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लिवर में होने वाली सूजन को हेपेटाइटिस के नाम से जाना जाता है। ये बीमारी हेपेटाइटिस वायरसके संक्रमण के कारण होती है। वायरल हेपेटाइटिस के प्रमुख पांच प्रकार हैं जिनमें हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी और ई शामिल हैं।

हेपेटाइटिस ए और हेपेटाइटिस बी बासी या दूषित भोजन एवं पानी के सेवन के कारण होता है जबकि हेपेटाइटिस सी और हेपेटाइटिस डी संक्रमित व्‍यक्‍ति के साथ यौंन संबंध बनाने या संक्रमित शरीर के फ्लूइड (तरल पदार्थ) के सीधे संपर्क में आने के कारण फैलता है।

हेपेटाइटिस बी भी संक्रमित व्‍यक्‍ति के यौन संपर्क में आने से फैलता है। हालांकि, जन्‍म के दौरान मां से शिशु के अंदर भी संक्रमित खून द्वारा ये वायरस फैल सकता है। इसके अलावा टैटू और एक्यूपंक्चर से भी इस बीमारी का खतरा रहता है। शुरुआत में हेपेटाइटिस बी का कोई लक्षण सामने नहीं आता है लेकिन 8 से 10 साल के अंदर ये समस्‍या लीवर सिरोसिस या लिवर कैंसर का रूप ले सकती है।

(और पढ़ें - हेपेटाइटिस बी टेस्ट क्या है)

शराब के सेवन, किसी अन्‍य संक्रमण और ऑटोइम्‍यून रोगों (जिसमें इम्‍यून सिस्‍टम स्‍वयं शरीर पर हमला कर देता है) के कारण हेपेटाइटिस रोग हो सकता है। अधिक मात्रा में, रोज़ या लंबे समय तक किसी दवा का सेवन करने पर भी लिवर में सूजन की शिकायत हो सकती है।

हेपेटाइटिस को दो भागों - तीव्र और जीर्ण के रूप में वर्गीकृत किया गया है। तीव्र हेपेटाइटिस 6 माह से कम अवधि तक होता है जबकि जीर्ण हेपेटाइटिस इससे अधिक समय तक रहता है। आमतौर पर हेपेटाइटिस बी और सी जीर्ण हेपेटाइटिस का रूप लेते हैं।

आयुर्वेद में ऐसे उपचार, जड़ी बूटियों और औषधियों का उल्‍लेख किया गया है जिनका इस्‍तेमाल लिवर विकारों (जैसे कि हेपेटाइटिस) के इलाज के लिए किया जा सकता है। हेपेटाइटिस के आयुर्वेदिक इलाज में दीपन (भूख बढ़ाना), पाचन (पाचक), स्‍नेहन (तेल से चिकनाहट लाने की विधि), स्‍वेदन (पसीना निकालने की विधि), वमन (औषधियों से उल्‍टी लाने की विधि), विरेचन (दस्‍त की विधि), बस्‍ती (एनिमा) और रक्‍तमोक्षण (रक्‍त निकालने की विधि) चिकित्‍सा दी जाती है।

हेपेटाइटिस के इलाज के लिए इस्‍तेमाल होने वाली जड़ी बूटियों और औषधियों में कुटकी, कालमेघ, कुमारी (एलोवेरा), पुनर्नवा, काकमाची (मकोय), गुडूची, दारुहरिद्रा, आरोग्‍यवर्धिनी वटी, कुमारी आसव और पुनर्नवासव शामिल हैं।

  1. आयुर्वेद के दृष्टिकोण से हेपेटाइटिस - Ayurveda ke anusar Hepatitis
  2. लिवर में सूजन का आयुर्वेदिक इलाज - Hepatitis ka ayurvedic ilaj
  3. हेपेटाइटिस की आयुर्वेदिक दवा, जड़ी बूटी और औषधि - Liver me sujan ki ayurvedic dawa aur aushadhi
  4. आयुर्वेद के अनुसार लिवर में सूजन होने पर क्या करें और क्या न करें - Ayurved ke anusar Hepatitis hone par kya kare kya na kare
  5. लिवर में सूजन की आयुर्वेदिक दवा कितनी लाभदायक है - Liver me sujan ka ayurvedic upchar kitna labhkari hai
  6. हेपेटाइटिस की आयुर्वेदिक औषधि के नुकसान - Hepatitis ki ayurvedic dawa ke side effects
  7. हेपेटाइटिस के आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट से जुड़े अन्य सुझाव - Hepatitis ke ayurvedic ilaj se jude anya sujhav
  8. हेपेटाइटिस की आयुर्वेदिक दवा और इलाज के डॉक्टर

आयुर्वेद के अनुसार हेपेटाइटिस बी समेत लिवर से संबंधित सभी समस्‍याएं स्‍थानदुष्टि (लिवर के खराब होने के कारण) की वजह से पैदा होती हैं। सभी प्रकार की लिवर से जुड़ी बीमारियां पित्त दोष के असंतुलित या खराब होने के कारण होती हैं। अत्‍यधिक पित्त के उत्‍पादन या पित्त के स्राव में रुकावट आने की वजह से पित्त दोष असंतुलित होने लगता है।

असंतुलित पित्त दोष अग्नि (पाचन अग्‍नि) को प्रभावित करता है और इसकी वजह से पाचन तथा पोषण को अवशोषित करने जैसी विभिन्‍न चयापचय प्रक्रियाओं में दिक्‍कतें आने लगती हैं। ये सभी समस्‍याएं हेपेटाइटिस, सिरोसिस और फैटी लिवर जैसे लिवर रोगों का रूप ले लेती हैं।

लक्षण के आधार पर लिवर रोगों को निम्‍न प्रकार से वर्गीकृत किया गया है:

  • रूधपथ कमला (लिवर में पित्त का जमना): ये त्रिदोष (वात, पित्त और कफ) के खराब होने के कारण होता है। सूखे, ठंडे, भारी और मीठे खाद्य पदार्थों के सेवन, अत्‍यधिक व्यायाम एवं प्राकृतिक इच्‍छाओं जैसे कि मल त्‍याग तथा पेशाब को रोकने के कारण वात और कफ खराब होने लगता है जिससे लिवर की पित्त नाडियों में रुकावट आने लगती है। (और पढ़ें - पेशाब रोकने के नुकसान)
  • बहुपित्त कमला (हेपेटाइटिस): रक्‍त और मम्‍सा धातु के खराब होने के साथ पित्त में गड़बड़ी आने पर हेपेटाइटिस रोग होता है। गर्म, कड़वा और मसालेदार खाना खाने की वजह से हेपेटाइटिस की समस्‍या हो सकती है। हेपेटाइटिस के लक्षणों में नाखूनों, आंखों, त्‍वचा, पेशाब और मल का रंग पीला पड़ना, त्‍वचा का रंग फीका पड़ना, कमजोरी, बदन दर्द, बुखार और स्‍वाद में कमी आना शामिल है। (और पढ़ें - मसालेदार खाने के नुकसान
  • कुंभ कामला: अगर तुरंत इस बीमारी का इलाज न किया जाए तो ये लिवर सिरोसिस का रूप ले सकती है।
  • हलीमक: एनीमिया के बढ़ने पर हलीमक होता है। ये समस्‍या वात और पित्त दोनों के खराब होने पर होती है। (और पढ़ें - वात पित्त और कफ क्या है)

वैसे तो पारंपरिक औषधि, एलोपैथी उपचार से हेपेटाइटिस का इलाज किया जाता है लेकिन ये चिकित्‍साएं बहुत महंगी होती हैं और इलाज लेने वाले केवल 30 फीसदी मरीज़ों को ही बीमारी से छुटकारा मिलता है। हेपेटाइटिस का आयुर्वेदिक इलाज बहुत किफायती है और इसमें लिवर से जुड़ी किसी भी समस्‍या या रोग को दूर करने के लिए लिवर तथा शरीर की अन्‍य प्रणालियों को मजबूती प्रदान की जाती है।

  • दीपन और पाचन
    • प्रमुख चिकित्‍सा से पहले दीपन और पाचन कर्म किया जाता है।
    • इसमें चयापचय अग्नि को ठीक करने के लिए जड़ी बूटियों और औषधियों का इस्‍तेमाल किया जाता है जिससे भूख बढ़ती है एवं पाचन प्रक्रिया में सुधार आता है। (और पढ़ें - भूख बढ़ाने का उपाय)
    • ये शरीर से अमा (विषाक्‍त पदार्थ) को भी बाहर निकालता है।
    • दीपन या पाचन कर्म में अग्नि (पाचन अग्‍नि) को उत्तेजित एवं पाचन में सुधार लाने के लिए घी दिया जाता है।
    • भूख बढ़ाने और पाचन में सुधार लाने के लिए शुंथि, घृत, दशमूलारिष्‍ट, पिप्‍पल्‍यादि घृत और चित्रकादि वटी जैसी औषधियों की सलाह दी जाती है।
       
  • स्‍नेहन कर्म
    • स्‍नेहन में औषधीय तेलों से शरीर को चिकना किया जाता है। हेपेटाइटिस के इलाज में बाहरी और अंदरूनी तौर पर शरीर में चिकनाहट लाई जाती है।
    • अंदरूनी स्‍वेदन में तेल पिलाया जाता है जिसे स्‍नेहपान के नाम से जानते हैं।
    • स्‍नेहन और स्‍नेहपान से शरीर की विभिन्‍न नाडियों से अमा को पतला कर के पाचन मार्ग में लाया जाता है। अमा और बढ़े हुए दोष को पंचकर्म थेरेपी के वमन एवं विरेचन तथा बस्‍ती कर्म द्वारा पाचन मार्ग से बाहर निकाल दिया जाता है।
    • हेपेटाइटिस के इलाज में स्‍नेहपान के लिए कल्याणक घृत, महातिक्‍त घृत और पंचतिक्‍त घृत का इस्‍तेमाल किया जाता है।
       
  • स्‍वेदन कर्म
    • स्‍वेदन चिकित्‍सा में विभिन्‍न तरीकों से शरीर पर पसीना लाया जाता है।
    • इसमें अमा को पतला कर के उसे पाचन मार्ग में लाया जाता है जहां से उसे आसानी से शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
    • ये शरीर में अकड़न और भारीपन से भी राहत दिलाने में मदद करता है।
       
  • वमन कर्म
    • पंचकर्म थेरेपी में से एक वमन में उल्‍टी लाने के लिए जड़ी बूटियों का इस्‍तेमाल किया जाता है।
    • इससे शरीर से अमा और बढ़े हुए दोष को साफ करने में मदद मिलती है।
    • प्रमुख तौर पर इस चिकित्‍सा का इस्‍तेमाल बढ़े हुए कफ और पित्त के कारण उत्‍पन्‍न हुई समस्‍याओं के इलाज के लिए किया जाता है।
       
  • विरेचन कर्म
    • विरेचन में दस्त और बढ़े हुए दोष को हटाने एवं गुदा मार्ग के ज़रिए अमा को बाहर निकालने के लिए जड़ी बूटियों या औषधियों का सेवन करवाया जाता है।
    • प्रमुख तौर पर इसका इस्‍तेमाल अत्‍यधिक पित्त दोष को साफ करने के लिए किया जाता है लेकिन ये अन्‍य दोषों के बढ़ने के कारण हुए रोगों के इलाज में भी असरकारी है।
       
  • बस्‍ती कर्म
    • बस्‍ती एक आयुर्वेदिक एनिमा थेरेपी है जिसमें गुदा मार्ग के ज़रिए आंतों में जड़ी बूटियां डाली जाती हैं।
    • ये आंतों और मलाशय को साफ करता है और बढ़े हुए दोष एवं अमा को हटाता है जो कि अधिकतर रोगों का प्रमुख कारण है।
    • रेचन के लिए इस्‍तेमाल होने वाली जड़ी बूटियों में दशमूल, वच, रसना और कुठ का नाम शामिल है।
    • ये चिकित्‍सा जठरांत्र, मूत्रजननांगी और न्‍यूरोमस्‍कुलर रोगों (नसों और मांसपेशियों से संबंधित) के इलाज में उपयोगी है।
       
  • रक्‍तमोक्षण
    • रक्‍तमोक्षण में किसी धातु के उपकरण, जोंक, गाय के सींग या सूखे करेले द्वारा अशुद्ध और विषाक्‍त खून को शरीर से बाहर निकाला जाता है।
    • ये रक्‍त जनित रोगों, पित्त प्रधान बीमारियों और कुछ वात रोगों के इलाज में उपयोगी है।
    • इस चिकित्‍सा से पीलिया, एक्जिमा, तिल के निशान, विटिलिगो (सफेद दाग), स्‍कैबीज, मुंह के छाले या सूजन और गठिया का इलाज किया जा सकता है।

हेपेटाइटिस के लिए आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां

  • कटुकी 
    • कटुकी उत्‍सर्जन, स्‍त्री प्रजनन, तंत्रिका, परिसंचरण और पाचन तंत्र पर कार्य करती है। इसमें रेचक और भूख बढ़ाने वाले गुण मौजूद हैं।
    • ये जठरांत्र प्रणाली में पित्त रस के रिसाव को बढ़ाती है। ये हेपेटाइटिस जैसे लिवर रेागों के इलाज में उपयोगी है।
    • कटुकी अत्‍यधिक पित्त के स्राव के कारण होने वाले बुखार, मिर्गी और कब्ज को भी दूर करती है।
    • अर्क, अपमिश्रण, पाउडर या गोली के रूप में कटुकी का इस्‍तेमाल कर सकते हैं।
       
  • कालमेघ
    • कालमेघ लंबे समय से हो रहे बुखार को ठीक करने और अत्‍यधिक पित्त को साफ करने में उपयोगी है।
    • ये दस्‍त लाने और कीड़ों को खत्‍म करने में मदद करती है। दीपन कर्म में भी इसका इस्‍तेमाल किया जा सकता है। (और पढ़ें - पेट के कीड़े मारने के उपाय)
    • ये जड़ी बूटी प्‍लीहा और पाचन तंत्र के कार्य में सुधार लाती है।
    • कटुकि के चूर्ण को पानी, शहद या गन्ने के जूस के साथ या चिकित्‍सक के निर्देशानुसार ले सकते हैं।
       
  • कुमारी
    • कुमारी परिसंचरण, स्‍त्री प्रजनन प्रणाली, तंत्रिका, पाचन और उत्‍सर्जन प्रणाली पर कार्य करती है। इसमें तीखे शक्‍तिवर्द्धक, कृमिनाशक (कीड़ें नष्‍ट करने वाले), ऊर्जादायक, रेचक और उत्तेजक गुण होते हैं।
    • ये बढ़े हुए वात को साफ करती है और कब्‍ज, पीलिया, हेपेटाइटिस, लिवर बढ़ने, किडनी संबंधित विकारों, कान में संक्रमण एवं मोटापे जैसे अनेक रोगों के इलाज में मदद करती है।
    • अवलेह, पाउडर, काढ़े, पेस्‍ट, पल्‍प, हर्बल वाइन या जूस के रूप में इसका इस्‍तेमाल कर सकते हैं।
       
  • पुनर्नवा
    • पुनर्नवा स्‍त्री प्रजनन प्रणाली, पाचन, श्‍वसन, परिसंचरण और तंत्रिका तंत्र पर कार्य करती है। इसमें भूख बढ़ाने वाले, रेचक, ऊर्जादायक, कफ-निस्‍सारक (बलगम साफ करने वाले) और पसीना लाने वाले गुण होते हैं।
    • ये ह्रदय रोगों, किडनी से संबंधित विकारों और शराब की लत को नियंत्रित करने में उपयोगी है।
    • पुनर्नवा के पौधे की पत्तियों से बना रस पीलिया के इलाज में उपयोगी है।
    • पुनर्नवा का इस्‍तेमाल जूस, काढ़े, अर्क, पेस्‍ट और पाउडर के रूप में कर सकते हैं।
       
  • काकमाची
    • काकमाची प्रजनन और परिसंचरण तंत्र पर कार्य करती है। इसमें नींद लाने वाले, कफ-निस्‍सारक, शक्‍तिवर्द्धक, मूत्रवर्द्धक और पसीना लाने वाले गुण होते हैं।
    • हृदय रोग, त्‍वचा रोगों, सूजन, प्‍लीहा और लिवर के बढ़ने, हेपेटाइटिस एवं बुखार जैसी स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं को नियंत्रित करने के लिए इसका इस्‍तेमाल किया जा सकता है।
    • इस जड़ी बूटी का इस्‍तेमाल अर्क, पुल्टिस, पत्तियों, सिरप, काढ़े और पाउडर के रूप में किया जा सकता है।
       
  • गुडूची
    • गुडूची परिसंचरण और पाचन प्रणाली पर कार्य करती है। इससे बार-बार पेशाब आता है और पाचन में सुधार लाने में मदद मिलती है। (और पढ़ें - पाचन क्रिया कैसे सुधारे)
    • ये जड़ी बूटियां कई रोगों के लक्षणों को वापिस आने से रोकती है। प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करने वाली जड़ी बूटियों में गुडूची प्रमुख है एवं इसे खून साफ करने वाली जड़ी बूटी के रूप में भी जाना जाता है। (और पढ़ें खून साफ करने के घरेलू उपाय)
    • पीलिया और हेपेटाइटिस जैसे पित्त विकारों को भी ठीक करने में गुडूची असरकारी है।
    • टीबी, एचआईवी एड्स और कैंसर के कारण होने वाली कमजोरी को दूर करने में गुडूची मदद करती है।
    • अर्क और पाउडर के रूप में गुडूची ले सकते हैं।
       
  • दारुहरिद्रा
    • दारुहरिद्रा परिसंचरण और पाचन तंत्र पर कार्य करती है। इसमें लिवर को सुरक्षा देने वाले, कड़वे शक्‍तिवर्द्धक, भूख बढ़ाने वाले, मूत्रवर्द्धक और बुखार कम करने वाले गुण होते हैं।
    • ये प्रमुख तौर पर पित्त और मूत्र से संबंधित समस्‍याओं को दूर करने के लिए इस्‍तेमाल की जाती है।
    • ये अमा और अत्‍यधिक पित्त को साफ करती है इसलिए पीलिया एवं हेपेटाइटिस के इलाज में दारुहरिद्रा असरकारी होती है।
    • दारुहरिद्रा लिवर के कार्य को नियंत्रित करती है और प्‍लीहा एवं लिवर के बढ़ने, लिवर में सूजन, किडनी स्‍टोन, गैस्‍ट्रिक तथा ड्योडनल अल्‍सर जैसी समस्‍याओं के इलाज में मदद करती है।
    • काढ़े, पाउडर, औषधीय घी और पेस्‍ट के रूप में इसका इस्‍तेमाल किया जा सकता है।

हेपेटाइटिस के लिए आयुर्वेदिक औषधियां

  • आरोग्‍यवर्धिनी वटी
    • लिवर से संबंधित विकारों के इलाज में आरोग्‍यवर्धिनी वटी का इस्‍तेमाल किया जा सकता है। ये औषधि विभिन्‍न दोषों को संतुलित कर सेहत में सुधार लाती है।
    • इस मिश्रण में मुख्‍य सामग्री कुटकी है जो कि लिवर पर असर कर के पित्त रस के उत्‍पादन को उत्तेजित करती है।
    • इसके अलावा आरोग्‍यवर्धिनी वटी में शिलाजीत और ताम्र भस्‍म (तांबे को ऑक्सीजन और वायु में उच्च तामपान पर गर्म करके तैयार हुई) भी मौजूद है जो कि अत्‍यधिक पित्त को लिवर से आंतों की ओर स्रावित करता है। इस पित्त को विभिन्‍न चिकित्‍साओं द्वारा शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
    • एंटीऑक्सीडेंट और लिवर को सुरक्षा देने वाले गुणों के कारण ये मिश्रण लिवर के कार्य में सुधार लाने में भी उपयोगी है। ये खासतौर पर हेपेटाइटिस बी को नियंत्रित करने में उपयोगी है।
    • आरोग्‍यवर्धिनी वटी रक्‍त धातु पर असर करती है और लिवर को मजबूती प्रदान करती है।
    • ये परिसंचरण नाडियों की सफाई, शरीर में वसा के वितरण को संतुलित करने, पाचन अग्‍नि को उत्तेजित करने और शरीर से अमा को बाहर निकालने में मदद करती है।
    • लिवर संबंधित समस्‍याओं में सुधार लाने के लिए इस औषधि को कम से कम 7 से 8 महीनों तक लेना चाहिए। चिकित्‍सक की सलाह पर उपचार के बाद भी इस दवा का सेवन कर सकते हैं।
       
  • कुमारी आसव
    • इस मिश्रण में कुमारी, गोक्षुरा, कुठ, बाला, कटुकी, आमलकी, त्रिकटु (पिप्पली, शुंथि [सोंठ] और मारीच [काली मिर्च] का मिश्रण) एवं हल्दी मौजूद है।
    • कुमारी जड़ी बूटी को लिवर के लिए लाभकारी माना जाता है।
    • हेपेटाइटिस बी संक्रमण के उपचार की अवधि को कम करने के लिए आरोग्‍यवर्धिनी वटी के साथ इस मिश्रण को ले सकते हैं।
    • ये भूख में सुधार लाने में मदद करता है और एनोरेक्सिया के इलाज में असरकारी है।
    • गैस्ट्रिक और ड्योडनल अल्‍सर, पेट फूलने एवं किडनी स्‍टोन के इलाज में भी कुमारी आसव का इस्‍तेमाल कर सकते हैं।
       
  • पुनर्नवासव
    • इस मिश्रण में पुनर्नवा, नीम, गुडूची, अरंडी, गोक्षुरा, त्रिकटु और शहद मौजूद है। इस मिश्रण का प्रमुख तत्‍व पुनर्नवा है जो कि हेपेटाइ‍टिस और पीलिया के इलाज में असरकारी है।
    • इस मिश्रण का इस्‍तेमाल लिवर से संबंधित विकारों, बुखार, प्‍ली‍हा विकारों और एनीमिया को नियंत्रित करने के लिए किया जा सकता है।

व्‍यक्‍ति की प्रकृति और कई कारणों के आधार पर चिकित्‍सा पद्धति निर्धारित की जाती है। उचित औषधि और रोग के निदान हेतु आयुर्वेदिक चिकित्‍सक से परामर्श करें।

क्‍या करें

क्‍या न करें

एक चिकित्‍सकीय अध्‍ययन में तीव्र हेपेटाइटिस बी से ग्रस्‍त 200 प्रतिभागियों को शामिल किया गया था। इस अध्‍ययन में कटुकी, कालमेघ, भूमि आमलकी, गुडूची, पुनर्नवा, भृंगराज और दारुहरिद्रा से युक्‍त आयुर्वेदिक मिश्रण के लिवर पर होने वाले असर की जांच की गई।

लक्षणों और लिवर फंक्‍शन टेस्‍ट के आधार पर इन प्रतिभागियों में हेपेटाइटिस बी की पुष्टि की गई थी। आयुर्वेदिक मिश्रण लेने वाले प्रतिभागियों को हेपेटाइटिस बी के लक्षणों से 90 प्रतिशत राहत मिली और इसका कोई दुष्‍प्रभाव भी सामने नहीं आया। अध्‍ययन में बताया गया कि इस मिश्रण में इस्‍तेमाल की गई जड़ी बूटियां हेपेटाइटिस बी को नियंत्रित करने में असरकारी हैं।

(और पढ़ें - हेपेटाइटिस बी में क्या खाना चाहिए)

कई वर्षों से विभिन्‍न रोगों के इलाज के लिए आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों और औषधियों का इस्‍तेमाल किया जाता रहा है। वैसे तो आयुर्वेदिक उपचार सुरक्षित होता है लेकिन मरीज़ की स्थिति और प्रकृति के आधार पर कुछ हानिकारक प्रभाव सामने आ सकते हैं। उदाहरण के तौर पर:

  • बच्‍चों, बुजुर्गों और कार्डियोवस्‍कुलर रोगों से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति को वमन कर्म नहीं देना चाहिए।
  • बच्‍चों, वृद्ध और कमजोर व्‍यक्‍ति एवं गर्भवती महिला को विरेचन की सलाह नहीं दी जाती है।
  • गुदा में सूजन, आंत्र रुकावट और छिद्र, एनीमिया एवं हैजा से पीडित व्‍यक्‍ति को बस्‍ती कर्म नुकसान पहुंचा सकता है।
  • बवासीर, एनीमिया और ब्‍लीडिंग संबंधित विकारों में रक्‍तमोक्षण की सलाह नहीं दी जाती है।
  • गर्भावस्‍था में कुमारी का इस्‍तेमाल नहीं करना चाहिए।
  • अत्‍यधिक वात की स्थिति में दारु हरिद्रा का इस्‍तेमाल सावधानीपूर्वक करना चाहिए।

खराब जीवनशैली, खानपान से संबंधित गलत आदतों और माता-पिता के संक्रमित रक्‍त के कारण हेपेटाइटिस हो सकता है। आयुर्वेदिक उपचार से अधिकतर रोगों की जड़ बनने वाले विषाक्‍त रक्‍त, अमा और बढ़े हुए दोष को शरीर से साफ किया जा सकता है।

आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां और औषधियां सूजन को कम करने और शरीर को मजबूती देने में भी मदद करती हैं। आयुर्वेदिक उपचार के साथ आहार और जीवनशैली में कुछ बदलाव कर के लिवर रोग पैदा करने वाले कारणों का इलाज किया जा सकता है। इससे रोग के लक्षणों से भी राहत मिलती है और बीमारी के दोबारा होने का खतरा भी दूर होता है।

(और पढ़ें - लिवर रोग के कारण)

Dr. Hari Om Verma

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आयुर्वेदा

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