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ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट एक तरह की मेडिकल जांच है। इस टेस्ट से यह पता किया जाता है कि आपके खून में ग्लूकोज कितनी तेजी से पहुंच रहा है। इस टेस्ट का इस्तेमाल आमतौर पर डायबिटीज, इन्सुलीन रजिस्टेंस, बीटा कोशिकाओं के कार्य में रुकावट और कई बार रिएक्टिव हाइपोग्लाइसेमियाएक्रोमेगली या कार्बोहाइड्रेट मेटाबोलिज्म जैसे दुर्लभ विकार की जांच करने के लिए किया जाता है। इस टेस्ट का सबसे सामान्य और जाना-माना वर्जन ओरल ग्लूकोज टोलेरेंस टेस्ट (ओजीटीटी) बताया जाता है। इस टेस्ट से यह पता किया जाता है कि खाने के बाद हमारे शरीर में भोजन के ग्लूकोज का कितने प्रतिशत हिस्सा ब्लड तक पहुंचता है। 

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इस टेस्ट के लिए सबसे पहले आपको एक निश्चित मात्रा में ग्लूकोज खाने को दिया जाता है। उसके 2 घंटे बाद शरीर में ग्लूकोज की मात्रा की जांच की जाती है। कुछ टेस्ट में यह यह अंतराल 3 घंटे का रखा जाता है और खिलाए गए ग्लूकोज की मात्रा में भी बदलाव कर देते हैं। इन्हें क्रमश: 2 ऑवर ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट और 3 ऑवर ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट कहते हैं। जीटीटी के कई सालों तक अलग-अलग उद्देश्यों के लिए अलग अलग रूप तैयार किए जाते रहे हैं। ग्लूकोज की अलग-अलग मात्रा, अलग-अलग अंतराल के साथ अलग-अलग प्रयोजनों से इन टेस्ट का उपयोग करके खून में ब्लड ग्लूकोज के साथ अलग-अलग तत्वों की जांच भी की जाती है।

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  1. ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट क्या होता है? - What is Glucose tolerance Test in Hindi?
  2. ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट क्यों किया जाता है - What is the purpose of Glucose tolerance Test in Hindi?
  3. ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट से पहले - Before Glucose tolerance Test in Hindi
  4. ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट के दौरान - During Glucose tolerance Test in Hindi
  5. ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट के बाद - After Glucose tolerance Test in Hindi
  6. ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट के क्या जोखिम हैं? - What are the risks associated with Glucose tolerance test in hindi?
  7. ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट के परिणाम का क्या मतलब होता है? - What do the results of Glucose tolerance Test mean in Hindi?

ग्लूकोज टोलरेंस टेस्ट एक तरह का लैब टेस्ट है। इस टेस्ट के माध्यम से यह पता किया जाता है कि हमारा शरीर हमारे द्वारा खाए गए शूगर को ब्लड से होते हुए मांसपेशियों और टीशूज तक कितना पहुंचा रहा है। ज्यादातर मामलों में इस टेस्ट का इस्तेमाल शूगर की जांच के लिए किया जाता है। हालांकि, गर्भावस्था के दौरान शुगर की जांच के लिए टेस्ट अलग तरह से किया जाता है।

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ग्लूकोज एक तरह का शुगर होता है, जिसे हमारा शरीर इस्तेमाल करता है। जिन लोगों में शूगर की बीमारी होती है, उनके खून में ग्लूकोज का स्तर बहुत अधिक होता है। ज्यादातर मामलों में जो महिलाएं गर्भवती नहीं हैं, उनके इलाज में जो सबसे पहले टेस्ट किये जाते हैं, वो निम्नलिखित हैं:

  • फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज लेवेल:
    ग्लूकोज की मात्रा अगर दो अलग अलग टेस्ट में 126 mg/dL (7 mmol/L) है तो डायबिटीज का पता चलता है। 
     
  • हीमोग्लोबिन ए1सी टेस्ट:
    हीमोग्लोबिन ए1सी टेस्ट रिपोर्ट में अगर मात्रा 6.5% या उससे अधिक आती है तो डायबिटीज का पता चलता है।

ग्लूकोज टॉलेरेंस टेस्ट का इस्तेमाल डायबिटीज की जांच के लिए किया जाता है। ओरल ग्लूकोज टोलेरेंस टेस्ट (ओजीटीटी) का इस्तेमाल शूगर के इलाज के लिए स्क्रीनिंग के रूप में किया जाता है। इस जांच के लिए व्यक्ति को खाली पेट (बिना कुछ खाए-पिए) जांच करवानी होती है। अगर व्यक्ति में खाली पेट ग्लूकोज की मात्रा ज्यादा है लेकिन यह बहुत ज्यादा नहीं है (यानी 125 mg/dL या 7 mmol/L के बीच है) तो आपको इलाज के लिए डॉक्टर के पास जाना चाहिए। अगर शरीर में ग्लूकोज की मात्रा असाधारण रूप से बढ़ी हुई है तो यह डायबिटीज होने से पहले की स्थिति है। यह संकेत है कि भविष्य में आपको डायबिटीज की शिकायत हो सकती है। 

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जैसा पहले बताया गया है कि ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट की तैयारी के लिए एक रात तक (8 से 16 घंटों तक) के लिए खाली पेट रहना होता है। इसके अलावा आपको किसी तरह की कोई विशेष तैयारी नहीं करनी होती है। यानी बाकी दिनचर्या के काम रोज के दिनों की तरह कर सकते हैं। हालांकि इस टेस्ट से पहले इस बात का ख्याल रखना होता है कि टेस्ट वाले दिन जांच से पहले किसी तरह की कॉफी या कौफीन जैसी चीजों का सेवन न करें। इसका कारण यह है कि ये चीजें आपको उत्तेजित करती हैं। इससे आप सामान्य से ज्यादा सक्रिय होते हैं। जिसके कारण जांच रिपोर्ट प्रभावित हो सकती है।

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इस टेस्ट को किसी डॉक्टर के यहां या फिर किसी लैब में करवाया जा सकता है। इस टेस्ट के लिए सबसे पहले तो आपके ब्लड का सैंपल लिया जाता है। उस सैंपल से आपके खून में बेसलाइन ग्लूकोज का स्तर मापा जाता है। यह टेस्ट को एक तरह से ब्लड ग्लूकोज टेस्ट होता है। इसे फास्टिंग ग्लूकोज टेस्ट भी कहा जाता है। इसके बाद टेस्ट किस तरह से किया जाएगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपके डायबिटीज की जांच की जा रही है या गेस्टेनल डायबिटीज की जांच की जा रही है। इस जांच में तीन घंटे तक का समय लग सकता है।

इस टेस्ट की तरह ही इन्ट्रेवेनस ग्लूकोज टोलेरेंस टेस्ट होता है। इसका इस्तेमाल बहुत कम होता है। आमतौर पर इस टेस्ट का उपयोग डायबिटीज की जांच में नहीं किया जाता है। इस टेस्ट के एक रूप में आपकी नस में इंजेक्शन से तीन मिनट तक ग्लूकोस चढ़ाया जाता है। इंजेक्शन से पहले और इंजेक्शन के एक तथा तीन मिनट बाद खून में इंसुलिन का स्तर नापा जाता है। हालांकि, समय थोड़ा अंतर हो सकता है। अधिकांश तौर पर यह टेस्ट हमेशा शोध कार्य के उद्देश्य से ही किया जाता है।

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ग्लूकोज के घोल को पीना मीठे सोड़े को पीने जैसा ही है। इस टेस्ट के साइड इफेक्ट्स अपने आप में बहुत असामान्य हैं। इस टेस्ट के लिए ब्लड जांच करते समय कुछ लोगों को मतली आ सकती है, पसीना हो सकता है या सिर में हल्कापन महसूस हो सकता है। कुछ लोगों को सांस फूलने की समस्या हो सकती है। कई बार कुछ लोगों को ग्लूकोज पीने के बाद बेहोशी आ सकती है। अगर आपको इसमें से किसी तरह की कोई समस्या है तो अपने डॉक्टर से इस बारे में बात करें, उन्हें बताएं।

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टेस्ट के लिए जिस समय आपको सुई लगाई जाती है, कुछ लोगों को हल्का सा दर्द हो सकता है। जबकि कुछ लोगों को हल्का सी चुभन हो सकती है। उसके बाद उस जगह पर हल्का सा सुई की नोक जितना घाव हो सकता है, जो की जल्द ही ठीक हो सकता है। 

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टेस्ट के बाद वाले पैराग्राफ में आपने इस टेस्ट के बाद आने वाली परेशानियों के बारे में पढ़ा होगा। यानी जांच के बाद सुई लगाई जाने वाली जगह पर घाव, दर्द और संक्रमण जैसी स्थितियां हो सकती हैं। चूंकि हर आदमी की नसों, धमनियों और मांसपेशियों की साइज अलग-अलग होती हैं। इसीलिए अलग-अलग आदमियों के लिए खून की जांच कराने का अनुभव व परेशानियां अलग-अलग हो सकती हैं। 

अगर हम इस टेस्ट से संबंधित अन्य जोखिम की बात करें तो वे निम्नलिखित हैं: 

  • जांच वाली नस में सुई चुभोने के कारण कई बार निशान बन जाना। 
  • सिर में हल्कापन महसूस करना या फिर बेहोशी महसूस करना। 
  • हेमाटोमा यानी स्किन के अंदर खून का जमा होना। 
  • संक्रमण (स्किन के कट जाने से) होना। 

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जो महिलाएं गर्भवती नहीं हैं, उनके लिए टाइप 2 डायबिटीज की जांच के लिए नॉर्मल बैल्यू 75 ग्राम ओजीटीटी माना जाता है। खाली पेट रहने पर यह 60 से लेकर 100 mg/dL (3.3 से लेकर 5.5 mmol/L), 1 घंटे बाद 200 mg/dL (11.1 mmol/L) से कम जबकि 2 घंटे बाद 140 mg/dL (7.8 mmol/L) से कम नार्मल माना जाता है।

उपर दिए गए उदाहरण इन टेस्ट्स के लिए मोटे तौर पर एक पैमाना है। अलग-अलग लैब में जांच करवाने पर नॉर्मल वैल्यू रेंज बदल सकती है। कुछ लैब में अलग-अलग सैंपल्स या अलग-अलग मेजरमेंट का इस्तेमाल करते हैं। टेस्ट रिजल्ट आने के बाद रिजल्ट के बारे में अपने डॉक्टर से बात करें। ग्लूकोज का स्तर अगर सामान्य स्तर से अधिक है तो इसका मतलब है कि आपको जल्द ही डायबिटीज या तो हो सकती है या फिर हो चुकी है।

2 घंटे बाद की वैल्यू की बात करें तो यह 140 और 200 mg/dL (7.8 and 11.1 mmol/L) के बीच भी हो सकता है। इसे इम्पेयर्ड ग्लूकोज टोलेरेंस भी कहा जाता है। डॉक्टर इसे "प्री-डायबिटीज" भी कहते हैं। इसका मतलब है कि समय के साथ-साथ आपको डायबिटीज का खतरा है। अगर शरीर में ग्लूकोज का स्तर 200 mg/dL (11.1 mmol/L) या उससे अधिक है तो आपको डायबिटीज के इलाज की जरूरत है।

शरीर में कुछ गंभीर तरह के तनाव जैसे, ट्रॉमा, स्ट्रोक, हार्ट अटैक या सर्जरी से खून में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है। कई तरह के एक्सरसाइज हैं, जिनके माध्यम से आप खून में ग्लूकोज की मात्रा को कम करके नियंत्रित कर सकते हैं। कुछ दवाएं आपके शरीर में ब्लड ग्लूकोज का लेवल बढ़ा या घटा सकती हैं। इसलिए अगर आप किसी तरह की कोई दवा का इस्तेमाल करते हैं तो टेस्ट से पहले अपने डॉक्टर को इस बारे में बता दें। 

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