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स्पाइनल फ्यूजन एक सर्जरी प्रोसीजर है, जिसमें रीढ़ में मौजूद दो या अधिक हड्डियों को आपस में जोड़ दिया जाता है। यह सर्जरी आमतौर पर हड्डी की स्थिरता बढ़ाने और दर्द को कम करने के लिए की जाती है, जो आमतौर पर स्पाइनल स्टेनोसिस या स्कोलियोसिस के कारण होती है।

(और पढे़ं - रीढ़ की हड्डी में टेढ़ापन का कारण)

रीढ़ की हड्डी कई छोटी-छोटी हड्डियों से मिलकर बनी होती है, जिन्हें कशेरुकाएं (वर्टिब्रा) कहा जाता है, जो एक-दूसरे के ऊपर स्थित होती हैं। यह वर्टिब्रा एक-दूसरे से एक वर्टेब्रल डिस्क के माध्यम से अलग होती हैं, जो रीढ़ की हड्डी को लचीलापन प्रदान करता है और साथ ही दबाव को अवशोषित करने के रूप में काम करता है। हालांकि, वर्टिब्रा में कोई क्षति या टूट-फूट होने होने से गंभीर दर्द, संवेदना की कमी व अन्य समस्याएं होने लगती हैं। स्पाइनल फ्यूजन सर्जरी को आमतौर पर दर्द कम करने के लिए किया जाता है। सर्जरी के दौरान बोन ग्राफ्ट की मदद से प्रभावित कशेरुकाओं को आपस में जोड़ दिया जाता है। ग्राफ्टिंग के लिए हड्डी को आपके कूल्हे से या फिर बोन बैंक से लिया जाता है। कुछ मामलों में कृत्रिम हड्डी का इस्तेमाल भी किया जाता है। सर्जरी के बाद आपको कम से कम चार से छह हफ्ते कम्पलीट बेडरेस्ट करने की सलाह दी जाती है, जिसके बाद आप अपनी सामान्य शारीरिक गतिविधियां शुरू कर सकते हैं।

(और पढ़ें - लंबर स्पाइनल स्टेनोसिस के लक्षण)

  1. स्पाइनल फ्यूजन क्या है - What is Spinal Fusion in Hindi
  2. स्पाइनल फ्यूजन किसलिए किया जाता है - Why is Spinal Fusion done in Hindi
  3. स्पाइनल फ्यूजन से पहले - Before Spinal Fusion in Hindi
  4. स्पाइनल फ्यूजन के दौरान - During Spinal Fusion in Hindi
  5. स्पाइनल फ्यूजन के बाद - Breaking Spinal Fusion in Hindi
  6. स्पाइनल फ्यूजन की जटिलताएं - Complications of Spinal Fusion in Hindi

स्पाइनल फ्यूजन क्या है?

स्पाइनल फ्यूजन एक सर्जरी प्रोसीजर है, जिसमें रीढ़ की दो या अधिक हड्डियों (वर्टिब्रा) को आपस में स्थायी रूप से जोड़ दिया जाता है। इस सर्जरी की मदद से रीढ़ की हड्डी में होने वाले दर्द को ठीक किया जाता है और रीढ़ की स्थिरता में सुधार किया जाता है।

रीढ़ की हड्डी कशेरुका नामक छोटी-छोटी हड्डियों से मिलकर बनी होती है, जो एक-दूसरे के ऊपर एक श्रृंखला के रूप में टिकी होती हैं। ये कशेरुकाएं एक-दूसरे से दो छोटे-छोटे जोड़ों (फेसेट जॉइंट) के माध्यम से जुड़ी होती हैं। इन जोड़ों के माध्यम से ही रीढ़ की हड्डी में लचीलापन आता है। हर वर्टिब्रा के बीच में एक इंटरवर्टिब्रल डिस्क होती है, जो दबाव को अवशोषित करने का काम करती है और रीढ़ को लचीलापन प्रदान करती है। इंटरवर्टिब्रल डिस्क बाहर से एन्युलस (रेशेदार छल्ले) और अंदर से न्यूक्लियस पल्पोसस से बनी होती है। सभी कशेरुकाओं में समान जगह पर एक छिद्र होता है, जो रीढ़ की हड्डी में एक रास्ता बनाता है। इस रास्ते के अंदर से नाजुक तंत्रिकाएं सुरक्षित रूप निकली होती हैं। रीढ़ की हड्डी के बीच से निकली ये तंत्रिकाएं शरीर के विभिन्न भागों से मस्तिष्क तक संकेतों का आदान-प्रदान करती हैं।

कुछ स्थितियां हैं जिनसे रीढ़ की हड्डी में दर्द, अकड़न, सुन्न होना व झुनझुनी जैसे लक्षण हो सकते हैं। इन समस्याओं में आमतौर पर वर्टिब्रा में दरार आना या फेसेट जॉइंट क्षतिग्रस्त होना आदि शामिल हैं।

यदि रीढ़ के हड्डी के किसी हिस्से में ये लक्षण हो रहे हैं, तो स्पाइनल फ्यूजन सर्जरी की मदद से उस हिस्से की कशेरुकाओं को आपस में जोड़ दिया जाता है। स्पाइनल फ्यूजन कशेरुकाओं को आपस में जोड़ देती है, जिससे उनके अंदर से निकली हुई कशेरुकाएं क्षतिग्रस्त होने से बच जाती हैं और परिणामस्वरूप ये लक्षण नहीं पनप पाते हैं।

(और पढ़ें - रीढ़ की हड्डी की चोट का इलाज)

स्पाइनल फ्यूजन सर्जरी किसलिए की जाती है?

निम्न स्थितियां होने पर डॉक्टर आपको स्पाइनल फ्यूजन सर्जरी करवाने की सलाह दे सकते हैं, जिनमें निम्न शामिल हैं -

स्पाइनल स्टेनोसिस
इसके लक्षणों में निम्न शामिल हैं -

  • गर्दन में दर्द
  • कमर के निचले हिस्से में दर्द
  • शारीरिक संतुलन न बना पाना
  • टांगों में भारीपन महसूस होना

स्पोंडिलोलिस्थीसिस
इसके लक्षण निम्न हैं -

  • कमर में अकड़न
  • मुड़ते समय दर्द होना
  • लंबे समय तक चलने या खड़े रहने पर दिक्कत होने लगना
  • पैर सुन्न होना या झुनझुनी महसूस होना

डीजेनेरेटिव डिस्क डिजीज
इस स्थिति से होने वाले सामान्य लक्षणों में निम्न शामिल हो सकते हैं -

  • बैठने, घुमने या मुड़ने के दौरान दर्द होना
  • बांह व टांग सुन्न होना या झुनझुनी महसूस होना
  • मांसपेशियों में कमजोरी
  • कमर के निचले हिस्से, जांघ व कूल्हों में गंभीर दर्द होना

स्कोलिओसिस
जिसके लक्षण कुछ इस प्रकार हैं -

  • कंधे या कमर एक समान न होना
  • शरीर एक तरफ झुका होना
  • त्वचा में रंग संबंधी असामान्यताएं या डिंपल पड़ना
  • त्वचा पर छोटे-छोटे धब्बों के रूप में बाल आना

रीढ़ की हड्डी टूटना
इससे निम्न लक्षण हो सकते हैं -

  • शरीर आगे की तरफ झुका होना
  • सामान्य रूप से चल न पाना
  • प्रभावित हिस्से में गंभीर दर्द होना
  • प्रभावित कशेरुका के ऊपर सूजन आना

रीढ़ की हड्डी में संक्रमण
इसके निम्न लक्षण हैं -

  • संक्रमित कशेरुका व उसके आस-पास दर्द महसूस होना
  • लालिमा, सूजन व छूने पर दर्द होना
  • शरीर का वजन कम होना
  • बुखार

स्पाइल ट्यूमर
रीढ़ की हड्डी में ट्यूमर होने पर निम्न लक्षण देखे जा सकते हैं -

स्पाइनल फ्यूजन को अन्य सर्जरी प्रोसीजर के साथ भी किया जा सकता है, जैसे लेमिनेक्टमीफोरेमिनेटोमी और डिसेक्टमी आदि

स्पाइनल फ्यूजन सर्जरी किसे नहीं करवानी चाहिए?

कुछ स्थितियां हैं, जिनमें यह सर्जरी नहीं की जाती है और यदि सर्जरी करनी जरूरी है तो विशेष देखभाल करते हुए इसे किया जाता है-

  • अरकानॉइडाइटिस -
    मस्तिष्क की सुरक्षा करने वाली झिल्ली (अरकानॉइड) में सूजन व लालिमा होना
  • एपिड्यूरल स्कारिंग -
    रीढ़ की हड्डी की पहले हुई किसी सर्जरी से स्कार बनना
  • संक्रमण -
    यदि आपको रीढ़ की हड्डी के आसपास या फिर शरीर के किसी अन्य हिस्से में संक्रमण है

(और पढ़ें - रीढ़ की हड्डी में टीबी के कारण)

स्पाइनल फ्यूजन सर्जरी से पहले क्या तैयारी का जाती है?

सर्जरी से पहले डॉक्टर आपको अस्पताल बुलाते हैं, जिस दौरान कुछ परीक्षण व अन्य टेस्ट किए जाते हैं, जिनकी मदद से पता लगाया जाता है कि आप इस सर्जरी के लिए कितने फिट हैं। यदि आपको स्वास्थ्य संबंधी कोई अन्य समस्या भी है, तो इन टेस्टों की मदद से पता लगाया जा सकता है।

स्पाइनल फ्यूजन सर्जरी से पहले आमतौर पर निम्न परीक्षण व टेस्ट किए जाते हैं -

इसके अलावा सर्जन आपको सर्जरी से पहले निम्न बातों का ध्यान रखने की सलाह दे सकते हैं -

  • यदि आप किसी भी प्रकार की कोई दवा, हर्बल उत्पाद या कोई सप्लीमेंट ले रहे हैं, तो डॉक्टर को इसके बारे में बता दें। डॉक्टर इनमें से कुछ दवाएं सर्जरी से पहले थोड़े दिन के लिए बंद करवा सकते हैं। इनमें अधिकतर रक्त पतला करने वाली दवाएं शामिल हैं जैसे एस्पिरिन, वारफेरिन और आइबुप्रोफेन आदि।
  • यदि आप धूम्रपान या शराब का सेवन करते हैं, तो सर्जरी से कुछ दिन पहले और बाद तक इनका सेवन बंद करने की सलाह दी जाती है। इससे सर्जरी के बाद जटिलताएं विकसित नहीं होती हैं और आपको जल्दी स्वस्थ होने में मदद मिलती है।
  • सर्जरी के लिए आपको खाली पेट अस्पताल जाने को कहा जाता है, जिसके लिए आपको सर्जरी से पहली आधी रात के बाद कुछ भी खाने या पीने से मना किया जाता है।
  • अस्पताल जाने से पहले नहा लें और कोई मेकअप न करें। यदि आपने कोई आभूषण या गैजेट पहना है, तो उसे भी घर पर ही उतार दें।
  • अस्पताल जाते समय अपने साथ किसी करीबी रिश्तेदार या मित्र को ले जाएं ताकि सर्जरी से पहले और बाद के कार्यों में आपकी मदद मिल सके।
  • अंत में आपको सहमति पत्र दिया जाता है, जिसपर हस्ताक्षर करके आप सर्जन को सर्जरी करने की अनुमति दे देते हैं।

(और पढ़ें - शराब की लत का इलाज)

स्पाइनल फ्यूजन सर्जरी कैसे की जाती है?

जब आप सर्जरी के लिए अस्पताल पहुंच जाते हैं, तो मेडिकल स्टाफ आपको हॉस्पिटल गाउन पहनने को देते हैं। आपकी बांह या हाथ की नस में सुई लगाई जाती है, जिसे इंट्रावेनस लाइन से जोड़ दिया जाता है। इंट्रावेनस की मदद से आपको सर्जरी के दौरान दवाएं व अन्य आवश्यक द्रव दिए जाते हैं।

स्पाइनल फ्यूजन को ओपन सर्जरी या मिनीमली इनवेसिव सर्जरी के रूप में किया जा सकता है। ओपन सर्जरी की तुलना में मिनीमली इनवेसिव सर्जरी में छोटा चीरा लगाने की आवश्यकता पड़ती है, जिससे घाव जल्दी भर जाते हैं। साथ ही मिनीमली इनवेसिव सर्जरी के बाद आप जल्दी स्वस्थ हो जाते हैं। स्पाइनल फ्यूजन को कई अलग-अलग सर्जरी प्रोसीजरों की मदद से किया जा सकता है, जिनमें निम्न शामिल हैं -

  • एंटीरियर एप्रोच -
    इसमें शरीर के सामने वाले हिस्से में चीरा लगाया जाता है जैसे गर्दन या पेट के निचले हिस्से में।
  • पोस्टीरियर एप्रोच -
    इसमें शरीर के पिछले हिस्से में चीरा लगाया जाता है, जैसे पीठ आदि।
  • लेटरल एप्रोच -
    इसमें शरीर के एक तरफ चीरा लगाया जाता है।

स्पाइनल फ्यूजन को मिनीमली इनवेसिव स्पाइनल फ्यूजन सर्जरी प्रोसीजर के द्वारा कुछ इस प्रकार किया जाता है -

  • आपको ऑपरेशन टेबल पर कमर या पेट के बल लिटाया जाएगा, जो इस बात पर निर्भर करता है कि किस एप्रोच से स्पाइनल फ्यूजन सर्जरी की जानी है।
  • इसके बाद एनेस्थीसिया का इंजेक्शन लगाया जाएगा, जिससे आप सर्जरी के दौरान गहरी नींद में सो जाएंगे।
  • आपके गले में एक ट्यूब डाली जाएगी, जिसकी मदद से आप सर्जरी के दौरान सांस ले पाएंगे।
  • सर्जरी प्रोसीजर के दौरान लगातार आपके शारीरिक संकेतों पर नजर रखी जाती है, जैसे ब्लड प्रेशर, पल्स रेट और हार्ट रेट आदि।
  • इंट्रेवनस या इंजेक्शन की मदद से आपको एंटीबायोटिक दवाएं दी जाएंगी, ताकि सर्जरी के बाद संक्रमण होने का खतरा न हो।
  • इसके बाद शरीर के पीछे या एक तरफ चीरा लगाया जाता है और मांसपेशियों व चर्बी को हटाकर रीढ़ की हड्डी तक पहुंचा जाता है।
  • इसके बाद दो या अधिक प्रभावित कशेरुकाओं को आपस में जोड़ दिया जाता है। वर्टिब्रा को जोड़ने का प्रोसीजर कुछ इस प्रकार है -
    • सबसे पहले जिन कशेरुकाओं को आपस में जोड़ना है उनके बीच की इंटरवर्टेब्रल डिस्क को हटा दिया जाता है और उनकी जगह पर बोन ग्राफ्ट लगा दिया जाता है।
    • इसके बाद रीढ़ की हड्डी के पिछले हिस्से को बोन ग्राफ्ट मटेरियल से बनी विशेष पट्टियों से भर दिया जाता है।
    • इसके बाद प्रभावित कशेरुकाओं के बीच में एक विशेष ढांचा (पिंजरे जैसी आकृति) लगा दिया जाता है और यह भी सिंथेटिक बोन जैसी सामग्री से ही बना होता है।

ग्राफ्ट के लिए ली गई हड्डी को कूल्हे की हड्डियों या बोन बैंक से लिया जाता है। इसके अलावा सर्जन कृत्रिम हड्डी को भी ले सकते हैं।

  • जब तक ग्राफ्टिंग वाला हिस्सा पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाता, तब तक पिन, प्लेट या छड़ों के माध्यम से उन्हें स्थिर रखा जाता है।
  • ग्राफ्टिंग प्रक्रिया पूरी होने के बाद चीरे को बंद करके टांके लगा दिए जाते हैं।

घाव के अंदर से एक ट्यूब लगाकर उसे बाहर निकाल दिया जाता है, ताकि बाद में बनने वाला द्रव अंदर जमा न होकर बाहर निकलता रहे। साथ ही यह ट्यूब रक्त के थक्के जमने से भी रोकती है। इस सर्जरी प्रक्रिया को पूरा करने में लगभग तीन से चार घंटे का समय लगता है। सर्जरी के बाद आपको कम से कम तीन से चार दिन तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ता है। अस्पताल में रहने के दौरान निम्न प्रक्रियाएं की जाती हैं -

  • आपको समय-समय पर आवश्यक दवाएं दी जाती हैं, जिन्हें इंजेक्शन या इंट्रावेनस के रूप में दिया जाता है।
  • आपको कुछ समय तक इंट्रावेनस के माध्यम से ही पोषण दिया जाता है और फिर धीरे-धीरे खाने के लिए नरम चीजें देना शुरू किया जाता है।
  • सर्जरी के बाद एक्स रे स्कैन भी किया जाता है, जो पुष्टि करता है कि सर्जरी ठीक से हो गई है या नहीं।
  • फीजिकल थेरेपिस्ट आपको बैठने, खड़े होने और चलने की विशेष तकनीक सिखाते हैं, जिनकी मदद से आप रीढ़ की हड्डी को बिना मोड़े शारीरिक गतिविधियां कर सकते हैं।
  • आपको प्लास्टर या बैक ब्रेसिज लगाकर घर के लिए छुट्टी दे दी जाती है।

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स्पाइनल फ्यूजन सर्जरी के बाद क्या देखभाल की जाती है?

सर्जरी के बाद जब आपको अस्पताल से छुट्टी मिल जाती है, तो आपको घर पर निम्न तरीके से देखभाल करने की सलाह दी जाती है -

  • सर्जरी वाले हिस्से को कम से कम एक हफ्ते तक सूखा रखें। नहाते समय घाव को किसी पॉलीथीन या प्लास्टिक लेयर से ढक लें।
  • सर्जरी के बाद आपको कुछ दिन तक दर्द रह सकता है, जिसके लिए आपको दर्दनिवारक दवाएं दी जाती हैं। एंटीबायोटिक दवाएं भी दी जाती हैं, ताकि घाव में संक्रमण न हो पाए।
  • आपको 20 मिनट तक लगातार बैठने से मना किया जाता है और चलते व बैठते समय बैक ब्रेसिज (पीठ को सहारा देने वाला विशेष उपकरण) लगाने को कहा जाता है।
  • जब तक डॉक्टर अनुमति न दें कोई भी भारी वस्तु न उठाएं। किसी भी चीज को उठाने के लिए कमर के बल न झुकें, इसकी बजाय आप घुटनों के बल झुक सकते हैं।
  • आपको सर्जरी के दो हफ्ते बाद थोड़ा बहुत चलने फिरने की अनुमति दी जा सकती है, जिसकी गति व दूरी को धीरे-धीरे बढ़ाया जाता है।
  • जब आप स्वस्थ हो जाते हैं, तो आपको तीन से छह महीनों तक फिजिकल थेरेपी करनी पड़ती है।
  • सर्जरी के बाद कम से कम दो हफ्तों तक ड्राइविंग या अन्य किसी मशीन को ऑपरेट न करें और सर्जरी के बाद पहली बार ड्राइविंग करने से पहले डॉक्टर से अनुमति ले लें।
  • यदि आप ऑफिस या स्कूल जाते हैं, तो वहां जाना शुरू करने से पहले कम से कम डेढ़ महीना शरीर को आराम दें। 
  • आपकी उम्र और समस्या की गंभीरता के अनुसार सर्जरी के बाद पूरी तरह से स्वस्थ होने में लगभग छह महीने का समय लग सकता है।

वैसे तो स्पाइनल फ्यूजन सर्जरी से पीठ के दर्द में आराम मिल जाता है, लेकिन ऐसा बहुत ही कम मामलों में देखा गया है कि सर्जरी के बाद दर्द व अन्य लक्षण पूरी तरह से ठीक हो गए हों। यदि आप नियमित रूप से व्यायाम करते हैं और शारीरिक वजन कम करते हैं तो आपको अच्छे परिणाम मिल सकते हैं।

डॉक्टर को कब दिखााएं?

यदि स्पाइनल फ्यूजन सर्जरी के बाद आपको निम्न में से कोई भी समस्या महसूस होती है, तो डॉक्टर से संपर्क कर लेना चाहिए -

(और पढ़ें - पीठ दर्द के घरेलू उपाय)

स्पाइनल फ्यूजन सर्जरी से क्या जोखिम होते हैं?

स्पाइनल फ्यूजन सर्जरी से कुछ जोखिम व जटिलताएं हो सकती हैं, जिनमें निम्न शामिल हैं -

  • तंत्रिकाएं क्षतिग्रस्त होना
  • आंत, मूत्राशय या टांग की मांसपेशियों में लकवा होना
  • स्पाइनल फ्लूइड का रिसाव होना
  • घाव में संक्रमण होना
  • फ्यूजन के आसपास की कशेरुकाएं नष्ट होने लगना
  • रक्त का थक्का बनना
  • सांस लेने संबंधी समस्याएं
  • दवाओं से एलर्जी होना

इसके अलावा रीढ़ के जिस हिस्से की सर्जरी हुई है, आप उसे हिला-ढुला नहीं पाते हैं। साथ ही यह भी संभव है कि सर्जरी वाले हिस्से से ऊपर और नीचे की कशेरुकाओं पर अनावश्यक दबाव पड़ने लगे। वर्टिब्रा पर दबाव पड़ने से रीढ़ के हिलने-ढुलने की क्षमता प्रभावित होती है और भविष्य में रीढ़ संबंधी समस्याएं होने का खतरा भी बढ़ जाता है।

(और पढ़ें - एलर्जी के घरेलू उपाय)

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संदर्भ

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