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कई बच्चे देरी से बोलना सीखते हैं जिसकी वजह से उसके माता-पिता घबरा जाते हैं। आपको बता दें कि ज्यादातर जिन बच्चों को बोलना शुरू करने में देरी होती है, वे कुछ समय के बाद बिना किसी मदद के बोलना शुरू कर देते हैं।

बच्चे के देर से बोलने के कई कारण हो सकते हैं। हर बच्चे का शारीरिक विकास अलग-अलग होता है। यदि आपका बच्चा भी अन्य बच्चों की अपेक्षा देरी से बोलता है तो ऐसे में आपको घबराने की बजाय सबसे पहले उसकी समस्या के सही कारणों का पता लगाना चाहिए।

(और पढ़ें - बच्चों के बोलने की सही उम्र)

इस लेख में आपको बच्चे के देर के बोलने की समस्या के विषय में बताया गया है। साथ ही आपको बच्चे के देरी से बोलने के लक्षण, बच्चे के देरी से बोलने के कारण और बच्चे के देरी से इलाज आदि विषयों के बारे में बताया जा रहा है।

(और पढ़ें - बच्चों की देखभाल)

  1. बच्चे के देरी से बोलने की जांच - Bache ke deri se bolne ke liye test
  2. बच्चों का देर से बोलने का इलाज - Bacho ka der se bolne ka ilaj
  3. बच्चे के बोलने में देरी के घरेलू उपाय - Bache ke bolne me deri ke gharelu upay
  4. बच्चा का देरी से बोलने का क्या मतलब होता है - Bacho ka deri se bolne ka kya matlab hota hai
  5. बच्चे के देर से बोलने के लक्षण - Bache ke der se bolne ke lakshan
  6. बच्चे के देरी से बोलने के कारण - Bache ke deri se bolne ke karan
  7. बच्चे का देरी से बोलना के डॉक्टर

देरी से बोलने वाले बच्चे का इलाज करने से पहले डॉक्टर उसकी समस्या की जांच करने की सलाह देते हैं। इसकी जांच भाषा विशेषज्ञ करते हैं, जिसमें वह बच्चे के बोलने और समझने वाले शब्दों और भाषा की जांच करते हैं। भाषा और बोली की पूरी जांच करने के बाद भाषा विशेषज्ञ अन्य टेस्ट करने का सुझाव देते हैं, जैसे, सुनने की क्षमता की जांच से सुनने की परेशानी का पता चलता है। कई बार काफी छोटा होने के कारण बच्चो में सुनने की समस्या का पता नहीं चल पाता है।  

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बच्चे के देर से बोलने की समस्या को दूर करने के लिए स्पीच थेरेपी का सहारा लिया जा सकता है। कई बार बच्चे की शारीरिक जांच और सुनने की क्षमता का टेस्ट भी समस्या को उजागर करने के लिए काफी नहीं होते हैं। इस स्थिति में भाषा विशेषज्ञ अपना अहम रोल अदा करते हैं। देरी से बोलने का इलाज धीरे-धीरे किया जाता है। इसमें सबसे पहले थेरेपिस्ट बच्चे की समस्या का कारण पता लगाने के लिए उसके बोलने के तरीके समझते हैं, जिसके बाद वह इलाज की योजना तय करते हैं। इसके इलाज में सांस संबंधी एक्सरसाइज, बोलने संबंधी एक्सरसाइज और बोलते समय बच्चे की मांसपेशियों को आराम देने पर जोर दिया जाता है। यह सभी एक्सरसाइज मुंह की मांसपेशियों के लिए की जाती हैं।

(और पढ़ें - थेरेपी के फायदे)

अगर आपका बच्चा देरी से बोलता है तो आप उसकी इस समस्या के लिए निम्न तरह के घरेलू उपायों को आजमा सकती हैं।

  • इस परेशानी को दूर करने के लिए आप बच्चे के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं। (और पढ़ें - बच्चों की इम्यूनिटी कैसे बढ़ाएं)
  • बच्चे के साथ कोई गेम खेले। गेम के दौरान बच्चे के साथ ज्यादा से ज्यादा बात करते रहें।
  • आप बच्चे के लिए लोरी गाएं या कुछ ऐसा करें जो उसको अच्छा लगता हो। (और पढ़ें - शिशु के दस्त का इलाज)
  • बच्चे के साथ खिलौने वाले फोन से खेलें, इससे आपका बच्चा बोलना सीखेगा।
  • जब भी आपका बच्चा कुछ बोलें, उससे सवाल न करें, बल्कि उसके कहें शब्दों को दोहराएं। इससे बच्चा बोलने के लिए प्रोत्साहित होता है। (और पढ़ें - नवजात शिशु का वजन कितना होता है)
  • बच्चे को ज्यादा देर तक टीवी न देखने दें।
  • जन्म के समय से ही बच्चे के साथ बातें करना शुरू करें। (और पढ़ें - नवजात शिशु को कफ कम करने का उपाय)
  • जब शिशु कुछ कहने की कोशिश करें, तो आप भी उस पर प्रतिक्रिया दें और उससे बातें करें। (और पढ़ें - नवजात शिशु को कब्ज का इलाज)
  • बच्चे के सामने तेज आवाज में पुस्तक पढ़ें।
  • बच्चे के हर सवाल का जवाब देने की कोशिश करें। अगर आपको उसके किसी सवाल का जवाब न पता हो, तो जवाब को ढ़ूंढने की कोशिश करें।

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हर बच्चे की बोलना सीखने की प्रक्रिया एक जैसी ही होती है, लेकिन उसके सीखने के प्रवृति तेज या धीरे हो सकती है। सामान्य तौर पर देखा जाए तो बच्चा एक साल की उम्र तक एक शब्द बोलने लगता है, 2 साल का होते-होते बच्चा दो शब्दों को साथ में बोलना सीख जाता है, जबकि तीन साल का होने तक बच्चा तीन शब्दों को मिलाकर एक छोटा वाक्य बोलने लगता है। अगर आपका बच्चा बोलने की सामान्य आयु में बहुत कम बोलता हो, ऐसे में यह परेशानी का कारण हो सकता है। इसमें बच्चे को निम्न तरह की समस्या हो सकती है।

  • पहला शब्द बोलने में मुश्किल और शब्दों को याद न रख पाना।
  • किसी वाक्य को बोलते समय शब्दों का उपयोग न कर पाना।
  • ज्यादा शब्द न समझ पाना। (और पढ़ें - बच्चे को मिट्टी खाने की आदत)
  • वाक्यों और शब्दों को न समझना।

लेकिन इस बात का ध्यान रहे कि बाल विशेषज्ञ बताते हैं कि बच्चे के बोलना सीखने जितना ही जरूरी होता है उसका बातों को समझ पाना। अगर वह सामान्य रूप से बातें समझ पाता है लेकिन बोलना शुरू करने में थोड़ी देरी हो रही है तो अक्सर घबराने की बात नहीं होती है।

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उम्र के बढ़ने के साथ ही बच्चा अपने आसपास के माहौल से शब्दों को सीखना शुरू कर देता है। बच्चा हर नई चीज को गौर से देखता व सुनता है और फिर उसकी नकल करते हुए बोलने का प्रयास करता है। लेकिन आपका बच्चा ऐसा नहीं कर रहा है तो यह उसके देरी से बोलने का संकेत हो सकता है। बच्चे के देरी से बोलने के कुछ लक्षणों को नीचे विस्तार से बताया जा रहा है।

  • 12 महीनों का होने तक
    एक साल का होने तक बच्चा अपने आसपास के माहौल के आधार पर बोलने का प्रयास करना शुरू कर देता है। बोलने की प्रक्रिया में बच्चा अपनी बात या परेशानी को बताने के लिए सबसे पहले अस्पष्ट रूप से बोलने की कोशिश करता है। 9 महीनों का होते-होते बच्चा आसान शब्द बोलना शुरू कर देता है, जिसमें वह सबसे पहले “मां” या “पापा” जैसे शब्द बोलना सीख जाता है। बेशक, वह इन शब्दों को मतलब को न जानता हो, पर फिर भी मां के द्वारा बार-बार सीखाने से बच्चा यह शब्द आसानी से सीख जाता है और बोलने लगता है। (और पढ़ें - माँ का दूध कैसे बढ़ाएं)

    इसके अलावा एक साल से पहले ही बच्चा अपने नाम और घर की कुछ खास वस्तुओं के प्रति अपनी प्रतिक्रिया देने लगता है। बच्चा बार-बार किसी शब्द को सुनने के बाद भी अपनी प्रतिक्रिया न दें, तो उसका ये स्वभाव किसी समस्या की ओर संकेत कर सकता है। (और पढ़ें - बच्चों को सिखाएं अच्छी सेहत के लिए अच्छी आदतें)
     
  • 18 महीनों का होने तक
    इस समय आपका बच्चा शरीर के किसी एक अंग के नाम को भी न समझ पाए या उसे न बता पाए, तो यह उसके देरी से बोलने का लक्षण माना जा सकता जाता है। इस उम्र के बच्चे कई शब्दों को बोलना सीख जाते हैं, लेकिन आपका बच्चा मात्र 6 शब्द भी न बोल पाए और वह अपनी परेशानी या जरूरत को आपको न बताए, तो यह भी बच्चे के बोलने की प्रक्रिया में समस्या का संकेत होते हैं। (और पढ़ें - बच्चों की सेहत के इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज)
     
  • 24 महीनों का होने तक
    दो साल के अधिकतर बच्चे करीब 50 शब्दों या उससे ज्यादा को समझने और बोलने लगते हैं। साथ ही वह दो शब्दों को मिलाकर बोलना सीख जाते हैं, जैसे "पापा आए", "पानी पीना", आदि। इतना ही नहीं इस उम्र के बच्चे आम चीजों के बारे में भी समझना शुरू कर देते हैं और शरीर के अंगों के बारे में पूछने पर भी बताने लगते हैं। इसके अलावा वह दो छोटे-छोटे वाक्यों को भी समझने का प्रयास करना शुरू कर देते हैं। यदि आपका बच्चा ऐसा नहीं कर पा रहा है, तो यह बच्चे में बोलने से संबंधी किसी समस्या का संकेत हो सकता है।(और पढ़ें - डाउन सिंड्रोम का इलाज)
     
  • तीन साल का होने तक
    यदि बच्चा बोलने में "मैं", "आप", "तुम" और "मेरे", आदि कुछ शब्दों का इस्तेमाल न कर पाता हो, अन्य लोग उसकी बात को समझ न पाते हों या वह छोटे वाक्य भी न बोल पा रहा हो, तो यह बोलने में समस्या हो सकती है। इसके साथ ही आपका बच्चा अन्य बच्चों के साथ न खेलता हो, आपके द्वारा कही बात को न समझ पाता हो, या बोलते समय बच्चे का हकलाना भी उसके देरी से बोलने का एक लक्षण हो सकता है।

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बच्चे के देरी से बोलने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। आमतौर पर अनुवाशिंक और स्वभाव, बच्चे के देरी से बोलने के मुख्य कारण होते हैं। इसके अलावा बच्चे के बोलने से पहले ही माता-पिता के द्वारा उनकी जरूरत के बारे में पूछ लेना भी बच्चे के देरी से बोलने की वजह होता है। बच्चों के देर से बोलने के अन्य कारणों को नीचे विस्तार से बताया जा रहा है।

  • समय से पहले पैदा होना –
    गर्भावस्था के निर्धारित समय से पहले पैदा होने वाले बच्चे सामान्यतः देरी से चलना, बोलना और अन्य कार्य करते हैं। (और पढ़ें - समय से पहले बच्चे का जन्म)
     
  • जुड़ना बच्चे होना –
    कई अध्ययन इस बात को बताते हैं कि जुड़वा पैदा होने वाले बच्चे अन्य बच्चों की तुलना में देरी से बोलना सीखते हैं। (और पढ़ें - जुड़वा बच्चे कैसे पैदा होते हैं)
     
  • कान का संक्रमण –
    यदि शिशु को जन्म के समय या शुरूआती दौर में कान का संक्रमण हो जाए तो इससे उनके बोलने की क्षमता प्रभावित होती है। सही तरह से न सुन पाना भी देरी से बोलने का कारण होता है। (और पढ़ें - कान में दर्द का इलाज)
     
  • लड़का –
    सामान्यतः लड़के लड़कियों की अपेक्षा देर से बोलना शुरू करते हैं। (और पढ़ें - लड़का पैदा करने के उपाय और तरीके से जुड़े मिथक)
     
  • बड़े भाई-बहन का ज्यादा बात करना –
    जब बच्चा अपने बड़े भाई या बहन को ज्यादा बोलते हुए देखता है, तो वह बात करना जरूरी ही नहीं समझता है। (और पढ़ें - बच्चों में भूख ना लगने के कारण और उनका आयुर्वेदिक समाधान)
     
  • अन्य गतिविधियों पर ध्यान देना –
    कई बार बच्चे के न बोलने के अलावा उसकी सभी गतिविधियां सामान्य होती है। इसका मतलब यह है कि आपका बच्चा बोलने के मुकाबले अन्य गतिविधियों में ज्यादा रुचि लेता है। (और पढ़ें - दूध में अगर ये मिलाएँगे तो आपके बच्चे दूध पीने से कभी मना नहीं करेंगे)
     
  • मस्तिष्क क्षति -
    जन्म से ही किसी प्रकार का दोष, स्ट्रोक या दुर्घटना की वजह से मस्तिष्क क्षति भी बोलने संबंधी विकार का कारण होता है। (और पढ़ें - मस्तिष्क की चोट का उपचार)
     
  • कटा हुआ तालू –
    बच्चे में कटा हुआ तालू (Cleft palate) एक प्रकार का जन्म-दोष होता है। इसमें बच्चे के मुंह के ऊपरी हिस्से में छेद होता है, जिसकी वजह से बच्चे के गले, नाक, ओर मुंह से निकलने वाली हवा ठीक से नहीं निकल पाती हैं। इसको स्पीच डिसऑर्डर (Speech disorder) कहा जाता है। (और पढ़ें - बच्चों के दांतों को कैविटी से बचने के उपाय)
     
  • फ्रेगाइल एक्स सिंड्रोम (fragile X syndrome) -
    एक आनुवांशिक विकार होता है, जो बच्चे को अपने माता-पिता से मिलता है। इस विकार में बच्चे के सिर का बढ़ना और आंखों का बाहर आना जैसे लक्षण शामिल होते हैं। इसकी वजह से बच्चा एक ही शब्द को बार-बार दोहराता है। (और पढ़ें - बच्चे कब चलना शुरू करते हैं)
     
  • सेरेब्रल पालसी -
    बच्चे को सेरेब्रल पाल्सी (Cerebral palsy) जैसा जन्मजात विकार होना। इसके कारण बच्चा हकलाकर बोलता है।

(और पढ़ें - हकलाना रोकने के इलाज)

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