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प्रोकैल्सिटोनिन टेस्ट क्या है?

प्रोकैल्सिटोनिन एक प्रोटीन है जो कि शरीर के किसी ऊतक में चोट लगने और बैक्टीरियल संक्रमण होने पर बनता है। इस कंपाउंड के उच्च स्तर सेप्सिस या गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण की तरफ संकेत कर सकते हैं। यह टेस्ट रक्त में प्रोकैल्सिटोनिन के स्तर का आकलन करने के लिए किया जाता है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि आपको सेप्सिस या कोई बैक्टीरियल संक्रमण तो नहीं है।

हर बार जब आपको कोई संक्रमण होता है तो आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली इसे शरीर के एक ही भाग में रखने की कोशिश करती है ताकि यह आपके पूरे शरीर में न फैले। हालांकि, कभी-कभी रोगजनक बैक्टीरिया आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली से बचकर रक्त में चले जाते हैं जिससे बैक्टीरिमिया नामक स्थिति हो जाती है। बैक्टीरिमिया से सेप्सिस नामक स्थिति पैदा हो सकती है, जो अत्यधिक गंभीर व घातक हो सकती है। यदि इस स्थिति का समय पर इलाज न किया जाए तो इससे शरीर का कोई अंदरूनी अंग काम करना बंद कर सकता है और यहां तक कि मरीज की मृत्यु भी हो सकती है।

प्रोकैल्सिटोनिन के स्तर कुछ अन्य स्थितियों में भी बढ़ सकते हैं। हालांकि, वे इतने अधिक नहीं होते जितने सेप्सिस में होते हैं। इसमें टिशू डैमेज शामिल है जो कि निम्न कारणों से हो सकता है :

  1. प्रोकैल्सिटोनिन टेस्ट क्यों किया जाता है - Procalcitonin Test Kyu Kiya Jata Hai
  2. प्रोकैल्सिटोनिन टेस्ट से पहले - Procalcitonin Test Se Pahle
  3. प्रोकैल्सिटोनिन टेस्ट के दौरान - Procalcitonin Test Ke Dauran
  4. प्रोकैल्सिटोनिन टेस्ट के परिणाम का क्या मतलब है - Procalcitonin Test Ke Parinam Ka Kya Matlab Hai

प्रोकैल्सिटोनिन टेस्ट क्यों किया जाता है?

डॉक्टर प्रोकैल्सिटोनिन टेस्ट की सलाह निम्न के लिए देते हैं :

  • सेप्सिस और मैनिंजाइटिस जैसे बैक्टीरियल संक्रमणों का परीक्षण करने के लिए
  • यूटीआई से ग्रस्त बच्चों में किडनी डैमेज का पता लगाने के लिए
  • सेप्सिस की गंभीरता का पता लगाने के लिए
  • इस बात का पता लगाने के लिए कि संक्रमण बैक्टीरियल है या अन्य संक्रमण है 
  • एंटीबायोटिक ट्रीटमेंट के प्रभाव पर नजर रखने के लिए 
  • ट्रॉमा, सर्जरी या नॉन-बैक्टीरियल संक्रमण के कारण जिन लोगों को टिशू डैमेज हुआ है उनमें सेकेंडरी बैक्टीरियल इन्फेक्शन के विकास की जांच के लिए 

इस टेस्ट की सलाह गंभीर रूप से बीमार लोगों को भी दी जा सकती है जिनमें सेप्सिस के निम्न लक्षण दिखाई देते हैं :

प्रोकैल्सिटोनिन टेस्ट अधिकतर उन लोगों का किया जाता है जो हॉस्पिटल में भर्ती हैं या जिनका इलाज आपातकालीन कक्ष में होता है।

प्रोकैल्सिटोनिन टेस्ट की  तैयारी कैसे करें?

यह एक सामान्य टेस्ट होता है, जिसके लिए विशेष तैयारी की आवश्यकता नहीं पड़ती है। हालांकि, आपकी शारीरिक स्थिति के अनुसार टेस्ट करने से पहले आपको कुछ सलाह दी जा सकती हैं।

 

प्रोकैल्सिटोनिन टेस्ट कैसे किया जाता है?

प्रोकैल्सिटोनिन टेस्ट के लिए एक ब्लड सैंपल की जरूरत होती है। डॉक्टर आपकी बांह की नस में सुई लगाकर रक्त की पर्याप्त मात्रा ले लेंगे। सुई लगने से आपको हल्का सा दर्द हो सकता है। 

टेस्ट के बाद कुछ लोगों को हल्का सा चक्कर आ सकता है। हालांकि इसके बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं होती। यदि रक्त निकाली गई जगह पर कोई संक्रमण या नील अधिक समय तक रहता है तो इसके बारे में जल्द से जल्द डॉक्टर को बताएं।

प्रोकैल्सिटोनिन टेस्ट के परिणाम क्या बताते हैं?

सामान्य परिणाम

तीन दिन से छोटे शिशुओं में इसके स्तर स्थिर नहीं होते। तीन दिन से बड़े बच्चों और वयस्कों में इसकी संदर्भ वैल्यू 0.15 ng/mL (नैनोग्राम प्रति मिलीलीटर) या इससे कम हो सकती है।

असामान्य परिणाम

यदि प्रोकैल्सिटोनिन के स्तर 0.15-2 ng/mL से थोड़ा ही अधिक है तो ये निम्न स्थितियों से जुड़ा हो सकता है :

  • शरीर के किसी हिस्से पर बैक्टीरियल इन्फेक्शन जो ज्यादा गंभीर नहीं है
  • रीनल फेलियर की अंतिम अवस्था जिसका इलाज न किया गया हो
  • नॉन इंफेक्शियस सिस्टमिक इंफ्लेमेटरी रिस्पांस

ऐसी स्थितियां जिनमें प्रोकैल्सिटोनिन के स्तर 2 ng/mL से अधिक होते हैं उनमें निम्न शामिल हैं:

  • बैक्टीरियल सेप्सिस
  • गंभीर नॉन-इंफेक्शियस इंफ्लेमेटरी स्थितियां (जैसे- गंभीर ट्रॉमा, गंभीर रूप से जलना, शरीर के कई अंदरुनी अंग अचानक से काम करना बंद कर देना, पेट या हृदय की कोई बड़ी सर्जरी होना)
  • गंभीर लोकल बैक्टीरियल संक्रमण (जैसे - गंभीर निमोनिया, मैनिंजाइटिस)
  • मेड्यूलरी थायराइड कार्सिनोमा (प्रोकैल्सिटोनिन 10000 ng/mL से अधिक हो सकता है)

जिन बच्चों के गुर्दे क्षतिग्रस्त हैं और उनके मूत्र पथ में संक्रमण होता है तो उनके प्रोकैल्सिटोनों का स्तर 0.5 ng/mL से अधिक हो सकता है।

नवजात शिशु जिनकी आयु तीन दिन से अधिक है उनमें प्रोकैल्सिटोनिन का स्तर निम्न के अनुसार है, तो गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण का संकेत देता है।

  • जन्म के समय 1 ng/mL से अधिक
  • जन्म के चौबीस घंटों बाद 100 ng/mL या इससे अधिक
  • जन्म के 48 घंटों बाद 50 ng/mL या इससे अधिक
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References

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