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एंटेरोसील - Enterocele in Hindi

Dr. Rajalakshmi VK (AIIMS)MBBS

January 08, 2021

January 13, 2021

कई बार आवाज़ आने में कुछ क्षण का विलम्ब हो सकता है!
एंटेरोसील
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एंटेरोसील क्या है?

एंटेरोसील एक ऐसी बीमारी है जिसमें छोटी आंत पेल्विस के निचले हिस्से की तरफ बढ़ने लगती है या लटकने लग जाती है। जब एंटेरोसील की समस्या होती है तो छोटी आंत योनि के ऊपरी हिस्से पर दबाव डालने लगती है जिससे वहां पर एक उभार बन जाता है। एंटेरोसील को स्मॉल बाउल प्रोलैप्स के नाम से भी जाना जाता है और यह पेल्विक ऑर्गन प्रोलैप्स का एक प्रकार है।

बच्चे को जन्म देना, बढ़ती उम्र में मांसपेशियां कमजोर होना व ऐसी अन्य कई स्थितियां हैं जिनकी वजह से पेल्विस के हिस्से में दबाव बढ़ने लगता है। सामान्य से अधिक दबाव पड़ने पर पेल्विस के हिस्से में मौजूद अंगों को सपोर्ट करने वाली मांसपेशियां व लिगामेंट्स कमजोर पड़ जाते हैं जिससे एंटेरोसील जैसी समस्याएं होने लगती हैं।

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एंटेरोसील का लक्षण - Enterocele Symptoms in Hindi

अधिकतर मामलों में महिलाओं में एंटेरोसील के कोई लक्षण नहीं दिखते और ना ही उन्हें कोई तकलीफ महसूस होती है इसलिए उनको पता ही नहीं चल पाता कि वे इस बीमारी से ग्रस्त हैं। ऐसी स्थिति में केवल सामान्य पेल्विक परीक्षण के दौरान ही बीमारी का पता चल पाता है। यदि एंटेरोसील से जुड़े लक्षण विकसित हो रहे हैं, तो वे स्थिति की गंभीरता और महिला के शारीरिक स्वास्थ्य पर निर्भर करते हैं। एंटेरोसील के ऐसे मामले जिसमें लक्षण नजर आते हैं उसमें निम्न संकेत शामिल हैं-

डॉक्टर को कब दिखाना चाहिए?

यदि आपको एंटेरोसील के लक्षण लगातार महसूस हो रहे हैं, तो ऐसी स्थिति में बिना देरी किए डॉक्टर से बात करनी  चाहिए। 

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एंटेरोसील का कारण - Enterocele Causes in Hindi

पेल्विक के निचले हिस्से में दबाव बढ़ना ही एंटेरोसील का सबसे मुख्य कारण है। अधिक दबाव होने पर मांसपेशियां व लिगामेंट्स कमजोर पड़ जाते हैं, जिससे पेल्विक में मौजूद अंगों पर उनकी पकड़ ढीली पड़ जाती है और वे अपनी जगह से सरक जाते हैं। वे स्थितियां या गतिविधियां जिनकी वजह से पेल्विस के हिस्से में दबाव बढ़ता है और एंटेरोसील की समस्या होती है वे हैं- 

  • गर्भावस्था व बच्चे को जन्म देना
  • लंबे समय से कब्ज की समस्या रहना
  • मल त्याग करते समय अत्यधिक जोर लगाना
  • लंबे समय से खांसी होना
  • दीर्घकालिक ब्रोंकाइटिस
  • बार-बार अधिक भारी वजन उठाना
  • शरीर का वजन सामान्य से अधिक होना (मोटापा)

गर्भावस्था और बच्चे को जन्म देना ये दोनों स्थितियां एंटेरोसील के लिए सबसे सामान्य कारणों में से एक हैं। योनि व पेल्विक के अन्य अंगों को अपनी जगह पर स्थिर बनाए रखने के लिए सहारा देने वाली मांसपेशियां व लिगामेंट गर्भावस्था, प्रसव और डिलिवरी के दौरान कमजोर पड़ जाते हैं। हालांकि, यह भी जरूरी नहीं है कि हर महिला जो बच्चे को जन्म देती है उसे एंटेरोसील की समस्या होगी और ना ही यह जरूरी है कि जो महिलाएं कभी गर्भवती नहीं हुई है उनको एंटेरोसील नहीं हो सकता है।

इसके अलावा कुछ अन्य कारक भी हैं, जो एंटेरोसील होने के खतरे को बढ़ा देते हैं-

  • बढ़ती उम्र
  • पहले कभी पेल्विक की सर्जरी हुई हो
  • किसी कारण से पेट में दबाव बढ़ना
  • धूम्रपान करना
  • संयोजी ऊतकों से संबंधी रोग

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एंटेरोसील से बचाव - Prevention of Enterocele in Hindi

कुछ उपाय हैं, जिन्हें अपनाकर एंटेरोसील होने के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है-

  • पर्याप्त मात्रा में फल, सब्जियां और फाइबर से भरपूर आहार खाएं ताकि कब्ज का खतरा कम हो जाए।
  • दिन में पर्याप्त मात्रा में पानी भी जरूर पिएं, इससे शरीर में पानी की कमी नहीं होती है और साथ ही कब्ज जैसी समस्याएं भी नहीं होती हैं।
  • शरीर का वजन सामान्य बनाए रखें, जिससे पेट पर दबाव कम हो। शारीरिक वजन कम करने के लिए डॉक्टर आपको कुछ प्रकार की एक्सरसाइज करने और विशेष आहार लेने का सुझाव दे सकते हैं।
  • कोई भी भारी वजन न उठाएं, ऐसा करने से पेट पर अधिक दबाव पड़ सकता है।
  • ब्रोंकाइटिस जैसे रोगों के कारण लंबे समय तक खांसी की समस्या बनी रहती है। खांसी के कारण भी एंटेरोसील का खतरा बढ़ जाता है। जल्द से जल्द खांसी का इलाज करवाएं ताकि एंटेरोसील होने के खतरे को कम किया जा सके।
  • धूम्रपान करना भी खांसी का कारण बन सकता है और परिणामस्वरूप एंटेरोसील का कारण बन सकता है।

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एंटेरोसील का परीक्षण - Diagnosis of Enterocele in Hindi

एंटेरोसील के परीक्षण के दौरान डॉक्टर सबसे पहले योनि व उसके आस-पास के हिस्से को देखकर व छूकर जांच करते हैं। इस दौरान मरीज से उसके स्वास्थ्य संबंधी पिछली जानकारियां ली जाती हैं। यदि इसके बाद भी डॉक्टर को कुछ संदेह रहता है, तो वे कुछ टेस्ट भी करवाने का सुझाव दे सकते हैं। हालांकि पेल्विक परीक्षण के दौरान डॉक्टर मरीज को गहरी सांस लेकर उसे रोक कर रखने के लिए कहते हैं औऱ फिर धीरे-धीरे सांस को इस तरह छोड़ना होता है मानो मलत्याग कर रहे हों। ऐसा करने के दौरान बढ़ा हुआ प्रोलैप्स नीचे की तरफ उभर जाता है।   

एंटेरोसील का इलाज - Enterocele Treatment in Hindi

यदि एंटेरोसील में योनि के ऊपर बनने वाला दबाव या उभार मरीज को कोई परेशानी नहीं दे रहा है तो उसका इलाज करने की जरूरत नहीं पड़ती है। हालांकि, यदि एंटेरोसील का आकार बड़ा है और उससे दर्द व अन्य तकलीफें आदि लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो डॉक्टर इलाज पर विचार करते हैं। इस स्थिति का इलाज करने के लिए आमतौर पर सर्जरी का सहारा लिया जाता है। हालांकि, यदि मरीज सर्जरी नहीं करवाना चाहता या फिर किसी कारण से सर्जरी करने में खतरा है, तो डॉक्टर नॉन-सर्जिकल विकल्पों की मदद ले सकते हैं।

एंटेरोसील के इलाज के विकल्पों में शामिल है-

  • देखरेख औऱ निगरानी- यदि एंटेरोसील से कोई भी तकलीफ या अन्य लक्षण महसूस नहीं हो रहा है, तो डॉक्टर कुछ समय के लिए कुछ सामान्य स्वास्थ्य सुधार तरीके अपनाते हैं। इस दौरान मरीज को कीगल एक्सरसाइज करने की सलाह दी जाती है ताकि पेल्विक मांसपेशियां मजबूत बनें। साथ ही अधिक वजन न उठाने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा खाने-पीने की चीजों में भी कुछ बदलाव किए जा सकते हैं, ताकि कब्ज के लक्षणों को कम किया जा सके।
  • वजाइनल पेसरी- इस प्रक्रिया में योनि में सिलिकॉन, प्लास्टिक या रबड़ से बना एक विशेष उपकरण लगाया जाता है, जिससे ढीले, कमजोर और उभरे हुए ऊतकों को सपोर्ट मिलता है।
  • सर्जरी- एंटेरोसील में योनि से बाहर निकलने वाले ऊतकों को सर्जरी की मदद से अंदर स्थिर कर दिया जाता है। यह सर्जरी रोबोट के जरिए या मैन्युअल रूप से की जाती है। सर्जरी प्रक्रिया के दौरान बाहर निकले हुऐ ऊतकों को वापस अंदर डाला जाता है और संयोजी ऊतकों को टाइट किया जाता है। कई बार इस दौरान सिथेटिक मेश की मदद से कमजोर ऊतकों को सहारा प्रदान किया जाता है।

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संदर्भ

  1. Richard E. Symmonds, Tiffany J. Williams, Raymond A. Lee, Maurice J. Webb, [link, American Journal of Obstetrics and Gynecology, Volume 140, Issue 8, 1981, Pages 852-859,
  2. Holley RL Enterocele: a review. Obstet Gynecol Surv. 1994 Apr;49(4):284-93. PMID: 8202302.
  3. Zacharin RF, Hamilton NT. Pulsion enterocele: long-term results of an abdominoperineal technique. Obstetrics and Gynecology. 1980 Feb;55(2):141-148.

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