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एएफपी का पूरा नाम एल्फा-फेटोप्रोटीन है। यह प्रोटीन विकसित हो रहे भ्रूण के लीवर में बनता है। गर्भावस्था में, जब बच्चा विकसित हो रहा होता है तो उस दौरान कुछ एएफपी प्लेसेंटा से होकर मां के खून तक पहुंच जाता है। एएफपी टेस्ट के माध्यम से गर्भवती महिला में दूसरी तिमाही के दौरान एएफपी के लेवेल को मापा जाता है। गर्भवती महिला में बहुत अधिक एएफपी या फिर बहुत कम एएफपी की मात्रा गर्भ में पल रहे बच्चे में जन्मदोष या फिर किसी अन्य तरह के दोष का संकेत हो सकती है, जैसे:

  • नेचुरल ट्यूब डिफेक्ट:
    यह एक तरह की गंभीर स्थिति है, जिसमें गर्भ में पल रहे बच्चे के दिमाग और स्पाइन के असाधारण रूप से विकसित होने का कारण हो सकती है। 
     
  • डाउन सिंड्रोम:
    यह एक तरह का जेनिटिक डिसऑर्डर है, जिसके कारण बच्चे में बौद्धिक रुप से कमजोरी और विकास में देरी हो सकती है। 
     
  • जुड़वा या एक से अधिक बच्चों का जन्म:
    गर्भ में एक से अधिक बच्चे पलने के कारण गर्भ में एक से अधिक बच्चे एएफपी बना रहे होते हैं। 
     
  • गर्भावस्था की सही तारीख का पता न होना:
    कई बार महिलाएं गर्भावस्था के समय की गलत काउंटिग करती हैं। क्योंकि गर्भावस्था के अलग-अलग समय में एएफपी अलग-अलग मात्रा में तैयार होती है।

(और पढ़ें - गर्भावस्था में देखभाल कैसे करें)

  1. एएफपी ब्लड टेस्ट क्या होता है? - What is Alpha Fetoprotein Test?
  2. एएफपी ब्लड टेस्ट क्यों किया जाता है? - What is the purpose of Alpha Fetoprotein Test?
  3. एएफपी ब्लड टेस्ट के दौरान - During Alpha Fetoprotein test in Hindi
  4. एएफपी ब्लड टेस्ट के क्या जोखिम होते हैं? - What are the risks of Alpha Fetoprotein Test in Hindi?
  5. एएफपी टेस्ट के परिणाम का क्या मतलब होता है? - What do the results of Alpha Fetoprotein Test in Hindi?

एएफपी टेस्ट गर्भ में पल रहे भ्रूण में नेचुरल ट्यूब डिफेक्ट्स या डाउन सिंड्रोम जैसे किसी जन्मदोष के खतरे की जांच के लिए किया जाता है। इस टेस्ट से यह पता किया जाता है कि गर्भ में पल रहे बच्चे में किसी तरह का कोई दोष तो नहीं है। अगर बच्चे में किसी तरह का दोष है तो समय रहते इसका इलाज किया जाता है। इसके अलावा अगर गर्भ में पल रहे बच्चे में कोई लाइलाज गंभीर बीमारी है तो शुरुआती दौर में ही डॉक्टरों के सलाह-मशवरे से गर्भावस्था को टर्मिनेट किया जा सकता है। हालांकि दुर्लभ मामलों में ऐसा होता है।

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अमेरिका के प्रेगिनेंसी एसोसिएट्स का कहना है कि सभी गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के 15वें से लेकर 20वें सप्ताह के बीच किसी भी समय एएफपी टेस्ट करवा लेना चाहिए।

आपको यह टेस्ट करवा लेना चाहिए अगर:

  • आपके परिवार में किसी को जन्मदोष रहा हो।
  • आप 35 या फिर उससे अधिक की उम्र के हैं।
  • आपको डायबटीज है।

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टेस्ट के समय लैब में सूई से आपके हाथ से थोड़ा सा खून निकाला जाता है। इसके लिए सुई चुभोने से पहले डॉक्टर आपकी बांह के ऊपर एक इलास्टिक बैंड बांध देते हैं। इससे उस जगह से खून का प्रवाह रुक जाता है। खून का प्रवाह रुक जाने से वहां पर नसें फूल आती हैं जिससे नसों से खून का नमूना लेना आसान हो जाता है। इसके बाद डॉक्टर सुई से थोड़ा सा खून निकालकर उसे किसी छोटी सी शीशी में इकट्ठा कर लेते हैं। सूई के चुभोए जाने के समय या फिर सूई को बाहर निकालते समय आपको थोड़ा सा दर्द जरूर हो सकता है। इस पूरी प्रक्रिया में सामान्यत: 5 मिनट से भी कम का समय लगता है।

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एएफपी टेस्ट के लिए खून निकालने में बहुत कम खतरा है। खून लेने के बाद सूई चुभोए जाने पर आप थोड़ा सा बेहोशी महसूस करने के साथ सूई चुभोई जाने वाली जगह पर आपको थोड़ी सी तकलीफ हो सकती है। इस प्रक्रिया में खून बहने या हेमाटोमा की संभावना बहुत कम है। ये सब उस स्थिति में होते हैं, जब आपकी स्किन के नीचे खून जमा हो जाता है। सूई चुभोए जाने वाली जगह पर इन्फेक्शन का भी बहुत कम खतरा रहता है।

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एएफपी टेस्ट के नेगेटिव या नार्मल आने का मतलब है कि आपका बच्चा स्वस्थ है। जबकि अगर एएफपी टेस्ट पॉजिटिव आता है तो इसका मतलब है कि आपको स्पाइना बाईफिडा जैसा कोई जन्मजात दोष है। ये एएफपी का स्तर 2.5 गुना या औसत स्तर से अधिक होने का परिणाम है। एएफपी टेस्ट के नेगेटिव आने के बाद डॉक्टर बच्चे में जन्मदोष या उससे जुड़ी अन्य जानकारी के लिए और जांच करवाने की सलाह दे सकते हैं।

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