भी बढ़ सकता है जिसके कारण पीसीओडी के इलाज में और दिक्‍कतें आने लगती हैं।

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सोया उत्‍पाद:

पीसीओएस से ग्रस्‍त महिलाओं में एस्‍ट्रोजन का स्‍तर सामान्‍य से ज्‍यादा हो जाता है। सोया उत्‍पाद एस्‍ट्रोजन के स्‍तर को बढ़ा सकते हैं इसलिए पीसीओएस के मरीज़ों को सोया उत्‍पादों का सेवन कम करना चाहिए। हालांकि, इस विषय में अभी और अध्‍ययन होने की जरूरत है।

ग्‍लूटेन:

पीसीओडी में आपको ग्‍लूटेन रहित खाद्य पदार्थों का ही सेवन करना चाहिए। ग्‍लूटेन की वजह से सूजन हो सकती है जो कि इंसुलिन रेजिस्‍टेंस का रूप ले सकती है और इस वजह से डायबिटीज का खतरा हो सकता है। सूजन की स्थिति में भी अत्‍यधिक मात्रा में एंड्रोजन हार्मोन बनने लगता है जिससे वजन बढ़ता है और अनियमित माहवारी की समस्‍या पैदा होने लगती है। ये दोनों ही पीसीओएस के लक्षण हैं। 

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जीवनशैली में कुछ बदलाव कर के भी पीसीओडी को नियंत्रित किया जा सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि पीसीओएस डाइट के साथ व्‍यायाम की मदद से भी वजन कम करने, इंसुलिन मेटाबोलिज्‍म में सुधार, नियमित माहवारी, लो कोलेस्‍ट्रोल लेवल में मदद मिल सकती है।

पीसीओडी से ग्रस्‍त महिलाएं सुबह के समय नाश्‍ता जरूर करें और रोज़ व्‍यायाम करें। तनाव से दूर रहें, थोड़े-थोड़े समय में कुछ न कुछ खाती रहें और आवश्यक जड़ी बूटियों एवं सप्‍लीमेंट्स का सेवन करें। 

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