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बच्चों के कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं हो जाती है और बच्चों में दौरे आना इन्हीं में एक आम समस्या मानी जाती है। शिशु में दौरे आने के लक्षण अन्य बड़े बच्चों की अपेक्षा अलग हो सकते हैं। मस्तिष्क के सही तरह से कार्य न करने के कारण दौरे आते हैं या दौरे पड़ने लगते हैं। इसके अलावा कई अन्य कारणों से भी बच्चों में दौरे आ सकते हैं। दौरे आने पर शरीर की स्थिति में बदलाव होता है और मरीज मौजूदा स्थिति को सही तरह से नहीं समझ पाता है। बच्चों में दौरे आना माता-पिता को डरा सकता है।

इस लेख में बच्चों में दौरे आने के बारे में विस्तार से बताया गया है। साथ ही इस लेख में आपको बच्चों में दौरे आने के लक्षण, बच्चों में दौरे आने के कारण, बच्चों में दौरे आने से बचाव और बच्चों में दौरे आने के इलाज के बारे में भी विस्तार से बताया गया है। 

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  1. बच्चों में दौरे आने का कारण - Bacho me daure aane ke karan
  2. बच्चों में दौरे आने से बचाव - Bacho me daure aane se bachav
  3. बच्चों में दौरे आने का इलाज - Bacho me daure aane ka ilaj
  4. बच्चों में दौरे आने का घरेलू उपचार - Bacho me daure aane ka gharelu upchar
  5. बच्चों में दौरे आने के लक्षण - Bacho me daure aane ke lakshan

अधिकतर बच्चों में दौरे पड़ने के कारणों का पता नहीं चल पाता है। बच्चों में दौरे पड़ने के अधिकतर मामले तब सामने आते हैं जब परिवार के किसी सदस्य को पहले कभी दौरे पड़ने की समस्या हो। इसके अन्य मामलों में इन्फेक्शन जैसे मेनिनजाइटिस, विकास में समस्या जैसे सेरेब्रल पाल्सी, सिर में चोट आदि को शामिल किया जाता है। दौरे पड़ने वाले करीब एक चौथाई बच्चों की जांच करने पर उनकी समस्या का कारण कुछ अन्य विकार पाए गए। इन अन्य विकारों में चक्कर आना, सांसों का रूकना, रात में डरना, सिरदर्द और मनोवैज्ञानिक समस्या को शामिल किया गया है। ज्वर दौरे बच्चों में सबसे आम समस्या होती है, यह तब होती है जब इन्फेक्शन तेज बुखार से संबंधित होता है।

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बच्चों में दौरे पड़ने के अन्य कारण

  • मैटाबॉलिक विकार:
    अधिकतर मैटाबॉलिक विकार बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली पर दबाव डालते हैं, जिसकी वजह से शरीर में बनने वाले केमिकल में असंतुलन आता है। यही असंतुलन कुछ दुर्लभ मामलों में दौरे पड़ने का कारण बनता है।
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  • दवाएं:
    यदि बच्चे पर किसी दवा से कोई प्रतिक्रिया न हो या उस पर गंभीर प्रतिक्रिया हो तो यह भी कुछ बहुत ही दुर्लभ मामलों में दौरे आने की आशंका बढ़ा देता है। 
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  • ऑक्सीजन की कमी:
    किसी कारण से दिमाग में ऑक्सीजन की कमी बच्चों में दौरे पड़ने की आम वजह होती है। 
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  • आंतरिक रक्तस्त्राव:
    आंतरिक रक्तस्राव, विशेष रूप से मस्तिष्क में रक्तस्त्राव होने से बच्चे को दौरे आने लगते हैं।

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दुर्भाग्य से अधिकांश प्रकार के दौरों से बचाव नहीं किया जा सकता है। सिर में चोट व गर्भावस्था के दौरान इन्फेक्शन जैसे कुछ मामलों से बचाव करना मुश्किल होता है। आगे आपको कुछ उपाय बताएं जा रहे हैं जिनकी मदद से दौरे की समस्या को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

  • बच्चों में ज्वर दौरे के मामले में बुखार को जल्दी ठीक करने पर जोर देना चाहिए। (और पढ़ें - बुखार में क्या खाएं)
  • इस बात का ध्यान रखें कि दौरे के समय बच्चे को चोट न लगें। (और पढ़ें - चोट लगने पर क्या करें)
  • अन्य बच्चों की तरह आपका बच्चा भी सभी गतिविधियों में हिस्सा ले सकता है। माता-पिता को इसके लिए केवल थोड़ी सजगता बरतने की जरूरत होती है। स्विमिंग के समय या जिस खेल में बच्चे को चोट लगने की आशंका हो उस दौरान माता-पिता को बच्चे के आसपास ही रहना चाहिए। (और पढ़ें - गुम चोट का इलाज)
  • नहाते समय बच्चे के गिरने की संभावना अधिक होती है, इस समय भी माता-पिता को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। बच्चे को नहाने के लिए बाथ टब की जगह पर फुव्वारे का प्रयोग करना बेहतर विकल्प माना जाता है, क्योंकि बाथ टब में बच्चे के डूबने का खतरा होता है।   

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बच्चों में दौरे आने का इलाज व्यस्कों मे दौरे के इलाज से अलग होता है। जब तक बच्चे के दौरे आने की समस्या का सही कारण नहीं पता चलता, तब तक उसको दवाएं नहीं दी जाती है। 

अधिकतर बच्चों को अपने जीवन में केवल एक बार ही दौरे पड़ने की समस्या होती है। इसी वजह से बच्चों के दौरे पड़ने की शुरुआत में उसको दवाएं नहीं दी जाती है। इसके अलावा दौरे पड़ने पर दी जाने वाली कई दवाएं ऐसी होती है, जिनसे लीवर और दांतों को नुकसान होने की संभावना अधिक होती है।

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बच्चें को दौरे की दवा देने से पहले डॉक्टर कई तरह के ब्लड टेस्ट करते हैं। इन टेस्ट के बाद डॉक्टर बच्चे को दी जाने वाले दवा की उचित खुराक को तय करते हैं।

यदि आपके बच्चे को एपिलेप्टिकस (एक प्रकार की मिर्गी) हो, तो उसे आईसीयू में एडमिट कराया जाता है और दौरे कम करने वाली दवाएं दी जाती हैं।   

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बच्चों में दौरे आने के घरेलू उपचार में सबसे पहले आपको और बच्चों को चोट लगन से बचना चाहिए। बच्चे को दौरे आने पर आपको निम्नलिखित उपाय अपनाने चाहिए।

  • दौरे पड़ते समय बच्चे को नीचे लेटने में मदद करें। (और पढ़ें - बच्चे के देर से चलने की पहचान कैसे करें)
  • बच्चे को नुकसान पहुंचाने वाली चीजों को दूर करें। इस दौरान आप बच्चे के चश्मे को उसकी आंखों से हटाएं, क्योंकि इससे भी उसको चोट पहुंच सकती है।
  • बच्चे के कपड़ों को ढीला करें। विशेष तौर पर बच्चे के गले के पास के कपड़ों को ढीला करें, ताकि आपका बच्चा सही तरह से सांस ले सकें। (और पढ़ें - नवजात शिशु के निमोनिया का इलाज)
  • ध्यान दें कि बच्चा सांस ले रहा हैं या नहीं। यदि वह सांस न ले रहा हो तो ऐसे में अन्य लोगों की मदद लें।
  • दौरे पड़ते समय बच्चे के मुंह में किसी चीज को ना डालें, इससे आप बच्चे और खुद को चोट पहुंचा सकते हैं। (और पढ़ें - बच्चों में भूख न लगने के कारण​)
  • दौरे पड़ने के बाद आप बच्चे को सामान्य अवस्था में आने तक करवट करके लेटा दें। साथ ही इस बात का भी ध्यान दें कि बच्चा सांस ले रहा है या नहीं। यदि बच्चा दौरे पड़ने के एक मिनट बाद तक सांस नहीं लेता तो उसको अपने मुंह से सांस देने (सीपीआर) का प्रयास करें। दौरे के समय बच्चे के शरीर में ऐंठन हो तो यह तकनीक न अपनाएं, क्योंकि इससे बच्चे को चोट पहुंच सकती है। (और पढ़ें - सीपीआर देने का तरीका)
  • जिस बच्चे को हाल ही में दौरे पड़े हो, उसको खाना, पानी या मुहं से खाने वाली दवा नहीं देनी चाहिए।  

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बच्चों में दौरे आने के लक्षण कई तरह के होते हैं। दौरे आते समय बच्चों के शरीर में होने वाले बदलाव और उनकी सजगता के स्तर से डॉक्टर बच्चों के दौरे के प्रकार को सही तरह से समझ पाते हैं। आगे बच्चों में दौरे के प्रकार और उनमें होने वाले लक्षणों को विस्तार से बताया गया है।

  • ज्वर दौरा (febrile seizures):
    इसमें बच्चे को लयबद्ध झटके और मांसपेशियों में ऐंठन की समस्या से गुजरना पड़ता है। इसके साथ ही बच्चे को कभी-कभी सांस लेने और आंखों को घुमाने में मुश्किल होती है। दौरे के बाद बच्चा अक्सर सुस्त और उलझन में पड़ जाता है। इसके अलावा दौरे के बाद बच्चे को अपनी परेशानी के बारे में भी याद नहीं रहता है। इस तरह के लक्षणों का समूह मिर्गी में भी होता है।
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  • शिशु में ऐंठन (Infantile spasms):
    ये दुर्लभ प्रकार का दौरा होता है, जो शिशु को पहले साल (4 से 8 माह के बीच में) में होता है। इसमें बच्चा अपनी पीठ को धनुष की तरह मोड़ लेता है और उसके हाथ व पैर अकड़ जाते हैं। इस तरह की ऐंठन विशेष रूप से बच्चे के सोने जाते समय, जागते समय या खाने के बाद होती है। शिशुओं को एक दिन में इस तरह के सैकड़ों दौरे पड़ सकते हैं।
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  • फोकल सिजर्स (focal seizures):
    इसमें बच्चे को पसीना आना, उल्टी होना, शरीर पीला होना, ऐंठन और मांसपेशियों के समूह (जैसे – उंगलियों, हाथों और पैरों) में कठोरता आने के लक्षण महसूस होते हैं। इसके साथ ही बच्चे द्वारा अजीब मुंह बनाना, होंठो को चाटना, चिल्लाना, रोना और बेहोशी आदि भी इसके कुछ लक्षण होते हैं। 
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  • एब्सेंस सिजर्स (absence seizures):
    इसमें चेतना थोड़े समय के लिए लुप्त हो जाती है और ऐसा लगता है, जैसे बच्चा अंतरिक्ष को घूर रहा हो या कुछ सोच रहा हो। ऐसा 30 सेकेंड के लिए दिन में कई बार हो सकता है। 
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  • एटोनिक सिजर्स (atonic seizures):
    इसमें आपका बच्चा अचानक मांसपेशियों पर नियंत्रण खो देता है। इससे बच्चे के अंग निष्क्रिय हो जाते हैं। ऐसे में बच्चे का सिर अचानक नीचे की ओर झुक जाता है या चलते हुए या घुटनों के बल पर चलते हुए बच्चा अचानक जमीन पर गिर जाता है। 
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  • टॉनिक सिजर्स (tonic seizures):
    इसमें बच्चे के शरीर के कुछ अंग (हाथ और पैर) या पूरे शरीर में ही अचानक अकड़न आ जाती है। 
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  • म्योक्लोनिक सिजर्स (myoclonic seizures):
    बच्चों की मांसपेशियों का समूह, विशेषकर गर्दन, कंधे और ऊपरी बांह में झटके लगने शुरू हो जाते हैं। यह दौरे बच्चे को दिन में एक साथ कई बार हो सकते हैं। 

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