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कई लोगों को लगता है कि अस्थमा की समस्या बच्चों को नहीं हो सकती है। लेकिन आपको बता दें कि बच्चे को अन्य रोगों की तरह ही अस्थमा भी हो सकता है। वायुमार्गों में लंबे समय तक रहने वाली सूजन की स्थिति को अस्थमा कहा जाता है। बाहरी एलर्जी और जलन करने वाले तत्व जब सांसों के जरिए अंदर जाते हैं, तो यह फेफड़ों में संवेदनशीलता को बढ़ा देते हैं, जिसकी वजह से वायुमार्गों में सूजन आ जाती है। इस समस्या में फेफड़ों से सांस अंदर व बाहर जाने का मार्ग बाधित हो जाता है। प्रदूषण व अन्य जलन पैदा करने वाले पदार्थों पर जब प्रतिरक्षा तंत्र प्रतिक्रिया करता है तो इसके परिणामस्वरूप बच्चों को अस्थमा हो जाता है, इसलिए एलर्जी और अस्थमा को एक दूसरे से जुड़ा हुआ माना जाता है। 12 महीनों से कम उम्र के शिशुओं के लिए यह एक गंभीर स्थिति होती है।

(और पढ़ें - बच्चों की देखभाल)  

बच्चों में अस्थमा एक गंभीर समस्या है, इसका समय रहते इलाज न किया जाए तो यह एक घातक समस्या बन सकती है। इस लेख में आपको बच्चों में अस्थमा के लक्षण, बच्चों में अस्थमा के कारण, बच्चों का अस्थमा से बचाव व बच्चों में अस्थमा का इलाज आदि को विस्तार से बताया गया है। 

(और पढ़ें - अस्थमा के घरेलू उपाय)

  1. बच्चो में अस्थमा के लक्षण - Bacho me asthma ke lakshan
  2. बच्चों में अस्थमा के कारण - Baccho me asthma ke karan
  3. बच्चों का अस्थमा से बचाव कैसे करें - Bache ka asthma se bachav kaise kare
  4. बच्चों की अस्थमा का परीक्षण - Bacho ki asthma ka parikshan
  5. बच्चों मे अस्थमा का इलाज - Bacho me asthma ke ilaj

श्वसन संक्रमण की वजह से बच्चों को अस्थमा के शुरूआती लक्षण महसूस होते हैं। अगर आपके बच्चे को किसी भी समय श्वसन तंत्र में वायरल इन्फेक्शन हो, तो उसको अवश्य ही अस्थमा के लक्षण महसूस होते हैं। वयस्कों के मुकाबले बच्चों के वायुमार्ग काफी छोटे होते हैं, ऐसे में इनमें हल्की सूजन भी सांस लेने में मुश्किल की वजह बन जाती है।

बच्चों के अस्थमा में निम्न लक्षणों को शामिल किया जाता है।

  • तेज-तेज सांसे लेना :
    अस्थमा होने पर बच्चा सांस तेजी से लेता है, साथ ही उसके द्वारा ली जाने वाली सांसों के बीच का अंतराल भी बेहद कम हो जाता है। औसतन, शिशु एक मिनट में 30 से 60 बार सांस लेता है, जबकि 3 से 12 महीनों के बीच वो 20 से 40 बार सांसे लेने लगता है। अस्थमा के कारण शिशु के सांस लेने की दर करीब पचास प्रतिशत बढ़ जाती है।
    (और पढ़ें - अस्थमा में क्या खाना चाहिए)
     
  • सांस लेने में दिक्कत होना :
    शिशु को फेफड़ों तक हवा ले जाने के लिए जोर लगाना पड़ता है। इस दौरान शिशु के नथुने फूलना, सांस लेते समय पसलियों को अंदर दबाना व पेट को ज्यादा हिलाना आदि सांस लेने में होने वाली परेशानी को दर्शाते हैं।
    (और पढ़ें - सांस लेने में दिक्कत हो तो क्या करे)
     
  • सीने में अकड़न :
    बच्चे का सीना छूने पर कठोर लगना, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सांस फूलने से थ्रोरेकिक मांसपेशियों (thoracic muscles) में अकड़न आ जाती है।
    (और पढ़ें - सांस फूलने के उपाय)
     
  • घरघराहट :
    सांस लेते समय सिटी की तरह आवाज निकलना, जो सांस फूलने की तरह ही लगता है। 
     
  • ज्यादा खांसी आना :
    बच्चों की खांसी का अनियंत्रित होना, खासकर देर शाम या रात के दौरान बच्चा बार-बार खांसता है।
    (और पढ़ें - खांसी के लिए घरेलू उपाय)
     
  • खाने में परेशानी :
    अस्थमा के कारण बच्चा सही तरह खाना नहीं खा पाता है, ऐसा सांस लेने में परेशानी की वजह से होता है।
     
  • थकान और सुस्ती :
    बच्चा आम दिनों की अपेक्षा कम एक्टिव रहता है और उसको थकानसुस्ती महसूस होती है।
    (और पढ़ें - थकान दूर करने के घरेलू उपाय)
     
  • त्वचा या नाखूनों का पीला या नीला होना :
    शरीर में ऑक्सीजन की कमी के कारण बच्चे के होंठ व नाखून पीले या नीले हो जाते हैं।   

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अस्थमा के मूलभूत कारणों का पता नहीं लगाया जा सका है। हालांकि, विशेषज्ञ इसको अनुवांशिक समस्या मानते हैं। विकारग्रस्त जीन का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचने से बच्चों को अस्थमा होता है। यदि गर्भावस्था के दौरान महिला धूम्रपान करती है तो इससे भी बच्चे में अस्थमा होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। इसके अलावा अनुवांशिक एलर्जी जैसे एक्जिमा को भी अस्थमा से संबंधित माना जाता है।

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शिशु व बच्चों में अस्थमा होने के कारण निम्न प्रकार से व्यक्त हैं:

  • एलर्जी :
    हवा और खाने में मौजूद एलर्जिक पदार्थ से भी शिशु में अस्थमा की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। धूल के कण, कीड़ों के मल और जानवरों के बालों को एलर्जिक पदार्थ में शामिल किया जाता है।
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  • श्वसन तंत्र में संक्रमण : 
    ऊपरी श्वसन तंत्र में संक्रमण जैसे- सर्दी जुकाम, निमोनियाफ्लू आदि से अधिक बलगम बनने के साथ ही वायुमार्गों में सूजन आ जाती है। यह स्थिति अस्थमा की संभावना बढ़ा देती है।
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  • वायु प्रदूषण :
    वाहनों व धूम्रपान से निकालने वाले धुएं से अस्थमा का अटैक पड़ने की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा तेज गंध या सुगंध भी अस्थमा की वजह हो सकती है।
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  • शारीरिक क्रियाएं : 
    ज्यादा दौड़ने भागने वाले खेलों के कारण भी अस्थमा होने की संभावना होती है। इस तरह के अस्थमा अटैक को एक्सरसाइज से होने वाला अस्थमा (exercise induced asthma) कहा जाता है।
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  • विशेष तरह की दवाएं : 
    मुख्य रूप से नॉन स्टेरॉयडल एंटी इंफ्लेमेटरी श्रेणी में आने वाली दवाएं, प्रतिरक्षा तंत्र की तरह ही कार्य करती हैं और इनकी वजह से शिशु को अस्थमा होने की संभावना बढ़ जाती है।
     
  • खाद्य संरक्षक :
    एक साल तक के बच्चों को कई तरह के खाद्य पदार्थों लेने की आवश्यकता होती है, जिसमें विशेष तरह के संरक्षक (preservatives) मिलें होते हैं। खाने की चीजों में मिले कुछ तरह के संरक्षक बच्चों में फूड एलर्जी की संभावना बढ़ाते हैं, और फूड एलर्जी भी अप्रत्यक्ष रूप से अस्थमा होने का कारण होती है।     

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अक्सर माता-पिता बच्चों को अस्थमा के लक्षणों को कम करने व इस रोग से बचाव के उपाय खोजते रहते हैं। ऐसे में आगे आपको कुछ उपाय बताए गए हैं जिनकी मदद से आप अपने बच्चे को अस्थमा व इसके लक्षणों से दूर रख सकते हैं। इन उपायों को आगे जानें-

  • जिस कमरे में आपका बच्चा रहता हो या उसका ज्यादा समय बीतता हो, उसे साफ सुथरा और धूल मुक्त रखें।
  • बच्चे को पालतू जानवरों से दूर रखें।
  • बच्चे को अस्थमा फैलाने वाले कारक जैसे- धूम्रपान और वाहन से निकलने वाले धुआं आदि से दूर रखें। (और पढ़ें - नवजात शिशु की खांसी का इलाज)
  • अपने बच्चे को खेलने के लिए गंदे खिलौने ना दें, जहां तक संभव हो सप्ताह में एक बार अपने बच्चों के खिलौनों को जरूर धोए।
  • बच्चे के कमरे ह्युमिडिटीफायर लगाए, इससे बच्चे को नमी वाले वातावरण के चलते सांस लेने की मुश्किल नहीं होती है।
  • बच्चे को घर में बना खाना ही दें। एलर्जी करने वाले खाद्य पदार्थ बच्चे के आहार में शामिल ना करें। (और पढ़ें - बेबी को सुलाने के टिप्स)

 ऊपर बताए गए उपायों से आप केवल अस्थमा के लक्षणों को कम कर सकते हैं, जैसे ही आप बच्चे में अस्थमा के किसी भी तरह के लक्षण देखें, तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लें।          

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बच्चों में अस्थमा की जांच किसी एक टेस्ट से नहीं की जा सकती है। डॉक्टर इस रोग की पहचान के लिए निम्न तरह के टेस्ट कर सकते हैं-

  • परिवार के लोगों की पूर्व स्वास्थ्य स्थितियों को जानना :
    इसमें डॉक्टर आपके परिवार के लोगों के पहले की स्वास्थ्य स्थिति का पूरा ब्यौरा लेते हैं। इससे डॉक्टर परिवार में एलर्जी, एक्जिमा और अस्थमा के बारे में जानने की कोशिश करते हैं।
    (और पढ़ें - एलर्जिक राइनाइटिस के घरेलू उपाय)
     
  • एक्स रे :
    इसमें एक्स रे के द्वारा श्वसनमार्गों में रुकावट, बलगम की स्थिति और ऊतकों में सूजन की जांच की जाती है।
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  • ब्लड टेस्ट :
    ब्लड टेस्ट से बच्चे के रक्त में इओसिनोफिल (eosinophil) की संख्या की जांच की जाती है। रक्त में इओसिनोफिल की अधिक संख्या अस्थमा की ओर संकेत करती है। 

(और पढ़ें - सीआरपी ब्लड टेस्ट क्या है)

अस्थमा का कोई भी इलाज मौजूद नहीं है। इस रोग में दी जानें वाली दवाएं केवल लक्षण को कम करने का काम करती हैं। बच्चों को अस्थमा की दवाएं कई तरह से दी जाती हैं, जिसमें शामिल हैं –

  • नेब्यूलाइजर (nebulizer) :
     ये एक प्रकार की मशीन होती है, जिसको बच्चे के मुंह और नाक में लगाया जाता है। इस मशीन के एक हिस्से में तरल दवा डाली जाती है, जो भाप के रूप में बच्चे को दी जाती है।
    (और पढ़ें - नेबुलाइजर मशीन क्या है)
     
  • मिटर्ड डोज इनहेलर (metered dose inhaler: एमडीआई) :
    इसको अस्थमा पम्प भी कहते हैं। इसमें इनहेलर को बच्चे के मुंह में डालकर पम्प करना होता है। पम्प करने के साथ ही बच्चा सांस के जरिए दवा को अंदर ले लेता है।
      
  • ड्राई पाउडर इनहेलर (dry power inhaler: डीपीआई) :
    ये इनहेलर एक डिस्क की तरह होता है। इसमें पाउडर वाली कैप्सूल को डाला जाता है। यह काफी हद तक मिटर्ड डोज इनहेलर की तरह ही होता है।
     
  • इंजेक्शन

अस्थमा में ली जाने वाली दवाएं

मुख्य रूप से तीन प्रकार की दवाओं को अस्थमा के इलाज में शामिल किया जाता है। इन तीनों प्रकार को नीचे विस्तार से बताया गया है।

  • लंबे समय के बचाव के लिए दवाएं :
    इन दवाओं को अस्थमा के इलाज में लंबे समय तक रोगी को दिया जाता है। अस्थमा के लक्षणों से बचाव के लिए शिशु को यह दवाएं रोजाना दी जाती है। इसमें सामान्य रूप से निम्न दवाएं बच्चों को दी जाती हैं। (और पढ़ें - शिशु के निमोनिया का इलाज)
     
    • सांस के जरिए लिए जाने वाली कोर्टिकोस्टेरॉयड :
      कोर्टिकोस्टेरॉयड फेफड़ों के अंदर मौजूद श्वसन मार्ग (bronchioles) की सूजन को कम करने में सहायक होती है। (और पढें - बच्चों की इम्यूनिटी कैसे बढ़ाएं)
       
    • लंबे समय तक असर करने वाले बीटा एगोनिस्ट : 
      यह केमिकल पदार्थ होता है जो फेफड़ों के अंदर मौजूद श्वसन मार्ग (bronchioles) की बाहरी नरम मांसपेशियों को फैलाता है।
       
  • तुरंत आराम के लिए दी जाने वाली दवाएं :
    इन दवाओं को अस्थमा के तुरंत इलाज के लिए बच्चों को दिया जाता है। ये दवाएं एमडीआई या सीधे नसों के द्वारा दी जा सकती हैं। तुरंत आराम पहुंचाने वाली दवाएं सीने की मांसपेशियों के अकड़न, सांस फूलने और घरघराहट की समस्या में जल्द आराम पहुंचाती हैं। इसमें निम्न दवाओं को शामिल किया जाता है।
     
    • कम समय के लिए असर करने वाली बीटा एगोनिस्ट :
      यह लंबे समय तक असर करने वाली दवाओं से संबंधित होती है, लेकिन यह तेजी से और कम समय के लिए असर करती हैं। (और पढ़ें - बच्चों का टीकाकरण चार्ट)
       
    • आईप्राट्रोपियम :
      यह एक ऐसा औषधीय तत्व है, जो सांस लेने में आनी वाली समस्या को कम करता है। साथ ही यह दवा अस्थमा के अटैक में भी प्रभावी रूप से काम करता है।
       
    • नसों से दी जाने वाली कार्टिकोस्टेरॉयड :
      यह कम समय के लिए आराम पहुंचाती है और अस्थमा के गंभीर मामलो में इस्तेमाल नहीं की जाती है। (और पढ़ें - नवजात शिशु के सर्दी जुकाम का इलाज
  • अस्थमा करने वाली एलर्जी के लिए दवाएं :
    इसमें निम्न को शामिल किया जाता है।
    • एलर्जी शॉट (Allergyshot)
    • ओमालीजूमैब (Omalizumab)
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